सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

११४ सूरसागर सार सटीक
गरव भयौ ब्रजनारि कौं, तबहीँ हरि जाना ।
राधा प्यारी संग लिये, भए अंतर्धाना ।
गोपिनि हरि देख्यौ नहीं, तब सब अकुलाई ।
चकित होइ पूछन लगीं, कहँ गए कन्हाई ।
कोउ मर्म जानैँ नहीं, व्याकुल सब बाला ।
सूर स्याम ढूँढ़ति फिरैं, जित-तित ब्रज-बाला ॥८७॥
अर्थ—(जब) ब्रज की नारियो को गर्व हो गया तभी कृष्ण ने जान लिया ।
राधा प्यारी को साथ लेकर वे अन्तर्ध्यान हो गये । गोपियाँ हरि को न देखकर व्याकुल
हो गयी । चकित होकर पूछने लगी कि कृष्ण कहां गये । कोई मर्म को नही जानती हैं,
(इससे) सभी गोपियाँ व्याकुल है । सूरदास कहते है कि गोपियां जहां-तहां (कृष्ण) को
खोजती फिरती हैं ॥८७॥
तुम कहूँ देखे स्याम बिसासी ।
तनक बजाइ बाँस की मुरली, लै गए प्रान निकाशी ।
कबहुँक आगैं, कबहुँक पाछैं, पग-पग भरति उसासी ।
सूर स्याम-दरसन के कारन, निकसीँ चंद-कला सी ॥८८॥
अर्थ—तुमने कही धोखेवाज कृष्ण को देखा है । तनिक बांस की वंशी बजाकर
वे प्राणो को निकाल ले गये । कभी आगे कभी पीछे (गोपियां) लम्बी सांस भरती हैं ।
सूरदास कहते हैं कि श्याम कृष्ण के दर्शन के लिए चन्द्रमा की कला के समान वे निकल
पडी ॥८८॥
कहि धौँ री बन वेलि कहूँ तैं, देखे हैं नंद-नंदन ।
बूझहु धौँ मालती कहूँ तैं, पाए हैं तन-चंदन ।
कहि धौँ कुंद, कदब, बकुल, बट, चंपक, ताल, तमाल ।
कहि धौँ कमल कहाँ कमलापति, सुन्दर नैन बिसाल ।
कहि धौँ री कुमुदिनि, कदली कछु, कहि बदरी करबीर ।
कहि तुलसी तुम सब जानति हौ, कहँ घनस्याम सरीर ।
कहि धौँ मृगी मया करि हमसौँ, कहि धौँ मधुप मराल ।
सूरदास-प्रभु के तुम सगी, हैं कहँ परम कृपाल ॥८६॥
अर्थ—वन की लताओं, निश्चय ही बताओ कि तुमने कृष्ण को कही देखा है ।
मालती तुम (तनिक) बूझो कि शरीर के लिए चन्दन के समान (कृष्ण) को तुमने
कही पाया है। कुद, कदम्ब, बकुल, वट, चम्पा, ताल, तमाल तुम लोग (कृष्ण को)
बताओ कहाँ है । कमल कहो लक्ष्मी के पति सुन्दर विशाल नयनो वाले कृष्ण कहाँ हैं।
कुमुदिनी, कदली, बेर, कनैेर (तुम लोग) कुछ कहो । तुलसी तुम सब कुछ जानती हो,
घन के समान साँवले शरीर वाले कृष्ण कहाँ है। हिरणी हमसे प्रेम करके बताओ तथा

वृन्दावन लीला ५१५
हे भ्रमर और मराल कहो कि कृष्ण कहां है। सूरदास तुम कृष्ण के साथी हो परम
कृपाल कृष्ण कहां है ॥८८॥
स्याम सबनि कौं देखही, वै देखतिं नाहीँ ।
जहाँ तहाँ व्याकुल फिरैं, धोर न तनु माहीँ ।
कोउ बंसीबट कौं चली, कोउ बन घन जाहीँ ।
देखि भूमि वह रास की, जहँ-तहँ पग-छाहीँ ।
सदा हठीली, लाड़िली, कहि-कहि पछिताहीँ ।
नैन सजल जल ढारहीँ, व्याकुल मन माहीँ ।
एक-एक ह्वै ढूँढहीँ, तरुनी बिकलाहीँ ।
सूरज प्रभु कहुँ नहिँ मिले, ढूँढ़ति द्रुम पाहीँ ॥६०॥
अर्थ—कृष्ण सबको देखते है, लेकिन वे (गोपियां) नही देखती। जहाँ तहाँ
व्याकुल होकर घूमती है, शरीर में धीरज नही है। कोई वंशीवट की ओर चली कोई
घने वन में जाती हैं। वे रास की भूमि देखकर जहां तहां पग की छाया देखती हैं ।
(हम) सदा हठ करने वाली तथा दुलारी हैं यह कह कहकर पछताती है। नयनो से जल
ढुलकाती हैं और मन से व्याकुल हैं। एक-एक करके ढूंढती है और (न पाने पर)
युवतियां विकल हो जाती है। सूरदास कहते हैं कि गोपियां वृक्षों के बीच ढूंढती हैं
लेकिन कृष्ण मिलते नही ॥६०॥
तब नागरि जिय गर्ब बढ़ायौ ।
मो समान तिय और नहीँ कोउ, गिरिधर मैँ हीँ बस करि पायौ ।
जोइ-जोइ कहति करत पिय सोइ सोइ, मेरैँ ही हित रास उपायौ ।
सुन्दर, चतुर और नहिँ मोसी, देह धरै कौ भाव जनायौ ।
कबहुँक बैठि जाति हरि कर धरि, कबहुँ कहति मैँ अति श्रम पायौ ।
सूर स्याम गहि कंठ रहो तिय, कंध चढ़ी यह बचन सुनायौ ॥६१॥
अर्थ—तब राधा के मन मे (कृष्ण) ने गर्व बढ़ा दिया। वे समझती है मेरे
समान कोई और स्त्री नही है। गिरिधर कृष्ण को मैंने ही वश मे किया है। जो-जो
कहती हूँ कृष्ण वही-वही करते है। मेरे ही लिए (उन्होने) रास रचाया। मुझसे सुन्दर
और चतुर और कोई नही है, क्योकि कृष्ण ने हमे शरीर धारण करने का भाव बता
दिया। कभी कृष्ण के हाथ पकड़ कर बैठ जाती है, कभी कहती है मैंने अत्यधिक श्रम
किया है। सूरदास कहते हैं कि राधा ने कृष्ण के गले से लिपट कर कहा कि मैं कन्धे
पर चढ़ जाऊं ॥६१॥
कहै भामिनी कंत सौं, मोहिँ कध चढ़ावहु ।
नृत्य करत अति श्रम भयो, ता श्रमहिँ मिटावहु ।
धरनी धरत बनै नहीँ, पग अतिहिँ पिराने ।
तिया-बचन सुनि गर्व के, पिय मन मुसुकाने ।

११६ सूरसागर सार सटीक
मैँ अविगत, अज, अकल हौँ, यह मरम न पायौ ।
भाव बस्य सब पैँ रहौँ, निगमनि यह गायौ ।
एक प्रान द्वै देह हैं, द्विविधा नहिँ यामैँ ।
गर्व कियौ नरदेह तैँ, मैँ रहौँ न तामैँ ।
सूरज-प्रभु अंतर भए, संग तैँ तजि प्यारी ।
जहाँ की तहँ ठाड़ी रही, वह घोष-कुमारी ॥६२॥
अर्थ—स्त्री (राधा) पति से कहती है कि मुझे कन्धे पर चढ़ाओ । नाच करते-
करते अत्यधिक परिश्रम हुआ उस थकावट को मिटाओ । पैर बहुत दर्द कर रहे है
(जिससे) पृथ्वी पर धरते नही बनता । स्त्री के बचन सुनकर (पति) कृष्ण मन मे
मुसकाये । मैं अज्ञात, अजन्मा, तथा अकल हूँ यह मर्म (गोपियो) ने नही पाया । भाव
के वश सबके साथ रहता हूँ । वेदो ने यही गाया है । (हमारे बीच) प्राण एक है तथा
शरीर दो है, इसमे कोई शंका नही है । (पर) मनुष्य के शरीर से जो गर्व करते हैं मैं
उसमे नही रहता । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण प्यारी राधा का साथ छोड़कर अंतर्ध्यान
हो गये । वह अहीर की लड़की राधा जहाँ की तहाँ खड़ी रह गई ॥६२॥
जो देखैँ द्रुम के तरैँ, मुरझी सुकुमारी ।
चकित भईँ सब सुन्दरी, वह तौ राधा री ।
याही कौँ खोजति सबै, यह रही कहाँ री ।
धाइ परीँ सब सुंदरी, जो जहाँ-तहाँ री ।
तन की तनकहुँ सुधि नहीँ, व्याकुल भईँ बाला ।
यह तौ अतिँ बेहाल है, कहुँ गए गोपाला ।
बार-बार बूझतिँ सबै, नहिँ बोलति बानी ।
सूर स्याम काहैँ तजी, कहि सब पछितानी ॥६३॥
अर्थ—जब (गोपियों ने) वृक्ष के नीचे देखा तो (उन्हे) मुरझायी हुई सुकुमारी
(राधा) दिखाई पडी । सब सुन्दरियां चकित हो गयीं कि यह तो राधा है । इसे ही
सब खोजते हे, यह कहां थी । जो जहां थी वहां से सब सुन्दरियां दौड पडी । शरीर की
तनिक भी याद नही, बालाये व्याकुल हो गयी । यह (राधा) तो अत्यधिक बेहाल है
गोपाल कही चले गये । बार वार सभी पूछती हैं लेकिन वह नही बोलती । सूरदास
कहते हैं (कि गोपियां सोचती है) कृष्ण ने इसे क्यो छोड़ दिया, यह कहकर सभी
पछताती है ॥६३॥
केहिँ मारग मैँ जाउँ सखी री, मारग मोहिँ बिसरचौ ।
ना जानौँ कित ह्वै गए मोहन, जात न जानि परचौ ।
अपनी पिय ढूँढ़ति फिरौँ, मोहिँ मिलिबे कौ चाव ।
काँटो लाग्यौ प्रेम कौ, पिय यह पायी दाव ।
बन डोंगर ढंढत फिरी, घर-मारग तजि गाउँ ।

