स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
परिचय एवं पृष्ठभूमि ७५
स्वात्मस्वरूप ही तो परमात्मा है अतः किसी उपाय की सार्थकता क्या है? नित्य,
स्वप्रकाश, निरावरण तत्त्व स्वात्मस्वरूप की प्राप्ति के लिए उपाय की क्या आवश्यकता
है ? ‘स्वात्मस्वरूप में लीन होना’—भी निरर्थक है क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य (प्रवेश
करने वाले) की सत्ता ही नहीं है । जगत् चिन्मय है—चिन्मात्रसार है । यह देश, काल,
उपाधि, आकृति, से परे, शब्दागम्य, प्रमाणागम्य, स्वतन्त्र, आनन्दघन यह स्वात्मस्वरूप
सभी सत्ताओं का केन्द्र है । मैं इस स्वात्म स्वरूप से भिन्न नहीं हूँ । इस अहमात्मक
स्वात्मस्वरूप में ही यह समस्त जगत् प्रतिबिम्बित हो रहा है । इस प्रत्यभिज्ञा के उदित
होने पर साधक नित्योदित परमात्मस्वरूप में प्रविष्ट हो जाता है—
१. अनन्यचेताः प्रत्यन्ते परव्योमवपुर्भवेत् ॥ (वि०भै० ४१)
२. अतश्च तन्मयं सर्वं भावयन् भवजिज्जनः (वि० भै० ९७)
३. बुद्धिं निस्तिमितां कृत्वा तत्तत्त्वमवशिष्यते ॥ (वि० भै० ९९)
४. क्षोभशक्ति विरामेण परा संजायते दशा । (वि० १०९)
५. तत्र-तत्र शिभावस्था व्यापकत्वात् क्व यास्यति । (वि० भै० ११३)
६. सर्वत्र भैरवो भावः समान्येष्वपि गोचरः ।
न च तद्व्यतिरेकेण परोऽस्तीत्यद्वया गतिः ॥ (१२१ वि० भै०)
इस उपायशून्य 'अनुपाय' में मन्त्र, पूजा, ध्यान एवं चर्या आदि सभी साधन व्यर्थ
हैं क्योंकि—‘उपायजालं न शिवं प्रकाशयेत्' ।
'त्रिक दर्शन' में 'बंधन' एवं 'मुक्ति' तथा मुक्ति के उपायों के संदर्भ में भी नव्य
दृष्टि प्रस्तुत की गई है यथा—
'बंधन' परमात्मा का अवरोहणात्मक व्यापार है । आत्मा का सम्यक् ज्ञान 'मुक्ति'
है और अज्ञान ही 'बंधन' है—
क) शिवजीवयोरभेद एव (मुक्तिः) उक्ता (आचार्य क्षेमराज) ।
ख) एतत्तत्त्वपरिज्ञानमेव मुक्तिः (आचार्य क्षेमराज) ।
ग) एतत्तत्त्वापरिज्ञानमेव बंधः (आचार्य क्षेमराज) ।
'मालिनीविजयोत्तर' तन्त्र में 'मल' को ही 'अज्ञान' एवं 'संसारांकुर कारण' कहा
गया है—'मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ।'
समावेश के पाँच भेद—
१. जाग्रत्स्वप्नादिभेदेन सर्वाविशक्रमो बुधैः ।
पञ्चभिस्तु परिज्ञेयः स्वव्यापारात्पृथक् पृथक् ॥ (अधि २।२६)
२. तत्र स्वरूपं शक्तिश्च सकलश्चेति तत्त्रयम् ।
इति जाग्रदवस्थेयं भेदे पञ्चदशात्मके ॥ (अधि० २।२७)
३. अकलौ द्वौ परिज्ञेयौ सम्यक् स्वप्नसुषुप्तयोः ।
मन्त्रादितत्पतीशान वर्गस्तुर्यः इति स्मृतः ॥ (२।२८)
७६ स्पन्दकारिका
४. शक्तिशांभू परिज्ञेयौ तुर्यातीते वरानने ।
त्रयोदशात्मके भेदे स्वरूपसकलावुभौ ॥ (२।२९)
मोक्ष—Tantric view of Moksha—Moksha, in the tantric sense
of the word, is the unfoldment of powers brought about by the self-
realisation.
रुद्रशक्ति
┌─────────────┬─────────────┐
आणव शाक्त शांभव
१. रुद्रशक्ति समावेशः पञ्चधा परिपठ्यते ।
२. रुद्रशक्ति समावेशस्तत्र नित्यं प्रतिष्ठितः (अधि० २।१३,१७)
१. भूत २. तत्त्व ३. आत्मा ४. मन्त्रेश ५. शक्ति—इन ५ भेदों तथा उपभेदों के
अनुसार रुद्रशक्ति के ५० भेद हैं ।
आणव—१. 'जाग्रत्' २. 'स्वप्न' ३. 'सुषुप्ति' ४. 'स्वप्नातीत'-'तुरीय' ५.
'तुर्यातीत' ।
पृथ्वी से पदार्थ तक (१) स्वरूप सकल स्तर—
(क) स्वरूप सकल शक्ति—जाग्रत् अवस्था ।
(ख) प्रलयाकल—स्वप्नावस्था ।
(ग) विज्ञानाकल—सुषुप्ति अवस्था ।
(घ) मन्त्र, मन्त्रेश—मन्त्रमहेशः तुरीयावस्था ।
(ङ) शिव-शक्ति—तुरीयातीतावस्था ।
पुरुष से कला पर्यन्त (२) स्वकल स्तर—
(क) सकल = जाग्रतावस्था ।
(ख) यथा पूर्वोक्त ।
(ग) यथा पूर्वोक्त ।
(घ) यथा पूर्वोक्त ।
(ङ) यथा पूर्वोक्त ।
माया तत्त्व (३) प्रलयाकल स्तर—
(क) प्रलयाकल-जाग्रतावस्था ।
(ख) विज्ञानाकल शक्ति-स्वप्नावस्था ।
(ग) यथा पूर्ववत् ।
(घ) यथा पूर्ववत् ।
(ङ) यथा पूर्ववत् ।
मायोर्ध्व (४) विज्ञानाकल स्तर—
(क) विज्ञानाकल-जाग्रतावस्था ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ७७
(ख) मन्त्र-स्वप्नावस्था ।
(ग) मन्त्रेश-स्वप्नातीतावस्था ।
(घ) मन्त्रमहेश-तुरीयावस्था ।
(ङ) यथा पूर्वोक्त ।
शुद्धविद्या (५) मन्त्रस्तर—
(क) मन्त्र-जाग्रतावस्था ।
(ख) मन्त्रेश-स्वानावस्था ।
(ग) मन्त्रमहेश-स्वप्नातीतावस्था
(घ) शक्ति-तुरीयावस्था ।
(ङ) शिव-तुरीयातीतावस्था ।
ईश्वर (६) मन्त्रेश स्तर—
(क) मन्त्र-जाग्रतावस्था ।
(ख) मन्त्रेश-स्वानावस्था ।
(ग) मन्त्रमहेश-स्वप्नातीतावस्था ।
(घ) शक्ति-तुरीयावस्था ।
(ङ) शिव-तुरीयातीतावस्था ।
सदाशिव (७) मन्त्रमहेश स्तर—
(क) मन्त्रमहेश-जाग्रतावस्था ।
(ख) क्रियाशक्ति-स्वप्नावस्था ।
(ग) ज्ञानशक्ति-स्वप्नातीतावस्था ।
(घ) इच्छाशक्ति-तुरीयावस्था ।
(ङ) शिव-तुरीयातीतावस्था ।
अव्यक्त स्तर (८) शिव स्तर (Undifferentiated stage)—
(क) क्रिया-जाग्रतावस्था ।
(ख) ज्ञान-स्वप्नावस्था ।
(ग) इच्छा-स्वप्नातीतावस्था ।
(घ) आनन्द-तुरीयावस्था ।
(ङ) चित् तुरीयातीतावस्था
अवस्थाओं के पर्याय—
(क) जाग्रत्-पिण्डस्थ—सर्वतोभद्र ।
(ख) स्वप्न-पदस्थ—व्याप्ति ।
(ग) सुषुप्ति-रूपस्थ—महाव्याप्ति ।
(घ) तुर्य-प्रचय—रूपातीत ।
(ङ) तुरीयातीत—महाप्रचय ।
७८ स्पन्दकारिका
संसार की सर्वोच्च सत्ता—सर्वकर्ता, सर्वज्ञ, सर्वस्थिति कारक, नित्य ॥
परमात्मा सिसृक्षा के स्तर (Creational Stage)—पर अपने को
'विज्ञानाकल' के रूप में प्रस्तुत करता है। परमात्मा उन्हें स्थिति, संहार एवं रक्षा का
कार्य प्रदान करते हैं—
क्रिया हेतु परमात्मा ७ करोड़ मन्त्रों को जन्म देते हैं। ये मन्त्र साधकों की
इच्छाओं की पूर्ति प्रदान करते हैं। आत्मा अपने को चार रूपों में व्यक्त करती है—१.
