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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

१४६ ] [ श्री शारदा तिलक
कामनाओं को प्राप्त करते थे ।१४। अब ध्यान बतलाते हैं—अंक में
करोड़ों उन्मत्त चन्द्रों के सदृश है, थोड़े पीन (स्थूल) और ऊँचे कुच-
युगों वाली, अर्ध चन्द्र से अंकित मस्तक से युत, मधु के मद से ईषत्
चञ्चल तीन नेत्रों से अन्वित, करकमलों में निरन्तर वरदान—जपवटी,
विद्या, कपाल को धारण करने वाली, यौवन के गर्व से संदृप्त, लिपि
के तनुवाली भगवती वागीश्वरी का मैं समाश्रय ग्रहण करता हूँ ।१५।
आधारदेशेऽधिष्ठाने नाभौ हृदि गले पुनः ।
विन्दौ नादे ततः शक्त्यां शिवे देशिकसत्तमः ।१६
नवाधारेषु विन्यस्य स्वरान्नव यथाविधि ।
हादिवर्णांस्तनौ न्यस्येन्मुखे ऊर्ध्वादितः सुधीः ।१७
ऊर्ध्वमाहेन्द्रयाम्योदक्पश्चिमेषु समाहितः ।
दोः पत्सु पञ्चवर्गाणां वर्णान्देशिकसत्तमः ।१८
अग्रमूलोपमूलाग्रमध्यदेशक्रमेण तु ।
जठरे पार्श्वयुगले नाभौ पृष्ठे समाहितः ।१९
गुह्यहृद्भ्रूविले न्यस्येत शादिवर्णत्रयं क्रमात् ।
सृष्टौ सर्गाविसना स्यात्स्थितौ वह्निमरुत्पयः ।२०
वियद्भूमिक्रमान्न्यस्येद्बिन्दुसर्गाविसानिकाम् ।
संहृतौ प्रतिलोमेन विन्यसेद्बिन्दुभूषिताम् ।२१
श्रेष्ठ आचार्य आधार देश में, अधिष्ठान में, नाभि में, कण्ठ में,
विन्दु में, नाद में, शिव में, शक्ति में नवाधारों में विन्यास करके फिर
नौ स्वरों को विधि पूर्वक सुधी हकार से आदि वर्णों को स्तनों में न्यास
करे और मुख में ऊर्ध्वादि से करे ।१६।१७। ऊर्ध्व में समाहित होकर
माहेन्द्री, याम्य, उत्तर और पश्चिम में न्यास करे । श्रेष्ठ आचार्य
पाँचों वर्गों के वर्णों का बाहुओं और पादों में न्यास करे ।
अग्रमूल, उपमूलाग्र और मध्य देश के क्रम से समाहित होकर जठर
में, पार्श्वों के युगल में अर्थात् दोनों पार्श्वों में, नाभि में, पृष्ठ में

सप्तम पटल ] [ १४७
न्यास करे । १८-१९। क्रम से शादि तीन वर्णों का गुह्य-हृदय और
भ्रूविल में न्यास करना चाहिए । सृष्टि में सर्ग के अवमान वाली होवे
और स्थिति में यहित, जल, आकाश और भूमि के क्रम से विन्दु
और विसर्ग के अवसान वाली का न्यास करे । और संहार में प्रतिलोम
से विन्दुभूषिता का न्यास करना चाहिए । २०-२१।
आगमोक्तेन मार्गेण दीक्षितः साधकोत्तमः ।
लक्षं न्यसेजपेत्तावदयुतं जुहुयात्तिलैः ।२२
पूजयेदन्वहं देवीं पीठे प्रागीरिते सुधीः ।
वर्णाब्जेनासनन्दद्यान्मूर्त्तिं मूलेन कल्पयेत् ।२३
देवीं सम्पूजयेत्तस्यामङ्गाद्यावरणान्यजेत् ।
आदावङ्गावृत्तिः पश्चादम्बिकाद्याभिरीरिता ।२४
द्वितीया मातृभिः प्रोक्ता तृतीया द्वष्टशक्तिभिः ।
चतुर्थी पञ्चमी प्रोक्ता द्वात्रिंशच्छाक्तिभिः पुनः ।२५
चतुः षष्ठ्या स्मृता षष्ठो शक्तिःभिर्लोकनायकैः ।
सप्तमी पुनरेतेषामस्त्रैः स्यादष्टमावृत्तिः ।२६
एवं पूज्या जगद्धात्री श्रीभूतलिपिदेवता ।
स्थानेषु तेषु विधिवदभ्यर्च्य्याङ्गानि पूर्ववत् ।२७
आगमों में वर्णित मार्ग से साधकों में उत्तम दीक्षित होकर एक
लाख जप करे और दश सहस्र तिलों के द्वारा होम करना चाहिए ।२२
सुधी को चाहिए कि वह पूर्व में वर्णित पीठ पर देवी का प्रतिदिन
पूजन करे । वर्णाब्ज से आसन अर्पित करे । और मूल मन्त्र के द्वारा
मूर्त्ति की कल्पना करे ।२२! उसमें देवी का भली-भाँति पूजन करे और
अंग आदि आवरणों का यजन करना चाहिए । आदि में अंगों की
आवृत्ति और पीछे अम्बिकाद्याओं से कही गयी है । २४। दूसरी
मातृकाओं से बतायी गयी है । तीसरी सोलह शक्तियों के द्वारा होती
है । फिर चौथी और पाँचवी बत्तीस शक्तियों से कही गयी हैं ।२५।
शक्तियों से और लोक नायकों के द्वारा चौंसठ से छठवीं बतायी गयी