वृन्दावन लीला ११७
बूझौं द्रुम, प्रति वेलि कोउ, कहै न पिय कौ नाउँ ।
चकित भई, चितवत फिरी, व्याकुल अतिहिं अनाथ ।
अब कैं जो कैसेहु मिलौं, पन्नक न त्यागौं साथ ।
हृदय माँझ पिय-घर करौं, नैननि बैठकि देउँ ।
सूरदास प्रभु सँग मिलीं, बहुरि रास-रस लेउँ ॥६४॥
अर्थ—सखी मैं किस रास्ते से जाऊँ, मुझे मार्ग भूल गया है । (मैं) नही जानती
कि मोहन किधर गये, जाते समय (मुझे) जान नही पडा । मैं अपने प्रिय को ढूंढती
फिरती हूँ । मुझे मिलने की इच्छा है। मुझे प्रेम का कांटा गड़ गया, ओर प्रिय को यह
मोका मिला । मैं गाँव को छोड़कर वन, पहाड़ी, तथा घर के रास्ते मे ढूंढती फिरी ।
(मैंने) वृक्षों से पूछा, प्रत्येक लता से पूछा, लेकिन कोई प्रिय के नाम को नही कहता ।
इसके बाद मैं) चकित हो गयी, (मेरी) निगाह फिर गयी ओर अत्यधिक असहाय
होकर व्याकुल हो गयी । अबकी वार यदि कैसे (भी) मिलेगे तो पलभर भी साथ नही
छोड़ूंगी । हृदय के बीच प्रिय के लिए घर बनाऊँगी और नयनों में बैठकि दूंगी ।
सूरदास कहते हैं कि प्रभु के साथ मिलने पर फिर से रास का रस लूंगी ॥६४॥
कृपा सिंधु हरि कृपा करौ हो ।
अनजानैं मन गर्व बढ़ायौ, सो जिनि हृदय धरौ हो ।
सोरह सहस पीर तनु एकै, राधा जिव, सब देह ।
ऐसी दसा देखि करुनामय, प्रगटौ हृदय-सनेह ।
गर्व-हत्यौ तनु विरह प्रकास्यौ, प्यारी व्याकुल जानि ।
सुनहु सूर अब दरसन दीजै, चूक लई इनि मानि ॥६५॥
अर्थ - कृपा के सागर कृष्ण कृपा करो । अज्ञान वश मन मे गर्व बढाया उसे
हृदय में धारण मत करो । सोलह सहस गोपियां, पर सबके शरीर मे पीडा एक ही ।
और सब शरीर हैं, राधा ही मानो उनका प्राण है। ऐसी दशा देखकर करुणामय कृष्ण
के हृदय मे स्नेह प्रकट हुआ । (कृष्ण ने गोपियों के) गर्व को समाप्त कर दिया और
प्यारी को व्याकुल जानकर शरीर मे विरह प्रकाशित किया । सूरदास कहते हैं कि
कृष्ण सुनो, अब दर्शन दीजिए। इन लोगो ने अपनी भूल मान ली ॥६५॥
अंतर तैं हरि प्रगट भए ।
रहत प्रेम के वस्य कन्हाई, जुवतिनि कौं मिलि हर्ष दए ।
वैसोइ सुख सबकौं फिरि दीन्हीं, वहै भाव सब मानि लियौ ।
वै जानति हरि सग तवहिं तैं, वहै बुद्धि सब, वहै हियौ ।
वहै रास-मंडल-रस जानतिं, विच गोपी, विच स्याम धनी ।
सूर स्याम श्यामा मधि नायक, वहै परस्पर प्रीति वनी ॥६६॥
अर्थ-ओट से कृष्ण प्रकट हो गये । कृष्ण प्रेम के वश रहते हैं । (उन्होने फिर
युवतियों से मिलकर) (उन्हे) आनन्द दिया । सबको वैसा ही सुख फिर से दिया और

११६ सूरसागर सार सटीक
उसी भाव से सबको (अपनाकर) मान लिया। वे (गोपियाँ) हरि को पहले से ही साथ
जानने लगीं। सबकी वही बुद्धि और वही हृदय (हो गया)। फिर उसी रास मण्डल
के रस को समझने लगी जिसमे (श्याम के) बीच मे गोपी और (गोपी के) बीच में
श्याम (थे)। सूरदास कहते हैं कि श्याम और श्यामा के मध्य नायक कृष्ण का फिर
वही परस्पर प्रेम बन गया ॥६६॥
आजु हरि अद्भुत रास उपायौ।
एकहिँ सुर सब मोहित कीन्हे, मुरली नाद सुनायौ।
अचल चले, थकित भए, सब मुनिजन ध्यान भुलायौँ।
चंचल पवन थक्यौ नहिँ डोलत, जमुना उलटि बहायौ।
थकित भयौ चंद्रमा सहित-मृग, सुधा-समुद्र बढ़ायौ।
सूर स्याम गोपिनि सुखदायक, लायक दरस दिखायौ ॥६७॥
अर्थ—आज कृष्ण ने अद्भुत रास रचाया। एक ही स्वर से सबको मोहित
करके मुरली की ध्वनि सुनायी। (जिससे) न चलने वाले (जड) चलने लगे, चलने वाले
थक गये और सब मुनि जनो का ध्यान भूल गया। चंचल पवन थककर (अब) नही
डोलता है। जमुना को उल्टा वहा दिया। हिरण सहित चन्द्रमा थक गया और अमृत
के समुद्र को बढ़ा दिया। सूरदास कहते है गोपियो को सुख देने वाले कृष्ण ने सत्पात्र
को दर्शन दिया ॥६७॥
बनावत रास मंडल प्यारौ।
मुकुट की लटक, झलक कुंडल की, निरतत नंद दुलारो।
उर वनमाल सोह सुंदर वर, गोपिनि कैँ सँग गावै।
लेत उपज नागर नागरि सँग, बिच-बिच तान सुनावै।
वंसीबट-तट रास रच्यौ है, सब गोपिनि सुखकारौ।
सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन सौँ, भक्तनि प्रान अधारौ ॥६८॥
अर्थ—कृष्ण प्यारे रास मण्डल को बनाते हैं। मुकुट को झुकाते हुए, कुण्डल
को झलकाते हुए, नन्द के दुलारे (कृष्ण) नाचते हैं। वक्ष स्थल पर श्रेष्ठ सुन्दर बनमाल
सुशोभित है, (और कृष्ण) गोपियो के साथ गाते हैं। कृष्ण राधा के साथ नया स्वर
भरते है, और बीच-बीच मे तान सुनाते है। सब गोपियो को सुख देने वाला रास
(कृष्ण ने) वंसीवट के निकट रचा है। सूरदास कहते हैं कि प्रभु, तुमसे मिलने की
आशा ही भक्तो के प्राण का आधार है ॥६८॥
रास रस स्रमित भईँ ब्रजवाल।
निसि सुख दै यमुना-तट लै गए, भोर भयौ तिहिँ काल।
मनकामना भई परिपूरन, रही न एकौ साधि।
षोड़स सहस नारि सँग मोहन, कीन्हौ सुख अवगाधि।

