सूरसागर सार (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Sur Sagar Saar with Hindi Commentary
महाकवि सूरदास / डॉ. धीरेन्द्र वर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवृन्दावन लीला १३१
आपुहिं करता, आपुहिं हरता, आपु बनावत, आपुहिँ भाने ।
ऐसे सूरदास के स्वामी, ते गोपिनि कैँ हाथ बिकाने ॥१३०॥
अर्थ-यह महिमा ये ही जानते हैं। योग, यज्ञ, तप, ध्यान में जो नही आते
वे ही (कृष्ण) दही का दान लेते सुख मानते हैं। आपस मे ग्वालों के साथ (दही)
खाते हैं और मीठा कह कहकर स्वयं बखान करते है। (जो) जगदीश विश्व का भरण
करने वाले कहाते हैं वही दोना भर दही से अघा जाते हैं। स्वयं कर्त्ता है, स्वयं हर्त्ता
हैं, स्वयं बनाते है और स्वयं नष्ट करते है। सूरदास कहते हैं कि ऐसे स्वामी कृष्ण
गोपियो के हाथ बिक गये हैं ॥१३०॥
सुनहु बात जुवती इक मेरी ।
तुमतेँ दूरि होत नहिँ कबहूँ, तुम राख्यो मोहिं घेरी ।
तुम कारन बैकुंठ तजत हौं, जनम लेत ब्रज आइ ।
वृन्दावन राधा-गोपी सँग, यहि नहिँ बिसरचौ जाइ ।
तुम अंतर-अंतर कह भाषति; एक प्रान द्वै देह ।
क्यों राधा ब्रज बसैँ बिसारौँ, सुमिरि पुरातन नेह ।
अब घर जाहु दान मैं पायौ, लेखा कियौ न जाइ ।
सूर स्याम हँसि-हँसि जुवतिनि सौँ, ऐसी कहत बनाइ ॥१३१॥
अर्थ-(कृष्ण कहते है) हे युवतियों, मेरी एक बात सुनो । (मैं) कभी तुमसे
दूर नही होता हूँ। तुमने मुझे चारो ओर से घेर रखा है। तुम्हारे लिए बैकुण्ठ छोडकर
ब्रज मे आकर जन्म लेता हूँ। राधा और गोपियो के साथ यह वृन्दावन भूल नही
जाता । तुम भेद-भेद कहती हो (किन्तु) (दोनो) मे एक ही प्राण हैं (केवल) शरीर
दो है। पुराने स्नेह को याद करके राधा के ब्रज के निवास को क्यो भूलूंगा। अब घर
जाओ, मैंने दान पा लिया क्योकि (दान का) हिसाब नही किया जा सकता । सूरदास
कहते हैं कि कृष्ण हँस-हँसकर युवतियो से इस प्रकार (बात) बनाकर कहते हैं ॥१३१॥
तुमहिँ बिना मन धिक अरु धिक घरु ।
तुमहिँ बिना धिक-धिक माता पितु, धिक कुल-कानि, लाज, डरु ।
धिक सुत पति, धिक जीवन जग कौ, धिक तुम बिनु संसार ।
धिक सौ दिवस, पहर, घटिका, पल जो बिनु नंद-कुमार ।
धिक धिक स्रवन कथा बिनु हरि कै, धिक लोचन बिनु रूप ।
सूरदास प्रभु तुम बिनु घर ज्यौं, बन भीतर के कूप ॥१३२॥
अर्थ-(गोपियां कहती है) तुम्हारे बिना मन ओर घर (सबको) धिक्कार है।
तुम्हारे बिना माता और पिता धिक्कार योग्य है ओर कुल की मर्यादा, लज्जा, डर
सबको धिक्कार है। तुम्हारे बिना पुत्र, पति, जग का जीवन तथा संसार को धिक्कार
है । वह दिन, पहर, घड़ी, पल सब धिक्कारने योग्य हैं जो बिना नदकिशोर (कृष्ण) के
हैं। कानो को धिक्कार है जो कृष्ण की कथा के बिना है तथा नयनो को धिक्कार है