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सर्वकोश
सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला १३७
स्याम भुजनि की सुन्दरताई ।
चन्दन खौरि अनूपम राजति, सो छवि कही न जाई ।
बड़े बिसाल जानु लौं परसत, इक उपमा मन आई ।
मनौ भुजंग गगन तैं उतरत, अधमुख रह्यौ झुलाई ।
रत्न-जटित पहुँची कर राजति, अँगुरी सुन्दर भारी ।
सूर मनौ फनि-सिर मनि सोभित, फन-फन की छबि न्यारी ॥१४६॥
अर्थ-कृष्ण की भुजाओ की सुन्दरता तथा मस्तक पर लगे हुए चन्दन के
तिलक की शोभा कही नही जा सकती । (भुजाएँ) बहुत विशाल हैं और घुटने तक
छूती हैं । एक उपमा मन मे आती है मानो आकाश से उतरता हुआ सर्प अधोमुख
झूल रहा हो । हाथ में रत्न जड़ित पहुँची शोभित है। अँगुलियां अत्यन्त सुन्दर हैं।
सूरदास कहते हैं कि यह (ऐसे शोभित है) मानो सर्प के सिर पर मणि शोभित हो
तथा प्रति फण की शोभा न्यारी हो ॥१४६॥
स्याम-अंग जुवती निरखि भुलानी ।
कोउ निरखति कुंडल की आभा, इतनेहिं माँझ बिकानी ।
ललित कपोल निरखि कोउ अटकी, सिथिल भई ज्यौं पानी ।
देह-गेह की सुधि नहिँ काहूँ, हरषत कोउ पछितानी ।
कोउ निरखति रही ललित नासिका, यह काहू नहिँ जानी ।
कोउ चक्रित भइ दसन-चमक पर, चकचौंधी अकुलानी ।
कोउ निरखति दुति चिबुक चारु की, सूर तरुनि बिततानी ॥१४७॥
अर्थ-कृष्ण के अंगों को देखकर युवतियां भूल गयीं । कोई कुंडल की कान्ति
देखती है, इसी बीच बिक गयी । सुन्दर कपोल को देखकर कोई उलझ गयी और पानी
की तरह शिथिल हो गयी । किसी को शरीर और घर की याद नही । कोई पछताती
हैं, कोई प्रसन्न होती हैं । कोई सुन्दर नाक को देखती रही, यह कोई (अन्य) न जान
पायी । कोई ओठों की शोभा देखती है और मुख से वाणी नही फूटती । कोई दाँतो
की चमक से चकित होकर चकाचौंध से आकुल हो गयी । कोई सुन्दर ठोढ़ी की कान्ति
देखती हैं । सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार तरुणियां व्याकुल हो गयी ॥१४७॥
मैं बलि जाउँ स्याम-मुख-छबि पर ।
बलि-बलि जाउँ कुटिल कच बिथुरे, बलि-बलि भुकुटी ललाट पर ।
बलि-बलि जाउँ चारु अवलोकनि, बलि-बलि कुडल-रबि को ।
बलि-बलि जाउँ नासिका सुललित, बलिहारी वा छबि की ।
बलि-बलि जाउँ अरुन अधरनि की, विद्रुम-बिंब लजावन ।
मैं बलि जाउँ दसन चमकनि की, वारौं तड़ितनि सावन ।