श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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ज्ञान के विधान के अतिरिक्त केवल वाक्य से तो उसकी सिद्धि हो नहीं
सकती, केवल उतने होने मात्र से अविद्या निवृत्ति देखी भी नहीं जाती ।
ऐसा भी नहीं कह सकते कि भेदवासना के निवारण के बिना "तत्त्वमसि"
आदि वाक्य अविद्या निवारक ज्ञानोत्पादक नहीं होते । क्योंकि चन्द्र एक
है ऐसी जानकारी होते हुए भी दृष्टि दोष से दो चन्द्रों की जो भ्रान्ति
होती है, वह निराधार ही तो है, उसका निराकरण तो होता नहीं, निराकृत
न होने पर भी निर्मूल होने से उसका कोई महत्व भी नहीं है । उसी
प्रकार भेद ज्ञान भी भ्रान्ति मूलक ही तो है, उसका कोई सत्य आधार
तो है नहीं, फिर वह भेदज्ञान बन्धन का कारण भी नहीं हो सकता,
उसका निराकरण सहसा न भी हो तो उसमें हानि ही क्या है ? वाक्य-
जन्य ज्ञान का कुछ असर तो होना ही चाहिए ।
सत्यां सामग्र्यां ज्ञानानुत्पत्त्यनुपपत्तेः, सत्यामपि विपरीत-
वासनायामाप्तोपदेशलिङ्गादिभिर्बाधकज्ञानोत्पत्तिदर्शनात् । सत्यपि
वाक्यार्थज्ञाने अनादिवासनया मात्रया भेदज्ञानमनुवर्तत इति भवता
न शक्यते वक्तुम्, भेदज्ञानसामग्र्या अपि वासनाया मिथ्यारूपत्वेन
ज्ञानोत्पत्त्यैव निवृत्तत्वात्, ज्ञानोत्पत्तावपि मिथ्यारूपायास्तस्याः
अनिवृत्तौ निवर्त्तकान्तराभावात् कदाचिदपि नास्या वासनाया निवृत्तिः ।
वासनाकार्यं भेदज्ञानं छिन्नमूलमथ चानुवर्त्तत इति बालिशभाषितम् ।
द्विचन्द्रज्ञानादौ तु बाधकसन्निधावपि मिथ्याज्ञानहेतोः परमार्थ-
तिमिरादिदोषस्य ज्ञानबाध्यत्वाभावेन अविनष्टत्वाद मिथ्याज्ञान-
निवृत्तिरविरुद्धा । प्रबलप्रमाणबाधितत्वेन भयादिकार्यं तु निवर्त्तते ।
अपिच भेदवासनानिरसनद्वारेण ज्ञानोत्पत्तिमभ्युपगच्छतां कदा-
चिदपि ज्ञानोत्पत्तिः न सेत्स्यति । भेदवासनाया अनादिकालोप-
चितत्वेनापरिमितत्वात् तद्विरोधिभावनायाश्चाल्पत्वादनया तन्नि-
रासानुपपत्तेः ।
प्रायः ज्ञानोत्पादक साधनों के रहते हुए भी ज्ञानोत्पत्ति नहीं होती
तथा विरुद्ध संस्कारों के होते हुए भी महात्माओ के उपदेश और आक-
स्मिक घटनाओं से सहसा ज्ञानोत्पत्ति होती देखी जाती है ।