१४८ ] [ श्री शारदा तिलक
हैं। फिर इनके अस्त्रों से सातवीं करे। इस प्रकार से अष्टम आवृत्ति
होती है। २६। इस रीति से जगतों की धात्री श्रीभूत लिपि देवता का
पूजन करना चाहिए। पूर्व की भाँति उन स्थानों में विधि के साथ
अङ्गों का अभ्यर्चन करे। २७।
अम्बिका वाग्भवी दुर्गा श्रीशक्तिश्चोक्तलक्षणाः ।
ब्राह्मयाद्याः पूर्ववत् प्रोक्ताः कराली विकराल्युमा ।२८
सरस्वती श्रीदुर्गाषा लक्ष्मीश्रुतयौ स्मृतिधृतिः ।
श्रद्धा मेधा मतिः कान्तिराया षोडशक्तयः । २६
खड् खेटकधारिण्यः श्यामाः पूज्याः स्वलङ्कृताः ।
विद्या ह्री पुष्टयः प्रज्ञा सिनावाली कुहूः पुनः । ३०
रुद्रा वीर्या प्रभानन्दा स्याद्योषा ऋद्धिदा शुभा ।
कालरात्रिर्महारात्रिर्भद्रकाली कपर्दिनी । ३१
विकृतिर्दण्डिमुण्डिन्यौ सेन्दुरुखण्डा शिखण्डिनी ।
निशुम्भशुम्भमथिनी महिषासुरमर्दिनी । ३२
इन्द्राणी चैव रुद्राणी शङ्करार्र्द्धशरीरिणी ।
नारी नारायणी चैव त्रिशूलिन्यपि पालिनी ।३३
अम्बिका ह्लादिनी चैव द्वात्रिंशच्छक्तयःस्मृतः ।
चक्रहस्ताः पिशाचास्याः सम्पूज्याश्चोरुभूषणाः । ३४
अम्बिका, वाग्भवी, दुर्गा, और श्री शक्ति ये सब उक्त लक्षणों वाली
है। ब्राह्मी आदि पूर्व में की ही तरह कही गयी है। कराली, त्रिकराली,
उमा, सरस्वती, श्री, दुर्गा, ऊषा, लक्ष्मी, श्रुति, स्मृति, धृति, श्रद्धा,
मेधा, मति, क्रान्ति और आर्या ये सोलह शक्तियां हैं ।२८।२६। ये सब
खड्ग और खेटक के धारण करने वाली हैं—श्यामा और स्वलंकृता हैं,
इनका पूजन करना चाहिए। विद्या, ह्री, पुष्टि, प्रज्ञा, सिनीवाली,
कुहू, रुद्रा, वीर्या, प्रभा, मन्दा, योषा, ऋद्धिहा, शुभा, कालरात्रि,
महारात्रि, भद्रकाली, कपर्दिनी, विकृति दण्डी, मुण्डिनी, इन्दु खण्डा,
शिखण्डिनी, निशुम्भ, शुम्भमथिनी महिषासुर मर्दिनी, इन्द्राणी, रुद्राणी

  • सप्तम पटल ] [ १४६
    शंकरा र्धश रीरिणी, नारी, नारायणी, त्रिशूलिनी, पालिनी, अम्बिका,
    ह्लादिनी ये बत्तीस शक्तियाँ कहीं हैं । चक्र, हस्ता, पिशाचा, और उरु-
    भूषणा पूजने योग्य हैं । २६।३४।
    पिङ्गलाक्षी विशालाक्षी समृद्धिर्वृद्धिरेव च ।
    श्रद्धा स्वाहा स्वधाऽभिख्या माया संज्ञा वसुन्धरा ।३५
    त्रिलोकधात्री सावित्री गायत्री त्रिदशेश्वरी ।
    सुरूपा बहुरूपा च स्कन्दमाताऽच्युतप्रिया ।३६
    विमला चामला पश्चादरुणी पुनरारुणी ।
    प्रकृतिर्विकृतिः सृष्टिः स्थितिः संहृतिरेव च । ३७
    सन्ध्या माता सती हंसी मद्दिका कुब्जिकाऽपरा (१) ।
    वेदमाता भगवती देवकी कमलासना । ३८
    त्रिमुखी सप्तमुख्यान्या सुरासुरविमर्दिनी ।
    लम्बोष्ठी चोर्ध्वकेशी च बहुशीर्षा वृकोदरी । ३६
    रथरेखाह्वया पश्चाच्छशिरेखा तथाऽपरा ।
    गगनवेगा पवनवेगा च तदनन्तरम् ।४०
    ततोभुवनमालाख्या ततः स्यान्मदनातुरा ।
    अनङ्गाऽनङ्गमदना तथैवानङ्गमेखला ।४१
    अनङ्गकुसुमा विश्वरूपाऽसुरभयङ्करी ।
    अक्षोभ्यासत्यवादिन्यौ वज्ररूपा शुचिव्रता ।४२
    पिङ्गलाक्षी, विशालाक्षी, समृद्धि, वृद्धि, श्रद्धा, स्वाहा, स्वधा,
    माया, वसुन्धरा, संज्ञा, त्रिलोक धात्री, सावित्री, गायत्री, त्रिदशेश्वरी,
    सुरूपा, बहुरूपा, स्कन्दमाता, अनुच्युत प्रिया, विमला, अमला, अरुणी,
    आरुणी, प्रकृति, सृष्टि, स्थिति, संहृति, सन्ध्या, माता, सती, हंसी,
    मद्दिका, कुब्जिका, अपरा, देवमाता, भगवती, देवकी, कमलासना,
    त्रिमुखी, सप्तमुखी, अन्या, सुरासुर विमर्दिनी, लम्बोष्ठा, ऊर्ध्व केशी,
    बहुशीर्षा, वृकोदरी, रथरेखा, शशिरेखा, अपरा, गगन, वेगा, पवन,

१५० ] [ श्री शारदा तिलक
वेगा, भुवनमाला, मदनातुरा, अनङ्गा मदना, अनङ्गमेखला, अनङ्ग-
कुसुमा, विश्व रूपा, असुर भयङ्करी, अक्षोभ्या, सत्यवादिनी, वज्ररूपा,
शुचिव्रत । ३५।४२।
वरदाख्या च वागीशा चतुःषष्टिः समीरिताः ।
चापबाणधरा सर्वा ज्वालाजिह्वाः समीरिताः ।४३
दंष्ट्रिण्यश्चोर्ध्वकेश्यास्ता युद्धोपक्रान्तमनसाः ।
सर्वाभरणसद्दीप्ताः पूजनीयाः प्रयत्नतः ।४४
लोकेशाः पूर्ववत्पूज्या स्तद्वद्वज्रादिकान्यपि ।
इत्थं यः पूजयेन्मन्त्री श्रीभूतलिपिदेवताम् ।४५
श्रीवाण्योः स भवेद्भूमिदेवैरप्यभिवन्द्यते ।
कमलैरयुतं हुत्वा राजानं वशमानयेत् ।४६
उत्पलैर्जुहुयात्तद्वन्महालक्ष्मीः प्रजायते ।
पलाशकुसुमैर्हुत्वा वत्सरेण कविर्भवेत् ।४७
राजी-लवणहोमेन वनितां वशमानयेत् ।
मातृकोक्तानि कर्माणि कुर्यादत्रापि साधकः ।४८
भूतलिप्या पुटीकृत्यं योमन्त्रं भजते नरः ।
क्रमोत्क्रमाच्छतावृत्त्या यस्य सिद्धो भवेन्मनुः ४६
वरदा, वागीशा, ये चौंसठ कही गई हैं। ये सब चाप और बाणों
के धारण करने वाली हैं और इनकी जिह्वा ज्वाला बताई गई है।
।४३। ये दाढ़ों वाली है और ऊपर की ओर केशों वाली हैं। और ये
युद्ध करने के लिए उपक्रान्त मन वाली हैं। ये समस्त आभरणों से
दैदीप्यमान है। इनका प्रयत्न पूर्वक पूजन करना चाहिए ।४३।४४।
लोकेशों का पूजन पूर्व की ही तरह करे तथा उनके आयुध वज्र आदि
का भी अर्चन करना चाहिए। इस तरह से मन्त्रधारी जो श्रीभूत लिपि
देवता का पूजन करता है वह श्री और वाणी का स्थान हो जाता है
और देवगणों के द्वारा भी वन्दना किया जाया करता है। दश हजार
आहुतियां कमलों के द्वारा देकर राजा को भी अपने वश में ले आया

