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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( १२ )
वाक्यार्थज्ञानमविद्यां निवर्त्तयतीत्येवंरूपस्य श्रवणस्यापेक्षितमेव
पूर्ववृत्तं वक्तव्यम् । तच्च नित्यानित्यवस्तुविवेकः, शमदमादि-
साधनसम्पत्, इहामुत्र फलभोगविरागः, मुमुक्षुत्वं चेत्येतत्साधन-
चतुष्टयम् । अनेन विना जिज्ञासानुपपत्तेः, अर्थस्वभावादेवेदमेव
पूर्ववृत्तमिति ज्ञायते ।
श्रवण, मनन और निदिध्यासन वाक्यार्थज्ञान के उपयोगी साधन
हैं। तत्त्वदर्शी आचार्य से "समस्त वेदान्त वाक्य अभेद विद्या के प्रतिपादक
हैं" ऐसे युक्तियुक्त वाक्यार्थ ग्रहण को श्रवण कहते हैं। ऐसे आचार्योपदिष्ट
तथ्य को युक्ति संगत मानकर आत्मसात् करने के अभ्यास को मनन
कहते हैं। एकत्व ज्ञान की विरोधी अनादि भेद बुद्धि और उसके संस्कारों
को दूर करने के लिए आचार्योपदिष्ट तत्व की अनवरत भावना को
निदिध्यासन कहते हैं। इस प्रकार श्रवण मनन आदि द्वारा जिसकी
समस्त भेदवासना निरस्त हो चुकी है, (तत्वमसि आदि) वाक्य जनित
ज्ञान उसी की अविद्या की निवृत्ति कर सकता है। इस प्रकार का श्रवण
रूप कर्म ही वाक्यार्थ ज्ञान का पूर्ववर्ती अपेक्षित कर्म है, ऐसा कहना
चाहिए। नित्य अनित्य वस्तु का विवेक, शम दम आदि साधन, ऐहिक
और पारलौकिक फल भोग से वैराग्य तथा मुमुक्षता ये चार साधन हैं,
इनके बिना ब्रह्म जिज्ञासा हो नही सकती। श्रुतियों के वास्तविक अर्थ
से ये चारो ही अपेक्षित पूर्ववृत्त ज्ञात होते हैं।
एतदुक्तं भवति—ब्रह्मस्वरूपाच्छादिकाऽविद्यामूलमपारमार्थिकं
भेददर्शनमेव बन्धमूलम् । बन्धश्चापारमार्थिकः स च समूलोऽपा-
रमार्थिकत्वादेव ज्ञानेनैव निवर्त्यते । निवर्त्तकं च ज्ञानं तत्त्व-
मस्यादिवाक्यजन्यम् । तस्यैतस्य वाक्यजन्यस्य ज्ञानस्य स्वरूपो-
त्पत्तौ कार्ये वा कर्मणो नोपयोगः, विविदिषायामेव तु कर्मणामुपयोगः
स च पापमूलरजस्तमोनिबर्हणद्वारेण सत्त्वविवृद्ध्या भवती-
त्युपयोगमभिप्रेत्य "ब्राह्मणा विविदिषन्ति" इत्युक्तमिति । अतः
कर्मज्ञानस्यानुपयोगादुक्तमेव साधनचतुष्टयं पूर्ववृत्तमिति वक्तव्यम् ।
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( १३ )
कथन यह है कि ब्रह्म के स्वरूप को ढकने वाली अविद्या से प्रसूत
असत्य भेद दर्शन ही (जीवों के) बन्धन का कारण है, वह बन्धन भी
अवास्तविक है, और वह समूल अवास्तविक होने से ज्ञान से ही उसकी
निवृत्ति हो जाती है। तत्त्वमसि आदि वाक्य जन्य ज्ञान ही उक्त बन्धन
का निवारक है। इस प्रकार के वाक्य जन्य ज्ञान में कार्य या कर्म की
कोई उपयोगिता नहीं है, विविदिषा में ही एक मात्र कर्मों की उपयोगिता
है। वह विविदिषा, पाप के हेतु रज और तम गुणों की निवृत्ति तथा सत्त्व
गुण की अत्यधिक वृद्धि में ही होती है। इसकी इस उपयोगिता के आशय
से ही “ब्राह्मणाः विविदिषन्ति” ऐसा निर्देश किया गया है। इससे सिद्ध
होता है कि ब्रह्मज्ञान में कर्मज्ञान की कोई उपोगिता नहीं है, पूर्वोक्त
साधन चतुष्टय ही पूर्ववर्ती उपयोगी साधन हैं।
(लघु सिद्धान्त)—अत्रोच्यते—यदुकमविद्यानिवृत्तिरेव मोक्षः सा
च ब्रह्मविज्ञानादेव भवति, इति । तदभ्युपगम्यते, अविद्यानिवृत्तये
वेदान्तवाक्यैर्विधित्सितं ज्ञानं किंरूपमिति विवेचनीयम्, किं
वाक्याद् वाक्यार्थज्ञानमात्रम्, उत तन्मूलमुपासनात्मकं ज्ञानम् ?
इति ।
(प्रतिवाद) आपने जो यह कहा कि “अविद्या निवृत्ति ही मोक्ष
है और वह ब्रह्मज्ञान से ही होती है”, तो मैं पूछता हूँ कि अविद्या
निवृत्ति के लिए वेदान्त वाक्यों के विधित्सित ज्ञान का रूप क्या है,
यह विवेचन का विषय है। वह ज्ञान वाक्य जन्य वाक्यार्थ ज्ञान मात्र है
अथवा वाक्यार्थ ज्ञान मूलक उपासना का बोधक है ?
न तावद् वाक्यजन्यं ज्ञानं तस्य विधानमन्तरेणापि वाक्या-
देव सिद्धेः, तावन्मात्रेणाविद्यानिवृत्त्यनुपलब्धेश्च । न च वाच्यम्
भेदवासनायामन्निरस्तायां वाक्यमविद्यानिवर्त्तकं ज्ञानं न जनयति,
जातेऽपि सर्वस्य सहसैव भेदज्ञानानिवृत्तिः न दोषाय, चन्द्रैकत्वे
ज्ञातेऽपि द्विचन्द्रज्ञानानिवृत्तिवत् । अनिवृत्तमपि छिन्नमूलत्वेन न
बन्धाय भवति, इति ।
वाक्य जन्य ज्ञान तो अविद्या निवृत्ति का कारण हो नहीं सकता,

( १४ )

