सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ सूरसागर सार सटीक
जिनमें आपका रूप नहीं । सूरदास कहते है कि कृष्ण तुम्हारे बिना घर वैसे ही है जैसे
वन के भीतर कुँआ (निरर्थक) हो ॥१३२॥
रीती मटुकी सीस धरैं ।
वन की घर की सुरति न काहूँ, लेहु दही या कहति फिरैं ।
कवहूँक जाति कुंज भीतर कीँ, तहाँ स्याम की सुरति करैं ।
चौँकि परतिं, कछु तन सुधि आवति, जहाँ तहां मुख सुनति ररैं ।
तब यह कहतिं कहीं मैं इनसौँ, भ्रमि भ्रमि वन में वृथा मरैं ।
सूर स्याम कैं रस पुनि छाकतिं, वैसे हीं ढँग बहुरि ढरैं ॥१३३॥
अर्थ - (गोपियां) खाली मटुकी सिर पर घर लेती है । वन की ओर घर की
(उन्हे) याद नही, लो दही यह कहती फिरती हैं । कभी कुंज के भीतर जाती हैं
और वहाँ कृष्ण की याद करती हैं । कुछ शरीर की याद आने पर चौंक पड़ती हैं ओर
जहाँ तहां सखियो को सुनाते हुए वार-वार कहती हैं । तब यह कहती हैं कि मुझे
इनसे क्या करना है जो वन घूम-घूमकर व्यर्थ मरती हूँ । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के
रस से पुनः मस्त हो जाती हैं वैसा ही ढङ्ग फिर धर लेती हैं ॥१३३॥
तरुनी स्याम-रस मतवारि ।
प्रथम जोवन-रस चढ़ायौ, अतिहि भई खुमारि ।
दूध नहिं दधि नहीँ, माखन नहीं रीती माट ।
महा-रस अँग-अंग पूरन, कहाँ घर, कहँ वाट ।
मातु-पितु गुरुजन कहाँ के, कौन पति को नारि ।
सूर प्रभु कैं प्रेम पूरन, छकि रहीं ब्रजनारि ॥१३४॥
अर्थ - तरुणिंयां कृष्ण के रस मे मतवाली हो गई हैं । प्रथम यौवन के रस के
चढ़ जाने से वे अत्यधिक शिथिल हो गयी । दूध नही, दही नही, मक्खन नही, मटुकी
खाली है। अंग-अंग मे महारस भर गया है । कहां घर और कहां रास्ता, कहाँ के
माता-पिता, कौन पति और कौन स्त्री (उन्हे कुछ भी ज्ञात नही) । सूरदास कहते हैं
कि कृष्ण के प्रेम-रस से पूर्ण ब्रज नारियां मस्त हो गयी हैं ॥१३४॥
कोउ माई लैहै री गोपालहिं ।
दधि की नाम स्यामसुंदर-रस, विसरि गयौ ब्रज-वालहिँ ।
मटुकी सीस, फिरति ब्रज-वीथिनि, बोलति बचन रसालहिँ ।
उफनत तक्र चहूँ दिसि चितवत, चित लाग्यौ नँद-लालहिँ ।
हँसति, रिसाति, बुलावति, वरजति, देखहु इनकी चालहिँ ।
सूर स्याम बिनु और न भावै, या विरहिनि बेहालहिँ ॥१३५॥
अर्थ- सखी, कोई गोपाल को लेगा । श्यामसुन्दर के रस मे ब्रज की युवती
को दही का नाम ही भूल गया । मटुकी को सिर पर (धर के) ब्रज की गलियो मे रस
से भरी बाते कहती है । मट्ठा के उफनते समय चारों दिशाओ मे देखती है उसका मन