सप्तम पटल ] [ १५१
करता है ।४५।४६। उसी भाँति उपलों के हवन करे तो महालक्ष्मी प्रसन्न
हो जाती है। ढाक के पुष्पों से होम करके एक ही वर्ष में कवि हो जाया
करता है ।४७। राजी (राई) और नमक के होम से वनिता को वश
में कर लेता है। मातृका में कहे हुए कर्म यहाँ पर भी साधक को करने
चाहिए ।४८। भूतलिपि में सम्पुट देकर जो मनुष्य मन्त्र का सेवन करता
है और क्रमोत्क्रम से सौ आवृत्ति करे तो उसका मन्त्र सिद्ध हो जाता
है ।४६।
सुषुप्तभुजगाकाराँ कुण्डलीमध्यवर्त्मना ।
संगमय्य परं स्थानं प्राणवित्तां परामृतैः ।५०
प्लावयेन्मूर्द्धिन मूलान्तं योगोऽयं सर्वसिद्धिदः ।
अनया न्यस्तदेहस्तु तेजसा भास्करोभवेत् ।५१
यन्त्रक्रियाविशेषांस्तु ज्ञात्वा कर्माणि साधयेत् ।५२
विन्द्राढ्यं गगनं तदेव शिवयुक् ज्ञानी चतुर्थ्यायुतो
नत्यन्तो मनुरेष मध्यविहितः साध्यस्य बन्ध्वक्षरैः ।
पत्रेष्वक्षरशो हकारपुटितांस्तद्भूतवर्णान्लिखे-
दन्त्यं चान्त्यदले विलिख्य मतिमान् वृत्तेन संवेष्टयेत् ।५३
विषद्यन्त्रमिदं प्रोक्तं लाक्षाचन्दननिर्मितम् ।
रोहिण्यामुदये राह्नोर्विषघ्नं सर्वशान्तिदम् ।५४
सुषुप्त अर्थात् सोये हुए भुजङ्ग के आकार वाली कुण्डली के मध्य
मार्ग के द्वारा परस्थान में सङ्क्रमित करके प्राणवित्ता को परामृत से
मूर्धा में मूल के अन्त पर्यन्त प्लावित करना चाहिए । यह सिद्ध योग
सब सिद्धियों के प्रदान करने वाला है। इसके द्वारा देह में जो न्यास
करता है वह तेज से भास्कर ही हो जाता है ।५०।५१। यन्त्र की क्रिया
के विषयों का ज्ञान प्राप्त करके कर्मों का साधन करना चाहिए ।५२।
अब विषद् यन्त्र बतलाया जाता है—गगन—हकार जो विन्दु से आढ्य
होवे, वह शिव अर्थात् एकादश एकार से युक्त होवे और ज्ञानी
शब्द चतुर्थी विभक्ति से युक्त होना चाहिए। अन्त में नमः—यह पद

१५२ ] [ श्री शारदा तिलक
होवे, जो वर्णिका में लिखना चाहिए। साध्य जो भी हो उसके विषाद
से ग्रस्त अमुक व्यक्ति के वस्त्र अक्षरों को अक्षरशः हकार से पुटित पत्रों
में लिखे। मतिमान पुरुष अन्य को अन्तिम दल में लिखे और उसे वृत्त
से संवेष्ठित कर देना चाहिए ।५३। वह विपद् यन्त्र कहा गया है जो
लाख और चन्दन से निर्मित होता है। रोहिणी में राहू के उदय में यह
विष के हनन करने वाला और सब प्रकार की शान्ति का प्रदाता
होता है ।५४।
यौ द्वौ साक्ष्यधरेन्दुखण्डशिरसौ स्यातां क्रमान् ङ्युतं
कोपेशं नमसाऽन्वित विरचयेन्मध्ये दलेष्वष्टसु ।
वायव्यान् यपुटान्विलिख्य विधिना शिष्टार्णमन्त्ये दल ॥
यन्त्रं वायुगृहेण वेष्टितमिदं स्यात्तालपत्रस्थितम् ।५५
स्वात्य मन्दोदये यन्त्रं वायव्ये निखनेद्विपोः ।
द्वयुच्चाटनकृतस्तस्य मृतिर्वा भवति ध्रुवम् ।५६
वह्नेर्त्रीजयुगं क्रमाच्छ्रवणसद्याद्वेन्दुयुक् स्यान्स्वरो
रोः फट्‌हृन्मनुरेष मध्यविहितः पत्रेषु वह्न्युद्भवान् ।
वर्णान्वह्निध्निरोधितान् प्रविलिखेत्साध्याक्षरैःपोषकै-
रन्त्य चान्त्यदले कृशानुपुरगं भूर्जोदरे कल्पितम् ।५७
शुभवारर्क्षसंयोगे लाक्षाकुङ्कुमनिर्मितम् ।
रक्षाकृत्सर्वभूतानां यन्त्रमाग्नेयमीरितम् ।५८
घातजाक्षरमिश्र तत्कृत्तिकायां कुजोदये ।
चिताङ्गारेण नवस्त्रे लिखितं नाशयेद्रिपुम् ।५६
अव वायव्य मन्त्र बतलाया जाता है—दो मकार होवे जो अक्षि-
इकार, शशधर—एकार, इन्दु खण्ड—विन्दु के शिर वाले होवे, चतुर्थी
से युत को पेश पद होवे और अन्त में नमः—यह पद होवे। मध्य में
अष्ट दलों में विरचित करे। य से पुटित वायव्यों लिखकर विधि से
शिष्ट वर्ण को अन्त्य दल में लिखे। इस यन्त्र को वायु गृह से वेष्टित
करके ताल पत्र पर स्थित करे ।५५। स्वाति नक्षत्र में मन्द अर्थात् शनि

