सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 284 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 111

१८२ । ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ बचन विवेक को अंग ॥४२॥
जाकै पद माथौ प्रवीन सो-ऐसो बन्यौ,
ताकै आगे फेरि फेरि हत्था दबाइये ।
जाहि नाना भेष भेष सिगाराइ सुन्दर,
ताकै आगे पानि पनि जोडि नवाइये ॥
जाके पञ्चामृत पान गान सब दिन बीते,
सुन्दर रहन नाहि गलगै लगाइये ।
चतुर प्रवीन आगे मूरख उधार पने,
मूरज पै आगे जैसे जेमना जिवाइये ॥१॥
एक वानी रूपवंत भगवंत अग,
अधिक विराजमान हिरन ऐनी है ।
एक वानी फाटे टूटे अम्बर उठाये यानि
नाह माहि त्रिपरीत मुनिजन नैनी है ॥
एक वानी मस्तक ही बहुत सिगार किये
लोकनि कों नीकी लगै मतनि कौ भंगी है ।
सुन्दर कहत वानी त्रिविध जगत मांहि
जानै कोऊ चतुर प्रवीन जाकै जैसी है ॥२॥
राजा को कुंवर जी सुरूप कै कुरुप होइ,
ताकौ तमजीम करि गोद लै खिलाइये ॥
और काहू रैनि कै सुरूप होइ सोभनीक,
ताहू कौ तौ देखि करि निकट बुलाइये ॥