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सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Sur Sagar Saar with Hindi Commentary

महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा

DevanagariBrajpublished359 पृष्ठ

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पृष्ठ 131

१३० सूरसागर सार सटीक
गन गंधर्व देखि सिहात ।
धन्य ब्रज-ललनानि कर तें, ब्रह्म माखन खात ।
नहीं रेख, न रूप, नहिं तनु, बरन नहिं अनुहारि ।
मातु-पितु नहिं दोउ जाकैं, हरत-मरत न जारि ।
आपु कर्त्ता आपु हर्त्ता, आपु त्रिभुवन नाथ ।
आपुहीँ सब घट कौ व्यापी, निगम गावत गाथ ।
अंग प्रति-प्रति रोम जाकै, कोटि-कोटि ब्रह्मांड ।
कीट ब्रह्म प्रजंत जल-थल, इनहिं तैं यह मंड ।
येइ विस्वंभरन नायक, ग्वाल-संग-विलास ।
सोइ प्रभु दधि दान माँगत, धन्य सूरजदास ॥१२८॥
अर्थ—गन्धर्वगण देखकर सिहाते है कि ब्रज की स्त्रियो से ब्रह्म (कृष्ण) मक्खन
खाते हैं । जिनकी न कोई रेखा, न रूप है, न शरीर का कोई रङ्ग है, जिनकी समता
नही है । माता-पिता दोनो जिसके नही हैं, जिसे न कोई हरता है और न जो स्वयं
मरता है, न नष्ट होता है । जो स्वयं कर्त्ता है, स्वयं हर्त्ता है और तीनों लोकों का
स्वामी है । स्वयं सब घटों मे व्याप्त है । वेद-शास्त्र जिनकी गाथा गाते हैं, जिनके
एक-एक रोम मे करोडों ब्रह्माण्ड है । कीट से ब्रह्म तक जल, थल और नभ की इन्ही से
शोभा है, यही विश्वम्भर नायक कृष्ण ग्वालो के साथ खेलते हैं । वही प्रभु दही का
दान मांगते हैं । सूरदास कहते हैं कि (गोपियां) धन्य हैं ॥१२८॥
ब्रह्म जिनहिं यह आयसु दीन्हौ ।
तिन तिन सग जन्म लियौ परगट, सखी सखा करि कीन्हौ ।
गोपी ग्वाल कान्ह द्वै नाहीं, ये कहुँ नैंकु न न्यारे ।
जहाँ-जहाँ अवतार धरत हरि, ये नहिं नैंकु बिसारे ।
एकै देह बहुत करि राखे, गोपी ग्वाल मुरारी ।
यह सुख देखि सूर कै प्रभु कौँ, थकित अमर-संग-नारी ॥१२६॥
अर्थ—ब्रह्म (कृष्ण) ने जिन (लोगो) को आज्ञा दी, उन-उन (लोगो) ने इनके
साथ जन्म लिया । (कृष्ण ने) इन्हे सखा और सखी करके (यथा उचित) माना ।
गोपी-ग्वाल और कृष्ण दो नही है । ये कही तनिक भी अलग नही है। जहां-जहां कृष्ण
(अवतार) धरते हैं इन्हे तनिक भी नही भूलते । एक ही शरीर है उसे गोपी, ग्वाल और
मुरारी के बहुत (रूपो) मे बना रखा है । सूरदास कहते है कि कृष्ण के इस सुख को
देखकर देवताओ के साथ की स्त्रियां थकित (बेचैन) हो जाती हैं ॥१२६॥
यह महिमा येई पै जानैं ।
जोग-यज्ञ तप ध्यान न आवत, सो दधि-दान लेत सुख मानैं ।
खात परस्पर ग्वालनि मिलि कै, मीठौ कहि कहि आप बखानैं ।
विस्वंभर जगदीस कहावत, ते दधि दोना माँझ अघानैं ।