सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला १४१
मुख पर चंद डारौँ वारि।
कुटिल कच पर भौँर वारौँ, भौंह पर धनु वारि।
भाल-केसरि-तिलक छवि पर, मदन-सर सत वारि।
मनु चली बहि सुधा-धारा, निरखि मन द्यौँ वारि।
नैन सुरसति-जमुन-गंगा, उपम डारौँ वारि।
मीन खंजन मृगज वारौँ, कमल के कुल वारि।
निरखि कुंडल तरनि वारौँ, कूप स्रवननि वारि।
झलक ललित कपोल-छवि पर, मुकुट सत-सत वारि।
नासिका पर कीर वारौँ, अधर बिद्रुम वारि।
दसन पर कन-बज्र वारौँ, बीज दाड़िम वारि।
चिबुक पर चित-बित्त धारौँ, प्रान डारौँ वारि।
सूर हरि की अंग-सोभा, को सकै निरवारि ॥१५५॥
अर्थ—कृष्ण के मुख पर चन्द्रमा को निछावर कर दूँ। कुटिल लटों पर भौंरे
को तथा भौंह पर धनुष निछावर (करती हूँ)। मस्तक पर केसर के तिलक की शोभा
पर मदन के सैकड़ो बाण निछावर हैं। (वह ऐसा प्रतीत होता है) मानो अमृत की
धारा बह चली हो और उसे देखकर मन को निछावर कर दूँ। नैनों पर सरस्वती,
यमुना और गङ्गा को उपमा निछावर कर दूँ। तब मछली, खंजन, मृग शावक तथा
कमल के समूह निछावर (है)। कुंडल को देखकर सूर्य को निछावर कर दूं और कानों
पर कुआं को निछावर देती हूँ। सुन्दर कपोल की शोभा की झलक पर सैकड़ों मुकुट
निछावर हैं। नासिका पर तोता तथा ओंठ पर मूँगे को वारती हूँ। दांतो पर हीरे के
दानो तथा अनार के बीज को निछावर करती हूँ। ठुड्डी पर चित्त की वृत्ति को धरती
हूँ और प्राणो को निछावर करती हूँ। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के अङ्ग की शोभा
का निर्णय कौन कर सकता है ॥१५५॥
नेत्र अनुराग
नैन न मेरे हाथ रहे।
देखत दरस स्याम सुन्दर कौ, जल की ढरनि बहे।
वह नीचे कौँ धावत आतुर, वैसेहि नैन भए।
वह तो जाइ समात उदधि मैं, ये प्रति अंग रए।
यह अगाध कहुँ वार पार नहिँ, येउ सोभा नहिँ पार।
लोचन मिले त्रिवेनी ह्वैकै, सूर समुद्र अपार ॥१५६॥
अर्थ-(गोपियां कहती हैं) आँखें मेरे वश मे नही रहती। सुन्दर कृष्ण का
दर्शन करते ही जल की तरह ढल कर बह जाती हैं। वह (जल) नीचे की ओर आतुर
होकर दौड़ता है वैसे ही नेत्र भी हो गये है। वह तो जाकर समुद्र में समा-
जाता है, किन्तु ये (नेत्र) कृष्ण के हर अङ्ग पर मोह गये हैं। यह (समुद्र) अगाध है