वृन्दावन लीला ११६
जमुना-जल बिहरत नँद-नंदन, संग मिलीँ सुकुमारि ।
सूर धन्य धरनी वृन्दावन, रबि तनया सुखकारि ॥६६॥
अर्थ—रास के रस से ब्रज की बालायें थक गयी । रात को सुख देकर (कृष्ण)
उन्हे जमुना के तट पर ले गये, उस समय सबेरा हो गया । (गोपियो की) सारी
मनोकामनाये पूर्ण हो गयी, एक भी इच्छा बाकी न रही । सोलह हजार नारियो के
साथ मोहन ने अगाध सुख प्राप्त किया । कृष्ण सुकुमारियो को साथ मे लेकर जमुना
के जल मे बिहार करते है । सूरदास कहते है कि वृन्दावन की धरती धन्य है और
सुख देने वाली यमुना (धन्य है) ॥६६॥
ललकत स्याम मन ललचात ।
कहत हैं घर जाहु सुंदरि, मुख न आवति बात ।
षट सहस दस गोप कन्या, रैनि भोगीं रास ।
एक छिन भईँ कोउ न न्यारी, सबनि पूजी आस ।
बिहंसि सब घर-घर पठाईँ, ब्रज गईँ ब्रज-बाल ।
सूर प्रभु-नंद-धाम पहुँचे, लख्यौ काहु न ख्याल ॥१००॥
अर्थ—इच्छा से (कृष्ण का) मन (बार-बार) ललचाता है । कृष्ण कहते हैं कि
हे सुन्दरियों घर जाओ, (लेकिन) मुँह मे बात नही आती । सोलह हजार गोप कन्याओ
ने रात मे रास का भोग किया । कोई एक भी क्षण अलग न हुई और सभी ने अपनी-
अपनी आशाओ को पूर्ण किया । कृष्ण ने हँस कर ब्रज बालाओं को उनके घर भेज
दिया । सूरदास कहते है कि फिर कृष्ण नन्द के घर पहुँचे और किसी ने इस खेल को
देखा समझा नही ॥१००॥
ब्रजबासी सब सोवत पाए ।
नंद सुवन मति ऐसी ठानी, उनि घर लोग जगाए ।
उठे प्रात-गाथा मुख भाषत, आतुर रैनि बिहानी ।
ऐँडत अंग जम्हात बदन भरि, कहत सबै यह बानी ।
जो जैसेँ सो तैसेँ लागे, अपनैँ-अपनैँ काज ।
सूर स्याम के चरित अगोचर, राखी कुल की लाज ॥१०१॥
अर्थ—(लौटकर) उन लोगों ने ब्रजवासियो को सोता पाया । नंद के पुत्र (कृष्ण)
ने बुद्धि मे ऐसा निश्चय करके उनके घर के लोगों को जगाया । उठ करके प्रातः काल
सामान्य बातो को मुँह से कहते हैं । आतुरता मे ही रात बीती । अङ्ग को ऐठकर तथा
मुँह भरकर जम्हाई लेते हुये सभी यह बात कहते है । जो जैसे थे वैसे ही अपने-अपने
काम में लग गये । सूरदास कहते है कि कृष्ण चरित्र न दिखाई देने वाला है (उन्होने
गोपियों की) कुल की लाज रख दी ॥१०१॥

३. गोचारण तथा दानलीला

१२० सूरसागर सार सटीक
ब्रज-जुवती रस-रास पगीँ ।
कियौ स्याम सब को मन भायो, निसि रति-रंग जगीँ ।
पूरन ब्रह्म, अकल, अविनासी, सबनि सग सुख दीन्ही ।
जितनी नारि भेष भए तितने, भेद न काहू कीन्ही ।
वह सुख टरत न काहूँ मन तैँ, पति हित-साध पुराईँ ।
सूर स्याम दूलह सब दुलहिनि, निसि भाँवरि दै आईं ॥१०२॥
अर्थ - ब्रज युवतियां रास के रस मे पगी रही । कृष्ण (के द्वारा) किया गया
(रास) सब के मन को अच्छा लगा । (वे) रात भर रति के रङ्ग मे जागती रही ।
पूर्ण ब्रह्म, अकल, अविनाशी, कृष्ण ने सब को साथ सुख दिया । जितनी स्त्रियां थी,
कृष्ण ने उतने ही वेष बनाये, किसी के साथ भेद-भाव नही किया । वह सुख किसी
के मन से टलता नही है । उन्होने (कृष्ण के लिए) पति प्रेम की इच्छा पूर्ण कर ली ।
सूरदास कहते हैं कि कृष्ण दूल्हा तथा (सब गोपियां) दुल्हिनियां रात मे भांवर दे
आईं ॥१०२॥
रास रस लीला गाइ सुनाऊँ ।
यह जस कहै, सुनै मुख श्रवननि, तिहि चरननि सिर नाऊँ ।
कहा कहौँ वक्ता स्रोता फल, इक रसना क्यौँ गाऊँ ।
अष्ट सिद्धि नवनिधि सुख-सपति, लघुता करि दरसाऊँ ।
जौ परतीति होइ हिरदै मैंँ, जग-माया धिक देखै ।
हरि-जन दरस हरिहि सम बूझै, अंतर कपट न लेखै ।
धनि वक्ता, तेई धन स्रोता, स्याम निकट हैं ताकैं ।
सूर धन्य तिहि के पितु, माता, भाव भगति है जाकैं ॥१०३॥
अर्थ - रास के रस की लीला को गाकर सुनाता हूँ । यह यश जो मुंह से कहता
और सुनता है उसके चरणो पर सिर झुका दूं । कहने वाले और सुनने वाले के फल
को कहाँ तक कहूँ और इस एक जीभ से क्यो गाऊँ । आठो सिद्धियां और नौ निधियों
के सुख सम्पत्ति को ( इस रास रस के सामने ) हीन करके दिखा दूँ । यदि हृदय मे
विश्वास हो तो ससार की माया को देखना धिक्कार है । भगवान् के भक्त का दर्शन
भगवान् के समान ही समझते हुए हृदय मे कपट नही रखे । वह वक्ता धन्य है और
वही श्रोता धन्य है और उसी के निकट कृष्ण हैं । सूरदास कहते हैं कि उसी के माता-
पिता धन्य हैं जिनमे भक्ति भाव है ॥१०३॥
पनघट लीला
पनघट रोके रहत कन्हाई ।
जमुना-जल कोउ भरन न पावै, देखत हीँ फिरि जाई ।
तबहिँ स्याम इक बुद्धि उपाई, आपुन रहे छपाई ।

वृन्दावन लीला १२१
तट ठाढे जे सखा संग के, तिनकौं लियौ बुलाई।
बैठारयौ ग्वालनि कौं द्रुमतर, आपुन फिरि-फिरि देखत।
बड़ी वार भई कोउ न आई, सूर स्याम मन लेखत ॥१५०४॥
अर्थ—कृष्ण पनघट को रोके रहते है। यमुना में कोई जल भरने नही पाता
और (कृष्ण को देखते ही) सब वापस फिर जाती हैं। तभी कृष्ण को एक उपाय सूझा
और उन्होंने अपने को छिपा लिया। तट पर जो मित्र खड़े थे उन्हें बुला लिया।
ग्वालों को वृक्ष के नीचे बैठा दिया और स्वयं घूम-घूम कर देखते हैं। बैठे-बैठे देर हो
गई लेकिन कोई (गोपी) नही आई जिससे कृष्ण मन में सोचते हैं ॥१५०४॥
जुवति इक आवति देखी स्याम।
द्रुम कैं ओट रहै हरि आपुन, जमुना तट गई बाम।
जल हलोरि गागरि भरि नागरि, जबहीं सीस उठायो।
घर कौं चली जाइ ता पाछैं, सिर तैं घट ढरकायो।
चतुर ग्वालि कर गह्यो स्याम कौ, कनक लकुटिया पाई।
औरनि सौं करि रहे अचगरी, मोसौँ लगत कन्हाई।
गागरि लै हँसि देत ग्वारि-कर, रीतौ घट नहिं लैहौँ।
सूर स्याम ह्वाँ आनि देहु भरि, तबहिँ लकुट कर दैहौं ॥१५०५॥
अर्थ—एक युवती को आते हुए कृष्ण ने देखा। कृष्ण स्वयं वृक्ष की ओट में
(छिपे) रहे और वह युवती यमुना के तट पर गयी। जल हिलोर कर गगरी भर कर
जब स्त्री ने सिर पर उठाया और (जैसे ही) घर की ओर चली, (कृष्ण ने) पीछे से
जाकर सिर से घड़ा ढरका दिया। चतुर ग्वालिन ने कृष्ण के हाथ को पकड़ा और
सोने की लकुटी पा गयी। (ग्वालिन बोली) कृष्ण औरों से शरारत करते रहे मुझसे
(क्यों) लगते हो। (कृष्ण) हंसकर खाली घड़ा ग्वालिन को देते है, (लेकिन वह कहती
है) मैं खाली घड़ा नही लूंगी। सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) कृष्ण इसे भर
कर लाओ तभी लकुटी दूंगी ॥१५०५॥
घट भरि दियौ स्याम उठाइ।
नैंकु तन की सुधि न ताकौं, चली ब्रज-समुहाइ।
स्याम सुन्दर नैन-भीतर, रहे आनि समाइ।
जहाँ-तहँ भरि दृष्टि देखै, तहाँ-तहाँ कन्हाइ।
उतहिं तैं इक सखी आई, कहति कहा भुलाइ।
सूर अबहीं हँसत आई, चली कहाँ गवाँइ ॥१५०६॥
अर्थ—कृष्ण ने घड़ा उठाकर भर दिया। उसे तनिक भी शरीर का ख्याल नही
और ब्रज की ओर चली। श्याम सुन्दर नयनों के भीतर आकर समा गये। जहाँ-जहाँ
निगाह भर कर देखती है तहाँ-तहाँ कृष्ण ही दिखाई देते हैं। उस तरफ से एक सखी

