श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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जिसकी पहले प्रतीति हो, यथार्थता का ज्ञान हो जाने पर जिस प्रतीति
की निवृत्ति हो जाये, उस प्रतीत ज्ञान को मिथ्या ज्ञान कहते हैं जैसे कि
रज्जु आदि अधिकरणों में सर्प आदि की भ्रान्ति। भ्रान्ति-वश ही रज्जु
आदि मे सर्प आदि की परिकल्पना होती है। इसी प्रकार चिन्मात्र शरीर
ब्रह्म मे देव, पशु पक्षी, मनुष्य, स्थावर आदि भेद वाला सारा जगत
परिकल्पित है, जिससे कि ब्रह्म के यथार्थ स्वरूप में बाधा रूप मिथ्यात्व
की प्रतीति होती है। उक्त दोष की उत्पादिका, स्वरूप को तिरोहित
करने वाली, विभिन्न विचित्र विक्षेपकारणी, सत् असत् से विलक्षण,
अकथ्य, अनादि अविद्या ही है। "अनृत (मिथ्या) द्वारा आवृत्त वह सत्य
होते हुए भी असत्य है,-सृष्टि के पूर्व सत् असत् कुछ नही था एकमात्र
तम (प्रकृति) ही था, उस समय प्रकेत (जीव-जगत) तम से ही
आच्छादित था, माया को प्रकृति तथा मायावान् को महेश्वर जानो,
ईश्वर माया द्वारा अनेक रूपों मे व्यक्त होता है, मेरी माया दुरति
क्रमणीया है, अनादि माया से सुप्त जीव जब उठता है ।" इत्यादि
वाक्यों से ज्ञात होता है कि निर्विशेष चिन्मात्र ब्रह्म ही स्वयं, सद् असद्
अनिर्वचनीया माया से आवृत्त होकर अपने को भिन्न-भिन्न रूपों में
देखता है।
यथोक्तम्—"ज्ञानस्वरूपो भगवान् यतोऽसावशेषमूर्तिर्न तु
वस्तुभूतः। ततो हि शैलाब्धिधरादिभेदान् जानीहि विज्ञानविजृम्भि-
तानि ॥ यदा तु शुद्धं निजरूपि सर्वकर्मक्षये ज्ञानमपास्तदोषम् ।
तदा हि संकल्पतरोः फलानि भवन्ति नो वस्तुषु वस्तुभेदाः ॥
तस्मान्न विज्ञानमृतेऽस्ति किंचित् क्वचित् कदाचिद् द्विज वस्तुजातम् ।
विज्ञानमेकं निजकर्मभेदविभिन्नचित्तैर्बहुधाऽभ्युपेतम् ॥ ज्ञानं विशुद्धं
विमलं विशोकमशेषलोभादिमिरस्तसंगम् । एकं सदैकं परमः
परेशः स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ सद्भाव एवं भवतो
मयोक्तो ज्ञानं यथा सत्यमसत्यमन्यत् । एतत्तु यत् संव्यवहारभूतं
तथापि चोक्तं भुवनाश्रितं ते ॥" इति । अस्याश्चाविद्याया निर्विशेष-
चिन्मात्रब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानेन निवृत्तिं वदन्ति—"न पुनर्मृत्यवे