शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२ ] [ श्री शारदा तिलक
होवे, जो वर्णिका में लिखना चाहिए। साध्य जो भी हो उसके विषाद
से ग्रस्त अमुक व्यक्ति के वस्त्र अक्षरों को अक्षरशः हकार से पुटित पत्रों
में लिखे। मतिमान पुरुष अन्य को अन्तिम दल में लिखे और उसे वृत्त
से संवेष्ठित कर देना चाहिए ।५३। वह विपद् यन्त्र कहा गया है जो
लाख और चन्दन से निर्मित होता है। रोहिणी में राहू के उदय में यह
विष के हनन करने वाला और सब प्रकार की शान्ति का प्रदाता
होता है ।५४।
यौ द्वौ साक्ष्यधरेन्दुखण्डशिरसौ स्यातां क्रमान् ङ्युतं
कोपेशं नमसाऽन्वित विरचयेन्मध्ये दलेष्वष्टसु ।
वायव्यान् यपुटान्विलिख्य विधिना शिष्टार्णमन्त्ये दल ॥
यन्त्रं वायुगृहेण वेष्टितमिदं स्यात्तालपत्रस्थितम् ।५५
स्वात्य मन्दोदये यन्त्रं वायव्ये निखनेद्विपोः ।
द्वयुच्चाटनकृतस्तस्य मृतिर्वा भवति ध्रुवम् ।५६
वह्नेर्त्रीजयुगं क्रमाच्छ्रवणसद्याद्वेन्दुयुक् स्यान्स्वरो
रोः फट्हृन्मनुरेष मध्यविहितः पत्रेषु वह्न्युद्भवान् ।
वर्णान्वह्निध्निरोधितान् प्रविलिखेत्साध्याक्षरैःपोषकै-
रन्त्य चान्त्यदले कृशानुपुरगं भूर्जोदरे कल्पितम् ।५७
शुभवारर्क्षसंयोगे लाक्षाकुङ्कुमनिर्मितम् ।
रक्षाकृत्सर्वभूतानां यन्त्रमाग्नेयमीरितम् ।५८
घातजाक्षरमिश्र तत्कृत्तिकायां कुजोदये ।
चिताङ्गारेण नवस्त्रे लिखितं नाशयेद्रिपुम् ।५६
अव वायव्य मन्त्र बतलाया जाता है—दो मकार होवे जो अक्षि-
इकार, शशधर—एकार, इन्दु खण्ड—विन्दु के शिर वाले होवे, चतुर्थी
से युत को पेश पद होवे और अन्त में नमः—यह पद होवे। मध्य में
अष्ट दलों में विरचित करे। य से पुटित वायव्यों लिखकर विधि से
शिष्ट वर्ण को अन्त्य दल में लिखे। इस यन्त्र को वायु गृह से वेष्टित
करके ताल पत्र पर स्थित करे ।५५। स्वाति नक्षत्र में मन्द अर्थात् शनि