सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

सुदामा-चरित / ४५
“धीरज अधीर के, हरन पर पीर के,
बताओ बलबीर के महल यहाँ कौन हैं?” ॥३१॥
(दोहा)
दीन जानि काहू पुरुष कर गहि लीन्हौं आय ।
दीनहिं द्वार खरो कियौ, दीनदयाल के जाय ॥३२॥
द्वारपाल द्विज जानिकै, कीन्हौं दंड-प्रनाम ।
“बिप्र ! कृपा करि भाषिए, सकुल आपनो नाम” ॥३३॥
सुदामा
नाम सुदामा कृस्न हम, पढ़े एकई साथ ।
कुल पाँड़े ब्रजराज सुनि सकल जानिहैं गाथ ॥ ३४ ॥
द्वारपाल चलि तहँ गयौ, जहाँ कृस्न जदराय ।
हाथ जोरि ठाढ़ो भयौ, बोल्यौ सीस नवाय ॥३५॥
(सवैया)
द्वारपाल
सीस पगा न झगा तन पै, प्रभू ! जानै को आहि ! बसै केहि ग्रामा ।
धोती फटी-सी लटी-दुपटी, अरु पाँय उपानह की नहिं सामा ॥
द्वार खरो द्विज दुर्बल एक, रह्यो चकि सों बसुधा अभिरामा ।
पूछत दीनदयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा ॥३६॥
(कवित्त)
बोल्यौ द्वारपालक ‘सुदामा नाम पाँड़े’, सुनि
छाँड़ राज-काज ऐसे जी की गति जानै को ?
द्वारिका के नाथ हाथ जोरि धाय गहे पाँय;
भेंटे लपटाय करि ऐसे दुख-सानै को ?
नैन दोऊ जल भरि पूँछत कुसल हरि,
बिप्र बोल्यौ ‘बिपदा मैं मोहि पहिचानै को ?

४६ / सुदामा-चरित
जैसी तुम करी तैसी करै को कृपा के सिंधु !
ऐसी प्रीति दीनबंधु ! दीनन सों मानै को ?' ॥३७॥
(सवैया)
लोचन पूरि रहे जल सों, प्रभु दूरि तें देखत ही दुख मेट्यौ ।
सोच भयो सुरनायक के, कलपद्रुम के हिय मांझ खखेट्यौ ॥
कंप कुबेर-हिये सरसो, परसो पग जात सुमेरु समेट्यौ ।
रंक तें राउ भयौ तबहीं, भरि अंक रमापति भेंट्यौ ॥३८॥
(दोहा)
भेंटि भली बिधि विप्र सों, कर गहि त्रिभुवनराय ।
अंतःपुर को लै गये, यहाँ न दूजौ जाय ॥३६॥
मनिमंडित चौकी कनक, ता ऊपर बैठाय ।
पानी धर्यो परात मैं, पग धोवन कौं लाय ॥४०॥
राज-रमनि सोरह-सहस, सह-सेवकन स-मीत ।
आठो पटरानी भई, चकित चितैं यह प्रीति ॥४१॥
जिनके चरनन को सलिल, हरत जगत-संताप ।
पाँय सुदामा विप्र के, धोवत ते हरि आप ॥४२॥
(सवैया)
ऐसे बेहाल बेवाइन सों, पग कंटक-जाल लगे पुनि जोए ।
'हाय ? महादुख पायौ सखा, तुम आए इतै न कितै दिन खोए ।'
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिकै करुनानिधि रोए ॥
पानि परात को हाथ छुयौ नहिं, नैनन के जल सों पग धोए ॥४३॥
(दोहा)
धोय पाँय पट-पीत सों, पोंछत हैं जदुराय ।
सतिभामा सों यौं कहा, 'करौ रसोई जाय' ॥

सुदामा-चरित / ४७
तंदुल तिय दीन्हें हते, आगे धरियौ जाय।
देखि राज-संपति विभव, दै नहिं सकत लजाय ॥४५॥
अंतरजामी आप हरि, जानि भगत की रीति।
सुहृद सुदामा विप्र सों, प्रगत जनाई प्रीति ॥४६॥
श्रीकृष्ण
कुछ भाभी हमकौ दियौ, सो तुम काहे न देत।
चाँपि पोटरी काँख मैं, रहे कहौ केहि हेत ॥४७॥
(सवैया)
आगे चना गुरु-मात दए ते लए तुम चाबि हमें नहिं दीने।
स्याम कह्यौ मुसुकाय सुदामा सों, 'चोरी की बानि मैं हौ जू प्रवीने॥
पोटरी काँख में चाँपि रहे तुम, खोलत नाहिं सुधा-रस-भीने।
पाछिली बानि अजौ न तजी तुम, तैसेई भाभी के तंदुल कीने ॥४८॥
(दोहा)
खोलत सकुचत गांठरी, चितवत हरि की ओर।
जीरन पट फटि छुटि परे, विखरि गये तेहि ठौर ॥४६॥
एक मुठी हरि भरि लई, लीन्हीं मुख मैं डारि।
चबत चबाउ करन लगे, चतुरानन त्रिपुरारि ॥५०॥
(सवैया)
काँपि उठी कमला मन सोचत, 'मो सों कहा हरि को मन औंको ?
रिद्धि कँरी सब सिद्धि कँपीं, नव सिद्धि कँपीं 'बम्हना यह धौं को ?
सोच भयौ सुरनायक कौ जब, दूसरि बार लियौ भरि झौँको।
मेरु डर्यो 'बकसैं जनि मोहिं' कुबेर चबावत चाउर चौंको ॥५१॥
(कवित्त)
हूल हियरा में, सब-कानन परी है टेर,
'भेंटत सुदामैं स्याम चाबि न अघात ही।'

