सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ चानक को अंग ॥ [ ६७
होइ उदास बिचार बिना नर,
गेह तज्यौ बन जाइ रह्यौ है ।
अंबर छाडि बघंबर लै करि,
कै तप कौ तन कष्ट सह्यौ है ॥
आसन मारि शवासन ह्वै,
मुख मौन गही, मन तौ न गह्यो है ।
सुन्दर कौन कुबुद्धि लगी कहि,
या भवसागर माँहि बह्यौ है ॥१९॥
भेष धर्यौ पर भेद न जानत,
भेद लहे बिनु खेद ही पैहै ।
भूख हा मारत नीद निवारत,
अन तजै फल पत्रनि खैहै ॥
और उपाइ अनेक करै पुनि,
ताहि तै हाथ कछू नहीं ऐहै ।
या नर देह वृथा शठ खोवत,
सुन्दर राम बिना पछितैहै ॥२०॥
आपुने आपुने थान मुकाम,
सराहन कौ सब बात भली है ।
यज्ञ ब्रतादिक तीरथ दान,
पुरान कथा जु अनेक चली है ॥
केतिक और उपाइ जहा लग,
ते सुनि कै नर बुद्धि छली है ।