सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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६६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
सोऊ गयौ तजिकै ततकाल,
कहै न बनै जु रही मुख मौना ।
तैसै हि सुन्दर ज्ञान बिना सब,
छाडि भये नर भाड कै दौना ॥१६॥
ज्यौ कोउ कोस कट्यौ नही मारग,
तेलकले घर मैं पशु जोये ।
ज्यौ बनिया गयौ बीस कै तीस कौ,
बीस हु मै दमहू नहिं होये ॥
ज्यौ कोउ चौबे छब्बे कौं चल्यौ पुनि,
होइ दुबे दुई गाठ के खोये ।
तैस हि सुन्दर और क्रिया सब,
गम बिना निहचै नर रोये ॥१७॥
जो कोउ राम बिना नर मूरिख,
औरन के गुन जीभ भनैगी ।
आनि क्रिया गढतै गडवा पुनि,
होत है भेरि कछू न बनैगी ॥
ज्यौ हथफेरि दिखावत चावर,
अन्त तौ धूरि की धूरि छनैगी ।
सुन्दर भूल भई अतिसै करि,
सूते की भैस पाडा ई जनैगी ॥१८॥
(१६) सलोना-सुन्दर । कत-अपना पति ।
(१७) तेलकले-तेल निकालने की घाणी, कोल्हू ।