१२२ सूरसागर सार सटीक
आयी ओर कहती है कि (तुम) कैसे भूली हुई हो। सूरदास कहते हैं कि (सखी पूछती
है) अभी तो तुम हँसती हुई आयी, कहाँ (मन) गवांकर चली जा रही हो ॥१०६॥
नौकैं देहु न मेरी गिंडुरी ।
लै जैहैं धरि जसुमति आगैं, आवहु री सब मिलि झुंडरी ।
काहूनहीं डरात कन्हाई, वाट घाट तुम करत अचगरी ।
जमुना-दह गिंडुरी फटकारी, फोरी सब मटुकी अरु गगरी ।
भली करी यह कुंवर कन्हाई, आजु मेटिहैं तुम्हरी लंगरी ।
चलीं सूर जसुमति के आगैं, उरहन लै ब्रज-तरुनी सगरी ॥१०७॥
अर्थ—(गोपियां कहती है) ठीक है तुम हमारी गिंडुरी मत दो । तुम्हे पकड़कर
यशोदा के आगे ले चलूंगी। आओ (सखियो) सब झुंड बनाकर चले । कृष्ण किसी से
नही डरते, घाट तथा रास्ते में शरारत करते है। यमुना के दह मे गिंडुरी फेक दी,
और मटकी तथा गगरी को फोड दिया । कुंवर कृष्ण तुमने अच्छा किया । आज
तुम्हारी दुष्टता मिटा दूंगी । सूरदास कहते हैं कि सभी ब्रज की तरुणियां यशोदा के
आगे शिकायत करने चली ॥१०७॥
सुनहु महरि तेरौ लाड़िलौ, अति करत अचगरी ।
जमुन भरन जल हम गईँ, तहँ रोकत डगरी ।
सिरतैं नीर ढराइ दै, फोरी सब गगरी ।
गेँडुरि दई फटकारि कै, हरि करत जु लंगरी ।
नित प्रति ऐसे ढंग करै, हमसौँ कहै धगरी ।
अब बस-वास बनैं, नहिं इहिँ तुव ब्रज-नगरी ।
आपु गयौ चढ़ि कदम पर, चितवत रहौँ सगरी ।
सूर स्याम ऐसेंहि सदा, हम सौं करै झगरी ॥१०८॥
अर्थ—(गोपियां कहती है) महरि सुनो तुम्हारा लाड़ला बहुत शरारत करता
है । हम यमुना मे जल भरने गयी थी वहां (हमारी) राह रोकता था । सिर से पानी
ढुलकाकर सब घडे फोड डाले । गेडुरी फेक दी, (इस प्रकार) कृष्ण शरारत करते हैं।
नित्य प्रति ऐसा ही ढङ्ग अपनाते है और हमे कुलटा कहते हैं। तुम्हारी इस ब्रज नगरी
में अब बसना-सहना नही बनता । स्वय कदम्ब पर चढ गये और (हम) सब देखती
रही। सूरदास कहते हैं कि हम (गोपियो) से ऐसे हमेशा झगडा करते है ॥१०८॥
ब्रज-घर-घर यह बात चलावत ।
जसुमति कौ सुत करत अचगरी, जमुना जल कोउ भरन न पावत ।
स्याम वरन नटवर बपु काछे, मुरली राग मलार बजावत ।
कुंडल-छबि रबि किरनहुँ तैं दुति, मुकुट इंद्र-धनुहुँ तैं भावत ।
मानत काहु न करत अचगरी, गागरि धरि जल मुंह ढरकावत ।
सूर स्याम कौं मात पिता दोउ, ऐसे ढंग आपुनहिं पढ़ावत ॥१०६॥

वृन्दावन लीला १२३
अर्थ—ब्रज के ( निवासी ) घर-घर यह बात चलाते हैं कि यशोदा का पुत्र
दुष्टता करता है जिससे कोई यमुना में जल भरने नही पाता । श्याम वर्ण के (कृष्ण)
नटवर का रूप सँवार कर मुरली से मलार राग बजाते है । कुंडल की छवि सूर्य की
किरण से भी तेज, मुकुट इन्द्र-धनुष से भी (अधिक) अच्छा लगता है । किसी का
कहना न मानकर (वे) शरारत करते हैं । गगरी को पकड़ कर मुंह से जल ढलका
देते हैं । सूरदास कहते हैं कि (ब्रजवासी कहते हैं) कृष्ण के माता-पिता ऐसे ढङ्ग स्वयं
(कृष्ण को) पढ़ाते हैं ॥११०६॥
करत अचगरी नंद महर कौ ।
सखा लिये जमुना तट बैठ्यो, निबह न लोग डगर कौ ।
कोउ खीझो, कोऊ बिन बरजौ, जुवतिन कैं मन ध्यान ।
मन-बच-कर्म स्याम सुन्दर तजि, और न जानति आन ।
यह लीला सब स्याम करत हैं, ब्रज-जुवतिन कैं हेत ।
सूर भजे जिहिं भाव कृष्ण कौं, ताकौं, सोइ फल देत ॥११०॥
अर्थ—महर नन्द के (पुत्र) शरारत करते रहते हैं । मित्रों को लेकर यमुना के
तट पर बैठ गये हैं जिससे लोगों को रास्ते मे निवाह नही है । कोई (चाहे) खीझे,
कोई (चाहे) रोके, युवतियो के मन मे (कृष्ण का गहरा) ध्यान है । मन, वाणी तथा
कर्म से कृष्ण को छोड़कर और किसी को नही जानती । यह सब लीला ब्रज की
युवतियों के लिए (ही) कृष्ण करते हैं । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण को जो जिस भाव
से भजता है उसे वैसा ही फल देते हैं ॥११०॥
दान लीला
ऐसी दान माँगिये नहिं जौ, हम पैं दियौ न जाइ ।
बन मैं पाइ अकेली जुवतिनि, मारग रोकत धाइ ।
घाट बाट औघट जमुना-तट, बातें कहत बनाइ ।
कोऊ ऐसी दान लेत है, कौनैं पठाए सिखाइ ।
हम जानतिं तुम यौँ नहिं रहौ, रहिहौ गारी खाइ ।
जो रस चाहौ सो रस नाहीँ, गोरस पियौ अघाइ ।
औरनि सौं लै लीजै मोहन, तब हम देहिं बुलाइ ।
सूर स्याम कत करत अचगरी, हम सौं कुँवर कन्हाइ ॥१११॥
अर्थ—(गोपियां कहती हैं) ऐसा दान मत मांगिये जो हमसे दिया न जा
सके । वन में युवतियों को अकेली पाकर दौड़कर (कृष्ण) रास्ता रोकते हो । घाट,
रास्ते दुर्गम पथ तथा यमुना के तट पर बनाकर बातें कहते हो । कोई ऐसा दान
लेता है (लगता है तुम्हे) किसी ने सिखाकर भेजा है । हम जानते है कि तुम ऐसे
नहीं रहोगे बल्कि गाली खाकर ही रहोगे । जो रस चाहते हो वह रस नही है, गोरस
भरपेट पी सकते हो । मोहन औरों से ले लीजिए तब हम बुलाकर दे देगी । सूरदास
कहते हैं कि (गोपियां कहती है) हे कुंवर कृष्ण हमसे दुष्टता क्यो करते हो ॥१११॥