'शिव' २. 'मन्त्रमहेश' ३. 'मन्त्रेश' ४. 'मन्त्र'।
विज्ञानाकल एवं मन्त्र—विज्ञानाकल में—१. मल। 'प्रलयाकल' में—२
मल ॥ 'मल' = अपूर्ण ज्ञान ॥ रुद्र = ११८ 'रुद्र' ही मन्त्रेश्वरों के रूप में नियुक्त किये
जाते हैं। (मालिनीविजयोत्तरतन्त्र)।
[८] बंधन और मुक्ति
शिवसूत्रकार तो कहते हैं कि 'ज्ञान' ही बंधन है—'ज्ञानं बंधः' (१।२) आत्मा में
अनात्मा एवं अनात्मा में आत्माभिमानस्वरूप अख्याति अर्थात् अज्ञानात्मक ज्ञान ही बंधन
है—
(१) 'आत्मनि अनात्मताभिमानरूपाख्यातिलक्षणाज्ञानात्मकं ज्ञानं केवलं बंधो'
तथा—
(२) अनात्मनि शरीरादौ आत्मताभिमानात्मकम् अज्ञानमूलं ज्ञानमपि बंध एव ॥१
स्पन्दकारिका = 'शब्दराशि समुत्थस्य शक्ति वर्गस्य भोग्यताम् । कलाविलुप्त
विभवो गतः सन् स पशुः स्मृतः ॥'—पशुत्व ही बंधन है।
आचार्य क्षेमराज की दृष्टि—सारांश
बंधन—१. आत्मा में अनात्मा का अभिमान रूप अज्ञान।
२. अनात्मा में आत्मा का अभिमानरूप अज्ञान।
३. 'अपूर्णम्मन्यतात्मकआणवमलसतत्त्वसंकुचितज्ञानात्मा बंधः ॥'
४. 'मल' = 'मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम्'
५. अज्ञानाद् बध्यते लोकस्ततः सृष्टिश्श्च संहतिः ।२
६. आत्मप्रत्यभिज्ञा का अभाव (स्वस्वरूप का ज्ञानाभाव)
७. ज्ञानाभाव 'अज्ञान' नहीं है प्रत्युत अपूर्णज्ञान अज्ञान है और यही बंधन का
कारण है।
८. जिस स्वस्वरूप का ज्ञान नहीं है उसका स्वरूप है क्या? 'आत्मनो भैरवं रूपम्'।
'स्पन्दकारिका' का मत—(१) इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् स
पश्यन् सर्वतो युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ।
१-२. शिवसूत्रविमर्शिनी।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ७९
२. अयमेवोदयस्तस्यध्येयस्यध्यायि चेतसि तदात्मतासमापत्तिमिच्छतः साधकस्य
वा।
३. इयमेवाऽमृतप्राप्तिरयमेवाऽत्मनो ग्रहः।
इयं निर्वाणदीक्षां च शिवसद्भावदायिनी।
४. यदा त्वेकत्रसंरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ।
नियच्छन् भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥—‘स्पन्दकारिका’
५. कलाविलुप्त विभव ही पशु है।
मुक्ति क्या है? ‘जीवन्मुक्ति’ ही मुक्ति है—
चिदानन्दलाभे देहादिषु चेत्यमानेष्वपि चिदैकात्म्यप्रतिपत्तिदार्ढ्यं जीवन्मुक्तिः।
अविचला चिदेकत्वप्रथा सैव जीवन्मुक्तिः। —(प्र०हृ०सू० १६
‘स्पन्दकारिका’ में कहा गया है कि जगत् को अपनी क्रीड़ा मानना ही ‘जीवन्मुक्ति’
है— ‘इति वा यस्य संवितिः क्रीड़ात्वेनाखिलं जगत्।
स पश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥’
समस्त ज्ञायमान पदार्थ जीव के अपने अंगसदृश हैं—‘भोक्तैव भोग्यभावेन सदा
सर्वत्र संस्थितः ॥ (स्पन्द का० २४)
पारमार्थिक दृष्टि से बंधन एवं मुक्ति—परमात्मा स्वयमेव अपनी इच्छा से स्व-
स्वरूप का आच्छादन करके पशु बन जाता है और स्वेच्छा से ही इस आच्छादन का
त्याग करके शिव भी बन जाता है अतः पशु का पशुत्वरूप बंधन एवं इस बंधन का
त्याग रूप शिवत्व या मुक्ति तो कल्पित ही है अतः कैसा बंधन कैसी मुक्ति?—
न मे बंधो न मोक्षो मे भीतस्यैता विभीषिकाः।
प्रतिबिम्बमिदं बुद्धेर्जलेष्विव विवस्वतः ॥ (१३२)१
आचार्य सोमानन्द का कथन है कि प्रतीतिमात्र ही बंधन-मोक्ष दोनों हैं—
विभिन्न शिवपक्षे तु सत्ये दार्ढ्यं परत्र नो।
प्रतीतिमात्रमेवात्र तावता बंधमोक्षता ॥२
अर्थात् ‘शिवाभेदप्रतीतिमात्रं मोक्षस्तदप्रतीतिस्तु बंध इति।’३
[९] अद्वैत भक्ति
‘स्पन्द’ एवं ‘प्रत्यभिज्ञा’ में अद्वैतभक्ति स्थापित है। ‘अनुभवसूत्र’ में भी यही दृष्टि
प्रतिपादित है—
१. द्वैतभक्तिः प्रपञ्चाख्या केनचित् कल्पिता मृषा।
अद्वैतभक्तिरचला निर्विकल्पा निरञ्जना ॥ (८ अधिकरणः ४८)
१. विज्ञानभैरव। २. शिवदृष्टि (सोमानन्द)।
३. शिवदृष्टिवृत्ति (उत्पलदेव)।
८० स्पन्दकारिका
२. एवमद्वैतभक्त्यैव प्रसादः सर्वतोमुखः ।
प्रसिद्ध्यति ततः सर्वमात्मरूपेण दृश्यते ॥ (८।३६)१
३. इसका प्रभाव क्या है ?
