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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 696 में से

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पृष्ठ 86

"इस प्रकार ब्रह्म प्राप्ति का साधन ज्ञान आश्रमकर्म अपेक्षित सिद्ध
होता है। अपेक्षित कर्म का स्वरूप तथा उपासना रहित कर्मों की अल्प
अस्थिर फलता का स्वरूपज्ञान कर्ममीमासा से ही होता है, इसीलिए
कर्ममीमासा को ब्रह्ममीमासा का पूर्वापेक्षित कहा गया है।
अपिच नित्यानित्यवस्तुविवेकादयश्च मीमांसाश्रवणमन्तरेण न
संपत्स्यते, फलकरणेतिकर्तव्यताधिकारिविशेषनिश्चयादृते कर्मस्व-
रूपतत्फलतास्थिरत्वास्थिरत्वात्मनित्यत्वादीनां दुरवबोधत्वात्। एषां
साधनत्वं च विनियोगावसेयम्, विनियोगश्च श्रुतिलिङ्गादिभ्यः,
स च तार्तीयः। उद्गीथाद्युपासनानि कर्मसमृद्ध्यर्थान्यपि ब्रह्मदृष्टि-
रूपाणि, ब्रह्मज्ञानापेक्षानीति इहैव चिन्तनीयानि। तान्यपि कर्माणि
अनभिसंहितफलानि ब्रह्मविद्योत्पादकानीति तद्साद्गुण्यापादना-
न्येतानि सुतरामिहैव संगतानि। तेषां च कर्मस्वरूपाधिगमापेक्षा
सर्वसम्मता।
नित्य अनित्य वस्तु का विवेक आदि कर्ममीमांसा के सुने बिना हो
नही सकता, स्थिरतर फल साधन विषयक कर्त्तव्यता के लिए विशेष
निश्चय आवश्यक है, उसके बिना कर्म का स्वरूप तथा उसके फल
की स्थिरता और अस्थिरता रूपी नित्यता और अनित्यता जानना कठिन
होगा। शम आदि ब्रह्मज्ञान के साधनों के विनियोग का ज्ञान भी इसी
कर्ममीमांसा से हो सकता है, कर्ममीमांसा शास्त्र के तृतीय अध्याय में
वर्णित श्रुतिलिंग आदि के आधार पर ही विनियोग का ज्ञान होता है।
उद्गीथ आदि उपासनाएँ कर्मसमृद्धि की द्योतिका होते हुए भी ब्रह्मदृष्ट
रूप होने से ब्रह्मज्ञान में अपेक्षित हैं, इसका विचार भी कर्ममीमांसा में ही
किया गया है। वे कर्म भी निष्काम भाव से अनुष्ठित होने पर ब्रह्मविद्यो-
त्पादक होते है, उद्गीथ आदि उपासनाएँ उन निष्काम कर्मों में उत्कर्ष
प्रदान करती हैं, इसलिए उन सबकी इस ब्रह्म मीमांसा में संगति है
तथा उन उद्गीथ आदि की कर्मसापेक्षता भी सर्वसम्मत सिद्ध होती है।
(महापूर्वपक्षः)—यदप्याहुः—अशेषविशेषप्रत्यनीकचिन्मात्रं ब्रह्मैव
परमार्थः, तदतिरेकिनानाविधज्ञातृज्ञेयतत्कृतज्ञानभेदादि सर्वं