सप्तम पटल ] [ १५३
के उदय शत्रु के गृह के द्वार में वायव्य में खोदकर रक्खें तो शत्रु का
उच्चाटन करने वाला होता है अथवा निश्चित रूप से मृत्यु हो जाती
है ।५६। अब आग्नेय को बतलाया जाता है—श्रवण—(उः) सद्य ओ,
अर्धेन्दु—विन्दु इनमें युक्त वह्नि के बीज दो अर्थात् दो रेफ, हृन्नमः७
यह पद और फट् होवे—यह मन्त्र मध्य में विहित होवे । पोषक साध्य
के अक्षरों से युक्त वह्नि निरोधित वर्णों को पत्रों में लिखना चाहिए
अनय को अन्तिम दल लिखे और कृशानुपुर में जर करके भोज पत्र में
कल्पित करे ।५७। शुभ वार नक्षत्र के संयोग में लाक्षा और कुम्कुम से
निर्माण किया हुआ यह समस्त प्राणियों की रक्षा करने वाला आग्नेय
यन्त्र होता है—ऐसा कहा गया है ।५८। वह घातक अक्षरों से मिश्रित
कृत्तिका में मंगल के उदय में चिता के अङ्गार से उसके वस्त्र पर लिखे
तो यह रिपु का नाश कर दिया करता है ।५६।
नासार्द्धेन्दुमदम्बु तन्मनुयुतं सार्द्धेन्दुडेन्तोविधु-
विध्वन्तेतु भुवे नमोविगदितो मध्ये मनुर्वारुणान् ।
वर्णान्पत्रपुटेषु वाक्षरपुटान्साध्यस्य वन्ध्वक्षरै-
रालिख्याप्यपुरेण वेष्टितमिदं यन्त्रं भवेद्वारुणम् ।६०
भूर्जपत्रे लिखेदेतद्रक्तचन्दनवारिणः ।
तरुणत्रोंदये काव्ये यन्त्रं वश्यादिकृद्भवेत् ।६१
गण्डो बिन्दुविभूषितोवसुमती स्यात्तादृशी गण्डयो
मध्यस्थौ तु जगौ लुके नतिरिमि मन्त्रं लिखेन्मध्यतः ।
लान्ताल्लांपुटीकृतान्वसुमतीवर्णान् दलेष्वालिखे-
त्सेवावर्णयुतान्यथाविधि भुवो गेहेन संवेययेत् ।६२
ज्येष्ठायामुदिते सौम्ये मृदि गैरिकनिर्मितम् ।
पार्थिवं यन्त्रमचिरात्सर्वत्र स्तम्भकृद् भवेत् ।६३
अब वारुण यन्त्र बतलाते हैं—नासा-ऋः, अर्द्धेन्दु, विन्दु-अम्बुक।,
मनु शब्द का अर्थ चतुर्दशवां स्वर है अतः मनु से ओंकार कहा जाता
है । इससे युत हो और चतुर्थी के अन्त वाला विधु होवे । फिर भुवे
नमः— यह होना चाहिए । मध्य में मन्त्र होवे । फिर वकाराभूर पुटित

१५४ ] [ श्री शारदा तिलक
साध्य के वन्धु अक्षरों के सहित वारुण वर्णों को पद्मपुटों में लिखकर
आप्यपुर से वेष्टित करे तो यह वारुण यन्त्र हो जाता है। ६०। इस मंत्र
को रक्त चन्दन के जल से भोज्य पत्र पर लिखना चाहिए। तरुण नक्षत्र
के उदय में भृगु वार में बनावे तो यह यन्त्र वश आदि के करने वाला
होता है। ६१। पार्थिव मन्त्र बतलाते हैं—गण्ड—लृं', वसुमती—लकार
गण्ड विन्दु से युक्त होवे। गण्ड वर्णों के मध्य में स्थित ज और ग—ये
वर्ण होवे। लुके स्वरूप है। अन्त में नमः—यह होता है। इस मन्त्र
को मध्य में लिखे। ल वर्ण से पुटीकृत लान्त वसुमती के वर्णों को दलों
में लिखना चाहिए जो सेवा वर्ण युक्त होवे। विधि के साथ भूपुर वेष्टित
करे। ६२। ज्येष्ठा ! नक्षत्र के उयय में सौम्य में मिट्टी में गैरिक से
निर्मित यह पार्थिव यन्त्र शीघ्र ही सर्वत्र स्तम्भन करने वाला होता
है। ६३।
गुह्याद्गुह्यतरां नित्यां श्रीभूतलिपिदेवताम् ।
यः सेवते शुभैः पुत्रैर्धनधान्यैश्च पूर्यते। ६४
अत्रिर्व्वरुणसंरुद्धो द्वाग्वादिनि ठद्वयम् ।
वागीश्वर्या दशार्णोऽयं मन्त्रो वाग्विभवप्रदः। ६५
ऋषिःकण्वोविराट्छन्दो देवता श्राकसमीरिता ।
शिरः श्रवण दृङ् नासावदनान्धुगुदेष्विमान्। ६६
न्यस्यार्णान् प्राग्वदङ्गानि मातृकोक्तानि कल्पयेत्। ६७
तरुणसकलमिन्दोर्विभ्रतीशुभ्रकान्तिः
कुचभरनमिताङ्गी सन्निषण्णा सिताब्दे ।
निजकरकमलद्यल्लेखनीपुस्तकश्रीः
सकलविभवसिद्धयै पातु वाग्देवता नः। ६८
यह गुह्य से भी अधिक गुह्य है। इस नित्या श्री भूत लिपि देवता
को जो सेवन दिया करता है वह शुभ-पुत्र और धन-धान्य से परिपूर्ण
हो जाया करता है। ६४। अत्रि—हकार, वरुण—वकार। इससे सम्पु-
टित होवे। फिर द्वाग्वादिनि और फिर दो ठकार होवें। यह वागी-
श्वरी का दश वर्णों का मन्त्र होता है जो वाग्विभव के देने वाला है। ६५

सप्तम पटल ] [ १५५
इस मन्त्र का ऋषि कण्व है और विराट् छन्द है तथा वाक् इसका
देवता बताया गया है। शिर, श्रवण, नेत्र, नासिका, मुख, अन्धु और
गुदा में इन वर्णों का न्यास करके पूर्व की ही तरह मातृका में कथित
अंगों की कल्पना करनी चाहिए ।६७। अब ध्यान बतलाया जाता है-
चन्द्र के एक खण्ड को धारण करने वाली, शुभ्र क्रान्ति से संयुत, कुच
युग भार से नमित अङ्ग वाली, सितकमल पर विराजमान, अपने करों
में लेखनी, पुस्तक श्री को धारण करती हुई वह वाग्देवता सम्पूर्ण वैभव
की सिद्धि के लिए जापकी रक्षा करे ।६८।
दशलक्षं जपेन्मन्त्रं दशांशं जुहुयात्ततः ।
पुण्डरीकैः पयोभ्यक्तैस्तिलैर्वा मधुराप्लुतैः ।६६
मातृकौदीरिते पीठे वागीशीमर्चयेत्सुधीः ।
वर्णाब्जेनासनं दद्यान्मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ।७०
आदावङ्गानि संपूज्य पश्चाच्छक्तीरिमा यजेत् ।
योगा सत्या च विमला ज्ञाना बुद्धिः स्मृतिः पनः ।७१
मेधा प्रज्ञा च पत्रेषु मुद्रापुस्तकधारिणीः ।
दलाग्रेषु समभ्यर्च्य ब्राह्मयाद्यास्ता यथाविधि ।७२
लोकपाला बहिः पूज्यास्तेषामस्त्राणि तद्बहिः ।
एवं संपूजयेन्मन्त्री जपहोमादितत्परः ।७३
इस मन्त्र का दश लाख जप करे और जप का दशांश होम करना
चाहिए। हवन दूध में अक्त कमलों से अथवा मधुर में आप्लुत तिलों
से करें। सुधी पुरुष मातृका में उदीरि पीठ पर वागीशी का अर्चन
करे, वर्णाब्ज से आसन देवे और मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे
।६६।७०। आदि में अंगों का पूजन करके पीछे इन शक्तियों का यजन
करना चाहिए। योग, सत्या, विमला, ज्ञाना, बुद्धि, स्मृति, मेधा और
प्रज्ञा का पत्रों में अर्चन करे। दलों के अग्र भागों में मुद्रा तथा पुस्तक
को धारण करने वाली ब्राह्मणी आदिका विधि के साथ समभ्यर्चन
करना चाहिये ।७१।७२। लोकपालों का यजन बाहिर करे तथा उनके

