स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिचय एवं पृष्ठभूमि ८५
विदिते तु परे तत्त्वे वर्णातीते ह्यविग्रहे ।
किंकरत्वं तु गच्छन्ति मन्त्रा मन्त्राधिपैः सह ॥
१०. 'हंसपारमेश्वर' — 'केवल वर्णरूप मन्त्र पशुभाव में स्थित है सुषुम्णामार्ग से
उच्चारण करने पर वे पशुपति बन जाते हैं
'पशुभावे स्थिताः मन्त्राः केवला वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णेध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥
सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ।। (स्पन्द का० २५)
११. 'मन्त्र' शाक्त मार्ग में सफल होते हैं—'एष शाक्तो मार्गोऽत्र च मन्त्राणां
साफल्यम्' (स्पन्दप्रदीपिका उत्पलाचार्य) ।।
१२. 'तत्त्वरक्षाविधान' में कहा गया है—'आत्मसंवित् या परमपद में मन्त्र का
प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह शक्ति एवं क्रिया से रहित है । शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि मन्त्र का जप वहीं सफल होता है ।'
१३. 'श्रीवैहायसी'—'संधिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि से बोधित जप करना चाहिए ।
यथा सूत्र में मणिग्रथित होते हैं तद्वत् शक्ति के ताने-बाने से निर्मित ही मन्त्राक्षरों का
ध्यान करना चाहिए । वह 'शक्ति' परम व्योम में अवस्थित रहती है और परामृत समृद्ध
है । उक्त पद्धति से जप करने पर ही 'मन्त्र' स्वस्वरूप को प्रकट करता है और तब अपने
को आच्छादित नहीं करता'—
'विष्णुवक्तं जपं कुर्यान्नादोर्ध्वध्वनिबोधितम् ।
मन्त्राक्षराणि मणिवच्छक्तौ प्रोतानि भावयेत् ।।
तामेव च परे व्योम्नि परामृत बृंहितम् ।
दर्शयत्यात्मसद्भावमेवं मन्त्रो हृतिं विना ।।'
१४. 'श्री कालपरा' में कहा गया है—'शब्द नादात्मक हैं अतः उसके साथ
प्रत्यय संवित्-संलग्न रहकर बढ़ाती है । मन्त्र बोध के स्वरूप में स्थित संवित् अभिन्न है
अतः वह आत्मबोध भी करा देती है'—
शब्दो नादात्मकस्तस्मात् प्रत्ययेनोपबृंहितः ।
मन्त्रबोधस्वरूपस्थमभिन्नो बोधयत्यपि ।।
१५. 'संकर्षणसूत्र' में कहा गया है—'चिद्रूपता स्वात्मैकनिष्ठ है । भावाभाव
उसकी दशाएं एवं परिष्कार हैं । वह स्वसंवेदन संवेद्य है । प्रकृति से अतीत भी वही है
और प्रकृति का विषय भी वही है । यही मन्त्रों का प्रत्ययात्मक कारण है । मन्त्र बाहर एवं
भीतर वर्णसप से प्रकट होते हैं । वे शाश्वत पद रूप में होते हैं । वे मनुष्य के कर चरण
आदि के समान हैं । वीर्य का योग होने पर किसी भी काल में प्रयोग करने पर वे सिद्ध
होते हैं ।'—
'स्वात्मैकनिष्ठं चिद्रूपं भावाभावपरिष्कृतम् ।
स्वसंवेदनसंवेद्यं प्रकृत्यातीतगोचरम् ।।