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सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

विषय सूची lxxvii
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
बुध शीघ्र का स्फुट मान ८७
सूर्य सिद्धान्त तथा भास्कर मत-रवि
चन्द्र की मन्दपरिधि ८९
दृक् सिद्ध मन्द परिधि १०६
शीघ्र परिधि निकालना १०६
मंगल आदि की मन्द परिधि १०७
मंगल बुध शुक्र की मन्द परिधि १०९
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार मन्दफल
तथा शीघ्रफल १११
शीघ्र और मन्द संस्कार का क्रम १२१
मंगल और बुध के संस्कार १२४
ग्रहों की स्फुट गति निकालना १३२
मंगल, बुध, शनि का गति साधन १५१
मंगल आदि का वक्र और ऋजु केन्द्रांश १५९
स्फुट ग्रह से मध्य ग्रह निकालना १६६
खण्ड फल की सरल विधि १६७
सूर्य चन्द्र मंगल का मन्द फल १७८
मंगल के स्थिर फल के सात खण्ड १७९
खण्ड फल से गति निकालना १८०
ऋजु और वक्र गति का निर्णय १८७
नष्ट फल निकालना १८८
उदयांश और अस्तांश तथा खण्डफल १८९
चतुर्थ केन्द्र गति १९९
तिथि आदि का भोगकाल २००
तिथि, मास की वृद्धि क्षय की स्थूल गणना २०१
स्थूल पंजिका के उपयोग २१०
श्री जगन्नाथ स्तुति २११
उपसंहार २१२
षष्ठ प्रकाश - सूक्ष्म पंचांग ७८-१०६
विवाह आदि में सूक्ष्म पंजिका का उपयोग १
चन्द्र बिम्ब आदि निकालना ५
तुंगान्तर पाक्षिक तथा दिगंश संस्कार ६

lxxviii सिद्धन्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
भुजान्तर फल के नियम १६
चन्द्र की सूक्ष्म गति १७
पक्ष का आधा तथा पाद निर्णय २३
ग्रहण काल के लिये चन्द्र की सूक्ष्म गति २४
तुंगान्तर आदि का कारण २७
स्थूल सूक्ष्म विचार ३१
दृक् कर्म के नियम ३३
भविष्य में चन्द्र गति में संशोधन ४७
पूर्व आचार्यों के स्थूल मत का कारण ५७
सूक्ष्म नक्षत्र निकालना ५८
ग्रहों का संक्रान्ति काल ६१
तिथि आदि का सन्धि काल ६९
प्रतिमण्डल, अपमण्डल, विमण्डल ७३
क्रान्ति पात के भगण ७५
उससे अयनांश निकालना ७९
दैनिक गति ८१
करणाब्द के ध्रुव ८१
चलांश का धन ऋण विचार ८३
छाया द्वारा गणित सूर्य तथा स्फुट सूर्य से
अयनांश की जांच ८८
क्रान्ति का निर्णय ९२
द्युज्या ९७
क्रान्ति गति ९८
सौम्य याम्य गोल
क्षितिज्या १००
चर प्राण निकालना १०२
दिनरात्रि का मान १०३
विक्षेप के कारण स्फुट क्रान्ति १०५
व्यावहारिक स्थूल फल १०६
ग्रहों के अपने अहोरात्र का मान ११६
स्थूल सावन दिन १२०
लग्न निकालना १२१

विषय सूची ix
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
अस्त लग्न १३४
होरा आदि विभाग १३५
इष्ट काल से स्फुट लग्न १३६
स्फुट लग्न से इष्ट काल १४१
मध्य लग्न १४३
अयनांश अनुसार लग्न का मान १५३
गर्ग मत से सूक्ष्म नक्षत्र १५७
करणाब्द के ध्रुव , १५८
अयनांश की अन्य विधि १५९
जगन्नाथ स्तुति १६०
उपसंहार १६२
३. त्रिप्रश्नाधिकार
सप्तम प्रकाश – शंकु छाया वर्णन १०७-१२५
शंकु छाया द्वारा दिशा निर्णय १
छाया भुज और कोटि के कर्ण शंकु के रूप १०
छाया वृद्धि १४
आकाश के मण्डल, अग्रा, अक्षप्रभा आदि २२
अक्ष और लम्बांश, यष्टि, दृग्ज्या आदि ४१
भुज निकालना ४३
सममण्डल ५०
छाया लम्बाई से स्फुट सूर्य आदि ५५
कोण शंकु का छाया कर्ण ५६
करणी साधन ५८
अक्षफल कोणशंकु ६०
दृग्ज्या, कोणशंकु का छाया कर्ण ६२
उदयज्या ६४
क्रान्ति आदि का असकृत् कर्म ६६
अभीष्ट काल के छाया की लम्बाई ६७
छाया से समय निकालना ६८
अन्त्या, उन्नतज्या तथा छेद ६९
शंकु से तत प्राण ७४
तारा ध्रुव से रात्रि में समय निकालना ८५

