शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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हैं। फिर इनके अस्त्रों से सातवीं करे। इस प्रकार से अष्टम आवृत्ति
होती है। २६। इस रीति से जगतों की धात्री श्रीभूत लिपि देवता का
पूजन करना चाहिए। पूर्व की भाँति उन स्थानों में विधि के साथ
अङ्गों का अभ्यर्चन करे। २७।
अम्बिका वाग्भवी दुर्गा श्रीशक्तिश्चोक्तलक्षणाः ।
ब्राह्मयाद्याः पूर्ववत् प्रोक्ताः कराली विकराल्युमा ।२८
सरस्वती श्रीदुर्गाषा लक्ष्मीश्रुतयौ स्मृतिधृतिः ।
श्रद्धा मेधा मतिः कान्तिराया षोडशक्तयः । २६
खड् खेटकधारिण्यः श्यामाः पूज्याः स्वलङ्कृताः ।
विद्या ह्री पुष्टयः प्रज्ञा सिनावाली कुहूः पुनः । ३०
रुद्रा वीर्या प्रभानन्दा स्याद्योषा ऋद्धिदा शुभा ।
कालरात्रिर्महारात्रिर्भद्रकाली कपर्दिनी । ३१
विकृतिर्दण्डिमुण्डिन्यौ सेन्दुरुखण्डा शिखण्डिनी ।
निशुम्भशुम्भमथिनी महिषासुरमर्दिनी । ३२
इन्द्राणी चैव रुद्राणी शङ्करार्र्द्धशरीरिणी ।
नारी नारायणी चैव त्रिशूलिन्यपि पालिनी ।३३
अम्बिका ह्लादिनी चैव द्वात्रिंशच्छक्तयःस्मृतः ।
चक्रहस्ताः पिशाचास्याः सम्पूज्याश्चोरुभूषणाः । ३४
अम्बिका, वाग्भवी, दुर्गा, और श्री शक्ति ये सब उक्त लक्षणों वाली
है। ब्राह्मी आदि पूर्व में की ही तरह कही गयी है। कराली, त्रिकराली,
उमा, सरस्वती, श्री, दुर्गा, ऊषा, लक्ष्मी, श्रुति, स्मृति, धृति, श्रद्धा,
मेधा, मति, क्रान्ति और आर्या ये सोलह शक्तियां हैं ।२८।२६। ये सब
खड्ग और खेटक के धारण करने वाली हैं—श्यामा और स्वलंकृता हैं,
इनका पूजन करना चाहिए। विद्या, ह्री, पुष्टि, प्रज्ञा, सिनीवाली,
कुहू, रुद्रा, वीर्या, प्रभा, मन्दा, योषा, ऋद्धिहा, शुभा, कालरात्रि,
महारात्रि, भद्रकाली, कपर्दिनी, विकृति दण्डी, मुण्डिनी, इन्दु खण्डा,
शिखण्डिनी, निशुम्भ, शुम्भमथिनी महिषासुर मर्दिनी, इन्द्राणी, रुद्राणी