ज्ञान के विधान के अतिरिक्त केवल वाक्य से तो उसकी सिद्धि हो नहीं
सकती, केवल उतने होने मात्र से अविद्या निवृत्ति देखी भी नहीं जाती ।
ऐसा भी नहीं कह सकते कि भेदवासना के निवारण के बिना "तत्त्वमसि"
आदि वाक्य अविद्या निवारक ज्ञानोत्पादक नहीं होते । क्योंकि चन्द्र एक
है ऐसी जानकारी होते हुए भी दृष्टि दोष से दो चन्द्रों की जो भ्रान्ति
होती है, वह निराधार ही तो है, उसका निराकरण तो होता नहीं, निराकृत
न होने पर भी निर्मूल होने से उसका कोई महत्व भी नहीं है । उसी
प्रकार भेद ज्ञान भी भ्रान्ति मूलक ही तो है, उसका कोई सत्य आधार
तो है नहीं, फिर वह भेदज्ञान बन्धन का कारण भी नहीं हो सकता,
उसका निराकरण सहसा न भी हो तो उसमें हानि ही क्या है ? वाक्य-
जन्य ज्ञान का कुछ असर तो होना ही चाहिए ।
सत्यां सामग्र्यां ज्ञानानुत्पत्त्यनुपपत्तेः, सत्यामपि विपरीत-
वासनायामाप्तोपदेशलिङ्गादिभिर्बाधकज्ञानोत्पत्तिदर्शनात् । सत्यपि
वाक्यार्थज्ञाने अनादिवासनया मात्रया भेदज्ञानमनुवर्तत इति भवता
न शक्यते वक्तुम्, भेदज्ञानसामग्र्या अपि वासनाया मिथ्यारूपत्वेन
ज्ञानोत्पत्त्यैव निवृत्तत्वात्, ज्ञानोत्पत्तावपि मिथ्यारूपायास्तस्याः
अनिवृत्तौ निवर्त्तकान्तराभावात् कदाचिदपि नास्या वासनाया निवृत्तिः ।
वासनाकार्यं भेदज्ञानं छिन्नमूलमथ चानुवर्त्तत इति बालिशभाषितम् ।
द्विचन्द्रज्ञानादौ तु बाधकसन्निधावपि मिथ्याज्ञानहेतोः परमार्थ-
तिमिरादिदोषस्य ज्ञानबाध्यत्वाभावेन अविनष्टत्वाद मिथ्याज्ञान-
निवृत्तिरविरुद्धा । प्रबलप्रमाणबाधितत्वेन भयादिकार्यं तु निवर्त्तते ।
अपिच भेदवासनानिरसनद्वारेण ज्ञानोत्पत्तिमभ्युपगच्छतां कदा-
चिदपि ज्ञानोत्पत्तिः न सेत्स्यति । भेदवासनाया अनादिकालोप-
चितत्वेनापरिमितत्वात् तद्विरोधिभावनायाश्चाल्पत्वादनया तन्नि-
रासानुपपत्तेः ।
प्रायः ज्ञानोत्पादक साधनों के रहते हुए भी ज्ञानोत्पत्ति नहीं होती
तथा विरुद्ध संस्कारों के होते हुए भी महात्माओ के उपदेश और आक-
स्मिक घटनाओं से सहसा ज्ञानोत्पत्ति होती देखी जाती है ।

( १५ )
वाक्यार्थ ज्ञान के होने पर भी अनादि वासना के कारण थोड़ी बहुत
भेद दृष्टि बनी ही रहती है, ऐसा तो आप कह नहीं सकते, क्योंकि आपके
मत से भेदवासना मिथ्या है अतः भेदोत्पादक साधनों के रहते हुए भी
ज्ञानोत्पत्ति से ही उस मिथ्यावासना की निवृत्ति हो जानी चाहिये। यदि
ज्ञानोत्पत्ति होने पर भी मिथ्यारूप उस वासना की निवृत्ति नहीं होती.तो,
उसकी निवृत्ति का ज्ञान के अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय तो है नहीं, फिर
वासना की निवृत्ति कभी भी सम्भव नहीं है। भेद दृष्टि की मूल कारण
वासना नष्ट हो जाय और उसका कार्य भेदज्ञान फिर भी बना रहे, ऐसा
तो मूर्ख ही कह सकता है। “चन्द्र दो हैं” ऐसा जो ज्ञान होता है उसमें
भ्रम के निवारक यथार्थ ज्ञान के होते हुए भी, भ्रम के यथार्थ कारण
तिमिर आदि दोष (नेत्र रोग विशेष) की स्थिति रहती है, जिसे यथार्थ
स्वानुभूत ज्ञान से दूर नहीं किया जा सकता, इस स्थिति में दो चन्द्र संबंधी
मिथ्या भ्रान्ति होती भी है तो कोई विरुद्ध बात नहीं है; किसी प्रामाणिक
व्यक्ति के द्वारा दो चन्द्र देखने वाले व्यक्ति की भ्रान्ति निवारण की जाती
है तो उसके भ्रम जन्य भय आदि की निवृत्ति हो जाती है। उसी प्रकार
वाक्यार्थ जन्य ज्ञान से भेदवासना की निवृत्ति हो जाने पर भेददृष्टि की
भी निवृत्ति हो जानी चाहिये, यदि भेददृष्टि बनी रहती है तो निश्चित-
ही भेदवासना भी है, वह वाक्यार्थ जन्य ज्ञान से कदापि निवृत्त नहीं होती
ऐसा मानना पड़ेगा।
भेदवासना के निराकरण से ही ज्ञानोत्पत्ति को चाहने वालों की
भी ज्ञानोत्पत्ति कभी हो नहीं सकती, क्योंकि भेदवासना अनन्त काल-
संचित होने से अपरिमित है तथा उसके विपरीत भावना (ज्ञानवासना)
बहुत ही अल्प है, उसके द्वारा प्रबल भेदवासना का निराकरण सम्भव
नहीं है।
अतो वाक्यार्थज्ञानादन्यदेव ध्यानोपासनादिशब्दवाच्यं ज्ञानं
वेदान्तवाक्यैर्विधित्सितम् । तथा च श्रुतयः—"विज्ञाय प्रज्ञां
कुर्वीत", “अनुविद्य विजानाति”, “ओमित्येवात्मानं ध्यायथ”,
“निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते”, “आत्मानमेव लोकमुपासीत”,
“आत्मा वाऽरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः”
“सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः”—इत्येवमाद्याः।
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( १६ )
इससे यह निश्चित होता है कि वाक्यार्थ ज्ञान से भिन्न ध्यान,
उपासना आदि शब्दगम्य ज्ञान ही वेदांत वाक्यों का अभीप्सिन तात्पर्य
है, ऐसा ही "अच्छी तरह जानकर प्रज्ञा (ध्यान) करनी चाहिये", "भली
भांति (वेदांतवाक्यों की) पर्यालोचना करके जानने की चेष्टा करो",
"आत्मा का प्रणव रूप से चिन्तन करो", "उपासक उस परमात्मा को
देखकर मृत्यु मुख से मुक्त होते है", "आत्मा की ही उपामना करो"
"आत्मा ही श्रोतव्य, द्रष्टव्य, मंतव्य और निदिध्यासितव्य है",
"वही अन्वेष्टव्य और जिज्ञास्य है"—इत्यादि श्रुतिवाक्यों का भी
तात्पर्य है।
अत्र निदिध्यासितव्य इत्यादिनेकार्थ्यात् "अनुविद्य विजानाति",
"विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत" इत्येवमादिभिर्वाक्यार्थज्ञानस्य ध्यानोपकारक-
त्वात् "अनुविद्य" "विज्ञाय" इत्यनूद्य "प्रज्ञां कुर्वीत" "विजानाति"
इति ध्यानं विधीयते। "श्रोतव्य" इति चानुवादः, स्वाध्यायस्यार्थ-
परत्वेनाधीतवेदः पुरुषः प्रयोजनवदर्थावबोधित्वदर्शनात्तन्निर्णयाय
स्वयमेव श्रवणे प्रवर्त्तते इति श्रवणस्य प्राप्तत्वात्। श्रवणप्रतिष्ठार्थ-
त्वान्मननस्य "मन्तव्य" इति चानुवादः, तस्माद् ध्यानमेव विधीयते।
वक्ष्यति च "आवृत्तिरसकृदुपदेशात्" इति।
उपर्युक्त श्रुति वाक्यो में निदिध्यासन आदि सभी उपाय एक ही
अर्थ के द्योतक हैं। "अनुविद्य विजानाति", "विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत" इत्यादि
वाक्यों से वाक्यार्थ ज्ञान की ध्यानोपकारकता ही बतलाई गई है, "प्रज्ञा
कुर्वीत", "विजानाति" आदि शब्दों में ध्यान का ही विधान बतलामा गया
है। "श्रोतव्य" शब्द भी ध्यान का अनुवाद है, अधीत अक्षर राशि का
अर्थावबोध ही स्वाध्याय का सही तात्पर्य है, वेदों को पढ़ा हुआ व्यक्ति
शब्द के प्रयोजनीय अर्थ को जानकर उमके निर्णय के लिए स्वयं ही श्रवण
के लिए प्रस्तुत होता है। इस प्रकार श्रवण भी ध्यान का ही एक प्रकार
सिद्ध होता है। श्रवण को स्थिर करना ही मनन का प्रयोजन है, "मनन"
'श्रवण'अपेक्षित उपाय है, इसलिए "मन्तव्य" को भी भ्यान का ही अनुवाद
मानना चाहिये, इससे भी ध्यान का ही विधान किया गया है। "आवृत्ति-
रसकृदुपदेशात्" सूत्र में सूत्रकार भी उक्त तथ्य का प्रतिपादन करते हैं।
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( १७ )
तदिदमपवर्गोपायतया विधित्सितं वेदनमुपासनम् इत्यवगम्यते ।
विद्युपास्योर्व्यतिकरेणोपक्रमोपसंहारदर्शनात् “मनो ब्रह्मेत्युपासीत'
इत्यत्र “भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद”,
“न स वेद अकृत्स्नो ह्येष आत्मेत्येवोपासीत”, “यस्तद् वेद यत्स वेद स
मयैतदुक्तः” इत्यत्र “अनु म एतां भगवो देवतां शाधि यां देवतामु-
पास्से” इति ।
मोक्ष के उपाय के रूप में वेदन और उपासना शब्द का श्रुति वाक्यों
में आगे पीछे उलट पलट कर विधान वर्णन किया गया है । जैसे—“मन
की ब्रह्म रूप से उपासना करनी चाहिए”, “जो उसे इस प्रकार जानता
है वह कीर्ति ( पराक्रम जन्य प्रतिष्ठा ), यश ( दान जन्य प्रतिष्ठा )
और ब्रह्मतेज से उद्दीप्त होकर सबको अभिभूत करता है”, “वे पूर्ण
आत्मा को नहीं जानते, ये सब तो उसके अंशमात्र हैं”, “आत्मा इन
अंशों में व्याप्त है, ऐसा मानकर ही उपासना करनी चाहिए”, “जो
उसे जानता है वही वास्तविक ज्ञाता है”, “भगवन् ! आप जिस देवता
की उपासना करते हैं मुझे उन्हीं का उपदेश दें ।” इत्यादि ।
ध्यानं च तैलधारावदविच्छिन्नस्मृतिसंतानरूपम् । “ध्रुवा
स्मृतिः, स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः” इति ध्रुवायाः स्मृते-
रपवर्गोपायतवश्रवणात् । सा च स्मृतिः दर्शनसमाकारा “भिद्यते
हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्
दृष्टे परावरे ॥” इत्यनेनैकार्थ्यात् । एवं सति “आत्मा वा अरे द्रष्ट-
व्यः” इत्यनेन निदिध्यासनस्य दर्शनसमानाकारता विधीयते ।
भवति च स्मृतेर्भावनाप्रकर्षाद् दर्शनरूपता । वाक्यकारेणैतत्सर्वं
प्रपञ्चितम् “वेदनमुपासनं स्यात् तद्विषये श्रवणात्” इति । सर्वा-
सूपनिषत्सु मोक्षसाधनतया विहितं वेदनमुपासनमित्युक्तम् “सकृत्
प्रत्ययं कुर्यात् शब्दार्थस्य कृतत्वात्प्रयाजादिवत्” इति पूर्वपक्षं कृत्वा
“सिद्धन्तूपासनशब्दात्” इति वेदनम् असकृदावृत्तं मोक्षसाधनमिति
[email protected]