४८ / सुदामा-चरित
कहै नरोत्तम; रिद्धि सिद्धिन मैं सोर भयौ,
ठाढ़ी थरहरैं ओर सोचै कमला तहीं ॥
नाक लोक, नाग लोक, ओक-ओक थोत-थोक,
ठाढ़े थरहरैं मुख सूखे सब गातहीं ।
हालो परो थोकन मैं, लालो परो लोकन मैं,
चालो परो चक्रन मैं चाउर चबातही ! ॥५२॥
(सवैया)
भौन भरो पकवान मिठाइन, लोग कहैं निधि हैं सुषमा के ।
सांझ सबेरे पिता अभिलाषत, दाख न चाखत सिंधु छमा के ।
बाँभन एक कोउ दुखिया सेर पावक चाउर लायौ समा के ॥
प्रीति की रीति कहा कहिए, तेहि बैठि चबात हैं कंत रमा के ॥५३॥
(दोहा)
मुठी तीसरी भरत ही, रुकुमिनि पकरी बाँह ।
'ऐसो तुम्हें कहा भई, संपति की अनचाह' ॥५४॥
कही रुकुमिनी कान में, 'यह धौं कौन मिलाप ।
करत सुदामा आप सों, होत सुदामा आप' ॥५५॥
(दोहा)
यह कौतुक लखिकै सभय, कही सेवकिनि आय ।
भई रसोई सिद्ध प्रभु ! 'भोजन करिए जाय' ॥५६॥
बिप्र-सहित असनान करि, धोती पहिरि बनाय ।
संध्या करि मध्याह्न की, चौका बैठे जाय ॥५७॥
(कवित्त)
रूपे के रुचिकर-थार पायक सहित सिता—
जीती जिन सोभा है सरदहू के चन्द की ।

सुदामा-चरित / ४६
दूसरे पहिति भात सोंधो सुरभी को घृत,
फूले-फूले फुलका प्रफुल्ल दुति मंद की ॥
पापर मुँगौरी बरा व्यंजन अनेक प्रीति—
देवता बिलोकि रहे देवकि के नन्द की ।
या विधि सुदामाजू कों आछे कै जेंवाय प्रभु,
पाछे तें पछ्यावरि परोसी आनि कंद की ॥५८॥
(दोहा)
सात दिवस यहि विधि रहे, दिन-दिन आदर-भाव।
चित चल्यौ घर चलन कौं, ताकर सुनौ बनाव ॥५६॥
(सवैया)
दाहिने बेद पढ़ै चतुरानन, सामुहे ध्यान महेस धर्यौ है ।
बाएँ दुऔ कर जोरि लिए, सब देवन साथ सुरेस खर्यौ है ॥
एतेइ बीच अनेक लिए धन, पायन आय कुबेर पर्यौ है ।
देखि बिभौ अपनो सपनो, वपुरो वह बांभन चौंकि पर्यौ है ॥६०॥
(दोहा)
देनो हुतौ सो दै चुके, बिप्र न जानी गाथ ।
चलती बेर गोपालजू, कछू न दीन्हों हाथ ॥६१॥
सुदामा
वह पुलकनि वह उठि मिलनि, वह आदर की भाँति ।
यह पठवनि गोपाल की, कछू न जानी जाति ॥६२॥
घर-घर कर ओड़त फिरे, तनक दही के काज ।
कहा भयो जौ अब भयौ, हरि को राज-समाज ॥६३॥
हौं आवत नाहीं हुतौ, वाही पठ्यौ ठेलि ।
कहिहौं धन सों जाइकै, अब धन धरौ सकेलि ॥६४॥

५० / सुदामा-चरित
बालपन के मित्र हैं, कहा देउं मैं साप ।
जैसो हरि हमको दिया, तैसो पइहैं आप ॥६५॥
नौ गुनधारि छगुन सों, तिगुना-मध्ये जाय ।
लायौँ चापल चौगुनी, आठौ गुननि गँवाय ॥६६॥
और कहा कहिए जहाँ, कंचन ही के धाम ।
निपट कठिन हरि को हियो, मोको दियो न दाम ॥६७॥
बहु-भंडार रतन-भरे, कौन हरै अब रोष ।
लाग आपने भाग को, काको दीजै दोष ॥६८॥
इमि सोचत-सोचत झखत, आया निज पुर-तीर ।
दीठि परी इकबार ही, हय गयंद की भीर ॥६६॥
हरि-दरसन तें दूरि दुख, भयौ, गयो निज देस ।
गौतम-रिषि को नाउँ लै, कीन्हो नगर प्रवेश ॥७०॥
(सवैया)
वैसई राज-समाज बने, गज-वाजि घने मन संभ्रम छायौ ।
वैसई कंचन के सब धाम हैं, द्वारिकै माहिं मनौँ फिरि आयौ ॥
भौन विलोकिबे को मन लोचत, सोचत ही सब गाँव मंझायो ।
पूछत पांडे फिरे सब सों, पर झोपरी को कहुँ खोज न पायौ ॥७१॥
सुदामा
(कुण्डलिया)
'देव नगर कै अच्छपुर, हौं भटको कित आय ?
नाम कहा यहि नगर को, सो न कहौ समुझाय ॥
सो न कहौ समुझाय, नगर-वासी तुम कैसे ?
पथिक जहाँ संभ्रमहि, तहाँ के लोग अनैसे ॥
नगर०—'लोग अनैसे नाहिं, लखौ द्विज-देव नगर कै।
कृपा करी हरि-देव, दियो है देव नगर कै ॥७२॥