lxxx सिद्धान्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
स्तुति तथा उपसंहार ९४-९५
अष्टम प्रकाश – चन्द्र ग्रहण वर्णन १२६-१४६
चन्द्र और सूर्य ग्रहण की सम्भावना १
रवि चन्द्र का बिम्ब व्यास १२
उनके मध्य और स्फुट मार्ग कर्ण, बिम्बकला १५
मन्द और स्फुट कर्ण २०
भूछाया की लम्बाई २५
तम का मान २७
वेद पुराण के अनुसार ग्रहण का अर्थ ३२
ग्रहण की दिशा ३३
चन्द्रपात में दिगंश संस्कार ३४
चन्द्र का विक्षेप शर की दिशा ३५
विक्षेप और शर के अनुसार ग्रास का मान ४०
ग्रहण की स्थितियों की अवधि ४५
दृक् सिद्ध तम मान ५१
इष्ट ग्रास काल, आयन वलन ५७
आक्ष वलन, चन्द्र का उदय अस्त ६०
चान्द्र दिन मान ६५
कदम्ब वृत्त में वलन ६६
अक्षज्या, क्रान्तिज्या ६९
अवतमस ७८
विभिन्न तमसों का मान ७९
ग्रहण के वर्ण भेद ८६
स्तुति और उपसंहार ८७-८८
नवम प्रकाश – सूर्य ग्रहण वर्णन १४७-१६२
सूर्य ग्रहण के लिये लम्बन १
सम पर्वकाल ४
वित्रिभ लग्न, नति साधन, दृग्गति ११
असकृत् विधि से स्फुट लम्बन १५
(सकृत एकबार) विधि से लम्बन, पर्वकाल २०
पर्वकाल, त्रिभोनलग्न क्रान्ति २५

विषय सूची lxxxi
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
शराक्ष दृक् क्षेप ३०
सूक्ष्म शराक्ष और दृक्क्षेप ३४
तम कर्ण ४५
स्फुट तम ४५
काल होरा ४९
स्पर्श, मोक्ष काल ५४
ग्रास की दिशा ६१
वलय ग्रास का काल ६८
ग्रहण काल का परमान, क्षयवृद्धि ८७
स्तुति और उपसंहार ८८-८९
दशम प्रकाश - परिलेख वर्णन १६३-१६
परिलेख का उद्देश्य १
शंकु और छेद, अर्द्ध ग्रास का अंगुल २
ख वृत्त में दिशा, वलन ग्रास की दिशा तथा शर २१
स्पर्श मोक्ष और मध्य ग्रहण १४
ग्राहक मार्ग, इष्टकालिक ग्रह २३
शलाका और वलन चालन ३२
सूर्य ग्रहण के लिये विशेष फलक ३५
ग्रहण फल का वर्णन नहीं ३६
स्तुति और उपसंहार ३७-३८
एकादश प्रकाश - ग्रहयुति वर्णन १७०-१८७
युति युद्ध और समागम १
सीधी और वक्र गति में गत और गम्य काल ५
ग्रहों की लिप्ता समान करना, उसके समय
का स्थिर मान ११
बुध शुक्र का मन्दफल, विक्षेप तथा स्पष्ट शर १६
पातोन ग्रह, क्षेपकर्ण, शरश्रुति २४
विक्षेप आयनदृक्कर्म, ध्रुव सूत्र ३१
स्फुट क्रान्ति, चर, नतोन्नत काल,
गत गम्य काल ३७
तारा ग्रहों का बिम्बमान ४१
बिम्ब विकला और योजन ५०

lxxxii सिद्धन्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
स्फुट बिम्ब मान, भास्वर बिम्ब, दृग्बिम्ब ५५
युद्धों के प्रकार ६९
भौम आदि का नति, लम्बन ७१
ग्रह तारा युति, बुध शुक्र से सूर्य का भेद ७५
चन्द्र और तारा ग्रहों की युति ८४
शराक्ष आदि की दिशा, ग्रह नक्षत्र युति ९०
उसके छेदक छाया अग्रा १०१
नलिका वेध ११०
स्तुति और उपसंहार १११-११२
द्वादश प्रकाश – ग्रह और नक्षत्र का योग १८८-२०४
नक्षत्रों का ध्रुवांश १
नक्षत्रों का विक्षेप ७
नक्षत्रों की तारा संख्या १२
नक्षत्रों की आकृति १५
योगतारा की स्थिति १९
योगतारा का विकलामान, लुब्धक की स्थिति २३
अगस्त्य की स्थिति ३५
सप्तर्षि की स्थिति ४१
ध्रुव की स्थिति ५०
भानांश, कालांश और क्षेत्रांश ६४
ध्रुव भगण, दृक् कर्म स्फुट विक्षेप आदि ७१
नक्षत्र चलन में क्रान्ति भेद, विभिन्न
स्थानों से दृश्यता ७८
ग्रहयुति साधन ८०
बिम्ब भेद योग्य नक्षत्र, रोहिणी शकट भेद ८६
धायापथ, यन्त्र द्वारा विशेष दृष्टि ९२
स्तुति तथा उपसंहार ९६-९७
त्रयोदश प्रकाश – ग्रह नक्षत्र का उदय और अस्त २०५-२१९
सूक्ष्म उदय और अस्त, उसकी दिशा, दृक् कर्म १
आक्ष कर्म, कालांश और लम्बान्तर १०
चन्द्र का विक्षेप, भानांश का मान और दिशा १५

