स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ स्पन्दकारिका
इयं योनिः स्मृता विप्र मन्त्राणां प्रत्ययात्मिका ।
ते मन्त्रा वर्णरूपेण सबाह्याभ्यन्तरोदिताः ॥
नैष्कालिक पदावस्थाः करणानीव देहिनाम् ।
प्रयुक्ताः सर्वकालेषु सिद्ध्यन्ते वीर्ययोगतः ॥'
१६. 'जय संहिता' में कहा गया है—'एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में
उदित होकर एकहो जाता है । तब उस जप को लक्षसंख्या से अधिक समझना
चाहिए'—
'एकस्य मन्त्रनाथस्याप्यन्तर्बाह्योदितस्य च ।
यदैक्यं तं जपं विद्धि लक्षसंख्याधिकं मुने ॥'
(एवं शुद्धबोधात्मकत्वेन अन्तर्बाह्योदयादेकोऽपि जपो लक्षसंख्याकः'—'स्पन्द-
प्रदीपिका') ।
१७. पुस्तक में लिखे मन्त्रों का जप इन्हीं कारणों से निषिद्ध है और ऐसा मन्त्र-
जापक चाण्डाल होता है—
'पुस्तके लिखितान्मन्त्रा दृष्ट्वा जपति यो नरः ।
स जीवन्नेव चाण्डालो,—तथा—'मृतःश्वा चाभिजायते ॥'
१८. 'मन्त्र' समस्त देवशक्तियों से युक्त होते हैं—
यथा—'श्रीविद्या' । 'श्रीविद्या' में
(१) 'वाग्भवकूट'—'क ए ई ल' ।
अ (श्रीकण्ठ) क (कोधीश) ए (कोणत्रय = योनि) ई (लक्ष्मी) 'अ' (अनुत्तर) के
साथ लं (मांस) ।
(२) 'कामराजकूट'—ह, स, क, ह, ल ।
ह (शिव) स (हंस) क (ब्रह्मा) ह (वियत्) ल (शक्र) अ (अक्षर) ।
(३) 'शक्तिकूट'—शिव (ह) वियत् (ह) के बिना 'कामराजकूट । शक्तिकूट कहा
जाता है । प्रत्येक कूट के अन्त में एक-एक हृल्लेखा 'ह्रीं' अन्त में जोड़ लेना चाहिए ।
('वरिवस्यारहस्यम्') ।
(४) 'ह्रीं' (हृल्लेखा) में 'ह' (व्योम) र (अग्नि) ई (वामलोचना) बिन्दु (.)
अर्धचन्द्र, रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, समना एवं उन्मनी । बिन्दादि ९ की
समष्टि 'नाद' कहलाता है ।
१९. 'वरिवस्यारहस्यम्'—मन्त्र के वर्णों का उच्चारण करते हुए ५ अव-
स्थाओं, ६ शून्यों, ७ विषुवों, ९ चक्रों एवं मन्त्र के अर्थ का चिन्तन करना चाहिए ।
यही 'जप' है—
एवमवस्थाशून्यविषुवन्ति चक्राणि पञ्च षट् सप्त ।
नव च मनोरर्थांश्च स्मरतोऽर्णोच्चरणं तु जपः ॥ (वरि०र०)