(क) कर्ता कारयिता कर्म करणं कार्यमेव च ।
सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।३७)
(ख) भोक्ता भोजयिता भोगो भोगोपकरणानि च ।
सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।३८)२
(ग) ग्राहकश्च तथा ग्राह्यं ग्रहणं सर्वतोमुखम् ।
सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।३९)
(घ) शरीरमिन्द्रियं प्राणा मनो बुद्धिरहंकृतिः ।
सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।४१)
(ङ) विधयश्च निषेधाश्च निषिद्धकरणान्यपि ।
सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।४२)३
(च) कामक्रोधादयः सर्वे तथा शान्त्यादयोऽपि च ।
सर्वमात्मतया भाति प्रसादात् पारमेश्वरात् ॥ (८।४३)
निष्कर्ष—
१. तस्मादद्वैतगां भक्तिमाश्रयेत् सर्वसिद्धिदाम् ।
न च द्वैतात्मिकां भक्तिं क्लेशहेतुप्रदायिनीम् ॥ (८।४४)४
२. अद्वैतपदरूढा या भक्तिरद्वैतलक्षणा ।
सैवाद्वैताभिधा भक्तिरन्या केवल कल्पिता । (८।४६)५
(क) द्वैतभक्ति—संसार-वर्धन-भेद बुद्धि—संसरण चक्र ॥
(ख) अद्वैतभक्ति—अभिन्नरूप—भेदहीन—संसार-विनाश ॥
द्वैतभक्त्या हि संसारवर्धनं भिन्नरूपतः ।
अभिन्नरूपतोऽद्वैतभक्त्या संसारनाशनम् ॥ (८।४७)६
अद्वैतभक्ति—द्वैतभक्ति की निवृत्ति ।
द्वैतभक्तिनिवृत्तौ हि साक्षादद्वैतलक्षण ।
भक्तिर्गरीयसी भाति निजर्वाण निरूपिणी ॥ (८।४९)
भक्ति की शक्ति एवं उसका विमर्श-स्वरूप—
१. भक्तिरेव परमार्थदायिनी भक्तिरेव परतत्त्ववेदिनी ।
भक्तिरेव भवदोषहारिणी भक्तिरेव शिवभावकारिणी ॥ (८।८३)
१-६. अनुभवसूत्र ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ८१
२. नाहमनात्मा पश्चात्कोऽहं योऽहं पदस्थ आत्मा साक्षी ।
सोऽहं तत्पति शिवदासोऽहं दासोऽहमिति चरेदुपरि ॥ (८।८५)१
—वातूलोत्तरतन्त्र शिवानुभवसूत्र
‘विज्ञानभैरव’ में कहा गया है कि भक्ति के उद्वेक से विरक्त मल के हृदय में
जिस प्रकार की मानसिक दशा (मति) उत्पन्न होती है वही ‘शांकरीशक्ति’ है और ऐसा
साधक ‘शिव’ हो जाता है ।
भक्त्युद्रेकाद्विरक्तस्य यादृशी जायते मतिः ।
सा शक्तिः शांकरी नित्यं भावयेत् तां ततः शिवः ॥ (विज्ञानभैरव ११८)
‘गीतानिष्यन्द’ में क्षेमेन्द्र ने कहा है कि—सर्वत्र सर्वव्यापक भगवान् के श्रीचरणों
में साष्टांग प्रणाम करना ही भक्ति नहीं है प्रत्युत् यथार्थ भक्ति तो यह है कि भाव स्वभाव
के सभी पदार्थों में एक ही भगवान् का अनुचिन्तन किया जाय । समस्त जगत् को
भगवन्मय समझा जाय ।
न पादपतनं भक्तिर्व्यापिनः परमेशितुः ।
भक्तिर्भावस्वभावानां वदेकीभावभावनम् ॥
उत्पलदेवाचार्य (‘श्री शिवस्तोत्रावली’ के पञ्चम स्तोत्र में) कहते हैं ‘हे भगवन् ।
आपके अद्वयानन्द को प्राप्त करके और इस जगत् को अपनी ही आत्मा की झलक से
युक्त देखते हुए भी मैं भक्तिरस के चमत्कारों से वंचित न रहूँ—
‘अपि लब्धभवद्भावः स्वात्मोल्लासमयः जगत् ।
पश्यन् भक्तिरसाभोगैर्गर्भवेयमवियोजितः ॥ १६ ॥
आचार्य उत्पलदेव पुनः कहते हैं—‘शिव बनकर शिव की पूजा करनी चाहिए—
ऐसा भक्त जनों से कहा जाता है क्योंकि पारमार्थिक सारभूत स्वरूप वाले आप भक्तों द्वारा
ही अभेद दृष्टि से ढूँढ़े जाते हैं—
‘शिवा भूत्वा यजेतेति भक्तो भूत्वेति कथ्यते ।
त्वमेव हि वपुः सारं भक्तैर्हृदयशोधितम् ॥ (१।१४)
‘हे पूर्णाहन्ता स्वरूप स्वामी ! मैं ईश्वर हूँ’ मैं ही सुन्दर (चिदात्मा के प्रकाश से
उज्ज्वल) हूँ । मैं ही सौभाग्यवान् हूँ । ज्यादा क्या कहूँ ? ‘इस जगत् में मेरे समान अन्य
कौन है ?’—ऐसे स्वात्माभिमान की भावना आपके भक्त को अत्यन्त शोभा देती है—
ईश्वरोऽहमेव रूपवान् पण्डितोऽस्मि सुभगोऽस्मि कोऽपरः ।
मत्समोऽस्ति जगतीति शोभते, मानिता त्वदनुरागिणः परम् ॥ ४ ॥
यहाँ समावेशमयी भक्ति स्पृहणीय है—
‘हे उमापति! अथाह, निर्विकल्प, अभेदरूप स्वात्मस्वरूप और सभी भेदमय
१. अनुभवसूत्र ।
स्पं.भू. ५
८२ स्पन्दकारिका
पदार्थों को निगल डालने वाले आप चिद्रूप में समावेश करते हुए मैं सदैव आपकी पूजा
करता हूँ—
'त्वामगाधमविकल्पमद्वयं, स्वं स्वरूपमखिलार्थघस्मरम् ।
आविशन्नहमुमेश सर्वदा, पूजयेयमभिसंस्तुवीय च ॥'
'भक्त्यावेशस्तु मे सदा' (१६।६)
'जहाँ इस अलौकिक चिदात्मा महादेव की पूजा की जाती है वहाँ कौन सी शोभा
नहीं होती, कौन सा आनन्द नहीं होता, कौन सी उत्कृष्ट सुखसम्पत्ति नहीं होती और
कौन सा मोक्ष नहीं होता ?'
का न शोभा न को ह्लादः का समृद्धिर्न वापरा ।
को वा न मोक्षः कोऽत्येष महादेवे यदर्च्यते ॥ (१७।२५)
'प्रत्यभिज्ञाकारिका' के ज्ञानाधिकार में उत्पलदेवाचार्य भगवान् की दास्य भक्ति
की चर्चा करते हुए प्रत्यभिज्ञा के प्रतिपादन की बात करते हैं—
'कथं चिदासाद्य महेश्वरस्य,
दास्यं जनस्याप्युपकारमिच्छन् ।
समस्त सम्पत्समवाप्ति हेतुं,
तत्प्रत्यभिज्ञामुपपादयामि ॥' (प्र०का०)
यहाँ 'भक्ति' को भगवान् की 'आह्लादिनी शक्ति' माना जाता है। 'भक्ति' भगवान् की
'आनन्द शक्ति' है । यहाँ 'भक्ति' भावना, गलदश्रुभावुकता या 'चित्त का द्रवीभाव' मात्र
नहीं है प्रत्युत् यह भगवान् में अपृथक् रूप से समवेत आनन्द शक्ति का उल्लास है । यह
परमात्मा की शाश्वत आनन्द शक्ति का उसके अपरिमेय आनन्दोल्लास की अभिव्यञ्जना
है । यह परमात्मा की अचिन्त्य शक्ति की (भक्त के हृदय में) अभिव्यक्ति है ।
[१०] मन्त्रविज्ञान और स्पन्दशास्त्र
'स्पन्दशास्त्र' ज्ञान-साधना, योग-साधना, मन्त्र-साधना एवं समावेशमयी भक्ति-
साधना—इन सभी में आस्था रखता है ।
मन्त्र विज्ञान के विषय में स्पन्दशास्त्र में मुख्यतः 'सहजविद्योदय स्पन्द निष्यन्द' में
प्रकाश डाला गया है । इसमें कहा गया है—
१. 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञ बल शालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानिव देहिनाम् ॥ २६ ॥ (स्पन्दकारिका)
२. 'तत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः ।
सहाराधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ॥ २७ ॥ (स्पन्दकारिका)
