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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

८४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
मनहर छंद
कवहू कै हसि उठै कवहू कै रोइ देत,
कबहु वकत कहू अंत हू न लहिये ।
कवहूक खाइ तौ अघाऽ नहि काहू करि,
कवहूक कहै मेरै कछु नहि चहिये ॥
कवहू आकाश जाइ कवहू पाताल जाइ,
सुन्दर कहत ताहि कैसे करि गहिये ।
कबहूक आइ लागै कवहू उतरि भागे,
भूत के से चिन्ह करै ऐसौ मन कहिये ॥१७॥
कबहु तौ पाख कौ परेवा कै दिखावै मन,
कबहूक धूरि के चावरि करि लेत है ।
कबहु तौ गोटिका उछारत आकास ओर,
कबहूक राते पीरे रग श्याम शेत है ॥
कबहु तौ श्राब कौ उगाइ करि ठाडौ करै,
कबहू तौ शीस धर जुदे कर देत है ।
बाजीगर कौ सौ ख्याल सुन्दर करत मन,
सदाई भ्रमत रहै ऐसौ कोऊ प्रेत है ॥१८॥
(१८) परेबा-पक्षी । चौररि-चावल । गोटिका-गोली ।
शीस धर जुदे-शिर को धड से अलग ।

॥ मन को अंग ॥ [ ८५
कबहूंक साध होत कबहूक चोर होत,
कबहूक राजा होत कबहूक रक सौ ।
कबहूक दीन होत कबहू गुमानी ह त,
कबहूंक सूधौ होत कबहूंक बक सौ ॥
कबहूक कामी होत कबहूक जती होत,
कबहूंक निर्मल होत कबहूंक पक सौ ।
मन कौ स्वरुप ऐसौ सुन्दर फटिक जैसौ,
कबहूक सूर होत कबहूं मयक सौ ॥१६॥
हाथीकौ सौ कान किधौ पीपर कौ पान किधौ,
ध्वजा कौ उडान कहु थिर न रहतु है ।
पानी कौ सौ घेरि किधौ पौन उग्झेर किधौ,
चक्र कौ सौ फेरि कोऊ कैसे कै गहतु है ॥
अरहट माल किधौ चरखा कौ ख्याल किधौ,
फेरि खात वाल कछु सुधि न लहतु है ।
घूमकौ सौ घाव ताकौ राखिबे कौ चाव ऐसौ,
मन कौ सुभाव सु तौ सुन्दर कहतु है ॥२०॥
(१६) गुमानी-अभिमानी, घमंडी । जती-साधु । पक-
कीचड । सूर-सूर्य सा गर्म । मयक-चद्रमा सा ठंडा ।
(२०) घेर-चक्कर, भंवर । पौन उरझेर-हवा का
चक्कर, भभूला । घूम को घाव-धुआ उडान ।

८६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सुख मानै दुख मानै सम्पति विपति मानै,
हर्ष मानै शोक मानै मानै रक धन है ।
घटि मानै वढि मानै शुभ हू अशुभ मानै,
लाभ मानै हानि मानै याँह तै कृपन है ।
पाप मानै पुन्य मानै उत्तम मध्यम मानै,
नीच मानै ऊच मानै मानै मेरो तन है ।
सुरग नरक मानै बध मानै मोक्ष मानै,
सुन्दर सकल मानै तातै नाम मन है ॥२१॥
जोई जोई देखै कछु सोई सोई मन आहि,
जोई जोई सुनै सोई मन ही कौ भ्रम है ।
जोई जोई सूँ घै जोई खाई जौ सपर्श होइ,
जोई जोई करै सोई मन ही कौ क्रम है ॥
ज ई जोई ग्रहै जोई त्यागै जोई अनुरागै,
जहाँ जहां जाइ सोई मन ही कौ श्रम है ।
जोई जोई कहै सोई सुन्दर सकल मन,
जोई जोई कलपै सु मन ही कौ ध्रम है ॥२२॥
एक ही विटप विश्व ज्यौ कौ त्यौ ही देखियत,
अति ही सघन ताके पत्र फल फूल है ।
(२२) श्रम दम, काम । ध्रम धर्म, गुण, स्वभाव ।