२. द्वितीय भाग: द्वारका-वैभव दर्शन, श्रीकृष्ण-मिलन एवं चरण-प्रक्षालन

सुदामा-चरित / ५१
(कवित्त)
सुन्दर महल मनि-मानिक जटित अति,
सुबरन सूरज-प्रकाश मानौं दै रह्यौ।
देखत सुदामाजू को नगर के लोग धाये,
भेंटे अकुलाय जोई सोई पाँव छ्वै रह्यौ॥
बाँभनी के भूषन विविध विधि देखि कह्यौ,
जैहौं हौं निकासौ सो तमासौ जग ज्वै रह्यौ।
ऐसी दसा फिरि जब द्वारिका-दरस पायौ,
द्वारिका तें सरस सुदामा पुर ह्वै रह्यौ॥७३॥
(दोहा)
कनक-दंड कर मैं लिए, द्वारपाल है द्वार।
जाय दिखायौ सबनि लै, 'या हैं महल तुम्हार'॥७४॥
कही सुदामा 'हँसत हौ, ह्वै करि परम प्रबीन।
कुटी दिखावहु मोहि वह, जहाँ बाँभनी दीन'॥७५॥
द्वारपाल सों तिन कही, 'कहि पठवहु यह गाथ।
आए बिप्र महाबली, देख होहु सनाथ'॥७६॥
सुनत चली आनन्दयुत, सब सखियन लै संग।
नूपुर किंकिनि, दुंदभी, मनहुँ काम चतुरंग॥७७॥
कही बांभनी आयकै, यहै कंत निज-गेह।
श्रीजदुपति तिहुँलोक मैं, कीन्हों प्रगट सनेह'॥७८॥
सुदामा
हमें कंत तुम जनि कहौ, बोलो वचन सँभारि।
इहैं कुटी मेरी हती, दीन बापुरी नारि॥७९॥
स्त्री
मैं तो नारि तिहारियै, सुधि संभारिए कंत।
प्रभुता सुन्दरता दई, अद्भुत श्री भगवंत॥८०॥

५२ / सुदामा-चरित
सुदामा
(कवित्त)
टूटी-सी मड़ैया मेरी परी हुती याही ठौर,
तामैं परो दुःख काटौं कहाँ हेम धाम-री ।
जेवर-जराऊ तुम साजे प्रति अंग-अंग,
सखी सोहैं संग वह छूछी हुती छाम री ॥
तुम तौ पटंबर री ! ओढ़े हौ किनारीदार,
सारी-जरतारी, वह ओढ़े कारी कामरी ॥
मेरी वा पड़ाइन तिहारी अनुहार ही पै,
विपद-सताई वह पाई कहाँ पामरी ? ॥८१॥
ठाड़ी ह्वै पँडाइन कहत मंजु-भायन सों,
'प्यारे परौं पायन तिहारोई जु घरु है।
आए चलि हरों श्रम कीन्हों तुम भूरि दुख,
दारिद गमायो यौं हँसत गह्यो करु है ॥
रिद्धि-सिद्धि दासी करि दीन्हीं अविनासी कृस्न,
पूरन-प्रकाशी, कामधेनु कोटि बरु है !
चलौ पति भूलौ मति तुम्हैं दीन्ही जदुपति,
संपति सो लीजिए समेत सुरतरु हैं' ॥८२॥
(दोहा)
समुझायो निज कंत कों, मुदित गई लै गेह ।
अन्हवायो तुरतहिं उबटि, सुचि सुगन्ध सों देह ॥८३॥
पूज्यो अधिक सनेह सों, सिंहासन बैठाय ।
सुचि सुगन्ध अंबर रचे, बर भूषण पहिराय ॥ ४॥
सीतल जल अचवायकै पानदान धरि पान।
धर्यो आय आगे तुरत, छवि रबि-प्रभा समान ॥-५॥

सुदामा-चरित / ५३

करहिं चौर चहुँ ओर तें, रंभादिक सब नारि।
पतिब्रता अति प्रेम सों, ठाढ़ी करै बयारि ॥८६॥
स्वेत-छत्र की छाँह मैं, राजत सक्र-समान।
बाहन गज रथ तुरँग बर, अरु अनेक सुभजान ॥८७॥
कामधेनु सुरतरु सहित, दीन्हीं श्री बलबीर।
जानि परी गुरुबंधु हरि, हरि लीन्हीं सब पीर ॥८८॥
बिबिध भाँति सेवा करी, सुधा पियायो बाम।
अति बिनीत मृदु बचन कहि, 'सब पूरो मन काम' ॥८६॥
लै आयसु तिय न्हाइ कर सुचि सुगन्ध सब लाइ।
पूजी गौरि सोहाग-हित प्रीति सहित सुख पाइ ॥ '०॥
षटरस चारि प्रकार के, भोजन रचे बनाय।
कंचन-थार मँगायकै, ता मैं धर्यो रचाय ॥६१॥
चंदन चौकी डारिकै, दासी परम सुजानि।
रतन जटिल भाजन-कनक, भरि गंगाजल आनि ॥६२॥
कूजा कंचन रतनयुत, सुचि सुगन्ध जल-पूरि।
रच्छाधान समेत सो, जल-प्रकाश भर-पूरि ॥६३॥
रतन-जटित पीढ़ा-कनक, धर्यो जु बैठन काम।
मरकत-मनि चौकी धरी, कछुक दूरि छवि-धाम ॥६४॥
चौकी लई मँगायकै, पग धोवन को पाथ।
मनि-पादुका बिचित्र अति, धरि सलिल के साथ ॥६५॥
'चलिए भोजन करन कों,' कह दासी मृदु भाखि'।
उठे 'क्रुस्न' सानंद कहि, 'धन्य धन्य हरि साखि' ॥६६॥
बसन उतारे जायकै, धोवत चरन-सरोज।
चौकी पै छबि देत यौं, जनु तनु धरे मनोज ॥६७॥
पहिरि पादुका बिप्र जब, पीढ़ा बैठे जाय।
रति तें अतिछबि आगरी, पति सों हँसि मुसुकाय ॥६८॥

