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सर्वकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 696 में से

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( ३० )
से ज्ञात होता है कि निर्विशेष शुद्ध चिन्मय ब्रह्म और आत्मा के अभेद
ज्ञान मात्र से अविद्या की निवृत्ति होती है। “पुनः मृत्यु के लिए ही
एकता नहीं देखता । अद्वैतदर्शी मृत्यु नहीं देखता। यह जीव जब अदृश्य,
अनात्म्य ( अशरीर ), अकथ्य, निराधार ब्रह्म में निर्भय होकर प्रतिष्ठित
हो जाता है तो उसकी अभय गति होती है। परावर ब्रह्म को देखकर
हृदय की ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं, सारे संशय उच्छिन्न हो जाते हैं, समस्त
कर्म क्षीण हो जाते हैं। ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है। उन्हें इस प्रकार
जानकर अमरता प्राप्त करता है। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्ग
नहीं है।” इत्यादि श्रुतियाँ भी उक्त मत की पुष्टि करती हैं। यहाँ
मृत्यु शब्द अविद्यावाची है। सनत्सुजात संहिता में भी--“प्रमाद को
ही मैं मृत्यु मानता हूँ तथा प्रमाद के अभाव को अमरता। ब्रह्म विज्ञान
और आनंद स्वरूप है” इत्यादि वाक्यों से निर्विशेष ब्रह्म के साथ आत्मा
की एकता ज्ञात होती है। “यह दूसरा है, मैं दूसरा हूँ, ऐसा मानकर जो
देवता की उपासना करता है, वह उपासना नहीं जानता, उपास्य को
आत्मा मानकर उपासना करनी चाहिए। तुम वही हो। हे भगवन्, तुम
मैं हूँ और मैं तुम हो; जो मैं हूँ सो वह है, जो वह है सो मैं हूँ।” इत्यादि
वाक्यों से भी उक्त बात सिद्ध होती है। सूत्रकार भी “आत्मेति तूपगच्छ-
न्ति” में ऐसा ही कहते हैं, तथा वाक्यकार--“ब्रह्म को आत्मा मानकर
ग्रहण करो, क्योंकि सब कुछ उसी से निष्पन्न होता है” ऐसा कहकर उक्त
बात की ही पुष्टि करते हैं। ऐसे ब्रह्मात्मैक्य विज्ञान से मिथ्या भ्रान्ति और
उसकी मूल कारण अविद्या की निवृत्ति होती है, यह युक्तिसंगत बात है।
ननु च सकलभेदनिवृत्तिः प्रत्यक्षविरुद्धा, कथमिव शास्त्रजन्य-
विज्ञानेन क्रियते ? कथं वा “रज्जुरेषा न सर्पः” इति ज्ञानेन
प्रत्यक्षविरुद्धा सर्पनिवृत्तिः क्रियते ? तत्र द्वयोः प्रत्यक्षयोर्विरोधः,
इह तु प्रत्यक्षमूलस्य शास्त्रस्य प्रत्यक्षस्य चेति चेत्; तुल्ययोर्विरोधे वा
कथं बाध्यबाधकभावः ? पूर्वोत्तरयोर्दुष्टकारणजन्यत्वतदभावाभ्या-
मिति चेत्; शास्त्रप्रत्यक्षयोरपि समानमेतत् ।
( प्रश्न ) समस्त भेद की निवृत्ति तो कहीं भी नहीं देखी जाती,
शास्त्र जन्य ज्ञान से उसे कैसे निवृत्त किया जा सकता है ? ( उत्तर )