( १८ )
निर्णीतम्। “उपासनं स्याद् ध्रुवानुस्मृतिदर्शनान्निर्वचनाच्च” इति।
तस्यैव वेदनस्योपासनरूपस्यासकृदावृत्तस्य ध्रुवानुस्मृतित्वमुप-
वर्णितम्।
तैल धारा की तरह अखंड प्रवाहमयी स्मृति परम्परा ही ध्यान
है। “स्मृति के आश्रय से हृदयस्थ समस्त ग्रन्थियाँ भंग हो जाती हैं।”
इस वाक्य में ध्रुवा स्मृति को मोक्ष का उपाय बतलाया गया है। वह
स्मृति आत्मदर्शन के समान रूप वाली है, “उस परावर सर्वोत्तम पुरुष
का दर्शन करके हृदयस्थ ग्रन्थियों का मोचन, संशयों का उच्छेद तथा
कर्मों का क्षय हो जाता है” इस वाक्य से स्मृति और दर्शन की एकार्थता
सिद्ध होती है। इसी प्रकार “आत्मा वा अरे” इत्यादि वाक्य से निदिध्यासन
की दर्शन रूपता दिखलायी गयी है। स्मृति भावना के प्रकर्ष से इसकी
दर्शन रूपता होती है। वाक्यकार ने इस सबका विस्तृत विवेचन इस
प्रकार किया है—“वेदन ही उपासना है ऐसा श्रुति से ही ज्ञात होता है।”
सभी उपनिषदों में मोक्ष के उपाय रूप से विहित “वेदन” को ही
“उपासना” रूप बतलाया गया है। प्रयाजादि याग की तरह ज्ञानानु-
शीलन भी एक बार करना चाहिए” इस वाक्य को पूर्वपक्ष के रूप में
उद्धृत करके “सिद्धन्तूपासनशब्दात्” इस सूत्र से “वेदन” की प्रवाहमयी
आवृत्ति का मोक्ष साधन के रूप में निर्णय किया गया है। तथा “उपासनं
स्याद् ध्रुवानुस्मृतिर्दर्शनान्निर्वचनाच्च” इस सूत्र से उस उपासना रूप
वेदन की प्रवाहमयी आवृत्ति को ध्रुवा स्मृति बतलाया गया है।
सेयं स्मृतिर्दर्शनरूपा प्रतिपादिता, दर्शनरूपता च प्रत्यक्षता-
पत्तिः। एवं प्रत्यक्षतापन्नामपवर्गसाधनभूतां स्मृतिं विशिनष्टि—
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष
वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥” इति। अनेन
केवलश्रवणमनननिदिध्यासनानामात्मप्राप्त्यनुपायत्वमुक्त्वा “यमेवैष
आत्मा वृणुते तेनैव लभ्यः” इत्युक्तम्।
उक्त स्मृति की दर्शन रूपता का प्रतिपादन किया गया है, दर्शन
रूपता को ही साक्षात्कार कहते हैं। ऐसी साक्षात्कार रूपता को प्राप्त

( १६ )
मोक्ष की साधन रूपा स्मृति का विश्लेषण श्रुति में इस प्रकार करते हैं—
“इस आत्मा को प्रवचन, मेधा या अधिक शास्त्र ज्ञान से नहीं प्राप्त
कर सकते, यह आत्मा ही जिसको वरण करता है, उसे ही वह प्राप्त
होता है, उसके समक्ष अपना रूप प्रकट कर देता है।” इस वाक्य से
केवल श्रवण मनन निदिध्यासन को आत्मप्राप्ति में असमर्थ बतला कर
“वही जिसे वरण करता है उसके समक्ष प्रकट होता है” ऐसी साक्षात्-
कार रूपा स्मृति का वर्णन किया गया है।
प्रियतम एव वरणीयो भवति, यस्यायं निरतिशयं प्रियः स
एवास्य प्रियतमो भवति, यथायं प्रियतमात्मानं प्राप्नोति तथा स्वयमे-
व भगवान् प्रयतत इति भगवतैवोक्तम्—“तेषां सततयुक्तानां भजतां
प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥” इति ।
“प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ।” इति च । अतः
साक्षात्काररूपा स्मृतिः स्मर्यमाणात्यर्थप्रियत्वेन स्वयमप्यत्यर्थं
प्रिया यस्य स एव परेणात्मना वरणीयो भवतीति तेनैव लभ्यते
परमात्मेत्युक्तं भवति; एवंरूपा ध्रुवानुस्मृतिरेव भक्तिशब्देनाभि-
धीयते । उपासनपर्यायत्वाद् भक्तिशब्दस्य । श्रत एव श्रुतिस्मृतिभिरेव-
मभिधीयते “तमेव विदित्वातिमृत्युमेति”, “तमेवं विद्वानमृत इह
भवति”, “नान्यः पन्था अयनाय विद्यते”, “नाहं वेदैर्नतपसा न
दानेन न चेज्यया । शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवं विधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन
प्रवेष्टुं च परन्तप ॥”, “पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ॥”
इति ।
प्रियतम व्यक्ति ही वरणीय होता है, जिस व्यक्ति के ये प्रभु अत्यन्त
प्रिय होते हैं वही उनका प्रियतम होता है। जिस प्रकार यह प्रियतम
उन्हें प्राप्त होता है वैसा प्रयास भगवान स्वयं ही करते हैं। ऐसा भगवान
का ही कथन है—“प्रीतिपूर्वक निरन्तर भजन करने वालों को मैं ऐसी