अर्थात् स्पन्दरूप आत्मबल के साथ तद्रूपता प्राप्त करने से प्रत्येक प्रकार के मन्त्र
में सर्वज्ञता, सर्वकर्तृत्वता, पूर्णता, सर्वव्यापकता, अमित तृप्ति, नित्यता, अप्रतिहत
स्वातंत्र्य आदि षडात्मक माहेश्वर बलों का संचार हो जाता है अतः वे इन बलों से अनन्त
परिचय एवं पृष्ठभूमि ८३
शक्तिसम्पन्न हो उठते हैं और मन्त्र उनके समस्त अभीष्टो को उसी प्रकार पूर्ण कर देते हैं
जैसे इन्द्रियाँ ॥
ये मन्त्र शान्तरूप एवं निरंजन (शुद्ध संविद्रूप एवं मायिक उपरागों से शून्य) होकर
आराधक के चित्त के साथ चिदाकाश में विलीन हो जाते हैं । ये समस्त मन्त्र शिवधर्मा
(शिवस्वरूप) हैं ।
ये मन्त्र द्विविध प्रकारक हैं—१. भोगरूप, २. मोक्षरूप । अर्थात् साञ्जन एवं
निरञ्जन ॥
(क) मन्त्र का साञ्जन स्वरूप—(सांसारिक भोगों के रूप में फल प्रदान करने
हेतु प्रयुक्त मन्त्र) उदा० मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण स्तंभन एवं द्वेषण आदि
अभिचार-सिद्धि हेतु, रोग-निवारण हेतु निग्रहानुग्रह हेतु या किसी अन्य सांसारिक
फलेच्छा हेतु प्रयुक्त मन्त्र 'साञ्जन मन्त्र' कहलाते हैं ।
(ख) निरञ्जन मन्त्र का स्वरूप—जिन मन्त्रों को अपने शिवत्व की अभिव्यक्ति
हेतु प्रयुक्त किया जाता है वे मन्त्र मायीय उपरागों, दूषणों, एवं ऐहिक फलाकांक्षाओं से
शून्य होने के कारण 'निरंजन' कहलाते हैं । इस प्रकार मन्त्रों के उपयोग की दो विधियाँ
हुईं १. 'सांजन विधि', २. 'निरंजन विधि' ।
वर्णरचना के रूप में विरचित मन्त्र को ही मन्त्र का स्वस्वरूप मानना असंगत
है—अभिनवगुप्त एवं क्षेमराज कहते हैं—
(क) 'लिपिस्थितस्तु यो मन्त्रो निर्वीर्यः सोऽत्र कल्पितः । (तन्त्रालोक ४.६६)
(ख) 'मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव, न तु विचित्र-
वर्णसंघटनामात्रम् ॥ (शिवसूत्र वि० २-१)
अर्थात् वर्ण समुदाय की विशिष्ट संरचना मात्र 'मन्त्र' नहीं है प्रत्युत् देवता के विमर्श
के कारण प्राप्त सामरस्य युक्त (आराधक का) चित्त ही 'मन्त्र' है—'चित्तं मन्त्रः' (शि.सूत्र)।
(ग) आचार्य उत्पल (स्पन्दप्रदीपिका में) कहते हैं—
'तद् बलं निरावरण चिदुल्लासरूपं परशक्त्याख्यमाक्रम्य अधिष्ठाय मन्त्राः बीज-
पिण्ड-पदनामरूपा मननत्राणधर्मिणः सहजनादशक्त्युद्बोधदीप्तत्वात् सर्वज्ञत्वादिन बलेन
श्लाघा युक्ता मंत्रिप्रयुक्ता अधिकारायानुग्रहादौ प्रवर्तते ॥'
(घ) आचार्य रामकण्ठ ('स्पन्द का०वि०') में कहते हैं—
'शिवस्य परमेश्वरस्यानन्यसाधारणः सर्वज्ञत्वादिर्गुणो सविद्यते येषां ते तथा शिवाद-
भिन्नस्वरूपा' 'शिवधर्मिणाः' ।
(ङ) 'तद्बलं'—'तत्' समनन्तर प्रतिपादितस्वरूपस्य शिवस्य संबंधि 'बलं
सामर्थ्य शक्तिम्' ।
(च) 'आक्रम्य'—उच्चिचारयिषावस्थायां तद्भेदोपपत्या स्वीकृत्य ।
(छ) सर्वज्ञस्य शिवस्य बलेन शक्त्या श्लाघमाना सन्तः यथास्वं प्रतिनियतकार्य-
संपादनस्वाम्यार्थ्यं प्रसरन्ति ॥
८४ स्पन्दकारिका
(ज) यदि मन्त्र को ‘परमेश्वराभेद’ प्राप्त न हुआ तो वे शक्तिहीन रहते हैं—यहाँ
तक कि तिनके को भी टेढ़ा नहीं कर सकते—
‘एते हि अनासादित परमेश्वरा-भेददशा उत्पादविनाशधर्मकवर्णमात्रात्मकाः तृणमपि
कुब्जयितुमशक्ताः’।
‘उक्त बलाक्रमणेन ... वृश्चिकविषाकर्षणान्त परापरस्वकार्यसंपादनाधिकारा प्रतिहत
शक्तयो भवन्ति ॥’
(झ) मन्त्रा नियताधिकारा एव ॥
(ञ) यस्तु स्वस्वभावे एव सुदृढात्मप्रतिपत्तिः तस्य उदयास्तमयज्ञस्य सर्व मन्त्राः
सर्वार्थसाधनाधिकारिणो भवन्ति तत्तदिति कर्तव्यता साहित्य नियमाद्यपेक्षां विना ॥
‘मन्त्र’ और आत्मबल की प्राप्ति का अन्तर्सम्बन्ध—
सारांश—१. पुस्तकों में लिखित मन्त्र (आत्मबल शून्य मन्त्र) निःशक्त होते हैं ।
२. मन्त्र वर्णरचना मात्र नहीं प्रत्युत् मन्त्रदेवता के साथ प्राप्त सामरस्य है । अतः
इस देव-सामरस्य-प्राप्त चित को भी मन्त्र कहते हैं ।
३. ‘मन्त्र’ सर्वज्ञत्वादिशक्तियों से तभी युक्त होते हैं जब वे निरावरणात्मक चिदु-
ल्लास रूप पराशक्ति से अधिष्ठित होते हैं । अन्यथा नहीं क्योंकि ‘मन्त्राश्चिन्मरीचयः’
(‘मन्त्र’ आत्मा की रश्मियाँ हैं)।
४. मन्त्र में चार बातें मुख्य होती हैं—१. ‘बीज’ २. ‘पिण्ड’ ३. ‘पद’ ४. ‘नाम’
और उनका धर्म है (क) ‘मनन’ (ख) ‘त्राण’ ।
मन्त्र का बल है—निरावरण चित् शक्ति का उल्लास अर्थात् पराशक्ति इसी परा-
शक्ति को ग्रहण करके ‘मन्त्र’ सहजनाद शक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त होते हैं । इसी के
कारण वे सर्वज्ञता आदि शक्तियों से शक्तिमान बनते हैं ।
५. ये ‘मन्त्र’ शिव से अभिन्नस्वरूप अर्थात् ‘शिवधर्मी’ हैं और इनमें परमेश्वर शिव
के समस्त सर्वज्ञत्वादि गुण या शक्तियाँ समाविष्ट हो जाती हैं ।
६. जब ये ‘मन्त्र’ आत्मबल (स्पन्द) को प्राप्त कर लेते हैं (अर्थात् आत्मबल को
अपने से अभिन्नस्वरूप में ग्रहण कर लेते हैं) (‘अभेदोपपत्त्या स्वीकृत्य’—रामकण्ठा-
चार्य)—तब वे सर्वज्ञ शिव के बल से श्लाघमान हो जाते हैं और नियत कार्यों को
सम्पन्न करने की सामर्थ्य प्राप्त कर लेते हैं ।
७. परमेश्वर से तादात्म्य न प्राप्त कर पाने पर ये मन्त्र एक तुच्छ तिनके को भी
टेढ़ा नहीं कर सकते ।
८. जो साधक स्वस्वभाव में दृढ़ रहकर मन्त्रों की सिद्धि करते हैं वे नियतकार्यों
को ही नहीं प्रत्युत् परमेश्वरवत् समस्त कार्यों को निष्पादित करने में समर्थ होते हैं ।
९. ‘त्रिकसार’—‘वर्णातीत निराकार परम तत्त्व का अवबोध हो जाने पर ‘मन्त्र’
मन्त्राधियों के साथ साधक के किंकर बन जाते हैं—
परिचय एवं पृष्ठभूमि ८५
विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविग्रहे ।
किंकरत्वं तु गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह ॥
१०. 'हंसपारमेश्वर' — 'केवल वर्णरूप मन्त्र पशुभाव में स्थित है सुषुम्णामार्ग से
उच्चारण करने पर वे पशुपति बन जाते हैं
'पशुभावे स्थिताः मन्त्राः केवला वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णेध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥
सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ।। (स्पन्द का० २५)
११. 'मन्त्र' शाक्त मार्ग में सफल होते हैं—'एष शाक्तो मार्गोऽत्र च मन्त्राणां
साफल्यम्' (स्पन्दप्रदीपिका उत्पलाचार्य) ।।
१२. 'तत्त्वरक्षाविधान' में कहा गया है—'आत्मसंवित् या परमपद में मन्त्र का
प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह शक्ति एवं क्रिया से रहित है । शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि मन्त्र का जप वहीं सफल होता है ।'
१३. 'श्रीवैहायसी'—'संधिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि से बोधित जप करना चाहिए ।
यथा सूत्र में मणिग्रथित होते हैं तद्वत् शक्ति के ताने-बाने से निर्मित ही मन्त्राक्षरों का
ध्यान करना चाहिए । वह 'शक्ति' परम व्योम में अवस्थित रहती है और परामृत समृद्ध
है । उक्त पद्धति से जप करने पर ही 'मन्त्र' स्वस्वरूप को प्रकट करता है और तब अपने
को आच्छादित नहीं करता'—
'विष्णुवक्तं जपं कुर्यान्नादोर्ध्वध्वनिबोधितम् ।
मन्त्राक्षराणि मणिवच्छक्तौ प्रोतानि भावयेत् ।।
तामेव च परे व्योम्नि परामृत बृंहितम् ।
दर्शयत्यात्मसद्भावमेवं मन्त्रो हृतिं विना ।।'
१४. 'श्री कालपरा' में कहा गया है—'शब्द नादात्मक हैं अतः उसके साथ
प्रत्यय संवित्-संलग्न रहकर बढ़ाती है । मन्त्र बोध के स्वरूप में स्थित संवित् अभिन्न है
अतः वह आत्मबोध भी करा देती है'—
शब्दो नादात्मकस्तस्मात् प्रत्ययेनोपबृंहितः ।
मन्त्रबोधस्वरूपस्थमभिन्नो बोधयत्यपि ।।
१५. 'संकर्षणसूत्र' में कहा गया है—'चिद्रूपता स्वात्मैकनिष्ठ है । भावाभाव
उसकी दशाएं एवं परिष्कार हैं । वह स्वसंवेदन संवेद्य है । प्रकृति से अतीत भी वही है
और प्रकृति का विषय भी वही है । यही मन्त्रों का प्रत्ययात्मक कारण है । मन्त्र बाहर एवं
भीतर वर्णसप से प्रकट होते हैं । वे शाश्वत पद रूप में होते हैं । वे मनुष्य के कर चरण
आदि के समान हैं । वीर्य का योग होने पर किसी भी काल में प्रयोग करने पर वे सिद्ध
होते हैं ।'—
'स्वात्मैकनिष्ठं चिद्रूपं भावाभावपरिष्कृतम् ।
स्वसंवेदनसंवेद्यं प्रकृत्यातीतगोचरम् ।।
८६ स्पन्दकारिका
इयं योनिः स्मृता विप्र मन्त्राणां प्रत्ययात्मिका ।
ते मन्त्रा वर्णरूपेण सबाह्याभ्यन्तरोदिताः ॥
नैष्कालिक पदावस्थाः करणानीव देहिनाम् ।
प्रयुक्ताः सर्वकालेषु सिद्ध्यन्ते वीर्ययोगतः ॥'
१६. 'जय संहिता' में कहा गया है—'एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में
उदित होकर एकहो जाता है । तब उस जप को लक्षसंख्या से अधिक समझना
चाहिए'—
'एकस्य मन्त्रनाथस्याप्यन्तर्बाह्योदितस्य च ।
यदैक्यं तं जपं विद्धि लक्षसंख्याधिकं मुने ॥'
(एवं शुद्धबोधात्मकत्वेन अन्तर्बाह्योदयादेकोऽपि जपो लक्षसंख्याकः'—'स्पन्द-
प्रदीपिका') ।
१७. पुस्तक में लिखे मन्त्रों का जप इन्हीं कारणों से निषिद्ध है और ऐसा मन्त्र-
जापक चाण्डाल होता है—
'पुस्तके लिखितान्मन्त्रा दृष्ट्वा जपति यो नरः ।
स जीवन्नेव चाण्डालो,—तथा—'मृतःश्वा चाभिजायते ॥'
१८. 'मन्त्र' समस्त देवशक्तियों से युक्त होते हैं—
यथा—'श्रीविद्या' । 'श्रीविद्या' में
(१) 'वाग्भवकूट'—'क ए ई ल' ।
अ (श्रीकण्ठ) क (कोधीश) ए (कोणत्रय = योनि) ई (लक्ष्मी) 'अ' (अनुत्तर) के
साथ लं (मांस) ।
(२) 'कामराजकूट'—ह, स, क, ह, ल ।
ह (शिव) स (हंस) क (ब्रह्मा) ह (वियत्) ल (शक्र) अ (अक्षर) ।
(३) 'शक्तिकूट'—शिव (ह) वियत् (ह) के बिना 'कामराजकूट । शक्तिकूट कहा
जाता है । प्रत्येक कूट के अन्त में एक-एक हृल्लेखा 'ह्रीं' अन्त में जोड़ लेना चाहिए ।
('वरिवस्यारहस्यम्') ।
(४) 'ह्रीं' (हृल्लेखा) में 'ह' (व्योम) र (अग्नि) ई (वामलोचना) बिन्दु (.)
अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मनी । बिन्दादि ९ की
समष्टि 'नाद' कहलाता है ।
१९. 'वरिवस्यारहस्यम्'—मन्त्र के वर्णों का उच्चारण करते हुए ५ अव-
स्थाओं, ६ शून्यों, ७ विषुवों, ९ चक्रों एवं मन्त्र के अर्थ का चिन्तन करना चाहिए ।
यही 'जप' है—
एवमवस्थाशून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्च षट् सप्त ।
नव च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ॥ (वरि०र०)
परिचय एवं पृष्ठभूमि ८७
(क) ५ अवस्थायें—जागरण, स्वप्न, सुषुप्ति, तुरीय, तुरीयातीत ।
(ख) ६ शून्य—तृतीयकूट के रेक, बिन्दु, रोधिनी, नादान्त, व्यापिका एवं उन्मनी
में महाशून्य ॥
(ग) ७ विषुव—मन्त्रविषुव । नाडी विषुव । प्रशान्तविषुव । शक्तिविषुव ।
तत्त्वविषुव ।
(घ) ९ चक्र—चक्रभावन—१. सकल, २. निष्कल, ३. सकल-निष्कल ।
(१) अकुल सहस्रार (२) मूलाधार (३) स्वाधिष्ठान (४) मणिपूरक (५) अनाहत
(६) विशुद्धाख्य (७) आज्ञा (८) सूक्ष्म जिह्वा (९) बिन्दु । (त्रैलोक्यमोहनादि ९ चक्र) ।
'शून्यषट्कं सुरेशानि अवस्थापञ्चकं पुनः ।
विषुवत्सप्तरूपं च भावयन्मनसा जपेत् ॥'
(ङ) मन्त्रार्थ—भावार्थ, संप्रदायार्थ, निगर्भार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ, महातत्त्वार्थ,
नामार्थ, शब्दरूपार्थ, नामैकदेशार्थ, शाक्तार्थ सामरस्यार्थ, समस्तार्थ, सगुणार्थ, महा-
वाक्यार्थ आदि ।
('पञ्चदशी' के उतने ही अर्थ हैं जितने उसके वर्ण हैं ।)
'अहं'—'अहं' भी एक मन्त्र है और उसका अर्थ निम्नांकित है—
अहमित्येकमद्वैतं यत्प्रकाशात्मविभ्रमः ।
अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः ॥
हकारोऽन्त्यः कालरूपो विमर्शाख्यः प्रकीर्तितः ।
अनयोः सामरस्यं यत् परस्मिन्ब्रह्मणि स्फुटम् ॥'
'अ' = शिव । 'ह' = 'शक्ति'
'अहकारौ शिवशक्ती शून्याकारौ परस्पराश्लिष्टौ ।
स्फुरणप्रकाशरूपावुपनिषदुक्तं परं ब्रह्म ॥' (वरि०२० २।६९)
'अहं'—'प्रकाश' + 'विमर्श' का सामरस्य ॥ 'स्पन्दकारिका' में—'स्वबल'
'आत्मबल' शब्दों का बार-बार प्रयोग किया गया है । यही बल 'मन्त्र' की आत्मा है