१२४ सूरसागर सार सटीक
ऐसैं जनि बोलहु नंद-लाला ।
छाँड़ि देहु अँचरा मेरौ नीकैं, जानत और सी वाला ।
बार-बार मै तुमहिं कहत हौं, परिहौ बहुरि जँजाला ।
जोवन, रूप देखि ललचाने, अवहीं तैं ये ख्याला ।
तरुनाई तनु आवन दीजै, कत जिय होत विहाला ।
सूर स्याम उर तैं कर टारहु, टूटै मोतिनि-माला ॥११२॥
अर्थ—(गोपी कहती है) हे नन्दलाल ऐसे मत कहो । मेरे सुन्दर अंचल को
छोड़ दो, मुझे अन्य बालाओं के समान (तो नहीं) समझ रहे हो । मैं वार-वार तुमसे
कहती हूँ कि फिर तुम जंजाल मे पड़ जाओगे । यौवन रूप को देखकर (आप) ललचा
गये और अभी से ये बाते सोचने लगे । शरीर मे जवानी आने दीजिए; मन (अभी से)
आकुल क्यों होता है । सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) वक्षस्थल से हाथ हटा
लो (नही तो) मोतियो की माला टूट जायेगी ॥११२॥
तैं कत तोर्यौ हार नौ सरि कौ ।
मोती वगरि रहे सब-वन मैं, गयौ कान कौ तरिकौ ।
ये अवगुन जु करत गोकुल मैं, तिलक दिये केसरि कौ ।
ढीठ गुवाल दही कौ मातौ, ओढ़नहार कमरि कौ ।
जाइ पुकारैं जसुमति आगैं, कहति जु मोचन लरिकौ ।
सूर स्याम जानी चतुराई, जिहिँ अभ्यास महुअरि कौ ॥११३॥
अर्थ—तुमने नव लड़ियो का हार क्यों तोड़ दिया ? (टूटकर) सब मोती वन
में बिखर गये । कान का तरीना भी (चला) गया । केसर का तिलक देकर गोकुल मे
इन अवगुणो को करते हो । (तुम) दही से मस्त, तथा कमरी के ओढ़ने वाले ढीठ
ग्वाल हो । जाकर पुकार कर यशोदा के आगे कहूँगी जो मोहन को बालक कहती हैं ।
सूरदास कहते हैं कि (गोपी कहती है) कृष्ण चतुरता जान गये जिन्हे महुअर (बाजा)
का अभ्यास हो गया है ॥११३॥
आपुन भईं सवै अब भोरी ।
तुम हरि कौ पीताम्बर झटक्यौ, उन तुम्हरी मोतिनि लर तोरी ।
माँगत दान ज्वाव नहिं देतीं, ऐसी तुम जोवन की जोरी ।
डर नहिं मानतिं नंद-नंदन कौ, करतिं आनि झकझोरा झोरी ।
इक तुम नारि गँवारि भली हौ, त्रिभुवन मैं इनकी सरि को री ।
सूर सुनहु लैहैं छँडाइ सब, अवहिँ फिरौगी दौरी दौरी ॥११४॥
अर्थ—अब सभी अपने आप अनजान (भोली) हो गयी, तुमने कृष्ण का पीतांबर
झटका, उन्होने तुम्हारी मोतियो की लड़ी तोड़ी । (उनके) दान मांगने पर (तुम लोग)
जवाब नहीं देती, (तुम) ऐसी यौवन के जोर वाली हो गयी हो । तुम नन्द के
नन्दन (कृष्ण) का डर नही मानती जो इस तरह आकर धक्का-मुक्की करती हो ।

वृन्दावन लीला १२५
एक तो तुम स्त्री. हो, दूसरे मूर्खा भी भली भांति हो भला संसार मे इनके समान कौन
है। सूरदास कहते है अभी सब छुड़ा लेंगे तो दौड़ी-दौड़ी फिरोगी ॥११४॥
हँसत सखनि यह कहत कन्हाई ।
जाइ चढ़ी तुम सघन द्रुमनि पर, जहँ तहँ रहौ छपाई ।
तब लौँ बैठि रहौ मुख मूंदे, जब जानहु सब आई ।
कूदि परौ तब द्रुमनि-द्रुमनि तैं, दै दै नंद दुहाई ।
चकित होहिं जैसैं जुवती-गन, डरनि जाहिं अकुलाई ।
बेनु-विषाण-मुरलि-धुन कीजौ, संख-सब्द गहनाई ।
नित प्रति जाति हमारै मारग, यह कहियौ समुझाई ।
सूर स्याम माखनदधि दानी, यह सुधि नाहिँ न पाई ? ॥११५॥
अर्थ -- हँसते हुए मित्रो से कृष्ण यह कहते है । तुम जाकर घने वृक्षो पर चढ़कर
जहां-तहां छिप रहो । तब तक मुंह मूंद कर बैठे रहो और जब जानो कि सब
(गोपियां) आ गई तब पेड-पेड़ से नन्द की दुहाई देकर कूद पड़ो । जैसे युवतियों का
समूह चकित और आकुल होकर डर से घबरा जाय तो बंशी, विषाण, मुरली की
ध्वनि करना और शंख का गहन शब्द करना । नित्य प्रति (तुम लोग) हमारे मार्ग
से जाती हो यह समझा कर कहना । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण माखन और दही के
दानी हैं क्या यह खबर नहीं है ॥११५॥
ग्वारिनि जब देखे नंद-नंदन ।
मोर मुकुट पीताम्बर काछे, खौरि किए तन चंदन ।
तब यह कह्यौ कहाँ अब जैहौ, आगैँ कुँवर कन्हाई ।
यह सुनि मन आनन्द बढ़ायौ, मुख कहैं, बात डराई ।
कोउ-कोउ कहति चलौ री जैये, कोउ कहै घर फिरि जैये ।
कोउ-कोउ कहति कहा करिहैं हरि, इनसौँ कहा परैयै ।
कोउ-कोउ कहति कालिहीँ हमकौँ, लूटि लई नंद लाल ।
सूर स्याम के ऐसे गुन हैं, घरहिँ फिरौ ब्रज-बाल । ११६०।
अर्थ - ग्वालिनो ने जब कृष्ण को देखा जो मोर मुकुट तथा पीताम्बर से सजे
थे तथा शरीर पर चन्दन का लेप किये थे तो कहा कि अब कहाँ जायेगे, आगे कुंवर
कृष्ण हैं। यह सुनकर मन मे आनन्द बढ़ गया और मुख से डरती हुई बात कहती है ।
कोई कोई कहती हैं (आगे) चली चलो । कोई कहती है घर वापस चलिये ! कोई
कहती है कृष्ण क्या करेगे इनसे कैसे भागा जाय । कोई कहती है कि कल ही हमको
कृष्ण ने लूट लिया था। सूरदास कहते है कि कृष्ण के ऐसे ही गुण है इसलिए ब्रज-
बालाएँ घर की ओर वापस चली गई ॥११६॥
कान्ह कहत दधि-दान न दैहौ ?
लैहौँ छीनि दूध दधि माखन, देखति ही तुम रैहौ ।

१२६ सूरसागर सार सटीक
सब दिन की भरि लेउँ आजुहीं, तब छाड़ी, मैं तुमकौ।
उघटति हो तुम मातु-पिता लौं, नहिं जानत हो हमकौ।
हम जानति हैं तुमकौ मोहन, लै-लै गोद खिलाए।
सूर स्याम अब भये जगाती, वै दिन सब विसराए ॥११७॥
अर्थ—कृष्ण कहते हैं कि (यदि) तुम दही का दान नहीं दोगी तो दूध, दही,
मक्खन छीन लूंगा (तुम) देखती ही रह जाओगी। सब दिन (की कमी) आज ही पूरी
कर लूंगा तब मैं तुमको छोड़ूँगा। तुम माता-पिता तक को बुरा-भला कहती हो
(लेकिन) मुझे जानती नहीं हो। (गोपियाँ कहती हैं) हम मोहन तुमको जानती हैं
तुम्हें गोद मे लेकर खिलाया है। सूरदास कहते हैं (गोपियाँ कहती हैं) अब तुम कर
उगाहने वाले हो गये हो, उन दिनो को भुला दिया ॥११७॥
जाइ सबै कंसहि गुहरावहु।
दधि माखन घृत लेत छुड़ाए, आजु हजूर बुलावहु।
ऐसे कौं कहि मोहिं बतावति, पल भीतर गहि मारौं।
मथुरापतिहिं सुनौगी तुमहीं, जब धरि केस पछारौं।
बार-बार दिन हमहिं बतावति, अपनौ दिन न विचार्यौ।
सूर इन्द्र ब्रज जबहिं बहावत, तब गिरि राखि उबार्यौ ॥११८॥
अर्थ—जाकर तुम सब लोग कंस को गुहारो। दही, माखन, घी, छुड़ाए लेते
हैं; आज हुज़ूर को बुलाओ। ऐसे आदमी को मुझसे कहकर बताती हो जिसे पल भर
मे मार डालूं। तुम ही सुनोगी जब मथुरा पति को बाल पकड़कर पछाड़ूँगा। बार-
बार हमसे दिन बताती हो अपना दिन नहीं विचारती। सूरदास कहते हैं कि जब इन्द्र
ने ब्रज को बहाना चाहा तब मैंने (कृष्ण ने) गिरि के द्वारा रक्षा की थी ॥११८॥
मोसौँ बात सुनहु ब्रज-नारी।
इक उपखान चलत त्रिभुवन मैं, तुमसों कहौं उघारी।
कबहूँ बालक मुँह न दीजिये, मुँह न दीजिये नारी।
जोइ मन करै सोइ करि डारैं, मूँड़ चढ़त हैं भारी।
बात कहत अँठिलाति जाति सब, हँसति देति कर तारी।
सूर कहा ये हमकौँ जानैँ, छाँछहिँ बेंचैनहारी ॥११९॥
अर्थ—हे ब्रज की नारियो मुझसे (एक) बात सुनो। तीनो लोकों में एक
उपाख्यान (कहावत) चलता है उसे उघाड़कर कहता हूँ। कभी बालक तथा स्त्री को
मुंह नही लगाना चाहिए। जो (ये) करना चाहे वही कर डाले तो सिर पर सवार
हो जाते हैं। बात कहने पर (गोपियाँ) हँसती, ताली देती ओर अठिलाती चली जाती
हैं। सूरदास कहते हैं कि (कृष्ण कहते हैं) ये छाछ बेचने वाली स्त्रियां हमको क्या
जाने ॥११९॥