॥ मन को अंग ॥ [ ८७
आगिले झरत पात नये नये होत जात,
ऐसौ याही तरु कौ अनादि काल मूल है ॥
दश च्यारि लोक लौ पसरि जहा तहा रह्यो,
अध पुनि ऊरध सूखिम अरु थूल है ।
कोऊ तौ कहत सत्य कोऊ तौ कहै असत्य,
सुन्दर सकल मत ही कौ भ्रम भूल है ॥२३॥
तौ सो न कपूत कोऊ कतहूं न देखियत,
तौ सो न सपूत कोऊ देखियत और है ।
तूं ही आप भूलि महा नीच हूं तें नीच होइ,
तूं ही आपु जाते तें सकल शिरमोर है ॥
तू ही आपु भ्रमै तब भ्रमत जगत देखै,
तेरे थिर भये सब ठौर ही कौ ठौर है ।
तूं ही जीव रूप तू ही ब्रह्म है अकाशवत,
सुन्दर कहत मन तेरी सब दौर है ॥२४॥
मन ही कै भ्रम तै जगत यह देखियत,
मन ही कौ भ्रम गयौ जगत विलात है ।
मन ही कै भ्रम जेवरी मैं उपजत साप,
मन कै विचारै साप जेवरी समात है ॥
(२३) विटप-वृक्ष । दश-च्यार-चौदह ।

८८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
मन ही कै भ्रम तै मरीचिका कौ जल कहै,
मन ही कै भ्रम सीपि रूपौ सो दिखात है ।
सुन्दर सकल यह दीसै मन ही कौ भ्रम,
मन ही कौ भ्रम गये ब्रह्म होइ जात है ॥२५॥
मन ही जगत रूप होइ करि विसतर्यौ,
मन ही अलख रूप जगत सौ न्यारौ है ।
मन ही सकल घट व्यापक अखंड एक,
मन ही सकल यह जगत पियारौ है ॥
मन ही आकाशवत हाथ न परत कछु,
मन के न रूप रेख बुद्ध ही न वारौ है ।
सुन्दर कहत परमारथ बिचारै जब,
मन मिटि जाइ एक ब्रह्म निज सारौ है ॥२६॥
॥ इति मन को अङ्ग सम्पूर्णं ॥
(२५) मरीचिका-मृगतृष्णा । रूपौ-चांदी ।

॥ चांनक को अंग ॥ [ ८६
अथ चांनक को अंग ॥१२॥
मनहर छंद
जोई जोई छूटिबे कौ करत उपाइ अज्ञ,
सोई सोई दिढ करि बंधन परतु है ।
जोग जज्ञ जप तप तीरथ ब्रतादि और,
झपापात लेत जाइ हिंमारै गरतु है ॥
कानऊ फराइ पुनि केसऊ लुचाई अग,
बिभूति लगाइ सिर जटाऊ धरतु है ।
बिनु ज्ञान पाये नहि छूटत हृदै की ग्रन्थि,
सुन्दर कहैत यौं ही भ्रमि कै मरतु है ॥१॥
निर्मांत्रिक छंद
जप तप करत धरत ब्रत जत सत,
मन बच क्रम भ्रम कष्ट सहत तन ।
वलकल बसन अशन फल पत्र जल,
कसत रसन रस तजत बसत वन ॥
जरत मरत नर गरत परत सर,
कहत लहत हय गय दल वल धन ।
पचत पचत भव भय न टरत शठ,
घट घट प्रगट गृहत न लखत जन ॥२॥
(१) दिढ-दृढ, मजबूत । झपापात-पहाड की चट्टान से
गिरना । हिमारै-हिमालय । ग्रन्थि-गाठ, घुण्डी ।
(२) वालकल-वल्कल, छाल । वसन-वस्त्र । अशन-
भोजन । रसन-जीभ । हय-घोडे । गय-गज । कपट-कष्ट ।

६० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
जोग करै जज्ञ करै, वेद विधि त्याग करै,
जप करै तप करै यू ही आयु खूटि है ।
यम करै नेम करै तीरथ ऊ ब्रत करै,
पुहमि भ्रटन करै वृथा श्वास टूटि है ॥
जीवे को जतन करै मन मैं वासना धरै,
पचि पचि यौ ही मरै काल सिर कूटि है ।
औरऊ अनेक विधि कोटिक उपाइ करैं,
सुन्दर कहत बिनु ज्ञान नहिं छूटि है ॥३॥
बुधि करि हीन रज तम गुन छाइ रह्यौ,
बन बन फिरत उदास होइ घरतै ।
कठिन तपस्या धरि मेघ शीत घाम सहै,
कंद मूल खाइ कोऊ कामना के डरतै ॥
अति ही अज्ञान और बिविध उपाइ करै,
निज रूप भूलि करि बधै जाइ परतै ।
सुन्दर कहत मूंधी ओर दिस देखै मुख,
हाथ- माहि आरसी न- फेरै मूढ करतै ॥४॥
(३) पुहमि-पृथ्वी पर । भ्रटन-भ्रमण, तीर्थयात्रा ।
(४) मूंधी-उलटी । आरसी-दर्पण, काच ।

॥ चांनक कौ अग ॥ [ ६१
मेघ सहै शीत कहै शीश पर घाम सहै,
कठिन तपस्या करि कंद मूल खात है ।
जोग करै जज्ञ करै तीरथ ऊ ब्रत करै,
पुनि नाना विधि करै मन मैं सिहात है ॥
और देवी देवता उपासना अनेक करै,
आमनि की हौंस कैसे आकडोडे जात है ।
सुन्दर कहत एक रवि के प्रकाश बिन,
जैंगनें की ज्योति कहा रजनी विलात है ॥५॥
आप ही कै घट मैं प्रगट परमेश्वर है,
ताहि छोडि भूलै नर दूर दूर जात है ।
कोई दौरै द्वारिका कौ कोई काशी जगनाथ,
कोई दौरै मथुरा कौ हरिद्वार न्हात है ॥
कोई दौरै बद्रीनाथ विषम पहाड चढि,
कोई तौ केदार जात मन मैं सिहात है ।
सुन्दर कहत गुरुदेव देहि दिव्य नैन,
दूरि ही कै दूरवीन निकट दिखात है ॥६॥
(५) हौंस-इच्छा । अकडोडे-आकडे का डोडा । जैंगने
की जोति-जुगनू की चमक ।
(६) सिहात है-अहंकार करता है । विषम-कठिन ।
(७) आधर्रैनि-अ धोने ।

६२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
कोऊ फिरै नागे पाउ कोऊ गूदरी बनाउ,
देह की दशा दिगाउ बाद लोन गूट्यो है ।
कोऊ दूनाहारी होइ कोऊ फलहारी तोइ,
कोऊ अधोमुख भूनि भूनि धूम घूट्यो है ॥
कोऊ नहि खाहि लोन कोऊ मुख गहे मौन,
सुन्दर कहत यां ही वृथा भुम कूट्यो है ।
प्रभुसों न प्रीति माहि, ज्ञानसों पच्चै नाहि,
देखो भाई आंधरैनि ज्यों बाजार लूट्यो है ॥७॥
इन्द्रव छंद
आसन मारि सवारि जटा नस,
उज्ज्वल अग विभूति चढाई ।
या हमकौ कछु देइ, दया करि,
घेरि रहे बहु लोग लुगाई ॥
कोउक उत्तम भोजन ल्यावत,
कोउक ल्यावत पान मिठाई ।
सुन्दर लै करि जान भयौ सब,
मूरख लोगन या सिधि पाई ॥८॥
ऊरध पाइ अधोमुख व्है करि,
घुटत घूमहि देह भुलावै ।
मेघहु शीतहु घाम सहै सिर,
तीनहु काल महा दुख पावै ॥
हाथ कछू न परै कबहूकन,
मूरिख कूकस कूटि उडावै ।

॥ चानक को अंग ॥ [ ६३
सुन्दर बछि बिषै सुख कौं घर,
बूडत है अरु झाझन गावै ॥६॥
ग्रेह तज्यौ अरु नेक तज्यौ पुनि,
खेह लगाइ कै देह सवारी ।
मेघ सहै सिर शीत सह्यौ तनु,
धूप सहै जु पचागनि बारी ॥
भूख सही रहै रूख तरै परि,
सुन्दर दास सहै दुख भारी ।
डासन छाडि कै कासन ऊपरि,
आसन मार्यौ पै आश न मारी ॥१०॥
जौ कोड कष्ट करै बहुभातिनि,
जात अज्ञान नही मन केरौ ।
ज्यौ तम पूरि रह्यौ घर भीतर,
कैसेहु दूर न होत अधेरौ ॥
लाठिनि मारिये ठेलि निकारिये,
और उपाइ करै बहुतेरौ ।
सुन्दर सूर प्रकाश भयौ तब,
तौ कतहू नहि देखिये नेरौ ॥११॥
(६) ऊरध-ऊपर । पाइ पैर । घुटत घूमहि-धु ए मे
घुटते हैं ।
(१०) ग्रेह-घर । खेह-भस्मी । पचागनि-पचाग्नि ।
रूख-वृक्ष । डासन-विछोना । कासन-घास की चटाई ।

