सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 93

( ३१ )
“यह रज्जु है, सर्प नहीं” ऐसे ज्ञान से प्रत्यक्ष विरुद्धा सर्पभ्रांति की
निवृत्ति कैसे कर लेते हो ? यदि कहो कि रज्जु और सर्प की प्रत्यक्षता
में तो नितांत विपरीतता है और ब्रह्म-जगत संबंध में तो प्रत्यक्ष मूलक
शास्त्र और प्रत्यक्ष का स्पष्ट विरोध है, (तो मैं पूछता हूँ कि) दोनों की
तुलना और विरोध में तुमने बाध्य-बाधक भाव कैसे किया ? यदि कहो
कि पूर्व बाध्यज्ञान दुष्ट कारणोत्पन्न होता है तथा पर बाधकज्ञान
अदुष्ट कारण जन्य होता है ( इस आधार पर हमने बाध्य-बाधक ज्ञान
किया ), ( तो मैं कहता हूँ कि ) अद्वैत बोधक शास्त्र तथा प्रत्यक्ष
जागतिक भेद में भी उक्त सिद्धान्त लागू हो सकता है । दोनों एक सी ही
बातें हैं ।
एतदुक्तं भवति—बाध्यबाधकभावे तुल्यत्वसापेक्षत्वनिर-
पेक्षत्वादि न कारणम्, ज्वालाभेदानुमानेन प्रत्यक्षोपमर्दायोगात् ।
तत्र हि ज्वालैक्यं प्रत्यक्षेणावगम्यते । एवं च सति द्वयोः प्रमाणयोः
विरोधे यत् संभाव्यमानान्यथासिद्धिः, तद् बाध्यम्, अनन्यथासिद्धि-
मनवकाशमितरद् बाधकमिति सर्वत्र बाध्यबाधकभावनिर्णयः । तस्मा-
दनादिनिधनाविच्छिन्नसंप्रदायासंभाव्यमानदोषगन्धानवकाशशास्त्रज-
न्यनिर्विशेषनित्यशुद्धमुक्तबुद्धस्वप्रकाशचिन्मात्रब्रह्मात्मभावावबोधेन सं-
भाव्यमान दोषावकाश प्रत्यक्षादि सिद्धविविधविकल्परूप बन्ध-
निवृत्तिर्युक्तैव । संभाव्यते च विविधविकल्पभेद प्रपञ्चग्राहिप्रत्यक्षस्य
अनादिभेदवासनादिरूपाऽविद्याख्यो दोषः ।
बाध्य बाधक भाव में (प्रमाण की) तुल्यता, सापेक्षता या निरपेक्षता
नहीं होती, जैसे कि--अग्नि शिखाओं के भेद से अग्नि की प्रत्यक्ष एकता में
तो कोई बाधा नहीं होती; वहाँ एक ही ज्वाला की प्रत्यक्ष प्रतीति होती
है उसी प्रकार दो भावों की विरोधस्थिति में संभाव्य अन्यथा सिद्धि (जो
प्रकारान्तर से सिद्ध हो सके) ही बाध्य कहलाती है तथा अनन्यथा सिद्ध
बाधक कहलाती है । यही बाध्य बाधक भाव का सामान्य सिद्धान्त है ।
इससे यह सिद्ध होता है कि उत्पत्ति विनाश रहित, अखंड, निर्दोष ,
प्रयोजनान्तर रहित, शास्त्रजन्य, निर्विशेष, नित्य शुद्ध बुद्ध मुक्त स्व
[email protected]