विषय सूची lxxxiii
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
मान विकला के अनुसार उदय अस्त मय अंश २४
शुक्र आदि का उदय और अस्त, गत
और गम्य काल ३४
स्फुट क्रान्ति के लिये दृक् कर्म ध्रुव ४३
ग्रह नक्षत्रों के उदय अस्त का कारण,
दिङ्मण्डल संस्कार ५०
सूर्य का स्फुट केन्द्र, नत तथा
उन्नति, कालांश संस्कार ५७
मेष में सायन सूर्य रहने पर उत्कल
देश के क्षेत्रांश आदि ६८
अन्य स्थानों में ग्रह सूर्य की अन्तर
कला की गणना ७३
दृक् कर्म से स्फुट उदय और अस्त काल ८१
उदय अस्त काल, सूर्य चन्द्र शुक्र के प्रकाशांश ८४
स्तुति और उपसंहार ८५-८६
चतुर्दश प्रकाश - चन्द्रशृंगोन्नति वर्णन २२०--२३०
अध्याय का विषय १
दृक्कर्म संस्कार से सूर्य चन्द्र का
नित्य उदय अस्त २
सावन और नाक्षत्र दिन, चान्द्र सावन दिन ७
शृंगोन्नति काल, शृंग के वक्र होने का कारण ११
आयन तथा आक्ष वलन और वलन,
सूर्य चन्द्र अन्तर २६
ख वृत्त लेखन ३०
उसमें सूर्य बिन्दु चन्द्र बिम्ब तथा
कपाल लेखन ३५
शुक्ल भाग का निर्णय, किरण व्याप्ति ४०
चन्द्र कला का योग तथा घटाव ४५
शुक्ल अंगुल मान, छेदक न्यास ५१
सूर्य पृथ्वी पृष्ठ तथा ऊर्ध्वाकाश लेखन ५५
वर्ण सूत्र से सित भाग की स्थिति, प्राचीन
सिद्धान्त में सुधार ६१

lxxxiv सिद्धान्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
यन्त्र से बुध और शुक्र के शृंग का
दर्शन, व्याख्या ६७
स्तुति और उपसंहार ६८-६९
पञ्चदश प्रकाश – महापात वर्णन २३१-२४४
विषय १
वैधृति तथा व्यतीपात की सम्भावना २
उनका स्वरूप तथा साधन ६
मध्यकाल, चक्र चक्रार्द्ध काल, दृक्
कर्म का निषेध १७
गत और गम्य काल, सूर्य चन्द्र
क्रान्ति का अन्तर २१
क्रान्ति गति के लिये असकृत् कर्म २५
स्पर्श, मोक्ष और स्थिति अर्द्ध का स्थिर मान ३४
मध्य काल का दारुण फल, वार निर्णय,
गोल और अयनभेद ४३
पात द्वारा ग्रह का क्षेप, २७ योगों में महापात ५१
सृष्टि काल, सृष्टि तथा कलि आरम्भ
से युग प्रवृत्ति ५९
करणाब्द आरम्भ का निर्णय तथा उसके ध्रुव ६३
सिद्धान्त तन्त्र तथा करण का फल ६७
भास्कर ध्रुव की त्रुटि, ब्रह्मा की आयु
के विषय में मत ६९
स्तुति तथा उपसंहार ७०-७१
४. गोलाधिकार
षोडश प्रकाश – प्रश्न वर्णन २४५-२५७
मंगलाचरण और विषय १
गोल ज्ञान का महत्व ६
गुरु शिष्य संवाद से सन्देह निवारण,
भूगोल के प्रश्न १२
पौराणिक मत १७
बौद्ध तथा जैन मत २५
भूभ्रमण मत (आधुनिक) २८