६४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
धार वह्यो खग धार हणौ,
जल धार सह्यौ गिरिधार गिर्यौ है ।
भार सच्यौ धन भारथ हू करि,
भार लयौ सिर भार पर्यौ है ॥
मार तप्यौ वहि मार गयौ,
जम मार दई मन् तौ न मर्यौ है ।
सार तज्यौ खुट सार पढ्यौ,
कहि सुन्दर कारिज कौन सर्यौ है ॥१२॥
कोउ भया पय पान करै नित,
कोउक खात हैं अन्न अलौनां ।
कोउक कष्ट करै निशवासगं,
कोउक बैठि कै साधत पौना ॥
कोऊक बाद बिवाद करै अति,
कोउक धारि रहै मुख मौना ।
सुन्दर एक अज्ञान गये बिनु,
सिद्ध भयौ नहिं दीसत कौना ॥१३॥
(१२) खग-खड्ग, तलवार । भारथ हूकार-बैल की
तरह पचरकर। खुट-खोटा ।

॥ चानक को अंग ॥ [ ६५
कोउक अंग बिभूति लगावत,
कोउक होत निराट दिगम्बर ।
कोउक श्वेत कषाइक ओढत,
कोउक काथ रंगै बहु अम्बर ॥
कोउक बलकल शीश जटा नख,
कोउक ओढत है जु बघबर ।
सुन्दर एक अज्ञान गये बिनु,
ये सब दीसत आहि अडबर ॥१४॥
कोउक जात पिराग बनारस,
कोउ गया जगनाथ ही धावै ।
को मथुरा बदरी हरिद्वार सु,
कोउ भया कुरुखेत हि न्हावै ॥
कोउक पुष्कर व्है पच तीरथ,
दौरैइ दौरै जु द्वारका आवै ।
सुन्दर बित्त गड़्यौ घर माहि सु,
बाहिर ढूंढत क्यौ करि पावै ॥१५॥
आगै कछू नहिं हाथ पर्यौ पुनि,
पीछै विगारि गये निज भौना ।
ज्यौ कोऊ कामिनि कत हि मारि,
चली सग और हि देखि सलौना ॥
(१५) पिराग-प्रयाग । वित्त-धन ।

६६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सोऊ गयौ तजिकै ततकाल,
कहै न बनै जु रही मुख मौना ।
तैसै हि सुन्दर ज्ञान बिना सब,
छाडि भये नर भाड कै दौना ॥१६॥
ज्यौ कोउ कोस कट्यौ नही मारग,
तेलकले घर मैं पशु जोये ।
ज्यौ बनिया गयौ बीस कै तीस कौ,
बीस हु मै दमहू नहिं होये ॥
ज्यौ कोउ चौबे छब्बे कौं चल्यौ पुनि,
होइ दुबे दुई गाठ के खोये ।
तैस हि सुन्दर और क्रिया सब,
गम बिना निहचै नर रोये ॥१७॥
जो कोउ राम बिना नर मूरिख,
औरन के गुन जीभ भनैगी ।
आनि क्रिया गढतै गडवा पुनि,
होत है भेरि कछू न बनैगी ॥
ज्यौ हथफेरि दिखावत चावर,
अन्त तौ धूरि की धूरि छनैगी ।
सुन्दर भूल भई अतिसै करि,
सूते की भैस पाडा ई जनैगी ॥१८॥
(१६) सलोना-सुन्दर । कत-अपना पति ।
(१७) तेलकले-तेल निकालने की घाणी, कोल्हू ।