( २० )
बुद्धि प्रदान करता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त कर सकें।" "ज्ञानी भक्तों का
मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वे मेरे प्रियतम हैं।"
अत्यन्त प्रिय प्रभु ही स्वयं स्मृतिमार्ग में प्रकट होकर साक्षात्कार के
अनुरूप अपनी प्रिय स्मृति प्रदान करते हैं, जिससे उपासक परमात्मा का
वरणीय होता है, उसी से वह परमात्मा को प्राप्त होता है। इस प्रकार
की ध्रुवानुस्मृति ही भक्ति शब्द से कही गयी है, उपासना शब्द भक्ति
शब्द का पर्यायवाची है, इससे भी उक्त बात की पुष्टि होती है। श्रुति-
स्मृतियों से भी ऐसा ही ज्ञात होता है, जैसे—"उसको इस प्रकार जानकर
मृत्यु का अतिक्रमण करता है", "उसको जानकर मुक्त हो जाता है",
"इसको जानने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है", "जैसा
तुमने मुझे देखा है, मेरे इस रूप को वेदाध्ययन, तप, दान, यज्ञ
किसी भी साधन से नहीं देखा जा सकता", "मेरी अनन्य भक्ति द्वारा ही
मेरे इस रूप को देखा और समझा जा सकता है", "केवल भक्ति द्वारा ही
पर पुरुष को प्राप्त किया जा सकता है।" इत्यादि।
एवंरूपाया ध्रुवानुस्मृतेः साधनानि यज्ञादीनि कर्माणि इति
"यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्" इत्यभिधास्यते। यद्यपि विविदिषन्तीति यज्ञा-
दयो विविदिषोत्पत्तौ विनियुज्यन्ते, तथापि तस्यैव वेदनस्य ध्यानरूप-
स्याहरहरनुष्ठीयमानस्याभ्यासाधेयातिशयस्याप्रयाणानुवर्तमानस्य
ब्रह्मप्राप्तिसाधनत्वात्तदुत्पत्तये सर्वाण्याश्रमकर्माणि यावज्जीवमनु-
ष्ठेयानि। वक्ष्यति च "आ प्रयाणात्तत्रापि हि दृष्टम्"। "अग्निहोत्रादि
तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात्।" "सहकारित्वेन च" इत्यादिषु।
वाक्यकारश्च ध्रुवानुस्मृतेर्विवेकादिभ्य एव निष्पत्तिमाह—"तल्ल-
ब्धिर्विवेकविमोकाभ्यासक्रियाकल्याणानवसादानुद्धर्षेभ्यः संभवान्नि
र्वचनाच्च" इति।
इस प्रकार ध्रुवा स्मृति के साधनरूप यज्ञादि कर्म हैं, ऐसा "यज्ञादि-
श्रुतेरश्ववत्" सूत्र में बतलावेंगे। यद्यपि "विविदिषन्ति" इस श्रुति में
यज्ञादि कर्मों को विविदिषोत्पत्ति में साधन बतलाया गया है, तथापि नित्य
निरन्तर मरणपर्यन्त अनुष्ठीयमान, अभ्यास द्वारा उत्कृष्टता को प्राप्त ध्यान-

( २१ )
रूप वेदन ही ब्रह्मप्राप्ति का साधन है, उसी की उत्पत्ति के लिए आश्रम
विहित समस्त कर्मों का जीवन पर्यन्त अनुष्ठान करना चाहिए। सूत्रकार
भी इसी बात का समर्थन “अप्रयाणात्तत्रापि हि दृष्टम्”, “अग्निहोत्रादि तु
तत्कार्यायैव तद्दर्शनात्”, “सहकारित्वेन च” इत्यादि सूत्रों में करते हैं।
वाक्यकार विवेक आदि से ध्रुवानुस्मृति की निष्पत्ति कहते हैं-“विवेक,
विमोक, अभ्यास, क्रिया, कल्याण, अनवसाद और अनुद्धर्ष से ध्रुवानुस्मृति
होती है, शास्त्र भी इसका समर्थन करते हैं।”
विवेकादीनां स्वरूपंचाह—“जात्याश्रयनिमित्तादुष्टादन्नात्
कायशुद्धिर्विवेकः” इति। तत्र निर्वचनम्-“आहारशुद्धौ सत्त्व-
शुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः” इति। “विमोकः कामानभिष्वङ्गः”
इति। “शान्त उपासीत” इति निर्वचनम्, “आरम्भणः शीलनं पुनः
पुनरभ्यासः” इति। निर्वचनं च स्मार्त्तमुदाहृतं भाष्यकारेण-“सदा
तद्भावभावितः” इति। “पञ्चमहायज्ञाद्यनुष्ठानं शक्तितः क्रिया”
इति। निर्वचनं “क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः”, “तमे तंवेदानुवचनेन
ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन” इति च।
“सत्यार्जवदयादानाहिंसानभिध्याः कल्यायानि” इति। निर्वचनं
“सत्येन लभ्यः”, “तेषामेवैष विरजो ब्रह्मलोकः” इत्यादि। “देश-
कालवैगुण्याच्छोकवस्त्वाद्यनुस्मृतेश्च तज्जं दैन्यमभास्वरत्वं मनसोऽव-
सादः” इति। “तद्विपर्ययोऽनवसादः”। निर्वचनं “नायमात्मा
बलहीनेन लभ्यः” इति। “तद्विपर्ययजा तुष्टिरुद्धर्षः” इति।
तद्विपर्ययोऽनुद्धर्षः, अतिसंतोषश्च विरोधीत्यर्थः। निर्वचनमपि
“शान्तो दान्तः” इति। एवं नियमयुक्तस्याश्रमविहितकर्मानुष्ठानेनैव
विद्यानिष्पत्तिरित्युक्तं भवति।
विवेक आदि का स्वरूप भी बतलाते हैं- जाति आश्रय निमित्त
दोषों से रहित अन्न से शरीर की रक्षा करना विवेक है। इस पर शास्त्र-
प्रमाण जैसे-“आहार शुद्धि से अन्तःकरण शुद्ध होता है, अन्तःकरण की
शुद्धि से ही ध्रुवा स्मृति होती है।” काम्य विषयों में आसक्ति न होना
[email protected]

( २१ )