५४ / सुदामा-चरित
विविध भाँति भोजन धरे, व्यंजन चारि-प्रकार।
जोरि पछिओरी सकल, प्रथम कहे नहिं पार ॥६६॥
‘हरिहिं समर्पौ कंत अब’ कहा मंद हँसि बाम।
करि घंटा को नाद त्यों, हरि समर्पि लिय नाम ॥१००॥
अगिन जिमाय विधान सों, वैस्व देव करि नेम।
बलि काढ़ी जेंवन लगे करति पवन तिय प्रेम ॥१०१॥
वार-वार पूछत यहै, ‘लीजै जो रुचि होय।
कृस्न-कृपा पूरन सबै, अबै परोसौं सोय ॥१०२॥
जेइँ चुके अचवन लगे, करन गये विश्राम।
रतन-जटित पालक कनक, देनो सुरेसम दाम ॥१०३॥
ललित बिछौना विरचिकै, पाँयत कसिकै डोरि।
राखे वसन सुसेवकनि, रुचिर अतर सों बोरि ॥१०४॥
पानदान नेरे धर्यो, भरि बीरी छवि-धाम।
चरन धोय पौढ़न लगे, करन हेत विश्राम ॥१०५॥
कोउ चँवर कोउ वीजना, कोउ सेवत पद चारु।
अति विचित्र भूषन सजे, गजमोतिन के हारु ॥१०६॥
करि सिंगार पिय पै गई, पान खाति मुसकाति।
‘कहौ कथा सब आदि तें, किमि दीन्ही यह भाँति ॥१०७॥
कही कथा सब आदि तें, राह चले की पीर।
सोवत जिमि ठाढ़े किये, नदी गोमती-तीर ॥१०८॥
गए द्वार जिहिं भाँति सों, सो सब करी बखान।
‘कहि न जाय मुख लाख सों, कृस्न मिले ज्यों आन ॥१०३॥
कर गहि भीतर लै गये, जहाँ सकल रनिवास।
पग धोवन को आप ही, बैठे रमा निवास ॥११०॥
देखि चरन मेरे चल्यो, प्रभु नयनन तें नीर।
ताहीं सों धोये चरन, देखि चकित नर-नारि’ ॥१११॥

सुदामा-चरित / ५५

बहुरि कही श्रीकृस्न जिमि, तंदुल लीन्हें आप ।
भेंटे हृदय लगायकै, मेटे भ्रम संताप ॥११२॥
बहुरि कही जेवनार सब, जिमि कीन्हीं बहु भाँति ।
बरनि कहाँ लगि हों कहौं, सब व्यंजन की पांति ॥११३॥
दिन प्रति अधिक सनेह सों, सपन दिखायो मोहि ।
सो देख्यो परतच्छ ही, सपन न निसफल होहिं ॥११४॥
बरनि कथा यहि विधि सबै, कह्यो आपनो मोह ।
कृस्न कृपानिधि भगत-हित, चिदानंद संदोह ॥११५॥

(कवित्त)

साजे सब साजबाज बाजि गज राजत हैं,
विविध रुचिर रथ पालकी बहल हैं ।
रतन-जटित शुभ-सिंहासन बैठिबे को,
चौक प्रति कामधनु कल्पद्रुम लहलहैं ॥
देखि-देखि भूषन वसन दासी दासन के,
सुख पाकसासन के लागत सहल हैं ।
संपति सुदामाजू को जहाँ लौं दइ है प्रभु,
कहाँ लौं गनाऊँ जहाँ कंचन-महल हैं ॥११६॥
बाजिशाला गजसाला दीन्हें गजराज खरे,
ब्रजराज महाराज राजन-समान के ।
बानक बिबिध बने मंदिर-कनक सोहैं,
मनि जरे मन मोहैं सब देवतान के ।
हीरा, लाल ललित झरोखन मैं झलकत,
झिमझिम झूमक झूलैं हैं मुकतान के ।
जानी नहिं बिपति सुदामाजू कीं कहाँ गई,
देखिए विधान जदुपतिजू के दान के ॥११७॥

५६ / सुदामा-चरित
सुदामा
'कहूँ सपनेहूँ सुबरन के महल होते,
पौरि मनि-मंडप कलस कब धरते ?
रतन जटित बर सिंहसन बैठिवे कौं,
खरे ह्वै खवास मो पै चौंर कब ढरते ?
देखि राज-सामा निज बामा सों सुदामा कहैं
कब ये भंडार मेरे रतनन भरते ?
जो पै पतिब्रता तू न देति उपदेश तो पै,
एती कृपा मो पै द्वारिकेस कब करते ? ॥११८॥
(दोहा)
उठे पहिरि अंबर रुचिर, सिहासन पर जाय ।
बैठे प्रभुता देखिकै, सुरपति रह्यो लजाय ॥११९॥
(सवैया)
कै वह टूटी-सी छानी हती, कहूँ कंचन के सब धाम सुहावत ।
कै पग मैं पनही न हती, कहँ लैं गजराजहु ठाढ़े महावत ॥
भूमि कठोर पै रात कटे, कहँ कोमल सेज पै नींद न आवत ।
कै जुरतो नहीं कोदो सवाँ, प्रभु के परताप तें दाख न भावत ॥१२०॥
(दोहा)
धन्य धन्य जदुबंस-मनि, दीनन पै अनुकूल ।
धन्य सुदामा सहित तिय, कहि बरसहिं सुर फूल ॥१२१॥