१५६ ] [ श्री शारदा तिलक
आयुधों का अर्चन उनके बाहिर करना चाहिए। इस प्रकार से जप
और होम आदि में परायण मन्त्रधारी भली-भाँति पूजन करे। ७३।
ब्रह्मचर्यरतः शुद्धःशुद्धदन्तनखादिकः ।
संस्मरन्सर्ववनिताः सततं देवताधिया ।७४
कवित्वं लभते धीमान् मासैर्द्वादशभिर्ध्रुवम् ।
कृत्वा तन्मन्त्रितं तोयं सहस्रं प्रत्यहं पिबेत् ।७५
महाकविर्भवेन्मन्त्री वत्सरेण न संशयः ।
उरोमात्रे जले स्थित्वा ध्यायेन्मार्तण्डमण्डले ।७६
स्थितां देवीं प्रतिदिनं त्रिसहस्रं जपेन्मनुम् ।
लभते मण्डलात्सिद्धि वाचमप्रतिमां भुवि ।७७
पलाशबिल्वकुसुमैर्जुहुयान्धुरोक्षितैः ।
समिद्भिर्वा तदुत्थाभिर्यशः प्राप्नोति वाक्पतेः ।७८
ब्रह्मचर्य व्रत में रत और दाँत तथा नरखों को शुद्ध रखने वाला
पुरुष निरन्तर सब वनिताओं का देवता की बुद्धि से निरन्तर स्मरण
करता हुआ पुरुष बारह मासों में ही धीमान् होकर निश्चय ही कवित्व
का लाभ किया करता है। इस मन्त्र से एक सहस्र बार अभिमन्त्रित
करके जल को प्रतिदिन पान करे तो मन्त्रधारी एक ही वर्ष में महा-
कवि हो जाया करता है—इसमें कुछ भी संशय नहीं है। वक्षःस्थल
पर्यन्त जल में स्थित होकर मार्तण्ड मण्डल में स्थित देवी का ध्यान
करे और नित्य ही तीन सहस्र मन्त्र का जप किया करे तो मण्डल से
सिद्धि का लाभ करता है और भूमण्डल में अप्रतिम वाणी को प्राप्त कर
लेता है ।७४।७५।७६।७७। पलाश-बिल्व के पुष्पों से मधुर में उक्षित
करके अथवा उनसे ग्रहण की हुई समिधाओं से हवन करे तो वाणी के
स्वामी के यश को प्राप्त कर लेता है ।७८।
होमोऽयं सर्वसौभाग्यलक्ष्मीवश्यप्रदोभवेत् ।
राजवृक्षसमुद्भूतैः प्रसूनैर्मधुराप्लुतैः ।७६

सप्तम पटल ] [ १५७
तत्समिद्भिश्च जुहुयात्कवित्वमतुलं लभेत् ।
एवं दशाक्षरी प्रोक्ता सिद्धये वाक्मिच्छताम् ।८०
हृदयान्ते भगवति वद शब्दयुगं पुनः ।
वाग्देवि वह्निजायान्तं वाग्भवाद्यं समुद्धरेत् ।८१
मनुं षोडशवर्णाढ्यं वागैश्वर्यफलप्रदम् ।
मनोः षड्भिः पदैः कुर्यात्षडङ्गानि सजातिभिः ।८२
शुभ्रां स्वच्छविलेपमाल्यवसनां शीतांशुखण्डोज्ज्वलां
व्याख्यामक्षगुणं सुधाढ्यकलशं विद्यां च हस्ताम्बुजैः ।
विभ्राणां कमलासनां कुचनतां वाग्देवतां सुस्मिताम् ।
वन्दे वाग्विभवप्रदां त्रिनयनां सौभाग्यसम्पत्करीम् ।८३
यह होम सब प्रकार के सौभाग्य-लक्ष्मी और वश्य के प्रदान करने
वाला होता है । राज वृक्ष से समुत्पन्न पुष्पों से मधुर में आप्लुत करके
और उसकी समिधाओं से होम करे तो अनुपम कवित्व की प्राप्ति कर
लिया करता है । इस प्रकार से वाक् शक्ति की इच्छा रखने वालों के
लिये यह दशाक्षरी सिद्धि के लिए बतलायी गयी है ।७९।८०।८१। हृदय
के अन्दर ‘भगवती’ वद (यह शब्द दो बार) कहे । वाग्देवि-यह कहकर
‘वाग्भवाद्य’ स्वाहा’ यह कहे—ऐसे मन्त्र का उद्धार करना चाहिए ।
यह मन्त्र सोलह अक्षरों से युक्त है जो वाक् के ऐश्वर्य का फल का
प्रदाता होता है । मन्त्र के छै स्वजाति पदों से षट् अङ्गों को करे ।८२
अब ध्यान बतलाया जाता है—परम स्वच्छ विलेपन और वस्त्र से सम-
न्विता-परम शुभ्र-चन्द्र खण्ड के धारण करने से अतीव समुज्ज्वला कर
कमलों में व्याख्या-अक्षमाला, सुधा से पूर्ण कलश और विद्या को धारण
करन वाली—कमल के आसन पर विराजमान—कुच युगल के भार से
नम्रा-सुन्दर स्मित वाली-वाग्विभव की प्रदात्री—तीन नयनों से युक्त-
सौभाग्य और सम्पदा करने वाली देवी की मैं वन्दना करता हूँ ।८३।

