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सर्वकोश
स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 519 में से

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पृष्ठ 76

परिचय एवं पृष्ठभूमि ७५
स्वात्मस्वरूप ही तो परमात्मा है अतः किसी उपाय की सार्थकता क्या है? नित्य,
स्वप्रकाश, निरावरण तत्त्व स्वात्मस्वरूप की प्राप्ति के लिए उपाय की क्या आवश्यकता
है ? ‘स्वात्मस्वरूप में लीन होना’—भी निरर्थक है क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य (प्रवेश
करने वाले) की सत्ता ही नहीं है । जगत् चिन्मय है—चिन्मात्रसार है । यह देश, काल,
उपाधि, आकृति, से परे, शब्दागम्य, प्रमाणागम्य, स्वतन्त्र, आनन्दघन यह स्वात्मस्वरूप
सभी सत्ताओं का केन्द्र है । मैं इस स्वात्म स्वरूप से भिन्न नहीं हूँ । इस अहमात्मक
स्वात्मस्वरूप में ही यह समस्त जगत् प्रतिबिम्बित हो रहा है । इस प्रत्यभिज्ञा के उदित
होने पर साधक नित्योदित परमात्मस्वरूप में प्रविष्ट हो जाता है—
१. अनन्यचेताः प्रत्यन्ते परव्योमवपुर्भवेत् ॥ (वि०भै० ४१)
२. अतश्च तन्मयं सर्वं भावयन् भवजिज्जनः (वि० भै० ९७)
३. बुद्धिं निस्तिमितां कृत्वा तत्तत्त्वमवशिष्यते ॥ (वि० भै० ९९)
४. क्षोभशक्ति विरामेण परा संजायते दशा । (वि० १०९)
५. तत्र-तत्र शिभावस्था व्यापकत्वात् क्व यास्यति । (वि० भै० ११३)
६. सर्वत्र भैरवो भावः समान्येष्वपि गोचरः ।
न च तद्व्यतिरेकेण परोऽस्तीत्यद्वया गतिः ॥ (१२१ वि० भै०)
इस उपायशून्य 'अनुपाय' में मन्त्र, पूजा, ध्यान एवं चर्या आदि सभी साधन व्यर्थ
हैं क्योंकि—‘उपायजालं न शिवं प्रकाशयेत्' ।
'त्रिक दर्शन' में 'बंधन' एवं 'मुक्ति' तथा मुक्ति के उपायों के संदर्भ में भी नव्य
दृष्टि प्रस्तुत की गई है यथा—
'बंधन' परमात्मा का अवरोहणात्मक व्यापार है । आत्मा का सम्यक् ज्ञान 'मुक्ति'
है और अज्ञान ही 'बंधन' है—
क) शिवजीवयोरभेद एव (मुक्तिः) उक्ता (आचार्य क्षेमराज) ।
ख) एतत्तत्त्वपरिज्ञानमेव मुक्तिः (आचार्य क्षेमराज) ।
ग) एतत्तत्त्वापरिज्ञानमेव बंधः (आचार्य क्षेमराज) ।
'मालिनीविजयोत्तर' तन्त्र में 'मल' को ही 'अज्ञान' एवं 'संसारांकुर कारण' कहा
गया है—'मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुरकारणम् ।'
समावेश के पाँच भेद—
१. जाग्रत्स्वप्नादिभेदेन सर्वाविशक्रमो बुधैः ।
पञ्चभिस्तु परिज्ञेयः स्वव्यापारात्पृथक् पृथक् ॥ (अधि २।२६)
२. तत्र स्वरूपं शक्तिश्च सकलश्चेति तत्त्रयम् ।
इति जाग्रदवस्थेयं भेदे पञ्चदशात्मके ॥ (अधि० २।२७)
३. अकलौ द्वौ परिज्ञेयौ सम्यक् स्वप्नसुषुप्तयोः ।
मन्त्रादितत्पतीशान वर्गस्तुर्यः इति स्मृतः ॥ (२।२८)