शब्दार्थ

(१) शब्दार्थ — गनेश = गणेश (हिन्दुओं के एक प्रसिद्ध देवता, जिन्हें सिद्धि
के देवता का सम्मान प्राप्त है।)। सुमिरन – स्मरण, स्तुति, प्रार्थना । वरनन =
वर्णन । जासो दारिद नास = जिनके नामस्मरण से निर्धनता का नाश होता है ।
व्याख्या – कविवर नरोत्तमदास अपने काव्य का प्रारम्भ करने से पहले श्री
गणेश जी का स्मरण करते हैं, जिससे उनके हृदय में निर्मल बुद्धि उत्पन्न हो ।
उसके उपरांत वे श्रीकृष्ण और सुदामा के चरित्र का वर्णन करते हैं, जिससे
भक्तों के दारिद्र्य रूपी दुःख का विनाश हो जाता है और उन्हें सुख-शांति प्राप्त
होती है ।
विशेष—इस दोहे को हम इस रचना का मंगलाचरण मान सकते हैं । इस
दृष्टि से कवि ने प्रबन्ध-काव्य की प्राचीन परम्परा का पालन किया ।
(२) शब्दार्थ—तें = मे । निरवान = स्वर्ग, मोक्ष । सिंधुर-मुख—हाथी के
समान मुख वाले, गणेश देवता । मूढ़ = मूर्ख ।
व्याख्या—गंगा-जल के पान से जैसे पापी मनुष्य को भी मुक्ति मिल जाती
है वैसे ही हाथी के समान मुख वाले गणेश देवता की कृपा से मूर्ख व्यक्ति भी
बुद्धिमान बन जाता है ।
विशेष—इस दोहे में गणेश देवता की स्तुति की गई है, उन्हें बुद्धि-दाता
का सम्मान दिया गया है ।
(३) शब्दार्थ—कई = कितने ही । वरनन = वर्णन । माया = लक्ष्मी, संसा-
रिक वैभव । ताको = उनको । सु = सुन्दर ।
व्याख्या—श्रीकृष्ण और सुदामा जन्म-जन्मान्तरों से मित्र रहे हैं । इस

५८ / सुदामा-चरित
रचना में कवि ने उनकी इसी आदर्श मैत्री का वर्णन किया है। यह कथा सुख,
सम्पत्ति और वैभव प्रदान करने वाली है। इससे सुन्दर उपदेश प्राप्त होता है।
विशेष—इस दोहे में कवि ने श्रीकृष्ण और सुदामा की आदर्श-मैत्री और
उसके महत्त्व की ओर इंगित किया है।
(४) शब्दार्थ—विप्र = ब्राह्मण। धाम = घर, निवास-स्थान। हिये = हृदय।
हरि = श्रीकृष्ण।
व्याख्या—श्रीकृष्ण जी के मित्र सुदामा नामक ब्राह्मण सदैव अपने घर पर
ही रहते और भिक्षा माँगकर अपने जीवन का निर्वाह करते थे। वे श्रीकृष्णजी
के अनन्य भक्त थे और हृदय में उन्हीं का दिन-रात नाम जपते थे।
विशेष—इस दोहे में प्राचीन ब्राह्मण धर्म का निरूपण हुआ है, जिसके अनु-
सार ब्राह्मण के दो ही धर्म थे—भिक्षावृत्ति से निर्वाह करना और दिन-रात प्रभु
का भजन करना।
(५) शब्दार्थ—घरनी = घरवाली, पत्नी, स्त्री। गहे = ग्रहण किये। वेद की
रीति = वैदिक आचार-विचार, नियम, वेदों में स्त्रियों के जो धर्म कहे गये हैं।
सलज = लज्जायुक्त। सुबुद्धि = अच्छी बुद्धि वाली।
व्याख्या—सुदामा की धर्म पत्नी पतिव्रता थी, वह वेद-शास्त्रों में प्रतिपादित
नारी-धर्म का पालन करने वाली, लज्जाशील, सदाचारमयी और अच्छी बुद्धि
वाली थी। पति-सेवा से उसका विशेष लगाव था। उसमें वह अत्यधिक रुचि
रखती थी।
विशेष—इस दोहे में सुदामा-पत्नी सुबुद्धि के चारित्रिक वैशिष्ट्य का उद्-
घाटन हुआ है।
(६) शब्दार्थ—कह्यौ = कहा। तिय = स्त्री, पत्नी। कृस्न = श्रीकृष्ण।
व्याख्या—सुदामा ने एक दिन अपनी पत्नी सुबुद्धि से कहा कि द्वारिकापति
श्रीकृष्ण उसके बाल-सखा हैं। इस रहस्य से परिचित हो जाने के पश्चात् सुबुद्धि
समय-समय पर इस प्रकार के अनुपम उपदेश दिया करती थी। वह अपने उपदेशों
से अपने पति को श्रीकृष्ण के पास जाकर अपनी निर्धनता को समाप्त कराने की
प्रेरणा दिया करती थी।

सुदामा-चरित / ५६
विशेष—इस दोहे में कथावृत्त की मौलिक उद्भावना का संकेत मिलता
है। श्रीमद्भागवत में सुदामा-पत्नी पहले से ही यह जानती है कि श्रीकृष्ण
उसके पति के मित्र हैं, किन्तु नरोत्तमदास अपनी इस रचना में सुदामा के मुँह
से इस रहस्य का उद्घाटन कराकर चमत्कार की सृष्टि करते हैं। उससे रचना
में नाटकीयता का संचार होता है।
(७) शब्दार्थ—हितू = हितैषी, मित्र। जदु-कुल-कैरव-चंद = यदुवंश रूपी
रात्रि-कमल के लिए चाँद अर्थात् श्रीकृष्ण। जैसे चाँद को देखकर कुमुदनी का
फूल खिल जाता है, उसी प्रकार यदुकुल श्रीकृष्ण को देखकर खिल जाता था।
ते = वे। दारिद-संताप तें = निर्धनता के दुख से। किमि = क्यों, किसलिए।
निर्द्वन्द्व—निश्चित।
व्याख्या—सुदामा-पत्नी सुबुद्धि अपने पति को समझाती हुई कहती है कि
जिनके मित्र द्वारिकापति श्रीकृष्ण के समान महादानी हों; वे निर्धनता के दुःख
से निश्चित क्यों न रहें अर्थात् उन्हें दारिद्र्य रूपी अभिशाप से अवश्य ही छुट-
कारा मिलना चाहिए और वे धन-वैभव को प्राप्त करें।
विशेष—इस दोहे में सुदामा-पत्नी सुबुद्धि के बुद्धि-कौशल और रूपक
अलंकार का सौष्ठव द्रष्टव्य है।
(८) शब्दार्थ—वाम = स्त्री, पत्नी। वृथा = व्यर्थ। भोग = सांसारिक
सुख।
व्याख्या—सुदामा ने अपनी पत्नी के विचार से असहमत होते हुए कहा
कि सांसारिक सुख-वैभव, विलास आदि व्यर्थ हैं। प्रभु का भजन ही सत्य है
और धर्म का पालन करते हुए जप, योग आदि में ध्यान लगाना ही समीचीन
है।
विशेष—इसमें सुदामा की वैराग्य-भावना के साथ-साथ आत्मतुष्टि अलं-
कार का सौन्दर्य देखा जा सकता है।
(६) शब्दार्थ—लोचन = नेत्र, नयन। दुख-मोचन = दुख दूर करने वाले।
भाल = माथा। पीत-वसन = पीले वस्त्र। वैजन्तीमाल = पाँच प्रकार के रत्नों
से बनी माला, जिसे श्रीकृष्ण जी अपने गले में पहनते थे। संदीपनि = सुदामा