१५८ ] [ श्री शारदा तिलक
हविष्याशी जपेत्सम्यग्वसुलक्षमनत्यधीः ।
दशांशं जुहुतादन्ते तिलैराज्यपरिप्लुतैः ।८४
मातृकोक्ते यजेत्पीठे देवीं प्रागीरिते क्रमात् ।
पिवेत्तन्मन्त्रितं तोयं प्रातःकाले दिनेदिने ।८५
विद्वान्वत्सरतो मन्त्री भवेन्नास्ति विचारणा ।८६
अभिषिञ्चेज्जलैर्जप्तैरात्मानं स्नानकर्मणि ।
तर्पयेत्तां जलैःशुद्धै रतिमेधामवाप्नुयात् ।८७
पुष्पगन्धादिकं सर्वं तज्जप्तं धारयेत्सुधीः ।
सभायां पूज्यते सद्भिर्वादे च विजयी भवेत् ।८८
हविष्य के अशन करने वाला, अनन्य बुद्धि वाला भली-भाँति आठ
लाख मन्त्र का जाप करे तथा जप का दशांश आज्य से परिप्लुत तिलों
से होम अन्त में करना चाहिए । मातृकाओं में कथित पीठ पर जो पूर्व
में कहा गया है। उस पर क्रम से यजन करना चाहिए । उस मन्त्र
में अभिमन्त्रित जल को प्रातःकाल में प्रतिदिन पान करना चाहिए ।
।८४।८५। मन्त्रधारी एक ही वर्ष में विद्वान् हो जाया करता है—इसमें
कुछ भी विचार करने की आवश्यकता नहीं है ।८६। स्नान के कर्म में
जप किए हुए जल से अपने आपका अभिषेक करे और जल से उस देवी
का तर्पण करे तो अत्यधिक मेधा की प्राप्ति किया करता हैं ।८७।
पुष्प और गन्ध आदि सभी को उस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करके
धारण करना चाहिए । वह सुधी पुरुष सभामें सत्पुरुषों के द्वारा पूजित
हुआ करता है और वह वाद में विजयी होता है ।८८।
तारो मायाऽधरो बिन्दुः शक्तिस्तारः सरस्वती ।
ङेन्तोन्त्यन्तिकोमन्त्रः प्रोक्त एकादशाक्षरः ।८६
ब्रह्मारन्ध्रभ्रुवोर्मध्ये नवरन्ध्रेषु च क्रमात् ।
मंत्रवर्णान्न्यसेन्मन्त्री वाग्भवेनाङ्गकल्पना ।६०
वाणीं पूर्णनिशाकरोज्ज्वलमुखीं कर्पूरकुन्दप्रभां
चन्द्रार्धाङ्कितमस्तकां निजकरैः संविभ्रतीमादरात् ।

सप्तम पटल ] [ १५६
वीणामक्षगुणं सुधाढ्यकलशं विद्यां च तुङ्गस्तनी ।
दिव्यैराभरणैर्विभूषिततनुं हंसाधिरूढा भजे ।६१
जपेद्द्वादशलक्षाणि तत्सहस्रं सिताम्बुजैः ।
नागचम्पकपुष्पैर्वा जुहुयात्साधकोत्तमः ।६२
मातृ कोक्ते यजेत्पीठे वक्ष्यमाणक्रमेण तान्।
वर्णाब्जेनासनं कुर्यान्मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ।६३
अब हंस वाणीश्वरी मन्त्र का उद्धार बताया जाता है-प्रणव, माया
भुवनेश्वरी, अक्षर-ऐ, बिन्दु शक्ति-प्रणव-सरस्वती जो चतुर्थी विभक्ति से
युक्त हो अन्त में नमः-यह पद है, यह ग्यारह अक्षरों वाला मन्त्र होता
है ।८८। मन्त्रधारी को चाहिए कि वह ब्रह्मरन्ध्र-भ्रू ओं के मध्य में
और क्रम से नौ रन्ध्रों में मन्त्र के वर्णों का न्यास करे और वाग्भव से
अङ्गों की कल्पना करनी चाहिए ।६०। ध्यान बताया जाता है-पूर्ण
चन्द्र से उज्ज्वल मुख से युत, कपूर और कुन्द के समान प्रभा वाली-
चन्द्र से अंकित मस्तक से संयुत, आदर के साथ अपने कर कमलों में
वीणा, अक्षमाला, सुधा से पूरित कलश और विद्या को धारण करती
हुई, उन्नत वक्षोजी वाली, दिव्य आभूषणों से भूषित शरीर से समन्वित
हंस पर समारूढा देवी का सेवन करता है ।६१। इस मन्त्र का बारह
लाख जप और उसकी सहस्र श्वेत कमलों से अथवा नाग चम्पक के
पुष्पों से साधकोत्तम होम करे ।६२। मातृका में उक्त पीठ पर आगे
बताये जाने वाले क्रम से यजन करना चाहिए । वर्णाब्ज के द्वारा
आसन अर्पित करे और मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करनी चाहिये ।
।६३।
देव्या दक्षिणतः पूज्या संस्कृता वाङ् मयी तनुः ।
प्राकृता वामतः पूज्या वाङ् मयी सर्वसिद्धिदा ।६४
इष्ट्वा पूर्ववदङ्गानि प्रज्ञाद्याः पूजयेत्ततः ।
प्रज्ञा मेधा श्रुतिः शक्तिः स्मृतिर्वागीश्वरी मतिः ।६५

१६० ] [ श्री शारदा तिलक
स्वस्तिश्चेति समाख्याता ब्राह्मयाद्यास्तदनन्तरम्।
लोकेशानर्चयेद्भूयस्तदस्त्राणि त तद्बहिः ।६६
इति सम्पूजयेद्देवी साक्षाद्वाग्वल्लभो भवेत्।
दशाक्षरीसमुक्तानि कर्माण्यत्रापि साधकः ।६७
वाचस्पतेऽमृतेभूयः प्लुतः प्लुरितिकीर्तयेत् ।
वागाद्यो मुनिभिः प्रोक्तो रुद्रसंख्याक्षरो मनुः ।६८
कुर्यादंगानि विधिवद्वागाद्यैः पञ्चभिः पदैः ।६६
आसीना कमले करैर्जपवटीं पद्मद्वयं पुस्तकं
विभ्राणा तरुणेन्दुबद्ध मुकुटा मुक्तेन्दुकुन्दप्रभा।
भालोन्मीलितलोचना कुचभराक्रान्ता भवद्भूतये
भूयाद्वागधिदेवता मुतिगणैरासेव्यमानाऽनिशम् ।१००
देवी के दक्षिण की ओर संस्कार की हुई वाङ्मयी तनु का पूजन
करना चाहिए। प्राकृता का वाम भाग में पूजन करे। यह वाङ्मयी
सब सिद्धियों के देने वाली है।६४। पूर्वकी तरह अङ्गों का यजन करके
फिर ब्रह्मादि का पूजन करे। प्रज्ञा-मेधा-श्रुति-शक्ति स्मृति वागीश्वरी-
मति ओर स्वस्ति का पूजन करके उसको अनन्तर ब्राह्मी आदि का
यजन करना चाहिए। फिर लो केशों का अर्चन कर उनके वाहिर
उनके अस्त्रों का यजन करना चाहिए ।६४।६५। इस रीति से देवी का
भली-भांति अर्चन करने से पूजक साक्षात् वाक्का वल्लभ हो जाता
है। यहां पर भी दशाक्षरी में कथित कर्मों को साधक करें ।६७। वागात्र
वाग्भव का आद्य-वाचस्पते फिर अमृते प्लुत और प्लुति-इसका कीर्तन
करे। यह मन्त्रं मुनियों के द्वारा एकादश अक्षरों वाला कहा गया है।
।६८। वागाद्य पाँच पदों से अङ्गों का समाचरण सविधि करना चाहि।
।६६। अब ध्यान है—कमल के आसन पर विराजमान, करों से जप
की माला, दो पद्म और पुस्तक को धारण करती हुई, तरुणचन्द्र
से मुकुट को बांधे हुए, मोती, चन्द्र और कुन्द के समान प्रभा वाली

