सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 151

सप्तम पटल ] [ १५१
करता है ।४५।४६। उसी भाँति उपलों के हवन करे तो महालक्ष्मी प्रसन्न
हो जाती है। ढाक के पुष्पों से होम करके एक ही वर्ष में कवि हो जाया
करता है ।४७। राजी (राई) और नमक के होम से वनिता को वश
में कर लेता है। मातृका में कहे हुए कर्म यहाँ पर भी साधक को करने
चाहिए ।४८। भूतलिपि में सम्पुट देकर जो मनुष्य मन्त्र का सेवन करता
है और क्रमोत्क्रम से सौ आवृत्ति करे तो उसका मन्त्र सिद्ध हो जाता
है ।४६।
सुषुप्तभुजगाकाराँ कुण्डलीमध्यवर्त्मना ।
संगमय्य परं स्थानं प्राणवित्तां परामृतैः ।५०
प्लावयेन्मूर्द्धिन मूलान्तं योगोऽयं सर्वसिद्धिदः ।
अनया न्यस्तदेहस्तु तेजसा भास्करोभवेत् ।५१
यन्त्रक्रियाविशेषांस्तु ज्ञात्वा कर्माणि साधयेत् ।५२
विन्द्राढ्यं गगनं तदेव शिवयुक् ज्ञानी चतुर्थ्यायुतो
नत्यन्तो मनुरेष मध्यविहितः साध्यस्य बन्ध्वक्षरैः ।
पत्रेष्वक्षरशो हकारपुटितांस्तद्भूतवर्णान्लिखे-
दन्त्यं चान्त्यदले विलिख्य मतिमान् वृत्तेन संवेष्टयेत् ।५३
विषद्यन्त्रमिदं प्रोक्तं लाक्षाचन्दननिर्मितम् ।
रोहिण्यामुदये राह्नोर्विषघ्नं सर्वशान्तिदम् ।५४
सुषुप्त अर्थात् सोये हुए भुजङ्ग के आकार वाली कुण्डली के मध्य
मार्ग के द्वारा परस्थान में सङ्क्रमित करके प्राणवित्ता को परामृत से
मूर्धा में मूल के अन्त पर्यन्त प्लावित करना चाहिए । यह सिद्ध योग
सब सिद्धियों के प्रदान करने वाला है। इसके द्वारा देह में जो न्यास
करता है वह तेज से भास्कर ही हो जाता है ।५०।५१। यन्त्र की क्रिया
के विषयों का ज्ञान प्राप्त करके कर्मों का साधन करना चाहिए ।५२।
अब विषद् यन्त्र बतलाया जाता है—गगन—हकार जो विन्दु से आढ्य
होवे, वह शिव अर्थात् एकादश एकार से युक्त होवे और ज्ञानी
शब्द चतुर्थी विभक्ति से युक्त होना चाहिए। अन्त में नमः—यह पद