[वृन्दावन लीला ५२७
यह जानति तुम नंदमहर-सुत ।
धेनु दुहत तुमकौं हम देखतिं, जबहिं जाति खरिकहिं उत ।
चोरी करत यहौ पुनि जानति, घर-घर ढूँढ़त भाँड़े।
मारग रोकि भए अब दानी, वे ढँग कब तैं छाँड़े।
और सुनौ जसुमति जब बांधे, हम कियौ सहाइ ।
सूरदास-प्रभु यह जानति हम, तुम ब्रज रहत कन्हाइ ॥१२०॥
अर्थ—यह जानती है कि तुम नन्द महर के पुत्र हो। तुमको गाय दुहते हुए
हम देखते है जब भी गायो के रहने के स्थान से होकर जाती हैं। फिर यह जानती है
कि तुम चोरी करते हो और घर-घर बर्तन ढूंढते फिरते हो। अब दानी होकर मार्ग
रोकने लगे हो। उन कार्यों (ढगो) को कब से छोड़ दिया। और सुनो, यशोदा जब
बांधती थी तब हम ही सहायक होती थी। सूरदास कहते है कि (हम गोपी) यह
जानती हैं कि तुम कृष्ण ब्रज मे रहते हो ॥१२०॥
को माता को पिता हमारैं ।
कब जनमत हमकौं तुम देख्यौ, हँसियत बचन तुम्हारैं ।
कब माखन चोरी करि खायौ, कब बाँधे महतारी ।
दुहत कौन गैया चारत, बात कहो यह भारी ।
तुम जानत मोहिं नंद-दुठौना, नंद कहाँ तैं आए ।
मैं पूरन अविगत, अविनासी, माया सबनि भुलाए ।
यह सुनि ग्वालि सबै मुसुक्यानी, ऐसे गुन हौ जानत ।
सूर स्याम जो निदर्यौ सबही, मात-पिता नहिं मानत ॥१२१॥
अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) मेरी कौन माता है और कौन पिता है। हमको कब
जन्मते देखा, तुम्हारी बातो पर हँसी आती है।—कब माखन चुराकर खाया, कब माता
ने हमे बांधा। किसकी गाय दुहता और चराता हूँ, तुमने यह बडी बात कही। तुम
मुझे नन्द का पुत्र समझती हो लेकिन नन्द कहां से आये। मैं पूर्ण, अविगत, अविनाशी
(हूँ) माया से सभी भूले हैं। यह सुनकर सभी ग्वालिने मुसकायी, ऐसे गुण को हम
जानती हैं। सूरदास कहते हैं (गोपियां कहती है) जो सबका निरादर करता है तथा
माता-पिता को नही मानता (ऐसे तुम्हे जानती हूँ) ॥१२१॥
भक्त हेत अवतार धरौं ।
कर्म-धर्म कैं वस मैं नाहीं, जोग जज्ञ मन मैं न करौं ।
दीन-गुहारि सुनौं श्रवननि भरि, गर्व-वचनसुनि हृदय जरौं ।
भाव-अधीन रहौं सबही कै, और न काहू नैंकु डरौं ।
ब्रह्मा कीट आदि लौं व्यापक, सबकौं सुख दै दुखहिं हरौं ।
सूर स्याम तब कही प्रगटही, जहाँ भाव तहँ तैं न टरौं ॥१२२॥

५२८ सूरसागर सार सटीक
अर्थ—(कृष्ण कहते हैं) भक्त के लिए अवतार धरता हूँ । धर्म-कर्म के वश में
नही रहता हूँ । योग और यज्ञ को मन में (धारण) नही करता । दीन की पुकार को
कान भर के सुनता हूँ । गर्व के वचन सुनकर हृदय से जल जाता हूँ । सब के (भक्ति)
भाव के अधीन रहता हूँ, और किसी से तनिक भी नही डरता । ब्रह्मा से लेकर कीट
तक व्याप्त हूँ, सब को सुख देकर दुःख को हरता हूँ । सूरदास कहते हैं तब कृष्ण ने
प्रत्यक्ष ही (सब कुछ कहा) कि जहाँ भाव है वहाँ से मै नही टलता ॥१२२॥
जौ तुमहीं हौ सबके राजा।
तौ बैठौ सिहासन चढ़ि कै, चँवर, छत्र, सिर भ्राजा ।
मोर-मुकुट, मुरली पीतावर, छाड़ी नटवर-साजा ।
वेनु, विषाण, सख क्यों पूरत, वाजै नौवत वाजा।
यह जु सुनैं हमहूँ सुख पावैं, सग करैं कछु काजा ।
सूर स्याम ऐसी बातैं सुनि, हमकौं आवति लाजा ॥१२३॥
अर्थ—(गोपियां कहती हैं) जब तुम ही सब के राजा हो तो सिहासन पर
चढ़कर बैठो, ओर सिर पर चंवर तथा छत्र सुशोभित हो । मोर-मुकुट, मुरली,
पीताम्बर और नटवर के वेश को छोड़ दो । बंशी, विषाण शंख क्यों बजाते हो,
नौवत बजे । यह जो सुने तो हम भी सुख पाये, और साथ मे कुछ काम करें ।
सूरदास कहते है कि यह बाते सुनकर हमको लज्जा आती है ॥१२३॥
हमहिं और सो रोकै कौन ।
रोकनहारौ नदमहर सुत, कान्ह नाम जाकौ है तौन ।
जाकैं वल है कामनृपति कौ, ठगत फिरत जुवतिनि कौं जोन ।
टोना डारि देत सिर ऊपर, आपु रहत ठाढ़ौ ह्वै मौन ।
सुनहु स्याम ऐसी न बूझियै, वानि परी तुमकौं यह कौन ।
सूरदास-प्रभु कृपा करहु अब, कैसेंहु जाहिं अपनै भौन ॥१२४॥
अर्थ - (गोपियां कहती हैं) हमको और कौन रोक सकता है । रोकने वाले वही
महर नन्द के पुत्र हैं, जिनका नाम कृष्ण है । जिनके पास राजा के समान काम करने
का बल है, जो युवतियो को ठगते फिरते है । सिर के ऊपर टोना डालकर स्वयं मौन
होकर खडे रहते है । हे कृष्ण सुनो समझ मे नही आता कि तुम्हारी यह कौन सी
आदत पड़ गयी है । हे कृष्ण अब कृपा करो किसी प्रकार हम अपने घर जायें ॥१२४॥
राधा सौं माखन हरि माँगत ।
औरनि की मटुकी कौ खायौ, तुम्हरौ कैसी लागत ।
लै आई वृषभानु-सुता, हँसि, सद लवनो है मेरौ ।
लै दीन्हौ अपनैं कर हरि-मुख, खात अल्प हँसि हेरौ ।
सबहिनि तैं मीठौ दधि है यह, मधुरैं कह्यौ सुनाइ ।
सूरदास-प्रभु सुख उपजायौ, ब्रज ललना मनभाइ ॥१२५॥