अष्टम पटल } [ १६१
भाल में उन्मीलित लोचन में समन्वित—अपने स्थूल कुचों के भार
से समाक्रान्त—निरन्तर मुनिगणों के द्वारा सेव्यमाना वाक् की अधि-
देवता आपकी भूति के लिए होवे ।१००।
रुद्रलक्षं जपेन्मंत्रं दशांशं जुहुयाद्घृतैः ।
मातृकाकल्पिते पीठे पूजयेत्तां यथा पुरा ।१०१
पलाशकुसुमैर्हुत्वा परां सिद्धिमवाप्नुयात् ।
कदम्बकुसुमैस्तद्वत्फलैः श्रीवृक्षसम्भवैः ।१०२
अचराच्छ्रियमाप्नोति वाचां कुन्दसमुद्भवैः ।
नन्द्यावर्तप्रसूनैर्वा हुत्वा वाग्वल्लभो भवेत् ।१०३
ब्राह्मीरसे स्वकल्काढ्ये कपिलाज्यं पचेज्जपन् ।
पिबेद्दिनादौ तं नित्यं सर्वशास्त्रार्थविद्भवेत् ।१०४
अनया विद्यया जप्तं ब्राह्मीपत्रञ्चभक्षयेत् ।
न विस्मरति मेधावी श्रुत्वा वेदागमान्पुनः ।१०५
इस मन्त्र का ग्यारह लाख जप करना चाहिए और जप का दशांश
घृत से होम करे। मातृका कल्पित पीठ पर पूर्व की ही भांति उस देवी
का अभ्यर्चन करे ।१०१। ढाक के पुष्पों से हवन करके परा सिद्धिकी
प्राप्ति किया करता है। उसी के समान कदम्ब के पुष्पों से और श्री
वृक्ष के फलों से होम करने पर भी फल हुआ करता है ।१०२। कुन्द से
समुत्पन्न अथवा नन्द्यावर्त के पुष्पों से होम करके शीघ्र ही श्री की
प्राप्ति किया करता है और वाग्वल्लभ हो जाता है ।१०३। अपने ही
कल्क से युक्त ब्राह्मी बूँटी के रस को कपिला गौ के घृत में जप करता
हुआ पाचन करे। उसको दिन के आदि में नित्य पीवे तो सब शास्त्रों
के अर्थों का ज्ञाता हो जाया करता है ।१०४। इस विद्या से अभिमन्त्रित
किए हुए ब्राह्मी बूँटी के पत्रों का भक्षण करे तो मेधावी और वेद
आगमों का श्रवण करके कभी भी भूलता नहीं है ।१०५।

१६२ ] [ श्री शारदा तिलक
बहुना किमियं विद्या जपतां कामदामणिः ।
तोयस्थं शयनं विष्णोः सकेवलचतुर्मुखः ।१९०६
बिन्द्वर्धीशयुतो वह्निर्बिन्दुसद्योऽम्बुमाम भृगुः ।
उक्तानि त्रीणि बीजानि सद्भिः सारस्वताथिनाम् ।१०७
अङ्गानि कल्पयेद्बीजैर्द्विरुक्तैर्जातिसंयुतैः ।१०८
मुक्ताहारावदातां शिरसि शशिकलालङ्कृतां बाहुभिःस्वै
व्याख्यां वर्णाक्षमालां मणिमयकलशं पुस्तकं चोद्वहन्ती ।
आपीनोत्तुङ्गवक्षोरुहभरविनमन्मध्यदेशामधीशां
वाचा, मीडे चिराय त्रिभुवननमितां पुण्डरीके निषण्णाम् ।१९०६
त्रिलक्षं प्रजपेन्मत्रं जुहुयात्तद्दशांशतः ।
पायसेनाज्यसिक्तेन संस्कृते हव्यवाहने ।११०
इस विद्या के विषय में अधिक क्या कहा जावे, इसके जप करने
वालों को यह कामनाओं के देने वाली चिन्तामणि ही है। अब अन्य
मन्त्र का उद्धार बतलाया जाता है--विष्णोः शयन-आकार, तोयस्थ-
वकारस्थ, चतुर्मुख केवल स्वर रहित क्कार, अर्धीश-ऊ, वह्नि-रेफ से
युक्त सम्-ओकार, अम्बु-वकार, भृगु-सः, ये सत्पुरुषों के द्वारा सारस्वत
के अथियों के लिए तीन बीज कहे गये हैं ।१०६।१०७। दो वार कहे
हुए जाति संयुक्त बीजों से अङ्गों की कल्पना करनी चाहिए ।१०८।
ध्यान बताया जाता है-मोतियों के हार के समान अवदात अर्थात्
श्वेत-शिर में चन्द्रमा की कला से विभूषित अपनी बाहुओं के द्वारा
व्याख्या-वर्णों की अक्षमाला, मणिमय कलश और पुस्तक को वहन करती
हुई-आपीन (स्थूल) और ऊँचे स्तनों के भार से विनम्र मध्य देश वाली
तीनों भुवनों के द्वारा वन्दित, पुण्डरीक पर विराजमान वाणी की
अधीशा का मैं स्तवन करता हूँ ।१०६। इस मन्त्र का तीन लाख जप
करना चाहिए और जप का दशांश होम करे । होम संस्कार किए हुए
अग्नि में आज्य से सिक्त पायस के द्वारा करना चाहिए ।११०।

