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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 519 में से

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पृष्ठ 93

९२ स्पन्दकारिका
जप के ५ अंग → (मन्त्रोच्चारण के समय—) जपांग—
अवस्था ५ शून्य ६ विषुवत् ७ चक्रों का स्मरण ९ मन्त्रार्थचिन्तन
मन्त्र और नाद—मूलाधार से उठने वाला 'नाद' मन्त्राक्षरों के मध्य माला में
पिरोये सूत्र की भाँति होता है—
आधारोत्थित नादो गुण इव परिभाति वर्णामध्यगतः (२।२२)
मन्त्रजप के समय मन्त्र-विस्तार—
प्रथमकूट = मूलाधार से आरब्ध प्रलयाग्निवतः क ए ई ल ह्रीं ।
द्वितीयकूट = अनाहत से आरब्ध एवं उसके आगे कोटिसूर्यवत्—
ह स क ह ल ह्रीं ।
तृतीयकूट = आज्ञा चक्र से आरब्ध एवं ललाट के मध्य तक कोटिचन्द्र के समान—
मन्त्र संस्क्रिया के १० भेद होते हैं—जनन, जीवन, ताडन, बोधन, अभिषेक
विमलीकरण, तर्पण, दीपन, गुप्ति आदि ।
'मन्त्र' और उसके विभिन्न अर्थ—
१. मननत्राणधर्माणो 'मन्त्राः'।
२. मननात् त्राणधर्मासौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः ।
३. चित्तं मन्त्रः । (शि०सू० ३।१)
४. संविद्देव्य मन्त्रः । (क्रमकेलि)
५. देव्येय मन्त्रः । (भूतिराज)
६. चिदग्निसंहार मरीचिमन्त्रः संविद्विकल्पान्गलपयन्नुदेति । (स्तोत्रभट्टारक)
७. वर्णात्मको न मन्त्रो दशभुजदेहो न पञ्चवदनोऽपि ।
संकल्पपूर्वकोटौ नादोल्लासो भवेन्मन्त्रः ॥'
८. नास्ति नादात् परो मन्त्रः । (राजभट्टारक)
९. मन्त्रः पदार्थांदियस्रंभात्मा परामर्शः । (महार्थमंजरी परिमल)
१०. तद्विमर्शस्वभावा हि सा वाच्या मन्त्रदेवता । (महासंवित् समासत्रा)
११. प्रमातृभूमिगता मन्त्राः । (मतंग टीका)
१२. मान्त्री शक्तिं मनसि महती देवतेत्याद्रियते । (संविदुल्लास)
१३. 'अग्निरूपा मन्त्राः' 'मन्त्रा न मीमांस्या' । (रौरवागम)
१४. सर्वे वर्णात्मकाः मन्त्राः । (तन्त्रसद्भाव)
१५. मन्त्रा वर्णात्मका सर्वे । (सर्ववीर)
१६. ते मन्त्रा वर्णरूपेण सबाह्याभ्यन्तरोदिताः । (संकर्षणसूत्र)