विषय सूची lxxxv
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
पूर्व सिद्धान्त तथा आर्य भट्ट मत ३८
सृष्टि क्रम, पृथ्वी का मान तथा
उसकी स्थिति, लोक ४२
संवत्सर, भेद, पदक तथा अतिरिक्त संस्कार,
मन्द और शीघ्र परिधि ४९
भुजगति फल दिनरात, लग्न मान
में अन्तर क्रान्ति ५३
सूर्य मान में अन्तर, लम्बन, नति,
वित्रिभ लग्न ५६
शराक्ष, शंकु कल्पना ६०
शरवलन ग्रह कक्षा में अन्तर, स्फुट शर ६२
रात्रि के अन्धकार का कारण ६६
ग्रह और तारा की दृष्टि सीमा ६७
नक्षत्र कक्षा, मेरु का उदय अस्त ६८
चन्द्र की कला शंकु तथा शृंगोन्नति के प्रश्न ७१
महापात, महः आदि लोक ७३
सौर, पितृ दिन, ब्रह्मा दिन ७५
प्रलय और वर्ष भेद, काल यन्त्र तथा मान यन्त्र ७६
ऋतु मान का अन्तर, मोक्ष, सरल पंचांग आदि ७७
स्तुति तथा उपसंहार ८०-८१
सप्तदश प्रकाश – भूगोल स्थिति वर्णन २५८-२८८
पृथ्वी की स्थिति विषय में तर्क तथा
शास्त्र वचन द्वारा समाधान १
पृथ्वी का आधार भूकम्प ६
पृथ्वी का विस्तार १३
गोलाकार तथा समतल रूप दिखायी देना १८
देशान्तर के कारण सूर्य और
चन्द्र दर्शन में अन्तर २१
पुराण और बौद्ध मत से पृथ्वी की स्थिति २८
पृथ्वी भ्रमण का खण्ड ३९
नक्षत्रों की सापेक्षगति का खण्डन प्रवह वायु ४१
जगत् शब्द की व्याख्या ४४

lxxxvi सिद्धान्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
सूर्य केन्द्रित आकर्षण द्वारा ग्रह गति का खण्ड ४८
पृथ्वी के दैनिक अक्ष भ्रमण का खण्डन ५५
दैनिक गति और क्रान्ति वृत्त का विरोध ५७
पृथ्वी की दीर्घवृत्त गति का निराकरण,
चन्द्र कलंक दर्शन ६६
ईश्वर की इच्छा ही प्रमाण ६८
सूर्य और अन्य ग्रहों के अक्ष भ्रमण पर
चन्द्र का नहीं ७३
अक्ष भ्रमण और ग्रहों के आकार में विषमता ७५
भास्कर मत-प्राकृतिक गुण के कारण गति ७७
ग्रह भ्रमण का आरम्भ काल ७९
मध्य सूर्य के बदले स्पष्ट सूर्य को
केन्द्र मानने में भूल ८१
मध्य रवि को केन्द्र मानने से शंका समाधान ८८
मन्द, पात और शीघ्र- देवता या पिण्ड ९४
बडे ग्रहों का अधिक शर तथा पृथ्वी शर हीन ९७
पृथ्वी और अन्य ग्रहों में भेद-सूर्य
से ग्रहों में वाष्प १०२
सौर मण्डल का भार केन्द्र १०५
पृथ्वी भ्रमण के कारण नीचे गिरते पत्थर
की दिशा में अन्तर ११२.
ग्रहों के भ्रमण काल और सूर्य से
दूरी में सम्बन्ध ११६
इस सूत्र के अनुसार सूर्य का अक्ष
भ्रमणवाल नहीं १२१
मन्द और शीघ्र फल दीखने के कारण ग्रहों
द्वारा पृथ्वी और सूर्य दोनों की परिक्रमा १२९
तारागण सूर्य समान और अति दूर
होने में शंका १३४
भचक्र स्थिरता का खण्डन १३९
सूर्य समान असंख्य तारा होने पर रात्रि कैसे १४२
ध्रुवीय व्यास कम होने अक्ष भ्रमण
के कारण नहीं १४६

विषय सूची lxxxvii
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
ईश्वर लीला का पार्थिव यन्त्र
द्वारा खण्डन नहीं १४८
पृथ्वी स्थिर तथा सूर्य केन्द्रित ग्रहों का भ्रमण १५१
स्तुति और उपसंहार १६०-१६१
अष्टादश प्रकाश – भूगोल वर्णन २९०-३१७
नाना मत से इष्ट देव को नमस्कार १
पूर्वप्रश्न उत्तर में सृष्टि कथन २
सौर मत से सृष्टि ३
सूर्य आदि का स्वरूप २३
चन्द्र कला का वर्णन ३२
कलंक की उत्पत्ति ३५
जल और तेज भाग ३८
भूमि में जल और स्थल का विभाग ४५
द्वीप और सागर की स्थिति ४८
गोल मत की विस्तृत युक्ति ५२
उसका गणित ५६
शंकु का मान ५९
उत्क्रम ज्या का अर्थ ६४
दृष्टि सीमा का निर्णय ६९
हिमालय का उदाहरण ७२
उसका दृश्य और अदृश्य विभाग ७५
उसकी प्रत्यक्षता ७७
उसकी उन्नत दृक् सीमा ७८
सुमेरू की स्थिति ८२
भारत की स्थिति ८८
द्वीप भेद और सागर ९१
उसका असल रूप ९४
क्षीर सागर आदि ९८
अन्य ग्रन्थों में मेरू का वर्णन १००
देव और असुरों का विभाग १०२
अक्षांश और देशान्तर निर्णय १०५
विषुव स्थान १०६