वृन्दावन लीला १५५
अर्थ-कृष्ण राधा से मक्खन मांगते है। और कहा कि औरों की मटकी का
(मक्खन) खाया । (देखूं) तुम्हारा कैसा लगता है। वृषभानु की पुत्री (मक्खन) ले आयी
और हँस कर (बोली) मेरा मक्खन ताजा है। (राधा ने मक्खन) लेकर अपने हाथ से
हरि के मुंह में दिया, और खाते हुए थोड़ा हँस कर देखा। कृष्ण ने कहा सबसे अधिक
मीठा दही है, यह मीठी बात कहकर (कृष्ण ने) सुनायो । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने
ब्रज की स्त्री (राधा) के मन को अच्छा लगने वाले सुख को उत्पन्न किया ॥१२५॥
मेरे दधि कौ हरि स्वाद न पायौ ।
जानत इन गुजरिनि कौ सौ है, लयौ छिड़ाइ मिलि ग्वालनि खायौ ।
धौरी धेनु दुहाइ छानि पय, मधुर ऑचि मैं औटि सिरायौ ।
नई दोहनी पोंछि पखारी, धरि निरधूम खिरनि पै तायौ ।
तामैं मिलि मिस्रित मिसिरी करि, दै कपूर पुट जावन नायौ ।
सुलभ ढकनियाँ ढाँकि बाँधि पट, जतन राखि छीकैं समुदायौ ।
हौं तुम कारन लै आई गृह, मारग मैं न कहूँ दरसायौ ।
सूरदास-प्रभु रसिक-सिरोमनि, कियौ कान्ह ग्वालिनि मन भायौ ॥१२६॥
अर्थ-(एक ग्वालिन कहती है) मेरे दही का स्वाद कृष्ण ने नही पाया ।
समझा कि मेरा दही अन्य गुजरियों जैसा है। लेकर सब ग्वालो मे वांट कर खाया ।
धौरी (सफेद गाय) को दुहाकर, दूध को छानकर, हल्की आंच में गरम करके फिर ठंडा
किया । नयी दोहनी को पोछकर धोया और बिना धुएँ की अंगीठी पर ताया। उसमें
मिसरी मिलाकर कपूर के पुट के साथ जावन दिया । अच्छी ढकनियां से ढाँक कर
कपड़े से बांधा और चिन्ता के साथ छीके पर रख दिया। मैं तुम्हारे ही कारण (इसे)
ले आँई, घर ओर रास्ते में किसी को नहीं दिखाया । सूरदास कहते है कि कृष्ण
रसिकों में शिरोमणि हैं, उन्होंने ग्वालिन के मन की बात की ॥१२६॥
गोपी कहति धन्य हम नारी ।
धन्य दूध, धनि दधि, धनि माखन,हम परूसति जेंवत गिरिधारी ।
धन्य घोष, धनि दिन, धनि निसि वह, धनि गोकुल प्रगटे वनवारी ।
धन्य सुकृत पाँछिलौ, धन्य धनि नँद, धन्य जसुमति महतारी ।
धनि धनि ग्वाल, धन्य वृन्दावन, धन्य भूमि यह अति सुखकारी ।
धन्य दान, धनि कान्ह मँगैया, धन्य सूर त्रिन-द्रुम बन-डारी ॥१२७॥
अर्थ-गोपियां कहती है कि हम स्त्रियाँ धन्य हैं, दूध धन्य है, दही धन्य है,
माखन धन्य है जिन्हे हम परोसती है और गिरधारी खाते है। अहीरों का गांव धन्य
है, दिन धन्य है और वह रात्रि धन्य है, गोकुल धन्य है, जहां कृष्ण प्रकट हुए ।
पिछला पुण्य धन्य है, नन्द धन्य हैं, यशोदा माता धन्य है, वृन्दावन धन्य है, अत्यधिक
सुख देने वाली यह भूमि धन्य है। दान धन्य है, मांगने वाले कृष्ण धन्य हैं। सूरदास
कहते हैं कि तृण, वृक्ष तथा वन की डाले धन्य है ॥१२७॥
दं

१३० सूरसागर सार सटीक
गन गंधर्व देखि सिहात ।
धन्य ब्रज-ललनानि कर तें, ब्रह्म माखन खात ।
नहीं रेख, न रूप, नहिं तनु, बरन नहिं अनुहारि ।
मातु-पितु नहिं दोउ जाकैं, हरत-मरत न जारि ।
आपु कर्त्ता आपु हर्त्ता, आपु त्रिभुवन नाथ ।
आपुहीँ सब घट कौ व्यापी, निगम गावत गाथ ।
अंग प्रति-प्रति रोम जाकै, कोटि-कोटि ब्रह्मांड ।
कीट ब्रह्म प्रजंत जल-थल, इनहिं तैं यह मंड ।
येइ विस्वंभरन नायक, ग्वाल-संग-विलास ।
सोइ प्रभु दधि दान माँगत, धन्य सूरजदास ॥१२८॥
अर्थ—गन्धर्वगण देखकर सिहाते है कि ब्रज की स्त्रियो से ब्रह्म (कृष्ण) मक्खन
खाते हैं । जिनकी न कोई रेखा, न रूप है, न शरीर का कोई रङ्ग है, जिनकी समता
नही है । माता-पिता दोनो जिसके नही हैं, जिसे न कोई हरता है और न जो स्वयं
मरता है, न नष्ट होता है । जो स्वयं कर्त्ता है, स्वयं हर्त्ता है और तीनों लोकों का
स्वामी है । स्वयं सब घटों मे व्याप्त है । वेद-शास्त्र जिनकी गाथा गाते हैं, जिनके
एक-एक रोम मे करोडों ब्रह्माण्ड है । कीट से ब्रह्म तक जल, थल और नभ की इन्ही से
शोभा है, यही विश्वम्भर नायक कृष्ण ग्वालो के साथ खेलते हैं । वही प्रभु दही का
दान मांगते हैं । सूरदास कहते हैं कि (गोपियां) धन्य हैं ॥१२८॥
ब्रह्म जिनहिं यह आयसु दीन्हौ ।
तिन तिन सग जन्म लियौ परगट, सखी सखा करि कीन्हौ ।
गोपी ग्वाल कान्ह द्वै नाहीं, ये कहुँ नैंकु न न्यारे ।
जहाँ-जहाँ अवतार धरत हरि, ये नहिं नैंकु बिसारे ।
एकै देह बहुत करि राखे, गोपी ग्वाल मुरारी ।
यह सुख देखि सूर कै प्रभु कौँ, थकित अमर-संग-नारी ॥१२६॥
अर्थ—ब्रह्म (कृष्ण) ने जिन (लोगो) को आज्ञा दी, उन-उन (लोगो) ने इनके
साथ जन्म लिया । (कृष्ण ने) इन्हे सखा और सखी करके (यथा उचित) माना ।
गोपी-ग्वाल और कृष्ण दो नही है । ये कही तनिक भी अलग नही है। जहां-जहां कृष्ण
(अवतार) धरते हैं इन्हे तनिक भी नही भूलते । एक ही शरीर है उसे गोपी, ग्वाल और
मुरारी के बहुत (रूपो) मे बना रखा है । सूरदास कहते है कि कृष्ण के इस सुख को
देखकर देवताओ के साथ की स्त्रियां थकित (बेचैन) हो जाती हैं ॥१२६॥
यह महिमा येई पै जानैं ।
जोग-यज्ञ तप ध्यान न आवत, सो दधि-दान लेत सुख मानैं ।
खात परस्पर ग्वालनि मिलि कै, मीठौ कहि कहि आप बखानैं ।
विस्वंभर जगदीस कहावत, ते दधि दोना माँझ अघानैं ।

वृन्दावन लीला १३१
आपुहिं करता, आपुहिं हरता, आपु बनावत, आपुहिँ भाने ।
ऐसे सूरदास के स्वामी, ते गोपिनि कैँ हाथ बिकाने ॥१३०॥
अर्थ-यह महिमा ये ही जानते हैं। योग, यज्ञ, तप, ध्यान में जो नही आते
वे ही (कृष्ण) दही का दान लेते सुख मानते हैं। आपस मे ग्वालों के साथ (दही)
खाते हैं और मीठा कह कहकर स्वयं बखान करते है। (जो) जगदीश विश्व का भरण
करने वाले कहाते हैं वही दोना भर दही से अघा जाते हैं। स्वयं कर्त्ता है, स्वयं हर्त्ता
हैं, स्वयं बनाते है और स्वयं नष्ट करते है। सूरदास कहते हैं कि ऐसे स्वामी कृष्ण
गोपियो के हाथ बिक गये हैं ॥१३०॥
सुनहु बात जुवती इक मेरी ।
तुमतेँ दूरि होत नहिँ कबहूँ, तुम राख्यो मोहिं घेरी ।
तुम कारन बैकुंठ तजत हौं, जनम लेत ब्रज आइ ।
वृन्दावन राधा-गोपी सँग, यहि नहिँ बिसरचौ जाइ ।
तुम अंतर-अंतर कह भाषति; एक प्रान द्वै देह ।
क्यों राधा ब्रज बसैँ बिसारौँ, सुमिरि पुरातन नेह ।
अब घर जाहु दान मैं पायौ, लेखा कियौ न जाइ ।
सूर स्याम हँसि-हँसि जुवतिनि सौँ, ऐसी कहत बनाइ ॥१३१॥
अर्थ-(कृष्ण कहते है) हे युवतियों, मेरी एक बात सुनो । (मैं) कभी तुमसे
दूर नही होता हूँ। तुमने मुझे चारो ओर से घेर रखा है। तुम्हारे लिए बैकुण्ठ छोडकर
ब्रज मे आकर जन्म लेता हूँ। राधा और गोपियो के साथ यह वृन्दावन भूल नही
जाता । तुम भेद-भेद कहती हो (किन्तु) (दोनो) मे एक ही प्राण हैं (केवल) शरीर
दो है। पुराने स्नेह को याद करके राधा के ब्रज के निवास को क्यो भूलूंगा। अब घर
जाओ, मैंने दान पा लिया क्योकि (दान का) हिसाब नही किया जा सकता । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण हँस-हँसकर युवतियो से इस प्रकार (बात) बनाकर कहते हैं ॥१३१॥
तुमहिँ बिना मन धिक अरु धिक घरु ।
तुमहिँ बिना धिक-धिक माता पितु, धिक कुल-कानि, लाज, डरु ।
धिक सुत पति, धिक जीवन जग कौ, धिक तुम बिनु संसार ।
धिक सौ दिवस, पहर, घटिका, पल जो बिनु नंद-कुमार ।
धिक धिक स्रवन कथा बिनु हरि कै, धिक लोचन बिनु रूप ।
सूरदास प्रभु तुम बिनु घर ज्यौं, बन भीतर के कूप ॥१३२॥
अर्थ-(गोपियां कहती है) तुम्हारे बिना मन ओर घर (सबको) धिक्कार है।
तुम्हारे बिना माता और पिता धिक्कार योग्य है ओर कुल की मर्यादा, लज्जा, डर
सबको धिक्कार है। तुम्हारे बिना पुत्र, पति, जग का जीवन तथा संसार को धिक्कार
है । वह दिन, पहर, घड़ी, पल सब धिक्कारने योग्य हैं जो बिना नदकिशोर (कृष्ण) के
हैं। कानो को धिक्कार है जो कृष्ण की कथा के बिना है तथा नयनो को धिक्कार है