सप्तम पटल । [ १६३
वागीशी पूजयेत्पीठे विधिना मातृकोदिते ।
प्राक् प्रस्तुतेन मार्गेण प्रत्यहं साधकोत्तमः ।१११
व्याघातकुसुमैर्हुत्वा वाक्सिद्धिमतुलां लभेत् ।
जाती पुष्पैः सिताम्भोजैः सिक्तैश्चन्दनवारिणा ।११२
नन्द्यावर्तैः शुभैः कुन्दैर्हुत्वा वाक्सिद्धिमाप्नुयात् ।
जपन् बीजत्रयं मन्त्री सभायां जयमाप्नुयात् ।११३
सितां वचां वा ब्राह्मी वा जप्त्वा खादेद्दिनागमे ।
मेधां काममवाप्नोति साधकोनात्र संशयः ।११४
एवमुक्तेषु मन्त्रेषु दीक्षितोयतमानसः ।
एवं यो भजते भक्तया स भवेद् मुक्तिभुक्तिभाक् ।११५
सुसितैर्गन्धकुसुमैः पूजा सारस्वते विधौ ।
दूर्वाबीजाङ्कुरं पुष्पं राजवृक्षसमुद्भवम् ।११६
उत्पलानि प्रशस्तानि सिन्दुवारांकुराणि च ।
भजेत्सरस्वतीं नित्यमेतानि परिवर्जयेत् ।११७
मातृका में कथित पीठ पर विधि से वागीशी का अर्चन करना
चाहिए । साधकोत्तम को पूर्व से प्रस्तुत मार्गके ही द्वारा प्रतिदिन पूजन
करे ।१११। व्याघात पुष्पों से होम करके अतुल वाक् सिद्धि की प्राप्ति
करता है । जाती के पुष्पों-श्वेत कमलों को चन्दन के जल में सिक्त
करके अथवा नन्द्यावर्त के शुभ पुष्पों से कुन्द पुष्पों से हवन करके वाक्
सिद्धि को प्राप्त किया करता है । मन्त्रधारी तीनों बीजों का जप करता
हुआ सभा में विजय प्राप्त करता है ।११२।११३। सित वचा अथवा
ब्राह्मी बूटी, को अभिमन्त्रित करके दिन के आगम में खावे तो साधक
पूर्ण मेधा को प्राप्ति किया करता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।११४
इस तरह से उक्त मन्त्रों में दीक्षित यत्तमानस जो ऐसा भक्ति से सेवन
करता है वह भुक्ति और मुक्ति को प्राप्त करने वाला होता है ।११५।
सारस्वत विधि में सुन्दर श्वेत गन्ध और पुष्पों से पूजा होती है । दूर्वा
कुर, पुष्प, राजवृक्ष से समुद्भूत पुष्प और उत्पल तथा सिन्दु

१६४ ] [ श्री शारदा तिलक
वारांकुर प्रशस्त होते हैं । सरस्वती देवी का नित्य सेवन करना चाहिए
और इनको वर्जित कर देवे ।११६।११७।
आम्रातं गृञ्जनं विल्वं कलञ्जं लशुनं तथा ।
तैलं पलाण्डुं पिण्याकं शाङ्ग्राष्टिमपि भोजने ।११८
सर्वं पर्युषितं त्याज्यं सदा सारस्वताथिना ।
नाचरेन्निशि ताम्बूलं स्त्रियं गच्छेद्विवा न च ।११६
न सन्ध्ययोः स्वपेज्जातु नाशुचिः किञ्चिदुच्चरेत् ।
प्रदोषेषु भवेन्मौनी दिग्वस्त्रा न विलोकयत् ।१२०
न पुष्पितां स्त्रियं गच्छेन्न निन्देद्रामलोचनाम् ।
न मृषा वचनं ब्रूयान्नाक्रमेत्पुस्तकं सुधीः ।१२१
अक्षराढ्यानि पत्राणि नोपेक्षेत न लंघयेत् ।
चतुर्द्दश्यष्टमीपर्वप्रतिपद्ग्रहणेषु च ।१२२
संक्रमेषु च सर्वेषु विद्यां नैव पठेद्द्विजः ।
व्याख्याने सन्त्यजेन्निद्रामालस्य जृम्भणं बुधः ।१२३
क्रोधं निष्ठीवनं तद्वन्नीचाङ्गस्पर्शनं तथा ।
मनुष्यसर्पमार्जारिमण्डूकनकुलादयः ।१२४
अन्तरा यदि गच्छेयुस्तदा व्याख्यां परित्यजेत् ।
निशासु दीपध्वंसेषु पाठं सद्यः परित्यजेत् ।१२५
ज्ञात्वा दोषानिमान्सम्यग् भक्त्यायो भारती यजेन् ।
वाचां सिद्धिमवाप्नोति वाचस्पतिरिवापरः ।१२६
आम्रत, गाजर, विल्व, कलञ्ज, लशुन, तेल, प्याज, पिण्याक,
और शाङ्ग्राष्टिक इनका भोजन में वर्चन कर देना चाहिए । सभी वस्तु
जो पर्युषित हो त्याग देनी चाहिये । जो सारस्वत का इच्छुक हो उसे
ऐसा त्याग कर देना चाहिए । रात्रि में ताम्बूल का सेवन न करे और
दिन में कभी स्त्री का गमन न करे ।११८।११६। दोनों सन्ध्याओं में
कभी शयन न करे और अशुचि रहकर कुछ भी उच्चारण न करे ।
प्रदोषों में मौनी व्रतधारी रहे और नग्न स्त्री को कभी नहीं देखना

अष्टम पटल ] [ १६५
चाहिए ।१२०। जो स्त्री रजो धर्म में हो उसका गमन नहीं करे और
सुन्दर नेत्रों वाली स्त्री की निन्दा नहीं करनी चाहिए । असत्य वचन
कभी न बोले और सुधी पुरुष पुस्तक का अतिक्रमण नहीं करे ।१२१।
जो भो पत्र अक्षरों युक्त हों उनकी उपेक्षा न करे तथा उनको लांघन
भी नही चाहिए । चतुर्दशी, अष्टमी, पर्व दिन, प्रतिपदा, उग्र ग्रहण,
सब संक्रमणों में द्विज विद्या न पढ़े । बुध पुरुष व्याख्यान में निन्दा का
तथा जँभाई और आलस्य का त्याग कर देवे ।१२२।१२३। क्रोध, थूकना,
नीच के अङ्ग का स्पर्श न करे । मनुष्य, सर्प, मार्जार, मेंढक और नकुल
आदि यदि बीच में होकर जावें तो व्याख्या का परित्याग कर देना
चाहिए ।१२४। निशा में दीप के बुझने पर पाठ का तुरन्त त्याग कर
देवे । इन दोषों का ज्ञान प्राप्त कर भली भाँति भक्ति से जो भारती
का यजन करता है वह दूसरे वाचस्पति के ही समान सिद्धि को प्राप्त
किया करता है ।१२५।१२८।
अष्टम पटल
लक्ष्मी मन्त्र प्रकरण
अथ वक्ष्ये श्रियो मन्त्रान् श्रीसौभाग्यफलप्रदान् ।
यस्याः कटाक्षमात्रेण त्रैलोक्यमपि वर्द्धते ।१
वान्तं वह्निसमारूढं वामनेत्रेन्दुसंयुतम् ।
बीजमेतत् श्रियः प्रोक्तं चिन्तामणिरिवापरः ।२
ऋषिर्भृगुर्निवृच्छन्दो देवता श्रीः समीरिता ।
षड्दीर्घयुक्तबीजेन कुर्यादङ्गानि षट्क्रमात् ।३
कान्त्या काञ्चनसन्निभाँ हिमगिरिप्रख्यैश्चतुर्भिर्गजै-
हस्तोत्क्षिप्तहिरण्मयामृतघटैरासिच्यमानां श्रियम् ।