lxxxviii सिद्धन्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
स्थिर वायु १०७
ख-मेरू १०८
ब्रहाण्ड आवरण १०९
भास्कर मत से गोल, प्रलय आदि ११३
भू व्यास और परिधि का शुद्धमान १५३
पृष्ठ फल तथा घनफलं १५४
जल और स्थल का योजन फल १५५
भास्कर की उक्ति १५६
अन्य मत १५७
घन और पृष्ठ फल का उदाहरण १५८
अंगुल से लेकर योजन तक दूरी का मान १६१
उसके भेद से ग्रहों का मान १७४
पृथ्वी का घनफल ५० करोड़ योजन १७५
स्तुति और उपसंहार १७६-१७७
ऊनविंश प्रकाश - भूगोल तथा खगोल वर्णन ३१८-३३८
त्रिविध सृष्टि का कारण १
ख मेरू तथा लोक २
सप्त वायु ३
ग्रहों की नैसर्गिक गति ४
ग्रहों की कई प्रकार की कक्षा ६
कक्षा का शीघ्रत्व ८
शीघ्र कक्षा का योजन मान १२
शीघ्र परिधि १६
मध्य स्फुट कर्ण १८
ग्रहों की दैनिक गति निकालना २३
गति का योजन मान २४
गति का कलात्मक मान २८
भचक्र की गति २९
प्राचीन परिलेख विधि में अशुद्धि ३२
वक्र गति का कारण ३५
ग्रहों के मध्य सूर्य की परिक्रमा की स्फुट गति ३७
कक्षा लम्बन के प्राचीन सिद्धान्त का खण्डन ३८

विषय सूची lxxxix
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
चन्द्र के क्षय वृद्धि में प्राचीन मत में भूल ४४
उपनिषद् प्रमाण से सूर्य आदि का बिम्ब,
कक्षा का मान ४७
चन्द्र कक्षा और बिम्ब का छोटा होना ५५
भूकक्षा का निर्णय ५६
तारा बिम्ब का कारण ५९
शंकु छाया से वृक्ष पर्वत आदि की ऊंचाई ७०
एक शंकु तथा दो शंकु की विधि ७६
पर्वत का दृश्य और अदृश्य भाग ७९
सूर्य चन्द्र की छाया द्वारा घर आदि की ऊंचाई ८०
मेघ की ऊंचाई ८३
पृथ्वी की गोलाई जानने के लिये
शंकु का उपयोग ८६
क्षितिज वृत्त ८७
दृष्टि सीमा के अनुसार पर्वत की दृश्यता ८८
पर्वत पर सूर्य का जल्दी उदय और
देरी से अस्त ९६
उसका व्यावहारिक अर्थ ९८
ग्यारह प्रकार के शंकुओं की दृष्टि सीमा १००
शंकु दृष्टि सीमा का निर्णय १०१
दृष्टि सीमा के शंकु की ऊंचाई १०२
प्राचीन मत से होरा दिन, मास
और वर्ष के पति १०३
सूर्य आदि की दृष्टि सीमा ११४
आकाश कक्षा का मान ११९
उसमें अन्य मतों का खण्डन १२०
वेद पुराण मत का समाधान १२३
स्तुति तथा उपसंहार १२४-१२५
बीसवां प्रकाश – यन्त्र वर्णन ३३९-३५८
यन्त्र की आवश्यकता १
दो प्रकार के गोल यन्त्र २
एक की प्राचीनता तथा दूसरे की नवीनता ३

सिद्धन्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
निर्माण के पूर्व ग्रह पूजा की आवश्यकता ४
भूगोल और मेरुदण्ड ६
निर्माण और स्थापन ८
आधार कक्षा और क्षितिज वृत्त जोड़ना ११
नाड़ी वलय और द्युरात्रि वृत्त बान्धना १४
दो फलकों का न्यास १६
अक्षांश वलय लगाना १७
उनको स्थिर करना अपमण्डल बान्धना २०
स्वस्तिक निर्णय २२
विमण्डल तथा उन्मण्डल बान्धना २३
क्षितिज वृत्त सबसे बड़ा २७
भूगोल बनाने के बाद ग्रह नक्षत्र लगाना २९
ग्रह वलन और प्रवह गति ३०
लंका और ख स्वस्तिक की स्थिति ३१
सभी ६ वृत्तों में खगोल रचना ३२
सममण्डल तथा दृङ्मण्डल का योग ३३
गोल स्थापन की विधि ३४
चक्रार्द्ध दर्शन तथा गोल भ्रमण ३९
प्राचीन मत से एक कक्षा यन्त्र ४२
नया बहु कक्ष यन्त्र ४४
ग्रह चलन देखने के लिए बहुकक्ष यन्त्र ४५
घन चक्र जोड़ी लगाना ४६
भू चन्द्र की स्थिति ५०
अन्य ग्रहों की स्थिति ५१
सूर्य के चारों ओर ग्रह भ्रमण ५३
ग्रह कक्षा का अंगुल मान ५७
ग्रह चक्र के लिये यष्टि ६१
वलयों में अन्तर कम या अधिक करना ६२
यष्टि चलाने की विधि ६३
भूकक्षा में ग्रह देखने की विधि ६६
अन्य प्रकार से भूकक्षा निर्माण ६७
सीधी तथा वक्र गति देखना ७२

