स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ९१
हैं कि शिव के परावाक्स्वभाव, अनाहतनादमय हो वह शक्तिमूलक एवं नादात्मक
विशिष्ट वर्ण-संरचना 'मन्त्र' है ।
मन्त्र और देवता तथा जगत—'वातुलशुद्धाख्यतन्त्र' (५ पटल) में कहा गया है
कि मन्त्र देवता एवं जगद्रूप है—मन्त्रस्तु देवता रूपं मन्त्ररूपमिदं जगत्' (५।१) ।
मन्त्र का स्वरूप क्या है ?
'मननं सर्वपक्षेषु त्राणं संसारसागरात् ।
मननत्राणधर्मत्वाद् 'मन्त्र' इत्यभिधीयते ।।' (५।७)
मन्त्र का प्रभाव—शिव-साक्षात्कार—
आह्वानतः स्वनाम्ना तु जनः सन्निहितो यथा ।
तथा मन्त्रप्रयोगेण शिवः सन्निहितो भवेत् ।। (५।८)
क्या 'मन्त्र' वर्ण-रचित पदों की समष्टि है?
आचार्य भास्करराय कहते हैं—१. 'माता, विद्या, चक्र, स्वगुरु एवं साधक' इन
पाँचों के भेद का अभाव ही मन्त्र का 'कौलिकार्थ' है ।
इत्थं माता विद्या चक्रं स्वगुरुः स्वयं चेति ।
पञ्चानामपि भेदाभावो मन्त्रस्य कौलिकार्थोऽयम् ॥ (२।१०२)
२. पराभट्टारिका (इष्टदेवी) विद्या, कुण्डलिनी एवं साधक एक दूसरे से अभिन्न
हैं—यह विमर्श श्रीविद्या का 'रहस्यार्थ' है ।
३. 'चक्र' विद्या के अक्षरों से निर्मित होने के कारण विद्या से अभिन्न है । (९६)
४. अवाङ्मनसगोचर, तत्त्वातीत, महत्तम, अणुतम, व्योमातीत, विश्वाभिन्न
चिदानन्द ब्रह्म में अपनी आत्मा का नियोजन ही मन्त्र का 'महातत्त्वार्थ' है । (१०९)
५. प्रत्येक मन्त्राक्षर में अचिन्त्य शक्ति है तथा अक्षरों एवं वामा, इच्छा तथा अन्य
शक्तियों में अभेद है यह विमर्श ही मन्त्र का 'शाक्तार्थ' है । (११८)
६. शिव एवं शक्ति के सामरस्य के कारण 'ब्रह्म हीं शिव एवं शक्ति दोनों ही
हैं'—यह मन्त्रविद्या का सामरस्यार्थ है । (१२०)
मन्त्र के अंग
(क) आन्तरिक अंग—
मन्त्र के वर्णों की संख्या, उद्धार, मात्रा (काल) उच्चारण, स्थान, प्रयत्न, रूप,
स्थितियाँ आकार आदि ।
(ख) मन्त्र के बाह्यांग—ऋषि, छन्द, देवता, विनियोग, बीज, शक्ति, कीलक,
न्यास, ध्यान, नियम एवं पूजा । (वरिवस्यारहस्यम्ः २ अंश।१६१)
मन्त्रोत्पत्ति—'कामकला बीज'—मूल मन्त्र का विकास और मूल—शरीर के
आन्तरिक एवं बाह्यांगों का विकास (२।१६४)
विद्या (मन्त्र) एवं देवी में अभेद है । (वरि० २।९१)