जिसका स्पन्द० में अनेक बार प्रयोग किया गया है—
१. अपित्वात्मबलस्पर्शात् पुरुषस्तत्समो भवेत् ॥ ८ ॥ (स्पन्द का०)
२. स्वबलोद्योगभावितः (३६) (स्पन्दकारिका) ।
३. 'तत्तथा बलमाक्रम्य' (३७)
४. स्वात्मन्यधिष्ठानात् (३९)
५. 'स्वयमेवावबोत्स्यते' (४३) (स्पन्द का०) ।
६. तदाक्रम्य बलं मन्त्राः (२६) (स्पन्द का०) ।
'स्वभाव' 'तदात्मतापत्ति' भी आत्मा के वाचक हैं—
'स्वभावादुपलब्धृतः' (इ) 'स्वभावमवलोकयन्' (११) (स्पन्द का०) ।
८८ स्पन्दकारिका
'तदाक्रम्य बलं मन्त्रा (३१) इयमेवात्मनो ग्रहः (३२) (स्पन्द का०) ।
२०. मन्त्रदेवता और साधक के साथ उसका तादात्म्य—'स्पन्दकारिका' (३१)
में कहा गया है कि ध्याता साधक के चित्त में ध्येय देवता का प्रत्यक्ष साक्षात्कार इसी को
कहते हैं कि ध्याता के चित्त की मन्त्रोच्चारण करने की इच्छा मात्र से तत्काल उसका
देवता के साथ तादात्म्य हो जाता है—
अयमेवोदयस्तस्य ध्येयस्य ध्यायिचेतसि ।
तादात्मतासमापत्तिरिच्छतः साधकस्य या ॥ (३१)
'तादात्म्यं तत्स्वभावत्वप्राप्तिः मन्त्रदेवतया सह साधकस्य मन्त्रोच्चारणेच्छया
संपादिता ।' (भट्टकल्लटः 'स्पन्दसर्वस्व')
२१. मन्त्रसाधना एवं अमृत प्राप्ति, आत्मग्रह, निर्वाण दीक्षा, शिवसद्भाव—
'स्पन्दकारिका' में कहा गया है—
इयमेवामृतप्राप्तिरयमेवात्मनो ग्रहः ।
इयं निर्वाण दीक्षा च शिवसद्भावदायिनी ॥ (३२)
[११] मन्त्र और नाद
'मन्त्र' अनाहतनाद का स्थूल विग्रह है । समस्त मन्त्रों में यह शब्द ब्रह्मस्वरूप
'नाद' माला की मनकाओं से ग्रथित सूत्र की भाँति है । यही कारण है कि 'नाद' (उद्गीथ,
प्रणव, ओंकार, ॐ) को परम मन्त्र कहा गया है । 'विज्ञानभैरव' में मन्त्र के जप को भी
नादात्मक कहा गया है—
भूयोभूयः परे भावे भावना भाव्यते हिया ।
जपः सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य ईदृशः ॥ (१४२)
'नाद' क्या है? 'शक्ति' ही नाद है—
'यत्किंचिन्नादरूपेण श्रूयते शक्तिरेव सा' (हठयोग० प्र० ४।१०२) १
नाद का प्रभाव— १. पापक्षय २. चित्त एवं प्राण का निरंजन में विलय
१. सदानादानुसंधानात् क्षीयन्ते पापसंचयाः ।
निरंजने विलीयेते निश्चितं चित्तमारुतौ ॥ (हठयोग० ४।१०५)
२. शंखदुन्दुभिनादं च न शृणोति कदाचन ।
काष्ठवज्जायते देह उन्मन्यावस्थया ध्रुवम् ॥ (४।१०६)
नाद— १. काष्ठवत् स्थैर्य २. उन्मनी (असंप्रज्ञात समाधि) ३. सर्वावस्थाविनिर्मुक्ति
४. सर्वचिन्ताक्षय ५. मृतवत् अवस्थान ६. काल वंचन ७. कर्म-मुक्ति ८. पञ्चविषयों से
मुक्ति ९. जाग्रत् स्वप्न-सुषुप्ति आदि से मुक्ति १०. समस्त द्वन्द्व-सुखदुःख, शीत-ऊष्ण,
मान-अपमान आदि से मुक्ति ११. जाग्रत् में भी सुषुप्ति १२. श्वासोच्छ्वास विवर्जित
१३. असम्प्रज्ञात समाधि ।
१. हठयोगप्रदीपिका (उप० ४/१०५-११२) ।
परिचय एवं पृष्ठभूमि ८९
मन्त्र और परमेश्वर के साथ अभेद विमर्शन—क्षेमराजाचार्य—शिवसूत्र-
विमर्शिनी' (२।१)—
आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि चूँकि 'चित्त' परतत्त्व का चिन्तन करता है—
विमर्शन करता है अतः उसे 'चित्त' कहते हैं और यही चित्त उस परमेश्वर के साथ
तादात्म्यभावापन्न होकर विमर्शन करता है अतः (मनु अवबोधने—'मन्त्र'; मन्त्र = तृ
'पालने' = मं + त्र) इस विमर्श रूप संवेदन को ही 'मन्त्र' कहा जाता = है। चूँकि चित्त
विमर्शन रूप है अतः 'चित्त' भी मन्त्र कहा जाता है—'चित्तं मन्त्रः ।२।१।। चेत्यते
विमृश्यते अनेन परं तत्त्वम् इति ।'¹
चित्तं, पूर्णस्फुरत्तासतत्त्वप्रासाद प्रणवादिविमर्शरूपं संवेदनम्, तदेव मन्त्र्यते गुप्तम्,
अन्तर भेदेन विमृश्यते परमेश्वररूपम् अनेन इति कृत्वा मन्त्रः ।' सारांश यह कि—
परमात्मा के साथ अपनी अभेदापत्तिपूर्वक परमात्मस्वरूप का विमर्शन, तत्स्वरूप
आत्मस्फुरत्ता ही 'मन्त्र' है।
मन्त्र के दो प्रधान अंग—मन्त्र के दो प्रसिद्ध एवं मुख्य अंग—आचार्य क्षेमराज
'शिवसूत्र विर्शिनी' में ही मन्त्र के दो प्रधान संघटक तत्त्वों पर भी प्रकाश डालते हैं और
उनकी नूतन व्याख्या करते हैं। ये निम्न हैं—
१. मनन = 'परस्फुरत्तात्मकमननधर्मार्थमता,²
२. त्राण = 'भेदमयसंसार-प्रशमनात्मक त्राणधर्मता च अस्य निरुच्यते ।³
मन्त्र के दो पक्ष—१. मननात्मक, २. त्राणात्मक ॥
'मन्त्र' की चित्त के साथ एकात्मता हो जाने पर चित्त परमेश्वर के साथ सामरस्य हो
जाने से चित्त भी 'मन्त्र' है—'मन्त्र-देवता विमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्त-
मेव मन्त्रः' विचित्रवर्णसंघट्टनमात्र मन्त्र नहीं है—'न तु विचित्रवर्णसंघट्टनमात्रकम् ।'⁴
'शिवसूत्र' में 'मन्त्र' शाक्तोपाय है। इसीलिए शिवसूत्रकार ने 'मन्त्र' की व्याख्या
द्वितीयोन्मेषः 'शाक्तोपाय' के अंतर्गत की है।
'संकेतपद्धति' में मन्त्र को मात्र मनन + त्राण लक्षणों के आधार पर परिभाषित
करते हुए कहा गया कि—मननात्त्राणधर्माऽसौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तिताः ।' दीपिकाकार
(योगिनीहृदयदीपिका) ने भी इसी की पुष्टि की—'मननात्त्रायन्ते साधकमिति मन्त्राश्चि-
न्मरीचयः ।' (यो० हृ० पटल २।१) 'योगिनीहृदय' में पराशक्ति को भी 'मन्त्र' का
अभिधान दिया गया है।
ज्ञातृज्ञानमयाकारमननान्मन्त्ररूपिणी ।
तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिस्तु मातृका ॥ (मन्त्रसंकेतः २०)
मन्त्र के अवयव (प्रणव की कलायें)
┌─────┬─────┬─────┬─────┬─────┬─────┬─────┐
बिन्दु नाद अर्धचन्द्र निरोधिनी नादान्त व्यापिनी समना उन्मना
───────────────────────
१-४. शिवसूत्रविमर्शिनी ।
९० स्पन्दकारिका
'अहंकार' मन्त्र और शिवशक्ति—अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ (विज्ञानभैरव ८८
की व्याख्या)—
१. बुद्धि भूमि से ऊपर अहंकार भूमि है। अहंकार—समस्त जगत् में अहन्ता
व्याप्त । २. अहंकार भूमि का ज्ञान—मुक्ति ३. अहंकार ही संवित्स्वरूप 'पराशक्ति' है
और यही 'ज्ञानशक्ति' भी है। 'मन्त्रशक्ति' के रूप में भी प्रतीत होने लगती है। ४.