विषय सूची xci
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
काल यन्त्र ७६
चक्र आदि नाम ७७
गोलार्द्ध यन्त्र ७८
मान यन्त्र ८२
उससे ग्रह और नक्षत्र की दूरी जानना ८३
उससे मेघ की ऊंचाई जानना ८८
उससे पर्वत आदि का मान जानना ८९
शीशे के बर्तन आदि का प्रयोग ९४
कपाल यन्त्र ९७
स्वयं वह यन्त्र तथा उसका भ्रमण १००
गोल भ्रमण में पाश का अन्तर १०८
गोल ज्ञान का फल ११०
कृतघ्नों को रहस्य नहीं कहना १११
स्तुति तथा उपसंहार ११२-११३
एकविंश प्रकाश – बाकी रहस्य ३५९-३९६
प्रश्नोत्तर रूप में वासना वर्णन १
उन्मण्डल २
चर अनुसार दिनमान में अन्तर ३
गोल के अनुसार उदय अस्त ४
दिन रात्रि का ह्रास वृद्धि ६
विभिन्न स्थानों में दिन रात्रि का मान ७
देव और असुरों की दिन रात्रि ९
ब्रह्मा का दिन १४
पितर दिन १६
लग्न और अस्त लग्न १८
राशियों के लग्न में अन्तर २०
गोल भ्रमण के द्वारा व्याख्या २२
कहां कौन राशि सदा दिखायी देगी २३
ग्रहों की योजन गति की समता का खण्डन २७
गति में तारतम्य २८
शीघ्रफल के कारण ग्रहों की कक्षा केन्द्र में सूर्य ३०
ग्रहों की नैसर्गिक गति ३१

सिद्धन्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
पूर्व सिद्धान्तों के अनुसार भगण संख्या,
उनका आरम्भ ३२
युग भगण को सूक्ष्म करने के लिए
कल्प भगण ३९
भास्कर मत से योग्यता ४०
उसका उपयोग ५०
ग्रन्थकार द्वारा भगण में संशोधन की विधि ५१
भविष्य में भूल शुद्धि की विधि ५४
अयनांश की परीक्षा ७०
वृहस्पति भगण से प्रभव आदि संवत्सर ७१
उसके अनुसार पदकों की तालिका ७६
पदक निकालने की विधि ७७
स्फुटीकरण से पृथ्वी पर दृक् सिद्धि ८३
अन्य लोकों में फल का तर्क ८५
भास्कर मत से फल निकालना ८६
स्फुटीकरण के लिये परिलेख ८७
प्रतिमण्डल भ्रमण का दृष्टान्त ११०
सूर्य चन्द्र का मन्द कर्ण १११
चन्द्र के तुंगान्तर फल का आधार ११५
शीघ्रफल के लिये छेदन ११६
कक्षागति का अंगुल मान
(यन्त्र और परिलेख) १२०
पूर्व सिद्धान्त की गति परीक्षा १३०
स्फूट गति के चार संस्कारों का प्रमाण १४१
परोच्च कल्पना का कारण १४४
भास्कर मत से प्रतिमण्डल बिम्ब का मान १४७
क्रान्ति कम होने का कारण १५२
ग्रहण में लम्बन संस्कार १५३
दृङ्मण्डल में लम्बन और अवनति
आदि का रूप १५४
ग्रास काल का मान आदि १७२
ग्रहण की दिशा का कारण १८१
दो वलनों का कारण १८४
ध्रुव तथा कदम्ब से नापने पर
विक्षेप में अन्तर १९१

