श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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कथन यह है कि ब्रह्म के स्वरूप को ढकने वाली अविद्या से प्रसूत
असत्य भेद दर्शन ही (जीवों के) बन्धन का कारण है, वह बन्धन भी
अवास्तविक है, और वह समूल अवास्तविक होने से ज्ञान से ही उसकी
निवृत्ति हो जाती है। तत्त्वमसि आदि वाक्य जन्य ज्ञान ही उक्त बन्धन
का निवारक है। इस प्रकार के वाक्य जन्य ज्ञान में कार्य या कर्म की
कोई उपयोगिता नहीं है, विविदिषा में ही एक मात्र कर्मों की उपयोगिता
है। वह विविदिषा, पाप के हेतु रज और तम गुणों की निवृत्ति तथा सत्त्व
गुण की अत्यधिक वृद्धि में ही होती है। इसकी इस उपयोगिता के आशय
से ही “ब्राह्मणाः विविदिषन्ति” ऐसा निर्देश किया गया है। इससे सिद्ध
होता है कि ब्रह्मज्ञान में कर्मज्ञान की कोई उपोगिता नहीं है, पूर्वोक्त
साधन चतुष्टय ही पूर्ववर्ती उपयोगी साधन हैं।
(लघु सिद्धान्त)—अत्रोच्यते—यदुकमविद्यानिवृत्तिरेव मोक्षः सा
च ब्रह्मविज्ञानादेव भवति, इति । तदभ्युपगम्यते, अविद्यानिवृत्तये
वेदान्तवाक्यैर्विधित्सितं ज्ञानं किंरूपमिति विवेचनीयम्, किं
वाक्याद् वाक्यार्थज्ञानमात्रम्, उत तन्मूलमुपासनात्मकं ज्ञानम् ?
इति ।
(प्रतिवाद) आपने जो यह कहा कि “अविद्या निवृत्ति ही मोक्ष
है और वह ब्रह्मज्ञान से ही होती है”, तो मैं पूछता हूँ कि अविद्या
निवृत्ति के लिए वेदान्त वाक्यों के विधित्सित ज्ञान का रूप क्या है,
यह विवेचन का विषय है। वह ज्ञान वाक्य जन्य वाक्यार्थ ज्ञान मात्र है
अथवा वाक्यार्थ ज्ञान मूलक उपासना का बोधक है ?
न तावद् वाक्यजन्यं ज्ञानं तस्य विधानमन्तरेणापि वाक्या-
देव सिद्धेः, तावन्मात्रेणाविद्यानिवृत्त्यनुपलब्धेश्च । न च वाच्यम्
भेदवासनायामन्निरस्तायां वाक्यमविद्यानिवर्त्तकं ज्ञानं न जनयति,
जातेऽपि सर्वस्य सहसैव भेदज्ञानानिवृत्तिः न दोषाय, चन्द्रैकत्वे
ज्ञातेऽपि द्विचन्द्रज्ञानानिवृत्तिवत् । अनिवृत्तमपि छिन्नमूलत्वेन न
बन्धाय भवति, इति ।
वाक्य जन्य ज्ञान तो अविद्या निवृत्ति का कारण हो नहीं सकता,