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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

॥ चानक को अंग ॥ [ ६५
कोउक अंग बिभूति लगावत,
कोउक होत निराट दिगम्बर ।
कोउक श्वेत कषाइक ओढत,
कोउक काथ रंगै बहु अम्बर ॥
कोउक बलकल शीश जटा नख,
कोउक ओढत है जु बघबर ।
सुन्दर एक अज्ञान गये बिनु,
ये सब दीसत आहि अडबर ॥१४॥
कोउक जात पिराग बनारस,
कोउ गया जगनाथ ही धावै ।
को मथुरा बदरी हरिद्वार सु,
कोउ भया कुरुखेत हि न्हावै ॥
कोउक पुष्कर व्है पच तीरथ,
दौरैइ दौरै जु द्वारका आवै ।
सुन्दर बित्त गड़्यौ घर माहि सु,
बाहिर ढूंढत क्यौ करि पावै ॥१५॥
आगै कछू नहिं हाथ पर्यौ पुनि,
पीछै विगारि गये निज भौना ।
ज्यौ कोऊ कामिनि कत हि मारि,
चली सग और हि देखि सलौना ॥
(१५) पिराग-प्रयाग । वित्त-धन ।