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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 117

११६ सूरसागर सार सटीक
मैँ अविगत, अज, अकल हौँ, यह मरम न पायौ ।
भाव बस्य सब पैँ रहौँ, निगमनि यह गायौ ।
एक प्रान द्वै देह हैं, द्विविधा नहिँ यामैँ ।
गर्व कियौ नरदेह तैँ, मैँ रहौँ न तामैँ ।
सूरज-प्रभु अंतर भए, संग तैँ तजि प्यारी ।
जहाँ की तहँ ठाड़ी रही, वह घोष-कुमारी ॥६२॥
अर्थ—स्त्री (राधा) पति से कहती है कि मुझे कन्धे पर चढ़ाओ । नाच करते-
करते अत्यधिक परिश्रम हुआ उस थकावट को मिटाओ । पैर बहुत दर्द कर रहे है
(जिससे) पृथ्वी पर धरते नही बनता । स्त्री के बचन सुनकर (पति) कृष्ण मन मे
मुसकाये । मैं अज्ञात, अजन्मा, तथा अकल हूँ यह मर्म (गोपियो) ने नही पाया । भाव
के वश सबके साथ रहता हूँ । वेदो ने यही गाया है । (हमारे बीच) प्राण एक है तथा
शरीर दो है, इसमे कोई शंका नही है । (पर) मनुष्य के शरीर से जो गर्व करते हैं मैं
उसमे नही रहता । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण प्यारी राधा का साथ छोड़कर अंतर्ध्यान
हो गये । वह अहीर की लड़की राधा जहाँ की तहाँ खड़ी रह गई ॥६२॥
जो देखैँ द्रुम के तरैँ, मुरझी सुकुमारी ।
चकित भईँ सब सुन्दरी, वह तौ राधा री ।
याही कौँ खोजति सबै, यह रही कहाँ री ।
धाइ परीँ सब सुंदरी, जो जहाँ-तहाँ री ।
तन की तनकहुँ सुधि नहीँ, व्याकुल भईँ बाला ।
यह तौ अतिँ बेहाल है, कहुँ गए गोपाला ।
बार-बार बूझतिँ सबै, नहिँ बोलति बानी ।
सूर स्याम काहैँ तजी, कहि सब पछितानी ॥६३॥
अर्थ—जब (गोपियों ने) वृक्ष के नीचे देखा तो (उन्हे) मुरझायी हुई सुकुमारी
(राधा) दिखाई पडी । सब सुन्दरियां चकित हो गयीं कि यह तो राधा है । इसे ही
सब खोजते हे, यह कहां थी । जो जहां थी वहां से सब सुन्दरियां दौड पडी । शरीर की
तनिक भी याद नही, बालाये व्याकुल हो गयी । यह (राधा) तो अत्यधिक बेहाल है
गोपाल कही चले गये । बार वार सभी पूछती हैं लेकिन वह नही बोलती । सूरदास
कहते हैं (कि गोपियां सोचती है) कृष्ण ने इसे क्यो छोड़ दिया, यह कहकर सभी
पछताती है ॥६३॥
केहिँ मारग मैँ जाउँ सखी री, मारग मोहिँ बिसरचौ ।
ना जानौँ कित ह्वै गए मोहन, जात न जानि परचौ ।
अपनी पिय ढूँढ़ति फिरौँ, मोहिँ मिलिबे कौ चाव ।
काँटो लाग्यौ प्रेम कौ, पिय यह पायी दाव ।
बन डोंगर ढंढत फिरी, घर-मारग तजि गाउँ ।