विमोक है। इस पर शास्त्र प्रमाण जैसे—"शान्त चित्त से उपासना करनी
चाहिए।" अवलम्बनपूर्वक शुभ विषय के पुनः पुनः अनुशीलन को
अभ्यास कहते हैं। शास्त्र प्रमाण में भाष्यकार इसमें स्मृतिवाक्य प्रस्तुत करते
हैं—"सदा उस परमात्मभाव में निमग्न रहता है।" यथाशक्ति पंचयज्ञों
के अनुष्ठान को क्रिया कहते हैं। शास्त्र प्रमाण जैसे—"ब्राह्मण वेदाध्ययन
यज्ञ, दान, तप द्वारा भोगतृणारहित होकर परमात्मा को जानने की
इच्छा करते हैं।" सत्य, सरलता, दया, दान, अहिंसा और अनभिध्या
(सफल चिन्ता) को कल्याण कहते हैं। शास्त्र प्रमाण—"इस विरज
(निर्दोष) ब्रह्मलोक को सत्य से प्राप्त करते हैं।" देश काल आदि की
विपरीतता तथा शोक के कारणों की स्मृति से होने वाली मन की
दुर्बलता और अप्रसन्नता को अवसाद कहते हैं, इनका न होना अनवसाद
है। शास्त्र प्रमाण—"यह आत्मा बलहीन (दुर्बल मन वाले) व्ययित से
लभ्य नहीं है।" उक्त अवसाद से होने वाले असंतोष को उद्धर्ष कहते
हैं, उसकी विपरीत स्थिति है। "शान्तदान्त" आदि वाक्य इसका
उदाहरण है। इन नियमो से युक्त आश्रम विहित कर्मानुष्ठान से ही
विद्या की निष्पत्ति हो सकती है; यही वक्तव्य का सारांश है।
तथाच श्रुत्यन्तरम् "विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह। अवि-
द्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥" इति । अत्राविद्याशब्दाभिहितं
वर्णाश्रमविहितं कर्म । अविद्यया कर्मणा, मृत्युं ज्ञानोत्पत्ति-
विरोधि प्राचीनं कर्म, तीर्त्वा अपोह्य, विद्यया ज्ञानेन, अमृतं
ब्रह्म, अश्नुते प्राप्नोति इत्यर्थः । मृत्युतरणोपायतया प्रतीता
अविद्या विद्ये तराद् विहितं कर्मैव, यथोक्तम्—"इयाज सोऽपि सुबहून्
यज्ञान् ज्ञानव्यपाश्रयः । ब्रह्मविद्यामधिष्ठाय ततुं मृत्युमविद्यया ॥" इति ।
एक दूसरी श्रुति भी उक्त तथ्य की पुष्टि करती है—"जो प्रसिद्ध
विद्या और अविद्या दोनों को जानते हैं, वे अविद्या से मृत्यु का अतिक्रमण
करके विद्या से अमृतत्व प्राप्त करते हैं।" यहाँ अविद्या शब्द का
अर्थ वर्णाश्रम विहित कर्म है। अर्थात् अविद्या-वर्णाश्रम कर्म द्वारा
ज्ञानोत्पत्ति विरोधी प्रारब्ध कर्म से,-छुटकारा पाकर, विद्या—ज्ञान

( २३ )
ज्ञान से, अमृत - ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। मृत्युतरण के उपायरूप से
प्रतीत अविद्या का तात्पर्य विद्याभिन्न वर्णाश्रम विहित कर्म ही है। जैसा
कि कहा गया—"ज्ञान संपन्न उन्होंने भी ब्रह्मबुद्धि अवलंबनपूर्वक,
अविद्या द्वारा ज्ञानविरोधी प्राक्तन कर्मों के निवारणार्थ बहुत से यज्ञों का
अनुष्ठान किया।"
ज्ञानविरोधि च कर्म पुण्यपापरूपम्। ब्रह्मज्ञानोत्पत्ति-
विरोधित्वेनानिष्टफलतयोभयोरपि पापशब्दाभिधेयत्वम्। अस्य च
ज्ञानविरोधित्वं ज्ञानोत्पत्तिहेतुभूतशुद्धसत्त्वविरोधिरजस्तमोविवृद्धि-
द्वारेण। पापस्य च ज्ञानोदयविरोधित्वम्—"एष एवासाधु
कर्म कारयति तं यमधो निनीषति" इति श्रुत्या अवगम्यते।
रजस्तमोर्यथार्थज्ञानावरणत्वं सत्त्वस्य च यथार्थज्ञानहेतुत्वं
भगवतैव प्रतिपादितं सत्त्वात्संजायते ज्ञानमित्यादिना। अतश्च
ज्ञानोत्पत्तये पापं कर्म निरसनीयम्, तन्निरसनञ्च अनभिसंहित-
फलेनानुष्ठितेन धर्मेण। तथा च श्रुतिः—"धर्मेण पापमपनुदति"
इति। तदेवं ब्रह्मप्राप्तिसाधनं ज्ञानं सर्वाश्रिमकर्मापेक्षम्, अतो
ऽपेक्षितकर्मस्वरूपज्ञानं केवलकर्मणामल्पास्थिरफलत्व ज्ञानं च कर्म-
मीमांसावसेयम् इति, सैवापेक्षिता ब्रह्मजिज्ञासायाः पूर्ववृत्ता वक्तव्या।
पुण्य-पाप रूप कर्म ही ज्ञान विरोधी हैं। ज्ञानोत्पत्ति के विरोधी होने
से दोनों ही अनिष्ट फलदायी हैं, इसलिए दोनों का ही पाप शब्द से
कथन किया गया है। चित्तशुद्धि से ज्ञानोत्पत्ति होती है, रज और तम
गुणों की वृद्धि करने वाला पाप उसके प्रतिकूल है, इसलिए वह ज्ञान-
विरोधी है। पाप की ज्ञानोदय-विरोधिता "जिसको अधोगति देना
चाहते हैं उससे भगवान ही पाप कराते हैं।" इस श्रुति से ज्ञात होती
है। रज और तम की ज्ञानावरणता तथा सत्त्व की यथार्थ ज्ञानहेतुता
का प्रतिपादन स्वयं भगवान् ने ही "सत्त्वात्संजायतेज्ञानम्" इत्यादि से
किया है, इसलिए ज्ञानोदय के लिए पाप कर्म का निरसन आवश्यक है,
उसका निराकरण अनासक्त फल वाले कर्मानुष्ठान से ही हो सकता है।
जैसा कि श्रुति-वाक्य भी है—"धर्म से पापों का निरसन होता है।"

"इस प्रकार ब्रह्म प्राप्ति का साधन ज्ञान आश्रमकर्म अपेक्षित सिद्ध
होता है। अपेक्षित कर्म का स्वरूप तथा उपासना रहित कर्मों की अल्प
अस्थिर फलता का स्वरूपज्ञान कर्ममीमासा से ही होता है, इसीलिए
कर्ममीमासा को ब्रह्ममीमासा का पूर्वापेक्षित कहा गया है।
अपिच नित्यानित्यवस्तुविवेकादयश्च मीमांसाश्रवणमन्तरेण न
संपत्स्यते, फलकरणेतिकर्तव्यताधिकारिविशेषनिश्चयादृते कर्मस्व-
रूपतत्फलतास्थिरत्वास्थिरत्वात्मनित्यत्वादीनां दुरवबोधत्वात्। एषां
साधनत्वं च विनियोगावसेयम्, विनियोगश्च श्रुतिलिङ्गादिभ्यः,
स च तार्तीयः। उद्गीथाद्युपासनानि कर्मसमृद्ध्यर्थान्यपि ब्रह्मदृष्टि-
रूपाणि, ब्रह्मज्ञानापेक्षानीति इहैव चिन्तनीयानि। तान्यपि कर्माणि
अनभिसंहितफलानि ब्रह्मविद्योत्पादकानीति तद्साद्गुण्यापादना-
न्येतानि सुतरामिहैव संगतानि। तेषां च कर्मस्वरूपाधिगमापेक्षा
सर्वसम्मता।
नित्य अनित्य वस्तु का विवेक आदि कर्ममीमांसा के सुने बिना हो
नही सकता, स्थिरतर फल साधन विषयक कर्त्तव्यता के लिए विशेष
निश्चय आवश्यक है, उसके बिना कर्म का स्वरूप तथा उसके फल
की स्थिरता और अस्थिरता रूपी नित्यता और अनित्यता जानना कठिन
होगा। शम आदि ब्रह्मज्ञान के साधनों के विनियोग का ज्ञान भी इसी
कर्ममीमांसा से हो सकता है, कर्ममीमांसा शास्त्र के तृतीय अध्याय में
वर्णित श्रुतिलिंग आदि के आधार पर ही विनियोग का ज्ञान होता है।
उद्गीथ आदि उपासनाएँ कर्मसमृद्धि की द्योतिका होते हुए भी ब्रह्मदृष्ट
रूप होने से ब्रह्मज्ञान में अपेक्षित हैं, इसका विचार भी कर्ममीमांसा में ही
किया गया है। वे कर्म भी निष्काम भाव से अनुष्ठित होने पर ब्रह्मविद्यो-
त्पादक होते है, उद्गीथ आदि उपासनाएँ उन निष्काम कर्मों में उत्कर्ष
प्रदान करती हैं, इसलिए उन सबकी इस ब्रह्म मीमांसा में संगति है
तथा उन उद्गीथ आदि की कर्मसापेक्षता भी सर्वसम्मत सिद्ध होती है।
(महापूर्वपक्षः)—यदप्याहुः—अशेषविशेषप्रत्यनीकचिन्मात्रं ब्रह्मैव
परमार्थः, तदतिरेकिनानाविधज्ञातृज्ञेयतत्कृतज्ञानभेदादि सर्वं