विषय सूची xciii
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
मेरू का उदय अस्त १९४
शृंगोन्नति का कारण १९७
महापात का कारण १९८
भगण आदि का उपयोग १९९
अक्षांश के अनुसार ऋतुओं का मान २०७
शीत, उष्ण और सम मण्डल २११
मेघ उत्पत्ति २२५
घनमूल की भास्कर विधि २४०
गोल संख्या का घनमूल २४५
स्तुति और उपसंहार २५०-२५३
५. कालाधिकार
द्वाविंश प्रकाश - संवत्सर ३९७-४०८
कालरूप ईश्वर की स्तुति १
काल के दो रूप २
सभी कार्यों में कालरूप ईश्वर का स्मरण ३
काल के विभाग १४
कालात्मा सूर्य १५
संवत्सर आदि शब्दों की उत्पति १६
नौ प्रकार के काल मान २५
चन्द्र मान का निर्णय २७
विभिन्न मासों के कर्तव्य ३६
सूर्य के ८७ दिन आदि का निर्णय ४४
संक्रान्ति पुण्यकाल का निर्णय ४९
पांच प्रकार के वर्षों के सावन दिन आदि ६१
चन्द्र से जल में उल्लास ६५
चन्द्र सतह पर दिन ७६
स्तुति और उपसंहार ७७-७८
त्रयोविंश प्रकाश - पुरुषोत्तम स्तव ४०९-४२६
श्री जगन्नाथ स्तुति प्रतिज्ञा १
उत्कल प्रशंसा २
नीलाद्रि और पुरुषोत्तम ३
पताका तथा ध्वज दण्ड, चक्र ७
कलश और आमला की माला १०

xciv सिद्धन्त दर्पण
विषय श्लोक स० पृष्ठ स०
घण्टा और प्रासाद १२
प्राग्रीव वर्णन १३
कल्प वट १४
सप्तमूर्त्ति रूप जगन्नाथ स्तुति १७
श्लेष द्वारा जगन्नाथ और समुद्र स्तुति २१
ब्रह्माण्ड, शिव, गौरी, वाणी, गणेश, सूर्य
और ग्रह साम्य २३
दशावतार स्तुति ३०
उनके अनेक रूपों का कारण ४१
अन्य छन्दों में जगन्नाथ स्तुति ५४
इष्ट प्रार्थना ५६
उपसंहार ५७
चतुर्विंश प्रकाश – उपसंहार ४२७-४५७
कौतुक पञ्जिका १
सूक्ष्म तिथि, स्थूल विधि अन्य विधियां १९
ग्रह निकालना ३२
चन्द्र पात उच्च की सरल विधि, कौतुक
पञ्जिका से लाभ ५०
इस ग्रन्थ के प्रति प्रकाश के विषय ७६
अन्य स्थानों की पञ्जिका बनाना ९२
सौ स्थानों के अक्षांश तथा देशान्तर ९३
दो स्थानों के बीच दूरी निकालना १४०
सूक्ष्मतम क्रान्ति १४२
रवि क्रान्ति और अक्षांश का सूक्ष्म निर्णय १४३
पूर्वजों का वर्णन १४४
ग्रन्थ का समय तथा कृष्णार्पण १४८
ग्रन्थ ग्रहण प्रार्थना १५०
गोल गणित उत्तरार्द्ध समाप्ति १५१
ग्रन्थ समाप्ति १५२
शब्द रूप ब्रह्म की स्तुति १५३
स्तुति और उपसंहार १५४-१५५
परिशिष्ट – पदक ४५९-५१३

श्री कृष्णाय नमः
अविघ्न मस्तु
सिद्धान्त दर्पणः
मध्यमाधिकारः
प्रथमः प्रकाशः
काल वर्णनम्
श्री भूमाधव चक्र चक्रयवनिभृत्तद्भाभिरभ्युज्ज्वलं
श्री कण्ठ प्रमुखाखिला मरशिखा जुष्टांघ्रि पीठोपलम्
श्री नीलाचल मौलि मण्डल महा नीलाय मानं महः
श्री भूमाधरितस्मरं भवतु नः प्रत्यूह हत्युद्यतम् । १ ।
श्री नीलाचल के शिखर भूषण अति नील तेज के युक्त श्री जगन्नाथ हमारे
सभी विघ्न नष्ट करने के लिए सदा उद्यत रहें । श्री जगन्नाथ के साथ श्री (लक्ष्मी),
भू (पृथ्वी), माधव (दुर्गामाधव) चक्र (सुदर्शन चक्र), चक्री (नारायण), बलभद्र
(अवनिभृत्) सुभद्रा-इन सात देवताओं का तेज सम्मिलित है । इन्हें महादेव
(श्रीकण्ठ) के साथ आकर देवता गण पत्थर के रत्न पीठ पर सिर लगाते हैं । १ ।
गांगेय द्युति भंगदांग लतया श्री राधयालिं गितम्
विद्युत्सांगिघना घना घनप घन रुक् प्रेमामृतै का श्रयम् ।
सत्संवित्सुखम क्षर क्षरपरं पूर्णाति पूर्णोत्तमम्
श्रीकृष्णारूय मुपास्महे सुरुचिरं वेदान्तं वेद्यं महः । २ ।
स्वर्ण तेज को भी लज्जित करती हुई श्री राधा की अंगलता के आलिंगन से
(कृष्ण का) श्याम रूप काले मेघ की बिजली के समान शोभित होता है, उस
प्रेम रूपी अमृत का ही एक आश्रय है । यह तेज सत् चित् आनन्द रूप, पंचभूतों
से परे (क्षरपर) अविनाशी, स्वयं पूर्ण होने के कारण अतुलनीय है । २ ।
जयति जगती भर्तुर्धामाद्भुतं परमाणुतां
ययुरपि जगत्कोषा यल्लोम जाल विलावली
यदनिलजल ज्योतिः क्षौणीपराणु गृहोदर-
स्फुर दपि सुरागणैः क्रीडन्निजैरवतारकैः । ३ ।
जगत् के पालक अद्भुत, तेज के परमेश्वर की जय हो, जो परम सूक्ष्म होने
हुए भी रोम-रोम में ब्रह्माण्ड धारण किये हुए हैं । जिन के विराट स्वरूप में पृथ्वी
(मिट्टी) आग, जल, आकाश, पवन पञ्चभूत, सूक्ष्म रूप से फैले हुए हैं, वही
परमात्मा उन्हीं पञ्चभूतों के भीतर देह धारण कर प्रकट होते हैं (अवतार लेते हैं)
उन अवतारों की (क्रीड़ाओं) की देवगण भी गणना नहीं कर पाते ।