६० / सुदामा-चरित
तथा श्रीकृष्ण के गुरु का नाम।
व्याख्या—सुदामा की विरक्ति को देखकर उसकी पत्नी सुबुद्धि उसे उपदेश
देती हुई कहने लगी कि संदीपन गुरु के पास जो श्रीकृष्ण आपके साथ पढ़े हैं
और जिन्हें आप अपना बालसखा मानते हैं, वे सांसारिक व्यक्ति नहीं हैं। उसका
तो यह विश्वास है कि कमल के समान नेत्र वाले, दुःखों को दूर करने वाले,
माथे पर तिलक लगाने वाले, कानों में कुण्डल धारण करने वाले, मस्तक पर
मुकुट पहने, पीले वस्त्रों को ओढ़े, गले में वैजयन्ती माला पहने, हाथ में शंख,
चक्र, गदा तथा कमल को लिए जिस चतुर्भुज मूर्ति का सबने परमात्मा के रूप
में उल्लेख किया है, श्रीकृष्ण वस्तुतः उन्हीं के अवतार हैं। वे ही आज द्वारिका-
पुरी के स्वामी हैं। वे अनाथों के नाथ हैं, अतः यदि आप द्वारिकापुरी जायेंगे तो
वे अवश्य ही हमारी निर्धनता को दूर कर देंगे।
विशेष—इस कवित्त में श्रीकृष्ण के भव्य रूप-चित्रण तथा उनके अवतार
होने की ओर संकेत किया गया है। वे विष्णु के अवतार हैं और अनाथों के
नाथ होने के कारण उन्हें दीनबन्धु कहा जाता है। परिकर, उपमा आदि अलं-
कारों के स्वाभाविक प्रयोग से इस छन्द के भाव-सौष्ठव में वृद्धि हुई है।
(१०) शब्दार्थ—सिक्षक = शिक्षक। सिगरे = सारे। पद-पंकज = चरण-
कमल। परिच्छा—परीक्षा। बावरि = पगली। भिच्छा = भिक्षा।
व्याख्या—सुदामा अपनी पत्नी का उपदेश सुनकर चिढ़ गये, उनका ज्ञानी
रूप प्रबल हो उठा और वे अपनी पत्नी को समझाते हुए कहने लगे कि हे
ब्राह्मणी ! जो सुदामा सारे संसार को उपदेश देता है, उसे वह क्या शिक्षा दे
रही है। जो व्यक्ति तपस्या करके स्वर्ग प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें धन-वैभव
की कोई इच्छा नहीं होती है। वह तो हरि-भक्त है। उसे धन-दौलत की आकाँक्षा
नहीं है। उसके हृदय में तो श्रीकृष्ण के चरण-कमल की चाह है, वह हजारों
बार उसकी परीक्षा लेकर देख सकती है। धन-वैभव अन्य व्यक्तियों को चाहिए;
ब्राह्मण का धन तो केवल भिक्षा ही है, उसी से वह अपना निर्वाह करता है।
सुदामा ब्राह्मण है, सामान्य गृहस्थी नहीं। फलतः उसे धन का लोभ नहीं है।
विशेष—इस सवैया छन्द में एक आदर्श ब्राह्मण की जीवन-दृष्टि पर प्रकाश