तस्मिन्नेव परिकल्पितं मिथ्याभूतम्—“सदेव सौम्येदमग्र आसी-
देकमेवाद्वितीयम्”, “अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते”, “यत्तदद्रे-
श्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादं नित्यं विभुं
सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद् भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः”, “सत्यं
ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”, “निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं
निरञ्जनम्”, “यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।
अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्”, “न दृष्टेर्द्रष्टारंपश्येः
न मतेर्मन्तारं मन्वीथाः”, “आनन्दो ब्रह्म”, “इदं सर्वं यदयमात्मा”,
“नेह नानास्ति किंचन”, “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव
पश्यति”, “यत्र हि द्वैत मिव भवति, तदितर इतरं पश्यति यत्र त्वस्य
सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं विजानीयात्”, “वाचारम्भणं
विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्”, “यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदर-
मन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं भवति”, “न स्थानतोऽपि परस्योभयलिङ्गं
सर्वत्र हि”, “मायामात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात्”, “प्रत्यस्त-
मितभेदं यत् सत्तामात्रमगोचरम् । वचसामात्म संवेद्यं तज्ज्ञानं
ब्रह्म संज्ञितम्॥”, “ज्ञानस्वरूपमत्यन्तनिर्मलं परमार्थतः । तमे-
वार्थस्वरूपेण भ्रान्तिदर्शनतः स्थितम्॥”, “परमार्थस्त्वमेवैको नान्यो-
ऽस्ति जगतः पते !”, “यदेतद् दृश्यते मूर्त्तमेतज्ज्ञानात्मनस्तव । भ्रान्ति-
ज्ञानेन पश्यन्ति जगद्रूपमयोगिनः ॥”, “ज्ञानस्वरूपमखिलं
जगदेतदबुद्धयः । अर्थस्वरूपं पश्यन्तो भ्राम्यन्ते मोहसंप्लवे ॥”, “ये तु
ज्ञानविदः शुद्धचेतसस्तेऽखिलं जगत् । ज्ञानात्मकं प्रपश्यन्ति त्वद्रूपं
परमेश्वर ॥”, “तस्यात्मपरदेहेषु सतोऽप्येकमयं हि यत् । विज्ञानं पर-
मार्थो हि द्वैतिनोऽतथ्यदर्शिनः ॥”, “यद्यन्योऽस्ति परः कोऽपि मत्तः
पार्थिवसत्तम । तदैषोऽहमयं चान्यो वक्तुमेवमपीष्यते॥”, “वेणुरन्ध्रविभे-
देन भेदः षड्जादिसंज्ञितः । अभेदव्यापिनो वायोस्तथासौ परमात्मनः ॥”,

( २६ )
“सोऽहं स च त्वं स च सर्वमेतदात्मस्वरूपं त्यज भेदमोहम् । इतीरित-
स्तेन स राजवर्यः तत्याज भेदं परमार्थदृष्टिः ॥”, “विभेदजनके ज्ञाने
नाशमात्यन्तिकं गते । आत्मनो ब्रह्मणो भेदमसन्तं कः करिष्यति ॥”,
“अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।” “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि
सर्वक्षेत्रेषु भारत ।” “न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ।”
इत्यादिभिर्वस्तुस्वरूपोपदेशपरैः शास्त्रैः निर्विशेषचिन्मात्रं ब्रह्मैव
सत्यम् अन्यत् सर्वं मिथ्या इत्यभिधानात् ।
महापूर्वपक्ष (शांकरमत)—सर्व प्रकार के विशेष धर्मों से रहित
चिन्मय ब्रह्म ही यथार्थ सत्य है। उसके अतिरिक्त ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञान आदि
सभी प्रकार के भेद उस ब्रह्म मे ही कल्पित है, सभी मिथ्या है, जैसा कि
“हे सौम्य ! यह सब कुछ पहले एक अद्वितीय सत् ही था,—बाद मे परा से
अक्षर की अभिव्यक्ति हुई, जो बुद्धीन्द्रिय, अगम्य, कर्मेन्द्रिय, अगम्य, मूल
कारण रहित, स्थूलता शुक्लता आदि अवस्थाओ से रहित, नेत्र-कान-हाथ
पर रहित, नित्य, विभु, सूक्ष्म, अव्यय और भूतो के कारण है, उनको धीर
लोग सभी ओर देखते है, ब्रह्म सत्य ज्ञान और अनन्त रूप है—वह अखण्ड
निष्क्रिय शांत निर्दोष और निर्मल है, जो सोचते है कि हम ब्रह्म को
नही जानते वस्तुत वे ही यथार्थ ज्ञाता है, ब्रह्म विशेषज्ञो से अज्ञात तथा
अज्ञो से ज्ञात है—वह दृष्टा की दृष्टि से दृष्ट तथा मनन करने वाले के
मन से मननीय नही है — ब्रह्म आनन्द है,—यह सब कुछ आत्म-स्वरूप है,
इसमे कोई विभिन्नता नही है,—जो इसमे भेद देखता है वह बार-बार
मृत्यु को प्राप्त करता है,—जब द्वैत भाव में रहता है तभी दूसरे को
दूसरा समझता है,—जब सब कुछ आत्मभूत है तो कौन किसे देखे, कौन
किसे जाने ? —घट आदि केवल कहने मात्र के है, एक मात्र मिट्टी ही
यथार्थ है,—जिस समय इसमें भेद देखता है तभी जीव भयभीत होता है,
किसी भी उपाधि से परब्रह्म में दोनों बातें (सविशेषता और निर्विशेषता)
नही हो सकती, सर्वत्र इसकी निर्विशेष, रूपता ही बतलाई गई है,—
स्वप्न दृष्ट वस्तु मायामय है क्योंकि उनकी अभिव्यक्ति नही होती —
भेद रहित, सत्ता मात्र, अगोचर, वाणी और अन्तः करण से संवेद्य ज्ञान
ही ब्रह्म नाम वाला है —नितान्त निर्मल ज्ञानस्वरूप वह भ्रमवश विकारों
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के रूप में परिलक्षित होता है,—हे प्रभु ! एक मात्र आप ही परमार्थ सत्य
है, और सब कुछ मिथ्या है, आप ज्ञानमय है, यह दृश्यमान जगत आपकी
ही मूर्ति है, योग रहित व्यक्ति ही इस जगत को आपसे भिन्न देखता है, जो
शुद्ध चित्त ज्ञाता है वे समस्त जगत को ज्ञानात्मक आपका ही रूप मानते
हैं, जो अपने और दूसरे शरीरों में एक मात्र सत् को देखते हैं, उनका ऐसा
विज्ञान ही परमार्थ है, द्वैत वादी वस्तुतः तथ्य नहीं जानते । जैसे एक
व्यापक वायु वेणुरंध्रों में प्रवेश करके षड्ज आदि नाम प्राप्त करता है,
वैसे ही परमात्मा में भी भेद है । यदि मुझसे कुछ भिन्न है तब तो यह मैं
हूं; अमुक दूसरा है ऐसा कहा जा सकता है, जो मैं हूं, वही तुम हो, तुम्हीं
सब कुछ हो, तब भेदभ्रम छोड़ दो—इस प्रकार कहने पर उस राजा ने
परमार्थ दृष्टि से भेद भाव का त्याग कर दिया । भेद के मूल कारण
भ्रमात्मक वृत्ति के नष्ट हो जाने पर, आत्मा और ब्रह्म के भेद की बात
कौन कर सकता है। मैं ही समस्त भूतों का हृदयस्थ आत्मा हूं । मुझे
सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ जानो । मेरे अतिरिक्त स्थावर जंगम कुछ भो नहीं है ।”
इत्यादि वस्तु स्वरूप का निरूपण करने वाले शास्त्र वचनों से ‘निर्विशेष
चिन्मात्र ब्रह्म ही सत्य है और सब कुछ मिथ्या है” ऐसा सिद्ध होता है ।
मिथ्यात्वं नाम प्रतीयमानत्वपूर्वकयथावस्थितवस्तुज्ञान-
निवर्त्यत्वम् । यथा रज्ज्वाद्यधिष्ठानसर्पादेः । दोषवशाद् हि तत्र
तत्कल्पनम् । एवं चिन्मात्रवपुषि परे ब्रह्मणि दोषपरिकल्पितमिदं
देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरादिभेदं सर्वं जगद् यथावस्थितब्रह्मस्वरूपा-
वबोधबाध्यं मिथ्यारूपम्, दोषश्च स्वरूपतिरोधानविविधविचित्र-
विक्षेपकरी सदसद-अनिर्वचनीया अनाद्यविद्या एव । “अनृतेन
हि प्रत्यूढाः, तेषां सत्यानां सतामनृतमपिधानम् ।”, “नासदासीन्नो
सदासीत्तदानी तम आसीत्तमसा गूढमग्रे प्रकेतम् ।”, “मायां तु प्रकृतिं
विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।”, “इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते ।”,
“मम माया दुरत्यया ।”, “अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुद्ध्यते ।”
इत्यादिभिर्निर्विशेषचिन्मात्रं ब्रह्मैवानाद्यविद्यया सदसदनिर्वाच्या
तिरोहितस्वरूपं स्वगतनानात्वं पश्यति इत्यवगम्यते ।