शिव एवं शक्ति से अभिन्न 'अहंकार' ही 'मन्त्र' है। यही अहंकार अपरिमित अहन्ता
के रूप में 'पूर्णाहन्ता' के रूप में विकसित हो जाता है।
यहाँ अहंकार सांख्य सम्मत अहंकार से पृथक् है क्योंकि वहाँ क्रम इस प्रकार
है—मन-अहंकार—बुद्धि (आरोह क्रमानुसार) । यहाँ 'विमर्शदशा' के अर्थ में ही
'अहंकार' प्रयुक्त है। प्रकाशरूप शिव की इसी विमर्शदशा में समस्त जगत् अन्तर्लीन
है। विमर्श शक्ति—अखिल जगत् का उन्मीलन ।। 'विश्वाहन्ता' (विरूपाक्षपञ्चाशिका) =
'पूर्णाहन्ता' का मन्त्र से सम्बन्ध है।
योगिनी हृदय एवं मन्त्र—'योगिनी हृदय' में कहा गया है कि इन्द्रियों को संयमित
करके आन्तर नाद की भावना करना ही 'जप' है। जप तो मन्त्र का होता है अतः यदि इस
अनाहत नाद का ही जप जप है तो सिद्ध हुआ कि 'मन्त्र' अनाहत नाद है—
संयमेन्द्रिय संचार प्रोच्चरेन्नादमान्तरम् ।
एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्य जपो जपः ॥
हंसः मन्त्र सोऽहं मन्त्र—जीव दशा का स्वाभाविक मन्त्र—'हंसः हंसः' (अजपा
गायत्री) जब सुषुम्णा नाड़ी में जब प्राण हृदयाकाश से ऊपर की ओर आरोहण करता है
तब 'हम्' वर्ण उत्पन्न होता है और जब वह 'द्वादशान्त' से नीचे की ओर अवरोहण
करता है (उतरता है) तब उसकी अपान अवस्था से 'सः' वर्ण उत्पन्न होता है। इन दोनों
वर्णों के उच्चारण से प्राणी 'जीवित' कहलाता है। परिमित अहन्ता में स्थित यह जीव
अहर्निश 'हंसः हंसः' मन्त्र का जप करता रहता है—
सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत् पुनः ।
हंस हंसेत्यमुं मन्त्रं जीवा जपति नित्यशः ॥ (विज्ञानभैरव ५३)
महेश्वरानन्द—सोम और सूर्य (हंकार + सःकार) के अस्त एवं गमन के काल के
मध्यवर्ती क्षण का उद्धार करना चाहिए—'अहं सः' के विमर्श का उदय = अहं सः =
'सोऽहं' मन्त्र बन जाएगा। 'मैं वही शिव हूँ' की प्रत्यभिज्ञा (संवित् का स्वस्वरूप)
संवित्क्रम में—'अहं सः' 'सोऽहं' मन्त्र बन जाएगा।
'मध्यत्रुटिखुटितव्याऽस्तंगतयोः सोमसूर्ययोस्तर्हि ।' (५६)
शैवागमों में षडध्व का क्रम एवं मन्त्र—'वर्ण' 'पद' 'मन्त्र' 'कला' 'तत्त्व'
भुवन। यह जगत् वाचक (ग्राहक) के रूप में—'पर' 'सूक्ष्म' एवं 'स्थूल' रूप में
क्रमशः—'वर्ण' 'मन्त्र' एवं 'पद' के रूप में विभक्त हो जाता है।
जयरथ 'तत्स्वरूपं जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः (१।९०) की व्याख्या में कहते
परिचय एवं पृष्ठभूमि ९१
हैं कि शिव के परावाक्स्वभाव, अनाहतनादमय हो वह शक्तिमूलक एवं नादात्मक
विशिष्ट वर्ण-संरचना 'मन्त्र' है ।
मन्त्र और देवता तथा जगत—'वातुलशुद्धाख्यतन्त्र' (५ पटल) में कहा गया है
कि मन्त्र देवता एवं जगद्रूप है—मन्त्रस्तु देवता रूपं मन्त्ररूपमिदं जगत्' (५।१) ।
मन्त्र का स्वरूप क्या है ?
'मननं सर्वपक्षेषु त्राणं संसारसागरात् ।
मननत्राणधर्मत्वाद् 'मन्त्र' इत्यभिधीयते ।।' (५।७)
मन्त्र का प्रभाव—शिव-साक्षात्कार—
आह्वानतः स्वनाम्ना तु जनः सन्निहितो यथा ।
तथा मन्त्रप्रयोगेण शिवः सन्निहितो भवेत् ।। (५।८)
क्या 'मन्त्र' वर्ण-रचित पदों की समष्टि है?
आचार्य भास्करराय कहते हैं—१. 'माता, विद्या, चक्र, स्वगुरु एवं साधक' इन
पाँचों के भेद का अभाव ही मन्त्र का 'कौलिकार्थ' है ।
इत्थं माता विद्या चक्रं स्वगुरुः स्वयं चेति ।
पञ्चानामपि भेदाभावो मन्त्रस्य कौलिकार्थोऽयम् ॥ (२।१०२)
२. पराभट्टारिका (इष्टदेवी) विद्या, कुण्डलिनी एवं साधक एक दूसरे से अभिन्न
हैं—यह विमर्श श्रीविद्या का 'रहस्यार्थ' है ।
३. 'चक्र' विद्या के अक्षरों से निर्मित होने के कारण विद्या से अभिन्न है । (९६)
४. अवाङ्मनसगोचर, तत्त्वातीत, महत्तम, अणुतम, व्योमातीत, विश्वाभिन्न
चिदानन्द ब्रह्म में अपनी आत्मा का नियोजन ही मन्त्र का 'महातत्त्वार्थ' है । (१०९)
५. प्रत्येक मन्त्राक्षर में अचिन्त्य शक्ति है तथा अक्षरों एवं वामा, इच्छा तथा अन्य
शक्तियों में अभेद है यह विमर्श ही मन्त्र का 'शाक्तार्थ' है । (११८)
६. शिव एवं शक्ति के सामरस्य के कारण 'ब्रह्म हीं शिव एवं शक्ति दोनों ही
हैं'—यह मन्त्रविद्या का सामरस्यार्थ है । (१२०)
मन्त्र के अंग
(क) आन्तरिक अंग—
मन्त्र के वर्णों की संख्या, उद्धार, मात्रा (काल) उच्चारण, स्थान, प्रयत्न, रूप,
स्थितियाँ आकार आदि ।
(ख) मन्त्र के बाह्यांग—ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग, बीज, शक्ति, कीलक,
न्यास, ध्यान, नियम एवं पूजा । (वरिवस्यारहस्यम्ः २ अंश।१६१)
मन्त्रोत्पत्ति—'कामकला बीज'—मूल मन्त्र का विकास और मूल—शरीर के
आन्तरिक एवं बाह्यांगों का विकास (२।१६४)
विद्या (मन्त्र) एवं देवी में अभेद है । (वरि० २।९१)
९२ स्पन्दकारिका
जप के ५ अंग → (मन्त्रोच्चारण के समय—) जपांग—
अवस्था ५ शून्य ६ विषुवत् ७ चक्रों का स्मरण ९ मन्त्रार्थचिन्तन
मन्त्र और नाद—मूलाधार से उठने वाला 'नाद' मन्त्राक्षरों के मध्य माला में
पिरोये सूत्र की भाँति होता है—
आधारोत्थित नादो गुण इव परिभाति वर्णामध्यगतः (२।२२)
मन्त्रजप के समय मन्त्र-विस्तार—
प्रथमकूट = मूलाधार से आरब्ध प्रलयाग्निवतः क ए ई ल ह्रीं ।
द्वितीयकूट = अनाहत से आरब्ध एवं उसके आगे कोटिसूर्यवत्—
ह स क ह ल ह्रीं ।
तृतीयकूट = आज्ञा चक्र से आरब्ध एवं ललाट के मध्य तक कोटिचन्द्र के समान—
मन्त्र संस्क्रिया के १० भेद होते हैं—जनन, जीवन, ताडन, बोधन, अभिषेक
विमलीकरण, तर्पण, दीपन, गुप्ति आदि ।
'मन्त्र' और उसके विभिन्न अर्थ—
१. मननत्राणधर्माणो 'मन्त्राः'।
२. मननात् त्राणधर्मासौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः ।
३. चित्तं मन्त्रः । (शि०सू० ३।१)
४. संविद्देव्य मन्त्रः । (क्रमकेलि)
५. देव्येय मन्त्रः । (भूतिराज)
६. चिदग्निसंहार मरीचिमन्त्रः संविद्विकल्पान्गलपयन्नुदेति । (स्तोत्रभट्टारक)