सुदामा-चरित / ६१

डाला गया है। आदर्श ब्राह्मण धन-वैभव को नहीं वरन् प्रभु-भजन को ही अपना
जीवन-लक्ष्य बनाता है। सुदामा इसी जीवन-दर्शन का प्रबल समर्थक था।
(११) शब्दार्थ — तिहुँलोकन = तीनों लोक = स्वर्ग, मर्त्य और पाताल ।
सिद्ध करो = जाओ, प्रस्थान करो (यह ब्रज का एक प्रचलित मुहावरा है।)
मति = मति, राय । दीन ह्वै बोलै = दीन भाव से बोलते हुए । पन = अवस्था ।
कन = अन्न के दाने, भीख । सो तिहुँपन क्यों कन माँगत डोले = वह तीसरी
अवस्था अर्थात् बुढ़ापे में भी क्यों भिक्षा माँगता फिरे ।
व्याख्या — सुदामा के सबल तर्क को सुनकर भी उसकी पत्नी सुबुद्धि सन्तुष्ट
न हुई और अपनी धारणा को पुष्ट करती हुई कहने लगी कि द्वारिकापति श्री-
कृष्ण तीनों लोकों के महादानी हैं। संसार उनका नाम स्मरण करके ही जीवित
है। वे दीनबन्धु हैं। हे नाथ ! मेरे विचार से आप शीघ्र ही द्वारिका के लिए
प्रस्थान कीजिए। जो प्रभु के द्वार पर जाकर अपने दुःखों के निवारण की प्रार्थना
नहीं करते हैं, उन्हें साधारण लोगों के द्वार पर जाकर, दीन बनकर भिक्षा मांगनी
पड़ती है। भगवान् श्रीकृष्ण जिनके मित्र हों, वह भला क्यों इस बुढ़ापे में द्वार-
द्वार भीख माँगता फिरे ? अर्थात् आपको द्वार-द्वार भीख नहीं माँगनी चाहिए।
श्रीकृष्ण से सहायता लेने में आपको संकोच करने की आवश्यकता नहीं है।
विशेष — इस छन्द में सुबुद्धि के तर्क उसके बुद्धि-कौशल को प्रदर्शित करते
हैं। ऐसे ही तर्कों से वह अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त करती है।
(१२) शब्दार्थ — छत्रिन = क्षत्रिय । पन = प्रण, प्रतिज्ञा, कर्त्तव्य । जुद्ध = युद्ध,
लड़ाई। जुवा = युवा । बाजि = घोड़े । वैंसे = वैश्य, व्यापारी वर्ग । सेवन-
साजन = सेवा करना । कै = अथवा, या ।
व्याख्या — सुदामा अपनी पत्नी के तर्क को काटते हुए कहने लगे कि क्षत्रियों
का धर्म सेना (हाथी, घोड़े आदि) को सजाकर युद्ध करना है। वैश्यों का व्यव-
साय, व्यापार एवं खेती करना है। शूद्रों का काम सेवा करना है। ब्राह्मणों का
धर्म पढ़ना और तप करना है। उन्हें सुख-सम्पत्ति की चाह नहीं रहती। वे
जीवन-निर्वाह के लिए भिक्षा माँगते हैं; उन्हें भिक्षा माँगने में किसी प्रकार की
लज्जा नहीं करनी चाहिए ।

६२ / सुदामा-चरित
विशेष—इस छन्द में सुदामा द्वारा समाज के चारों वर्गों के धर्म की व्याख्या
की गई है। उसी के अनुसार सुदामा भिक्षा माँगकर निर्वाह करने में अपना अप-
मान नहीं समझता है।
(१३) शब्दार्थ—कोदो-सवाँ—एक तरह का सस्ता और मोटा अन्न ।
जुरतो = मिलता। मिठौती = मिठाई। सीत बितीत = सर्दियाँ कटती हैं, गुजरती
हैं। हौं = मैं। हठती = हठ करके रहती। पै तुम्हें न हठौती = तुम्हें ठेल कर
नहीं भेजती। पेलि पठौती = ठेल कर भेजती।
व्याख्या—सुदामा की आदर्शवादिता से कुछ अधीर होकर उसकी पत्नी
कहने लगी कि उसे दूध, दही एवं मिठाई की चाह नहीं है। उसे तो जीवित रहने
के लिए यदि कोदो-सवाँ जैसे मोटे अनाज और जाड़े में मोटे वस्त्र ही मिल
जाते तो वह दृढ़तापूर्वक रहती और आपसे द्वारिकापुरी जाने के लिए हठ न
करती। पर यहाँ तो स्थिति बड़ी विकट है, कभी पेट भर अन्न नहीं मिला है और
जाड़ा सिसियाते ही व्यतीत हुआ है। घर में दरिद्रता का ऐसा साम्राज्य छाया
हुआ है कि रोटी बनाने के लिए समुचित तवा और कठौती तक नहीं है। उसे
यदि यह पता न चलता कि द्वारिकापति श्रीकृष्ण जैसे महादानी आपके बाल-सखा
तथा सहपाठी हैं तो वह कभी भी आपको द्वारिका जाने के लिए बाध्य न करती।
विशेष—सुदामा के घोर दारिद्र्य को व्यंजित करने के लिए यह छन्द,
विशेषतः इसके ये शब्द—'टूटो तवा अरु फूटी कठौती' अत्यन्त मार्मिक हैं। इससे
सुदामा के घर की दयनीय स्थिति एक चित्र प्रस्तुत हो जाता है।
(१४) शब्दार्थ—जक ठानी = किसी बात की बार-बार रट लगाना। वक =
बकवाद। जाम = पहर। दैहैं लदाय = भर देंगे। लढ़ा = बैलगाड़ी। अटारी
अटा = कोठी, भव्य भवन। छानी = छप्पर। जौ पै = यदि। काहू पै = किसी से
भी। अजानी = भोली, अनजान, अज्ञात।
व्याख्या—भाग्यवादी सुदामा अपनी पत्नी को समझाते हुए कहने लगे कि
तुम्हें तो बस सब कुछ छोड़कर दिन-रात अपनी निर्धनता की ही चिंता लगी
रहती है। क्या वह यह समझती है कि उसके (सुदामा के) द्वारिकापुरी पहुँचते
ही श्रीकृष्ण उसे गाड़ियाँ भर-भर कर धन-वैभव दे देंगे। क्या उसे इस बात का