२ सिद्धान्त दर्पण
श्री भास्कर प्रभृति खेचर चक्रवालं
नत्वा गुरुम् स्वपितरौ तदनुग्रहाढ्यः
गूढोऽप्य गाढ़ गणक प्रति पत्तयेऽहं
सिद्धान्त दर्पण इति प्रथयामि शास्त्रम् । ४ ।
सूर्यादि ग्रह, अपने गुरु और माता-पिता को प्रणाम कर उनके आशीर्वाद से
मैं सिद्धान्त दर्पण नामक शास्त्र लिखता हूं जिससे कठिन ज्योतिष शास्त्र को अल्प
बुद्धि गणक भी समझ सकें ।
ग्रन्थेऽस्मिन्नधिकार पञ्चकमहं वक्ष्यामि मध्यस्फुट
त्रिप्रश्नातति गोल काल सहितं सांगं स्ववक्रोद्गतैः ।
वाग्यैः क्वापि दिवाकरांश गतितैर्गन्थान्तरोत्थापितै-
रैकार्थ्यात् क्वचिदन्विते सुवितते बोधाय बालावतेः । ५ ।
इस ग्रन्थ में पांच अधिकार (प्रधान अध्याय) हैं - १. मध्य, २. स्फुट,
३. त्रिप्रश्न, ४. विवेचन सहित गोल, तथा ५. काल । ये सभी विभिन्न अध्यायों
में विभक्त हैं । इसमें अपनी रचना, सूर्य सिद्धान्त तथा अन्य ग्रन्थों से उद्धृत श्लोक
भी हैं । एक ही अर्थ के अन्य ग्रन्थ के श्लोकों से बह्ने भी (ज्योतिष न जानने
वाले भी) सहज ही समझ सकते हैं । इस कारण ग्रन्थ विस्तृत हो गया है । ५ ।
नास्ते काला वयव कलना यत्र दृक् शास्त्र सिद्धा
श्रौत स्मार्त व्यवहतिरपि छिद्यते यत्र धर्म्या ।
तस्मा देषा कृतिरनुतववागस्तुवा प्रस्तु तार्था
ग्राह्या दक्षै ग्रहण भगणा द्यत्र संलक्ष्य साक्षात् । ६ ।
यदि काल के अवयव (लिप्ता, दण्ड, दिन, मास, वर्ष आदि ) की गणना
प्रत्यक्ष नहीं जाय तो वैदिक और स्मार्त कर्म धर्म का फल नहीं देते हैं । अतः
विद्वानों द्वारा इस ग्रन्थ की परीक्षा की जाय कि इसकी गणना अनुसार ग्रहण और
भगण आदि दिखते हैं या नहीं, तब इसे स्वीकार करें । ६ ।
प्राक् सिद्धान्त प्रसिद्धा रवि शशि भगण। घस्र मासाब्द संख्या
भूगोल व्यास जीवोपकरण सहिताः सर्वदा सन्ति सत्याः ।
किन्त्वन्येषां ग्रहाणामिह भगण गणस्योच्च पातेषु कक्षा-
बिम्बादीनां विसम्वादत इतरजनैः कल्प्यते ग्रन्थ जातम् । ७ ।
रवि और चन्द्र के भगण, दिन, मास और वर्ष की संख्या (एक कल्प में)
पृथ्वी, उसका व्यास, ज्या तथा कोटिज्या आदि हमेशा सत्य हैं, अतः ये सब
प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार ही लिखी गयी हैं । किन्तु अन्य ग्रहों के भगण, उच्च,
पात, शर, कक्षा और बिम्ब आदि का मान समय के साथ बदलते रहते हैं अतः
नये ग्रन्थ लिखे जाते हैं ।
कल्प, वर्ष, मास, दिन आदि की परिभाषा सूर्य और चन्द्रमा की गति के