१३२ सूरसागर सार सटीक
जिनमें आपका रूप नहीं । सूरदास कहते है कि कृष्ण तुम्हारे बिना घर वैसे ही है जैसे
वन के भीतर कुँआ (निरर्थक) हो ॥१३२॥
रीती मटुकी सीस धरैं ।
वन की घर की सुरति न काहूँ, लेहु दही या कहति फिरैं ।
कवहूँक जाति कुंज भीतर कीँ, तहाँ स्याम की सुरति करैं ।
चौँकि परतिं, कछु तन सुधि आवति, जहाँ तहां मुख सुनति ररैं ।
तब यह कहतिं कहीं मैं इनसौँ, भ्रमि भ्रमि वन में वृथा मरैं ।
सूर स्याम कैं रस पुनि छाकतिं, वैसे हीं ढँग बहुरि ढरैं ॥१३३॥
अर्थ - (गोपियां) खाली मटुकी सिर पर घर लेती है । वन की ओर घर की
(उन्हे) याद नही, लो दही यह कहती फिरती हैं । कभी कुंज के भीतर जाती हैं
और वहाँ कृष्ण की याद करती हैं । कुछ शरीर की याद आने पर चौंक पड़ती हैं ओर
जहाँ तहां सखियो को सुनाते हुए वार-वार कहती हैं । तब यह कहती हैं कि मुझे
इनसे क्या करना है जो वन घूम-घूमकर व्यर्थ मरती हूँ । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण के
रस से पुनः मस्त हो जाती हैं वैसा ही ढङ्ग फिर धर लेती हैं ॥१३३॥
तरुनी स्याम-रस मतवारि ।
प्रथम जोवन-रस चढ़ायौ, अतिहि भई खुमारि ।
दूध नहिं दधि नहीँ, माखन नहीं रीती माट ।
महा-रस अँग-अंग पूरन, कहाँ घर, कहँ वाट ।
मातु-पितु गुरुजन कहाँ के, कौन पति को नारि ।
सूर प्रभु कैं प्रेम पूरन, छकि रहीं ब्रजनारि ॥१३४॥
अर्थ - तरुणिंयां कृष्ण के रस मे मतवाली हो गई हैं । प्रथम यौवन के रस के
चढ़ जाने से वे अत्यधिक शिथिल हो गयी । दूध नही, दही नही, मक्खन नही, मटुकी
खाली है। अंग-अंग मे महारस भर गया है । कहां घर और कहां रास्ता, कहाँ के
माता-पिता, कौन पति और कौन स्त्री (उन्हे कुछ भी ज्ञात नही) । सूरदास कहते हैं
कि कृष्ण के प्रेम-रस से पूर्ण ब्रज नारियां मस्त हो गयी हैं ॥१३४॥
कोउ माई लैहै री गोपालहिं ।
दधि की नाम स्यामसुंदर-रस, विसरि गयौ ब्रज-वालहिँ ।
मटुकी सीस, फिरति ब्रज-वीथिनि, बोलति बचन रसालहिँ ।
उफनत तक्र चहूँ दिसि चितवत, चित लाग्यौ नँद-लालहिँ ।
हँसति, रिसाति, बुलावति, वरजति, देखहु इनकी चालहिँ ।
सूर स्याम बिनु और न भावै, या विरहिनि बेहालहिँ ॥१३५॥
अर्थ- सखी, कोई गोपाल को लेगा । श्यामसुन्दर के रस मे ब्रज की युवती
को दही का नाम ही भूल गया । मटुकी को सिर पर (धर के) ब्रज की गलियो मे रस
से भरी बाते कहती है । मट्ठा के उफनते समय चारों दिशाओ मे देखती है उसका मन

नन्दलाल में (ही) लगा है। (वह) हंसती है, नाराज होती है, बुलाती है और रोकती
हुई कहती है कि इनकी चाल देखो। सूरदास कहते हैं कि इस व्याकुल विरहिणी को
कृष्ण के बिना कुछ अच्छा नही लगता ॥१३५॥
गोपिका अनुराग
लोक-सकुच कुल-कानि तजो।
जैसेँ नदी सिंधु कौं धावै, वैसेहिं स्याम भजी।
मातु-पिता बहु त्रास दिखायौ, नैकुँ न डरी, लजी।
हारि मानि बैठे, नहिँ लागति, बहुतै बुद्धि संजी।
मानत नहीं लोक मरजादा, हरि कैँ रङ्ग मजी।
सूर स्याम कौं मिलि, चूनौ हरदी ज्यौँ रँजी ॥१३६॥
अर्थ-लोक के संकोच और कुल की मर्यादा को छोड़ दिया। जैसे नदी समुद्र
की ओर उमडती है वैसे ही (गोपियो ने) कृष्ण को भजा। माता-पिता ने बहुत डराया
(लेकिन वे) तनिक भी न डरी और न लजायी। (सब) हार मानकर बैठ गये, बहुत
बुद्धि लगायी। (लेकिन बुद्धि) लगती नही। (गोपियां) लोक की मर्यादा नही मानती
(वे) कृष्ण के रंग में रंग गयी। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण से मिलकर चूना और
हल्दी की तरह रंग रंगित हो गयी ॥१३६॥
कहा कहति तू मोहिँ, री माई।
नँद-नंदन मन हरि लियौ मेरौ, तब तैं मोकौँ कछु न सुहाई।
अब लौं नहिँ जानति मैं को ही, कब तैं तू मेरैँ ढिग आई।
कहाँ गेह, कहँ मातु-पिता हैं, कहाँ सजन, गुरुजन कहूँ भाई।
कैसी लाज, कानि है कैसी, कहा कहति ह्वै ह्वै रिसहाई?
अब तौ सूर भजी नँद-लालहिँ, की लघुता की होइ बड़ाई ॥१३७॥
अर्थ - हे सखी, तुम मुझे क्या कहती हो ? कृष्ण ने (जब से) मेरा मन हर
लिया तब से मुझे कुछ भी अच्छा नही लगता। अब तक मैं नही जान पाई कि मैं कौन
थी, तू कब से मेरे पास आयी। कहां घर, कहां माता-पिता है, पति कहां और गुरुजन
तथा भाई कहां हैं। (मुझे कुछ भी नही मालूम) कैसी लज्जा, मर्यादा कैसी है, तुम लोग
नाराज होकर क्या कह रहे हो ? सूरदास कहते है कि (गोपियां कहती हैं) अब तो
कृष्ण को भजा है चाहे छोटाई हो चाहे बड़ाई ॥१३७॥
मेरे कहे मैं कोउ नाहिं।
कहा कहौं, कछु कहि न आवै, नैकहुँ न डराहिँ।
नैन ये हरि-दरस-लोभी, श्रवन सब्द-रसाल।
प्रथमहीँ बन गयौ तन तजि, तब भई बेहाल।
इन्द्रियनि पर भूप मन है, सबनि लियौ बुलाइ।
सूर प्रभु कौँ मिले सब ये, मोहिँ करि गए बाइ ॥१३८॥