सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला १५५
अर्थ-कृष्ण राधा से मक्खन मांगते है। और कहा कि औरों की मटकी का
(मक्खन) खाया । (देखूं) तुम्हारा कैसा लगता है। वृषभानु की पुत्री (मक्खन) ले आयी
और हँस कर (बोली) मेरा मक्खन ताजा है। (राधा ने मक्खन) लेकर अपने हाथ से
हरि के मुंह में दिया, और खाते हुए थोड़ा हँस कर देखा। कृष्ण ने कहा सबसे अधिक
मीठा दही है, यह मीठी बात कहकर (कृष्ण ने) सुनायो । सूरदास कहते हैं कि कृष्ण ने
ब्रज की स्त्री (राधा) के मन को अच्छा लगने वाले सुख को उत्पन्न किया ॥१२५॥
मेरे दधि कौ हरि स्वाद न पायौ ।
जानत इन गुजरिनि कौ सौ है, लयौ छिड़ाइ मिलि ग्वालनि खायौ ।
धौरी धेनु दुहाइ छानि पय, मधुर ऑचि मैं औटि सिरायौ ।
नई दोहनी पोंछि पखारी, धरि निरधूम खिरनि पै तायौ ।
तामैं मिलि मिस्रित मिसिरी करि, दै कपूर पुट जावन नायौ ।
सुलभ ढकनियाँ ढाँकि बाँधि पट, जतन राखि छीकैं समुदायौ ।
हौं तुम कारन लै आई गृह, मारग मैं न कहूँ दरसायौ ।
सूरदास-प्रभु रसिक-सिरोमनि, कियौ कान्ह ग्वालिनि मन भायौ ॥१२६॥
अर्थ-(एक ग्वालिन कहती है) मेरे दही का स्वाद कृष्ण ने नही पाया ।
समझा कि मेरा दही अन्य गुजरियों जैसा है। लेकर सब ग्वालो मे वांट कर खाया ।
धौरी (सफेद गाय) को दुहाकर, दूध को छानकर, हल्की आंच में गरम करके फिर ठंडा
किया । नयी दोहनी को पोछकर धोया और बिना धुएँ की अंगीठी पर ताया। उसमें
मिसरी मिलाकर कपूर के पुट के साथ जावन दिया । अच्छी ढकनियां से ढाँक कर
कपड़े से बांधा और चिन्ता के साथ छीके पर रख दिया। मैं तुम्हारे ही कारण (इसे)
ले आँई, घर ओर रास्ते में किसी को नहीं दिखाया । सूरदास कहते है कि कृष्ण
रसिकों में शिरोमणि हैं, उन्होंने ग्वालिन के मन की बात की ॥१२६॥
गोपी कहति धन्य हम नारी ।
धन्य दूध, धनि दधि, धनि माखन,हम परूसति जेंवत गिरिधारी ।
धन्य घोष, धनि दिन, धनि निसि वह, धनि गोकुल प्रगटे वनवारी ।
धन्य सुकृत पाँछिलौ, धन्य धनि नँद, धन्य जसुमति महतारी ।
धनि धनि ग्वाल, धन्य वृन्दावन, धन्य भूमि यह अति सुखकारी ।
धन्य दान, धनि कान्ह मँगैया, धन्य सूर त्रिन-द्रुम बन-डारी ॥१२७॥
अर्थ-गोपियां कहती है कि हम स्त्रियाँ धन्य हैं, दूध धन्य है, दही धन्य है,
माखन धन्य है जिन्हे हम परोसती है और गिरधारी खाते है। अहीरों का गांव धन्य
है, दिन धन्य है और वह रात्रि धन्य है, गोकुल धन्य है, जहां कृष्ण प्रकट हुए ।
पिछला पुण्य धन्य है, नन्द धन्य हैं, यशोदा माता धन्य है, वृन्दावन धन्य है, अत्यधिक
सुख देने वाली यह भूमि धन्य है। दान धन्य है, मांगने वाले कृष्ण धन्य हैं। सूरदास
कहते हैं कि तृण, वृक्ष तथा वन की डाले धन्य है ॥१२७॥
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