( २८ )

जिसकी पहले प्रतीति हो, यथार्थता का ज्ञान हो जाने पर जिस प्रतीति
की निवृत्ति हो जाये, उस प्रतीत ज्ञान को मिथ्या ज्ञान कहते हैं जैसे कि
रज्जु आदि अधिकरणों में सर्प आदि की भ्रान्ति। भ्रान्ति-वश ही रज्जु
आदि मे सर्प आदि की परिकल्पना होती है। इसी प्रकार चिन्मात्र शरीर
ब्रह्म मे देव, पशु पक्षी, मनुष्य, स्थावर आदि भेद वाला सारा जगत
परिकल्पित है, जिससे कि ब्रह्म के यथार्थ स्वरूप में बाधा रूप मिथ्यात्व
की प्रतीति होती है। उक्त दोष की उत्पादिका, स्वरूप को तिरोहित
करने वाली, विभिन्न विचित्र विक्षेपकारणी, सत् असत् से विलक्षण,
अकथ्य, अनादि अविद्या ही है। "अनृत (मिथ्या) द्वारा आवृत्त वह सत्य
होते हुए भी असत्य है,-सृष्टि के पूर्व सत् असत् कुछ नही था एकमात्र
तम (प्रकृति) ही था, उस समय प्रकेत (जीव-जगत) तम से ही
आच्छादित था, माया को प्रकृति तथा मायावान् को महेश्वर जानो,
ईश्वर माया द्वारा अनेक रूपों मे व्यक्त होता है, मेरी माया दुरति
क्रमणीया है, अनादि माया से सुप्त जीव जब उठता है ।" इत्यादि
वाक्यों से ज्ञात होता है कि निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्म ही स्वयं, सद् असद्
अनिर्वचनीया माया से आवृत्त होकर अपने को भिन्न-भिन्न रूपों में
देखता है।
यथोक्तम्—"ज्ञानस्वरूपो भगवान् यतोऽसावशेषमूर्तिर्न तु
वस्तुभूतः। ततो हि शैलाब्धिधरादिभेदान् जानीहि विज्ञानविजृम्भि-
तानि ॥ यदा तु शुद्धं निजरूपि सर्वकर्मक्षये ज्ञानमपास्तदोषम् ।
तदा हि संकल्पतरोः फलानि भवन्ति नो वस्तुषु वस्तुभेदाः ॥
तस्मान्न विज्ञानमृतेऽस्ति किंचित् क्वचित् कदाचिद् द्विज वस्तुजातम् ।
विज्ञानमेकं निजकर्मभेदविभिन्नचित्तैर्बहुधाऽभ्युपेतम् ॥ ज्ञानं विशुद्धं
विमलं विशोकमशेषलोभादिमिरस्तसंगम् । एकं सदैकं परमः
परेशः स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ सद्भाव एवं भवतो
मयोक्तो ज्ञानं यथा सत्यमसत्यमन्यत् । एतत्तु यत् संव्यवहारभूतं
तथापि चोक्तं भुवनाश्रितं ते ॥" इति । अस्याश्चाविद्याया निर्विशेष-
चिन्मात्रब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेन निवृत्तिं वदन्ति—"न पुनर्मृत्यवे

( २६ )

तदेकं पश्यति ।”, “न मृत्यो मृत्युं पश्यति ।”, “यदा हि एवैष एतस्मिन्न-
दृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते अथ सोऽभयं गतो
भवति ॥”, “भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य
कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥”, “ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति ।”, “तमेवं
विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्थाः ।” इत्याद्याः श्रुतयः । अत्र मृत्युशब्देन
अविद्याऽभिधीयते । यथा सनत्सुजातवचनम्—“प्रमादं वै मृत्यु-
महं ब्रवीमि सदाऽप्रमादममृतत्वं ब्रवीमि ।” इति । “सत्यं ज्ञान-
मनन्तं ब्रह्म ।” “विज्ञानमानन्दं ब्रह्म।” इत्यादि शोधकवाक्यावसेयनि-
र्विशेषस्वरूपब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानं च । “अथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽ-
न्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद ।”, “अकृत्स्नो हि एष आत् त्येवे.-
पासीत ।”, ‘तत्त्वमसि ।”, “त्वं वा अहमस्मि भगवो देवते अहं वै त्व-
मसि भगवो देवते तद् योऽहं सोऽसौ योऽसौ सोऽहमस्मि ।” इत्यादि-
वाक्यसिद्धम् । वक्ष्यति च एतदेव—“आत्मेति तूपगच्छन्ति ग्राहयन्ति
च” इति । तथा च वाक्यकारः—“आत्मेत्येव तु गृह्णीयात् सर्वंस्य
तन्निष्पत्तेः ।” इति अनेन च ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेन मिथ्यारूपस्य
सकारणस्य बन्धस्य निवृत्तिरुक्ता ।
जैसा कि--“यह अनंत भगवान् ज्ञानस्वरूप हैं, वस्तुरूप नहीं,
इसलिए शैल, सागर, पृथिवी आदि भेदों को विज्ञान का स्फुरण मात्र
समझो । जब समस्त कर्म और उनके संस्कारों का क्षय हो जाता है तभी
शुद्ध ( अविद्या रहित ), निर्दोष ( रागादिशून्य ), भेददृष्टि रहित ज्ञान
का अपना वास्तविक रूप प्रकट होता है । इस निर्दुष्ट स्थिति में कल्पना
रूपी वृक्ष के वस्तुभेदमय फल आदि का उद्गम नहीं होता । विज्ञान के
अतिरिक्त कहीं भी कुछ नहीं है, अपने अपने कर्मों के भेद से जीव, एक
विज्ञान को अनेक रूपों में देखते हैं । विशुद्ध, विमल, शोक लोभादि रहित,
सदा एक, ज्ञान स्वरूप वे वासुदेव ही एक मात्र तथ्य हैं, उनके अतिरिक्त
और कुछ भी नहीं है । ज्ञान ही सत्य है और सब कुछ असत्य है, ऐसे सत्य
तथा जागतिक व्यवहारों का मैं तुम्हें उपदेश देता हूँ ।” इत्यादि श्रुतियों

