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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 93

८४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
मनहर छंद
कवहू कै हसि उठै कवहू कै रोइ देत,
कबहु वकत कहू अंत हू न लहिये ।
कवहूक खाइ तौ अघाऽ नहि काहू करि,
कवहूक कहै मेरै कछु नहि चहिये ॥
कवहू आकाश जाइ कवहू पाताल जाइ,
सुन्दर कहत ताहि कैसे करि गहिये ।
कबहूक आइ लागै कवहू उतरि भागे,
भूत के से चिन्ह करै ऐसौ मन कहिये ॥१७॥
कबहु तौ पाख कौ परेवा कै दिखावै मन,
कबहूक धूरि के चावरि करि लेत है ।
कबहु तौ गोटिका उछारत आकास ओर,
कबहूक राते पीरे रग श्याम शेत है ॥
कबहु तौ श्राब कौ उगाइ करि ठाडौ करै,
कबहू तौ शीस धर जुदे कर देत है ।
बाजीगर कौ सौ ख्याल सुन्दर करत मन,
सदाई भ्रमत रहै ऐसौ कोऊ प्रेत है ॥१८॥
(१८) परेबा-पक्षी । चौररि-चावल । गोटिका-गोली ।
शीस धर जुदे-शिर को धड से अलग ।