सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराधा-कृष्ण
प्रथम मिलन
खेलत हरि निकसे ब्रज-खोरी ।
कटि कछनी पीतांबर बाँधे, हाथ लिये भौंरा, चक, डोरी ।
मोर-मुकुट, कुंडल स्रवननि वर, दसन-दमक दामिनि-छवि छोरी ।
गए स्याम रबि-तनया कैँ तट, अंग लसति चन्दन की खोरी ।
औचक ही देखी तहँ राधा, नैन बिसाल भाल दियेँ रोरी ।
नील बसन फरिया कटि पहिरे, बेनी पीठि रुलति झकझोरी ।
संग लरिकिनी चली इत आवति, दिन-थोरी, अति छवि तन-गोरी ।
सूर स्याम देखत हीँ रीझे, नैन-नैन मिलि परी ठगोरी ॥१॥
अर्थ—खेलते हुए कृष्ण ब्रज की सँकरी गली मे निकले, कमर में कछनी और
पीताम्बर बांधे हुए हैं और हाथ मे भौंरा (लट्टू) और लट्टू की डोरी लिए हुए हैं।
उनके (मस्तक पर) मोर का मुकुट है, कानो में श्रेष्ठ कुण्डल है और उनके दांतो की
चमक ने बिजली की छवि को छीन लिया है। कृष्ण यमुना के तट पर गये, उनके
अंग पर चंदन का लेप शोभित है। उन्होने अचानक ही वहां राधा को देखा, जिसके
नेत्र बड़े-बड़े थे तथा मस्तक पर तिलक लगा था, जिसने नीला वस्त्र तथा कमर में
घांघरी पहन रखी थी। जिसके पीठ पर झकझोरती हुई चोटी हिलती डुलती है। वह
लडकियों के साथ इधर ही चली आती है। वह थोडे दिन (कम उम्र) की (होते हुए
भी), अत्यधिक सुन्दर तथा गोरे शरीर की है। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण (उसे)
देखते ही रीझ गये। नेत्र से नेत्र मिलते ही जादू का सा असर हुआ ॥१॥
बूझत स्याम कौन तू गोरी ।
कहाँ रहति, काकी है बेटी, देखी नहींँ कहूँ ब्रज खोरी ।
काहे कौँ हम ब्रज-तन आवतिँ, खेलति रहतिँ अपनी पौरी ।
सुनत रहतिँ स्रवननि नँद-ढोटा,करत फिरत माखन-दधि-चोरी ।
तुम्हरौ कहा चोरि हम लैहैँ, खेलन चलौ संग मिलि जोरी ।
सूरदास प्रभु रसिक-सिरोमनि, बातनि भुरइ राधिका भोरी ॥२॥
अर्थ-कृष्ण (राधा) से पूछते है-गोरी तुम कौन हो। कहाँ रहती हो और
किसकी बेटी हो, (क्योकि) तुम्हें ब्रज की गलियो मे कभी नही देखता हूँ। (राधा उत्तर
देती है) मैं ब्रज में किसलिए आऊँ, (मैं) अपने द्वार पर खेलती रहती हूँ। माखन तथा