सुदामा-चरित / ६३

ज्ञान नहीं है कि जिनके भाग्य में टूटी-फूटी झोपड़ी लिखी हो, उन्हें ऊँचे भव्य
भवन नहीं मिल सकते हैं। फलतः उसकी भोली पत्नी को यह समझ लेना चाहिए
कि यदि उनके भाग्य में निर्धनता ही लिखी हुई है तो उसे कोई दूर नहीं कर
सकता है। भाग्य का लिखा कोई नहीं मिटा सकता ।
विशेष—इस छन्द में भाग्य की प्रबलता का समर्थन किया गया है । उससे
सुदामा के चारित्रिक वैशिष्ट्य का भी उद्घाटन होता है ।
(१५) शब्दार्थ—पैज = प्रतिज्ञा । बेरे = समय । जिहि बेरे = जिस समय ।
पटकोट = वस्त्रों का ढेर । चहुँ फेरे = चारों ओर । ग्राह = मगरमच्छ, घड़ियाल ।
गयंद = हाथी, यहाँ गजेन्द्र का अर्थ है । निहचै = निश्चय, विश्वास । लोचन
कोर = एक नजर भर । हेरे = देखने से ।
व्याख्या—सुदामा के भाग्यवादी विचारों से असहमत होकर उसकी पत्नी
कहने लगी कि श्रीकृष्ण सब कुछ कर सकते हैं। उनमें अलौकिक शक्ति है। जब
हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद को खंभे में बाँध दिया था तब भगवान् श्रीकृष्ण
ने ही प्रकट होकर प्रह्लाद की प्रतिज्ञा को पूर्ण किया था। चीरहरण के समय
ज्यों ही द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण का हृदय में ध्यान किया, त्यों ही उन्होंने
दुर्योधन की सभा में वस्त्रों का ढेर लगाकर उसकी लाज बचाई । उन्होंने ग्राह
के फंदे में फंसे हुए हाथी की रक्षा की । हे स्वामी ! उसे तो श्रीकृष्ण की कृपा का
पूर्ण विश्वास है । हमारी निर्धनता से हजार गुनी बड़ी निर्धनता भी उनकी एक
कृपा-दृष्टि से दूर हो सकती है । वे सभी कुछ करने में समर्थ हैं ।
विशेष - इस छन्द में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप का प्रतिपादन हुआ है ।
वे सर्वशक्तिमान तथा भक्तवत्सल हैं ।
(१६) शब्दार्थ—चक्कवै = चक्रवर्ती राजा । चकिसे = चकित से, हैरान से
भूप = राजा । किन्नर = एक प्रकार के देवता जो संगीत में प्रवीण होते हैं।
जच्छ = यक्ष, कुबेर के गण । लौं = तक । ठाऊँ = स्थान । तैं = तूने । बिलोक्यौँ =
देखा । लोकन के मुखिया = लोकों के स्वामी । पैठन पाऊँ = प्रवेश करने पाऊँ
व्याख्या—सुदामा अपनी पत्नी के बार-बार कहने पर द्वारिकापुरी जाने में
अपनी विवशता प्रकट करते हुए कहने लगे कि द्वारिका पहुँच जाना तो सरल

६४ / सुदामा-चरित
है, । पृथ्वी—किन्तु श्रीकृष्ण के दरबार तक पहुँचना सरल नहीं है । उनके
महल के द्वार पर अनेक चक्रवर्ती राजा चकित-से होकर खड़े रहते हैं और कई
राजा तो वहाँ इस प्रकार चुपचाप खड़े रहते हैं, मानो मार्ग भूलकर वहाँ आ
गये हों। निवासियों की तो बात क्या, बड़े-बड़े देवता, गंधर्व, किन्नर, यक्ष भी
प्रातः से सायं तक वहाँ खड़े रहते हैं, उन्हें द्वारिकापति श्रीकृष्ण के दर्शन नहीं
हो पाते । उसने (सुबुद्धि) तो दरबार देखा नहीं इसलिए वह उसे वहाँ की
महिमा समझाने में असमर्थ है। उनके दरबार के अन्दर तो लोकों के स्वामी
भी नहीं जा सकते, उन्हें भी बाहर ही रुकना पड़ता है । द्वारिकाधीश के ऐसे
भव्य दरबार में दीन-हीन, निर्धन सुदामा भला कैसे प्रवेश पा सकता है ? अर्थात्
उसका वहाँ जाकर श्रीकृष्ण से मिलना सम्भव नहीं है ।
विशेष—इस छन्द में श्रीकृष्ण के भव्य दरबार की भव्य शोभा तथा महा-
नता का उद्घाटन हुआ है और उसीके माध्यम से सुदामा अपनी विवशता
व्यक्त करते हैं।
(१७) शब्दार्थ—तिमि = उसी तरह । अन्तरजामी = अन्तर्यामी, मन की
बात जानने वाले । तिहारी = तुम्हारी । सिख = शिक्षा । सुधि - खबर ।
व्याख्या—सुदामा-पत्नी श्रीकृष्ण को अन्तर्यामी बताकर अपने पति को
निस्संकोच द्वारिकापुरी जाने का आग्रह करती हुई कहती है कि भगवान् श्री-
कृष्ण अन्तर्यामी हैं। उसकी इस बात को वे मान लें। भले ही उनके द्वार पर
अनेक राजा भूले हुए-से खड़े रहते हों, बड़े-बड़े चक्रवर्ती राजा, देव, गन्धर्व,
किन्नर, यक्ष और लोकपाल भले ही उनके द्वार पर रोक दिये जाँय किन्तु आपके
साथ ऐसा व्यवहार नहीं हो सकता । उसे इस बात का पूर्ण विश्वास है कि यदि
वे द्वारिकापुरी जाएंगे तो श्रीकृष्ण सबको छोड़कर पहले उन्हीं की खबर लेंगे
अर्थात् उनका पूर्ण स्वागत होगा और उन्हें मिलने के लिए कोई नहीं रोकेगा।
विशेष—इस छन्द में सुदामा-पत्नी का यह तर्क अत्यन्त सार्थक तथा प्रभाव-
शाली है कि श्रीकृष्ण अन्तर्यामी हैं और सुदामा को उन तक पहुँचने और मिलने में
कोई बाधा नहीं आएगी। वस्तुतः सुबुद्धि का बुद्धि-कौशल सराहनीय है ।
(१८) शब्दार्थ—विलम्ब = देरी । सदाई = सदैव, सदा । याहि तें = इसी