॥ चानक को अंग ॥ [ ६७
होइ उदास बिचार बिना नर,
गेह तज्यौ बन जाइ रह्यौ है ।
अंबर छाडि बघंबर लै करि,
कै तप कौ तन कष्ट सह्यौ है ॥
आसन मारि शवासन ह्वै,
मुख मौन गही, मन तौ न गह्यो है ।
सुन्दर कौन कुबुद्धि लगी कहि,
या भवसागर माँहि बह्यौ है ॥१९॥
भेष धर्यौ पर भेद न जानत,
भेद लहे बिनु खेद ही पैहै ।
भूख हा मारत नीद निवारत,
अन तजै फल पत्रनि खैहै ॥
और उपाइ अनेक करै पुनि,
ताहि तै हाथ कछू नहीं ऐहै ।
या नर देह वृथा शठ खोवत,
सुन्दर राम बिना पछितैहै ॥२०॥
आपुने आपुने थान मुकाम,
सराहन कौ सब बात भली है ।
यज्ञ ब्रतादिक तीरथ दान,
पुरान कथा जु अनेक चली है ॥
केतिक और उपाइ जहा लग,
ते सुनि कै नर बुद्धि छली है ।

६८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सुन्दर ज्ञान विना न कहू सुख,
भूलनि की बहु भाति गली है ॥२१॥
कोउक चाहत पुत्र धनादिक,
कोउक चाहत वाझ जनायौ ।
कोऊक चाहत धात रसायन,
कोउक चाहत पारद खायौ ॥
कौउक चाहत जन्त्रनि मन्त्रनि,
कोउक चाहत रोग गमायौ ।
सुन्दर राम विना सब ही भ्रम,
देखहु या जग यौँ डहकायौ ॥२२॥
काहे कौ तू नर भेख बनावत,
काहे कौ तू दस हू दिसि डूलै ।
काहे कौ तू तन कपट करै अति,
काहे कौ तू मुख तै कहि फूलै ॥
काहे कौ और उपाइ करै अब,
आन क्रिया करिके मति भूलै ।
सुन्दर एक भजै भगवत हि,
तौ सुखसागर मैं नित भूलै ॥२३॥
॥ इति चांनक को अंग ॥

॥ विपरीत ज्ञानी को अंग ॥ [ ६६
अथ बिपरीत ज्ञानी को अंग ॥१३॥
मनहर छंद
'एक ब्रह्म' मुख मौ बनाइ करि कहत है,
अंतहकरन तौ बिकारनि सौ भर्यौ है ।
जैसैं ठग गोबर सौ कूपौ भरि राखत है,
सेर पाच घृत लै के ऊपर ज्यौ कर्यौ है ॥
जैसे कोऊ भाडे माँहि प्याज कौ छिपाइ राखै,
चीथरा कपूर कौ लै मुख बाधि धर्यौ है ।
सुन्दर कहत ऐसे ज्ञानी है जगत माहि,
तिनकौ तौ देखि करि मेरौ मन डर्यौ है ॥१॥
देह सौ ममत्त पुनि गेह सौ ममत्त सुत,
दारा सौ ममत्त मन माया मैं रहतु है ।
थिरता न लहै जैसै कदुक चौगान माहि,
कर्मनि कै वसि मार्यौ थका कौ बहुतु है ॥
अंतहकरन मु तौ जगत सौ रचि रह्यौ,
मुख सौ बनाइ बात ब्रह्म की कहतु है ।
सुन्दर अधिक मोही याही तै अचंभौ आहि,
भूमि पर पर्यौ कोऊ चन्द कौ गहतु है ॥२॥
मुख सौ कहत ज्ञान, भ्रमै मन इन्द्रिय प्रान,
मारग कै जल मैं न प्रतिबिंब लहिये ।

१०० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
गाठि मे न पैका कोऊ भयौ रहै साहूकार,
बातनि ही मुहर रुपैया गिनि गहिये ॥
सुपने मैं पचामृत जीमि कै तृपति भयौ,
जागै तै मरत भूख खाइबे कौ चहिये ।
सुन्दर सुभट जैसे काइर मारत गाल,
राजा भोज सम कहा गगौ तेली कहिये ॥३॥
संसार के सुखनि सौ आसक्त अनेक विधि,
इन्द्रिय हू लोलुप मन कबहू न गह्यौ है ।
कहत है ऐसै मै तो एक ब्रह्म जानत हू,
ताहि तै छोडी कै शुभ कर्मन कौ रह्यौ है ॥
ब्रह्म की न प्राप्ति पुनि कर्म सब छूटि गये,
दहुन तै भ्रष्ट होइ अधबिच बह्यौ है ।
सुन्दर कहत ताहि त्यागिये श्वपच जैसे,
याही भांति ग्रन्थ मै वसिष्ठजी हू कह्यौ है ॥४॥
ज्ञान की सी बात कहै मन तौ मलीन रहै,
वासना अनेक भरी नैकु न निवारि है ।
जैसे कऊ आभूषण अधिक बनाइ राख्यो,
कलई ऊपरि करि भीतरि भगारि है ॥
ज्यौही मन आवै त्यौही खेलत निसंक होड,
ज्ञान सुनि सीख लयौ ग्रथनि विचारि है ।
सुन्दर कहत वाकै अटक न कंऊ आहि,
जोई वासौ मिलै जाइ ताहि कौ विगारि है ॥५॥