७. वर्णात्मको न मन्त्रो दशभुजदेहो न पञ्चवदनोऽपि ।
संकल्पपूर्वकोटौ नादोल्लासो भवेन्मन्त्रः ॥'
८. नास्ति नादात् परो मन्त्रः । (राजभट्टारक)
९. मन्त्रः पदार्थांदियस्रंभात्मा परामर्शः । (महार्थमंजरी परिमल)
१०. तद्विमर्शस्वभावा हि सा वाच्या मन्त्रदेवता । (महासंवित् समासत्रा)
११. प्रमातृभूमिगता मन्त्राः । (मतंग टीका)
१२. मान्त्री शक्तिं मनसि महती देवतेत्याद्रियते । (संविदुल्लास)
१३. 'अग्निरूपा मन्त्राः' 'मन्त्रा न मीमांस्या' । (रौरवागम)
१४. सर्वे वर्णात्मकाः मन्त्राः । (तन्त्रसद्भाव)
१५. मन्त्रा वर्णात्मका सर्वे । (सर्ववीर)
१६. ते मन्त्रा वर्णरूपेण सबाह्याभ्यन्तरोदिताः । (संकर्षणसूत्र)
परिचय एवं पृष्ठभूमि ९३
१७. पशुभावे स्थिता मन्त्रा केवलं वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णेध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ।। (हंसपारमेश्वर)
१८. बीजपिण्डादिकं सर्वं संविदः स्पन्दनात्मताम् ।
विदधत परसंवित्तावुपाय इति वर्णितम् ।।
एकानुसंधान बलाज्जाते मन्त्रोदयेऽनिशम् ।
तन्मन्त्रदेवता यत्नात् तादात्म्येन प्रसीदति ।।
—अभिनवगुप्त : तन्त्रालोक (७।२-५)
'मन्त्र' वीर्यवान् होते हैं । 'संवित्स्तोत्र' में इस 'मन्त्रवीर्य' के विषय में कहा
गया है कि—
आदिमान्तिगगृहीतवर्णराश्यात्मिकाहमिति या स्वतः प्रथा । मन्त्रवीर्यम् ।।'
१९. त्रिकहृदय में कहा गया है—'अर्थस्य प्रतिपत्तिर्या ग्राह्यग्राहकरूपिणी । सा
एव मन्त्रशक्तिस्तु वितता मन्त्रसन्ततौ ।।'
२०. किंकरत्वं च गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह । (त्रिकसार)
२१. तन्त्रालोक—समस्त मन्त्र वीर्यबलोपेत हैं ।
२२. मन्त्र एवं मांत्रिक में अभेद आवश्यक है क्योंकि इस अभेदात्मकता के बिना
मन्त्र कभी सिद्ध नहीं होते—पृथङ्मन्त्रः पृथङ्मन्त्री न सिद्ध्यति कदाचन ।
—'श्रीकण्ठीसंहिता'
२३. उच्चार्यमाणा ये मन्त्रा न मन्त्राश्चापि तान् विदुः ।
२४. शक्तौ नियोजयेन्मन्त्र जपस्तु सफलीभवेत् ।। (तत्वरक्षाविधान)
२५. 'विषुवत्कं जपं कुर्यात्' ।
२६. एकस्य मन्त्रनाथस्य अन्तर्बाह्योदितस्य च ।
यदैक्यं तं जपं विद्धि ।। (सुभगोदयवासनाः १४।६९)
२७. उच्चार्यमाणा ये मन्त्रा न मन्त्राश्चापि तान्विदुः ।
मोहिता देवगंधर्वा मिथ्याज्ञानेन गर्विताः ।। (सर्वज्ञानोत्तर)
२८. 'मन्त्र' शक्ति के बिना व्यर्थ हैं—'तन्त्रसद्भाव'—
'मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरव्यया ।
तया हीना वरारोहे निष्फलाः शरदभ्रवत् ।।'
२९. मन्त्र के तत्त्व—१. देवतत्त्व २. प्राणतत्त्व ३. बिन्दु तत्त्व ४. ज्ञान तत्त्व ५.
शक्तितत्त्व ६. योगिनी तत्त्व (कामधेनु तन्त्र) ।।
३०. मन्त्र के स्थान—१. सकल २. निष्कल ३. सूक्ष्म ४. सकल निष्कल ५.
कलाभिन्न ६. कलातीत ।
३१. चैतन्यशून्य मन्त्र निरर्थक होते हैं—
चैतन्यरहितं मन्त्रं यो जपेत् स च पापकृत् ।
मन्त्राश्चैतन्यसंहिताः सर्वसिद्धिकराः स्मृताः ।। (शाला० ९।१०३)
९४ स्पन्दकारिका
मन्त्र—अपने तात्त्विक स्तर पर वर्ण या अक्षर नहीं है प्रत्युत् शक्ति की नादात्मक
अभिव्यक्ति है । इसीलिए इन्हें शिवात्मक कहा गया है—‘मन्त्रावर्णात्मिका सर्वे वर्णा सर्वे
शिवात्मकाः ।’ अर्थात् समस्त मन्त्र वर्णात्मक है किन्तु मन्त्रों के अवयव वर्ण स्वयं में
शिवात्मक हैं । इस प्रकार समस्त मन्त्र भी शिवात्मक हैं ।
प्रणव रूप जो मूलमन्त्र है उसके १२ अवयव निम्नांकित हैं—
अकारश्च उकारश्च मकारो बिन्दुरेव च ।
अर्धचन्द्रो निरोधी च नादो नादान्त एव च ॥
कौण्डली व्यापिनी शक्तिः समना श्रेति सामयाः ।
निष्कलं चात्मतत्त्वं च शक्तिश्चैव तथोन्मना ॥१
मन्त्रों का मूल स्रोत (योनि) ‘ज्ञानशक्ति’ है—
ज्ञानशक्तिः परासूक्ष्मा मातृकां तां विदुर्बुधाः ।
सा योनिः सर्वमन्त्राणां सर्वत्रार णिवत्स्थिता ॥
यह ‘ज्ञानशक्ति’ मन्त्रों के अवयवभूत वर्णों का भी आत्मस्वरूप है—इसीलिए इसे
‘मातृका’ भी कहा गया है—
‘ततोऽष्टविधभेदेन पञ्चादशवर्णरूपिणी ।
(ज्ञानशक्तिः) परा सूक्ष्मा मातृका तां बिदुर्बुधाः ॥’२
परावाक् को परमेष्ठी परमशिव का परमन्त्रात्मक विमर्श स्वरूप ‘हृदय’ कहा गया
है । ‘मन्त्र’ ही उसका हृदय है । विमर्श शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई ‘मन्त्र’ नहीं है और
यही मन्त्र परमेष्ठी शिव का हृदय है—‘सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकाला विशेषिणी । सैषा
सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥’३
मन्त्र का यथार्थ स्वरूप है—‘अहंविमर्श’ । उच्चतम भूमिकावस्थित विमर्शमय
शब्द ‘परावाक्’ है । ‘मनु अवबोधने’ ‘तृ पालने’ धातु से मन्त्र शब्द निष्पन्न हुआ ।
‘शिवसूत्रविमर्शिनी’ (२.१) में कहा गया है कि—विचित्रवर्णों के संघट्टन मात्र को
‘मन्त्र’ नहीं कहते प्रत्युत् मन्त्र के देवता का निरन्तर विमर्श करते रहने से प्राप्त साधक
चित्त का अपने देवता के साथ जो तादात्म्यभाव है वही है ‘मन्त्र’—‘मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन
प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव मन्त्रः न तु विचित्रवर्णसंघट्टनमात्रम् (शि०सू०वि०)।
‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी’ (१.५.१४) में मन्त्र को विमर्शनात्मा कहा गया है—
‘मन्त्रश्च विमर्शनात्मा’ विमर्शात्मक आत्मस्फुरण परममन्त्र है और इसका स्वस्वरूप है—
‘अहं परामर्श’ । यह ‘अहंविमर्श’ शुद्धाशुद्ध द्विविध प्रकारक है । ‘शुद्ध अहं विमर्श’ ही
मन्त्र है क्योंकि मन्त्र आत्मा की चिद्रश्मि ही मन्त्र है—‘मन्त्राश्चिन्मरीचयः । विमर्श
(आत्मस्पन्दन) ही प्रत्येक भाव का हृदय है और तद्रूप है ‘मन्त्र’ ।
शब्द, मन्त्र एवं ओंकार तत्वतः अभिन्न हैं ।
१-२. नेत्रतन्त्र । ३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा अ० ४ ।