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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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वृन्दावन लीला ११६
जमुना-जल बिहरत नँद-नंदन, संग मिलीँ सुकुमारि ।
सूर धन्य धरनी वृन्दावन, रबि तनया सुखकारि ॥६६॥
अर्थ—रास के रस से ब्रज की बालायें थक गयी । रात को सुख देकर (कृष्ण)
उन्हे जमुना के तट पर ले गये, उस समय सबेरा हो गया । (गोपियो की) सारी
मनोकामनाये पूर्ण हो गयी, एक भी इच्छा बाकी न रही । सोलह हजार नारियो के
साथ मोहन ने अगाध सुख प्राप्त किया । कृष्ण सुकुमारियो को साथ मे लेकर जमुना
के जल मे बिहार करते है । सूरदास कहते है कि वृन्दावन की धरती धन्य है और
सुख देने वाली यमुना (धन्य है) ॥६६॥
ललकत स्याम मन ललचात ।
कहत हैं घर जाहु सुंदरि, मुख न आवति बात ।
षट सहस दस गोप कन्या, रैनि भोगीं रास ।
एक छिन भईँ कोउ न न्यारी, सबनि पूजी आस ।
बिहंसि सब घर-घर पठाईँ, ब्रज गईँ ब्रज-बाल ।
सूर प्रभु-नंद-धाम पहुँचे, लख्यौ काहु न ख्याल ॥१००॥
अर्थ—इच्छा से (कृष्ण का) मन (बार-बार) ललचाता है । कृष्ण कहते हैं कि
हे सुन्दरियों घर जाओ, (लेकिन) मुँह मे बात नही आती । सोलह हजार गोप कन्याओ
ने रात मे रास का भोग किया । कोई एक भी क्षण अलग न हुई और सभी ने अपनी-
अपनी आशाओ को पूर्ण किया । कृष्ण ने हँस कर ब्रज बालाओं को उनके घर भेज
दिया । सूरदास कहते है कि फिर कृष्ण नन्द के घर पहुँचे और किसी ने इस खेल को
देखा समझा नही ॥१००॥
ब्रजबासी सब सोवत पाए ।
नंद सुवन मति ऐसी ठानी, उनि घर लोग जगाए ।
उठे प्रात-गाथा मुख भाषत, आतुर रैनि बिहानी ।
ऐँडत अंग जम्हात बदन भरि, कहत सबै यह बानी ।
जो जैसेँ सो तैसेँ लागे, अपनैँ-अपनैँ काज ।
सूर स्याम के चरित अगोचर, राखी कुल की लाज ॥१०१॥
अर्थ—(लौटकर) उन लोगों ने ब्रजवासियो को सोता पाया । नंद के पुत्र (कृष्ण)
ने बुद्धि मे ऐसा निश्चय करके उनके घर के लोगों को जगाया । उठ करके प्रातः काल
सामान्य बातो को मुँह से कहते हैं । आतुरता मे ही रात बीती । अङ्ग को ऐठकर तथा
मुँह भरकर जम्हाई लेते हुये सभी यह बात कहते है । जो जैसे थे वैसे ही अपने-अपने
काम में लग गये । सूरदास कहते है कि कृष्ण चरित्र न दिखाई देने वाला है (उन्होने
गोपियों की) कुल की लाज रख दी ॥१०१॥