॥ विपरीत ज्ञानी को अंग ॥ [ १०१
हंस श्वेत बक श्वेत देखिये समान दोऊ,
हंस मोती चुगै बक मछरी कौ खात है ।
पिक अरु काक दोऊ कैसे करि जाने जाहि,
पिक अंब डार काक करक हि जात है ॥
सिधौ अरु फटक पखान सम देखियत,
वह तौ कठोर वह जल मैं समात है ।
सुन्दर कहत ज्ञानी बाहिर भीतर शुद्ध,
ताकी पटतर और बातनि की बात है ॥६॥
॥ इति विपरीत ज्ञानी को अंग सम्पूर्ण ॥
(१) कूपो-घड़ा, कलशा ।
(४) श्वपच-चांडाल ।
(६) पटतर-समान ।

१८२ । ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ बचन विवेक को अंग ॥४२॥
जाकै पद माथौ प्रवीन सो-ऐसो बन्यौ,
ताकै आगे फेरि फेरि हत्था दबाइये ।
जाहि नाना भेष भेष सिगाराइ सुन्दर,
ताकै आगे पानि पनि जोडि नवाइये ॥
जाके पञ्चामृत पान गान सब दिन बीते,
सुन्दर रहन नाहि गलगै लगाइये ।
चतुर प्रवीन आगे मूरख उधार पने,
मूरज पै आगे जैसे जेमना जिवाइये ॥१॥
एक वानी रूपवंत भगवंत अग,
अधिक विराजमान हिरन ऐनी है ।
एक वानी फाटे टूटे अम्बर उठाये यानि
नाह माहि त्रिपरीत मुनिजन नैनी है ॥
एक वानी मस्तक ही बहुत सिगार किये
लोकनि कों नीकी लगै मतनि कौ भंगी है ।
सुन्दर कहत वानी त्रिविध जगत मांहि
जानै कोऊ चतुर प्रवीन जाकै जैसी है ॥२॥
राजा को कुंवर जी सुरूप कै कुरुप होइ,
ताकौ तमजीम करि गोद लै खिलाइये ॥
और काहू रैनि कै सुरूप होइ सोभनीक,
ताहू कौ तौ देखि करि निकट बुलाइये ॥

॥ वचन विवेक को अंग ॥ [ १०३
काहू के कुरूप कारौ कूबरौ व्है अंगहीन,
वाकी और देखि देखि माथौ ई हलाइये ।
सुन्दर कहत वाके बाप ही कौ प्यारौ लागे,
यौ ही जानि बानी कौ विवेक ऐसैं पाइये ॥३॥
बोलिये तौ तब जब बोलिबे की सुधि होइ,
न तौ मुख मौन गहि चुप होइ रहिये ।
जोरिये ऊ तब जब जोरिबो ऊ जानि परै,
तुक छंद अरथ अनूप जामैं लहिये ॥
गाइये ऊ तब जब गाइवे कौ कंठ होइ,
श्रवन के सुनत ही मन जाइ गहिये ।
तुक भग छंद भग अरथ मिले न कछु,
सुन्दर कहत ऐसी वानी नही कहिये ॥४॥
एकनि के बचन सुनत अति सुख होइ,
फूल से झरत है अधिक मन भावने ।
एकनि के बचन अश्म मानौ वरषत,
श्रवन के सुनत लगत अलखावने ॥
एकनि के वचन कटक कटु बिष रूप,
करत मरम छेद दुख उपजावने ।
सुन्दर कहत घट घट मैं वचन भेद,
उत्तम मधिम और अधम सुनावने ॥५॥