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( ३० )
से ज्ञात होता है कि निर्विशेष शुद्ध चिन्मय ब्रह्म और आत्मा के अभेद
ज्ञान मात्र से अविद्या की निवृत्ति होती है। “पुनः मृत्यु के लिए ही
एकता नहीं देखता । अद्वैतदर्शी मृत्यु नहीं देखता। यह जीव जब अदृश्य,
अनात्म्य ( अशरीर ), अकथ्य, निराधार ब्रह्म में निर्भय होकर प्रतिष्ठित
हो जाता है तो उसकी अभय गति होती है। परावर ब्रह्म को देखकर
हृदय की ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं, सारे संशय उच्छिन्न हो जाते हैं, समस्त
कर्म क्षीण हो जाते हैं। ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है। उन्हें इस प्रकार
जानकर अमरता प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग
नहीं है।” इत्यादि श्रुतियाँ भी उक्त मत की पुष्टि करती हैं। यहाँ
मृत्यु शब्द अविद्यावाची है। सनत्सुजात संहिता में भी--“प्रमाद को
ही मैं मृत्यु मानता हूँ तथा प्रमाद के अभाव को अमरता। ब्रह्म विज्ञान
और आनंद स्वरूप है” इत्यादि वाक्यों से निर्विशेष ब्रह्म के साथ आत्मा
की एकता ज्ञात होती है। “यह दूसरा है, मैं दूसरा हूँ, ऐसा मानकर जो
देवता की उपासना करता है, वह उपासना नहीं जानता, उपास्य को
आत्मा मानकर उपासना करनी चाहिए। तुम वही हो। हे भगवन्, तुम
मैं हूँ और मैं तुम हो; जो मैं हूँ सो वह है, जो वह है सो मैं हूँ।” इत्यादि
वाक्यों से भी उक्त बात सिद्ध होती है। सूत्रकार भी “आत्मेति तूपगच्छ-
न्ति” में ऐसा ही कहते हैं, तथा वाक्यकार--“ब्रह्म को आत्मा मानकर
ग्रहण करो, क्योंकि सब कुछ उसी से निष्पन्न होता है” ऐसा कहकर उक्त
बात की ही पुष्टि करते हैं। ऐसे ब्रह्मात्मैक्य विज्ञान से मिथ्या भ्रान्ति और
उसकी मूल कारण अविद्या की निवृत्ति होती है, यह युक्तिसंगत बात है।
ननु च सकलभेदनिवृत्तिः प्रत्यक्षविरुद्धा, कथमिव शास्त्रजन्य-
विज्ञानेन क्रियते ? कथं वा “रज्जुरेषा न सर्पः” इति ज्ञानेन
प्रत्यक्षविरुद्धा सर्पनिवृत्तिः क्रियते ? तत्र द्वयोः प्रत्यक्षयोर्विरोधः,
इह तु प्रत्यक्षमूलस्य शास्त्रस्य प्रत्यक्षस्य चेति चेत्; तुल्ययोर्विरोधे वा
कथं बाध्यबाधकभावः ? पूर्वोत्तरयोर्दुष्टकारणजन्यत्वतदभावाभ्या-
मिति चेत्; शास्त्रप्रत्यक्षयोरपि समानमेतत् ।
( प्रश्न ) समस्त भेद की निवृत्ति तो कहीं भी नहीं देखी जाती,
शास्त्र जन्य ज्ञान से उसे कैसे निवृत्त किया जा सकता है ? ( उत्तर )

( ३१ )
“यह रज्जु है, सर्प नहीं” ऐसे ज्ञान से प्रत्यक्ष विरुद्धा सर्पभ्रांति की
निवृत्ति कैसे कर लेते हो ? यदि कहो कि रज्जु और सर्प की प्रत्यक्षता
में तो नितांत विपरीतता है और ब्रह्म-जगत संबंध में तो प्रत्यक्ष मूलक
शास्त्र और प्रत्यक्ष का स्पष्ट विरोध है, (तो मैं पूछता हूँ कि) दोनों की
तुलना और विरोध में तुमने बाध्य-बाधक भाव कैसे किया ? यदि कहो
कि पूर्व बाध्यज्ञान दुष्ट कारणोत्पन्न होता है तथा पर बाधकज्ञान
अदुष्ट कारण जन्य होता है ( इस आधार पर हमने बाध्य-बाधक ज्ञान
किया ), ( तो मैं कहता हूँ कि ) अद्वैत बोधक शास्त्र तथा प्रत्यक्ष
जागतिक भेद में भी उक्त सिद्धान्त लागू हो सकता है । दोनों एक सी ही
बातें हैं ।
एतदुक्तं भवति—बाध्यबाधकभावे तुल्यत्वसापेक्षत्वनिर-
पेक्षत्वादि न कारणम्, ज्वालाभेदानुमानेन प्रत्यक्षोपमर्दायोगात् ।
तत्र हि ज्वालैक्यं प्रत्यक्षेणावगम्यते । एवं च सति द्वयोः प्रमाणयोः
विरोधे यत् संभाव्यमानान्यथासिद्धिः, तद् बाध्यम्, अनन्यथासिद्धि-
मनवकाशमितरद् बाधकमिति सर्वत्र बाध्यबाधकभावनिर्णयः । तस्मा-
दनादिनिधनाविच्छिन्नसंप्रदायासंभाव्यमानदोषगन्धानवकाशशास्त्रज-
न्यनिर्विशेषनित्यशुद्धमुक्तबुद्धस्वप्रकाशचिन्मात्रब्रह्मात्मभावावबोधेन सं-
भाव्यमान दोषावकाश प्रत्यक्षादि सिद्धविविधविकल्परूप बन्ध-
निवृत्तिर्युक्तैव । संभाव्यते च विविधविकल्पभेद प्रपञ्चग्राहिप्रत्यक्षस्य
अनादिभेदवासनादिरूपाऽविद्याख्यो दोषः ।
बाध्य बाधक भाव में (प्रमाण की) तुल्यता, सापेक्षता या निरपेक्षता
नहीं होती, जैसे कि--अग्नि शिखाओं के भेद से अग्नि की प्रत्यक्ष एकता में
तो कोई बाधा नहीं होती; वहाँ एक ही ज्वाला की प्रत्यक्ष प्रतीति होती
है उसी प्रकार दो भावों की विरोधस्थिति में संभाव्य अन्यथा सिद्धि (जो
प्रकारान्तर से सिद्ध हो सके) ही बाध्य कहलाती है तथा अनन्यथा सिद्ध
बाधक कहलाती है । यही बाध्य बाधक भाव का सामान्य सिद्धान्त है ।
इससे यह सिद्ध होता है कि उत्पत्ति विनाश रहित, अखंड, निर्दोष ,
प्रयोजनान्तर रहित, शास्त्रजन्य, निर्विशेष, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्व
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