सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

षष्ठ पटल ] [ १३६
उनको तन्तुओं से वेष्टित करे और शुद्धतापूर्वक वाहिर चन्दन से चर्चित
कर देना चाहिए । मन्त्रधारी पुरुष उनको सुन्दर धूप से सुवासित करे
और दूर्वा तथा अक्षतों से अन्वित कर देवे ।६२।
आपूर्य शुद्धतोयैस्तु (स्तान्) वेष्टयेदंऽशुकैस्तुतान् ।
मुक्तामाणिक्यवैदूर्यगोमेदान्वज्रविद्रुमौ ।६३
पुष्परागं मरकतं गरुडोन्दारमेव च ।
उक्तानि नव रत्नानि तेषु कुम्भेषु निःक्षिपेत् ।६४
विष्णुक्रान्तामिन्द्रवल्लीं देवीं दूर्वाश्व निःक्षिपेत् ।
स्थापयेत्कुम्भवक्त्रं षु कङ्कोलांश्चूतपल्लवान् ।६५
विन्यसेदक्षतोपेतांश्च फलान्वितान् ।
मध्येकुम्भं समाराध्य देवी मन्त्री वृषादितः ।६६
अर्चयेद्दिक्षु कुम्भेषु व्यापिन्याद्याः पुरोदिताः ।
वर्णमन्त्रयुता प्रोक्तलक्षणः सर्वसिद्धिदाः ।६७
शर्कराघृतसंयुक्तं पायसं च निवेदयेत् ।
स्पृष्ट्वा कुम्भान्कुशैर्विद्यां जपेत्साग्रंशतं शतम् ।६८
फिर उन कलशों को शुद्धि जल से आपूरित करे और उनको वस्त्रों
से वेष्टित कर देना चाहिए । नौ रत्नों के नाम—मुक्ता, माणिक—
वैदूर्य्य—गोमेद—वज्र (हीरा)—विद्रुम—पुष्पराग मरकल—गरु-
डोन्दार ये नौ रत्न होते हैं । इन नौ रत्नो के नाम बता दिए गए हैं
इनको उन कलशों में डाल देना चाहिए ।६३।६४। फिर उनमें विष्णु
क्रान्ता—इन्द्र वल्ली—देवी और दूर्वा का निक्षेप करे । उन कुम्भों के
मुखों में कंकोल और आम्र के पत्तों को स्थापित कर देना चाहिये ।६३।
।६५। वहाँ पर अक्षतों से उपेत तथा फलोंसे अन्वित चषकों का विन्यास
करे । मध्य में जो कुम्भ है वहां पर मन्त्रधारी देवी की समाराधना
करके वृषादि से दिशाओं में कुम्भों में पूर्व में उदित व्यापिनी आदि
का अर्चन करना चाहिए । पूर्व में कहे हुए लक्षणों से युक्त-वर्ण और
मन्त्र से युक्त सब सिद्धियों की प्रदात्री है ।६७। शर्करा और घृत

१४० [ श्री शारदा तिलक
से संयुक्त पायस को निवेदित करे । कुशाओं से कुम्भों का स्पर्श करके
साग्रशत-शत विद्या का जप करना चाहिए ।६८।
अभिषिञ्चेद्विलोमेन साध्यं त दत्तदक्षिणम् ।
सर्वपापक्षयकरं शुभदं शान्तिसिद्धिदम् । ६६
कृत्याद्रोहादिशमनं सौभाग्यश्रीजयप्रदम् ।
पुत्रप्रदं च वन्ध्यागामभिषेकमम्विदुः ।१००
ज्वरार्त्तं स्वपूरः स्थित्वा जपेत्साग्रं सहस्रकम् ।
ज्वरो नश्यति तस्याश क्षुद्रभूतग्रहा अपि ।१०१
परतेजसि सञ्चिन्त्य शुभ्रं स्रुतसुधामयम् ।
विधुं विद्यां जपेद्योगो त्रिषरोगविनाशकृत् ।१०२
बलीपलितरोगघ्नः क्षुत्पिपासाप्रणाशनः ।
पुष्टिदः सर्वसौभाग्यदायी लक्ष्मीशुभप्रदः ।१०३
विलोम से दी हुई दक्षिणा वाले उस साध्य का अभिषिञ्चन करना
चाहिए । यह अभिषेक समस्त पापोंके क्षय कर देने वाला शुभोंका दाता
और शान्ति तथा सिद्धि के देने वाला होता है । यह कृत्या के दोषों का
प्रशमन करने वाला—सौभाग्य, श्री और जय के देने वाला है । यह
अभिषेक वन्ध्या नारी को पुत्र प्रदान करने वाला होता है । ।६६-१००
जो मनुष्य ज्वर से आर्त्त होवे उसके आगे स्थित होकर साग्रसहस्र वार
जप करे तो उसका ज्वर शीघ्र ही नष्ट हो जाया करता है और क्षुद्र
भूत ग्रह भी विनष्ट हो जाया करते हैं ।१०१। पर तेज में शुभ्र स्रुत
सुधामय को सञ्चिन्त्य करके विधु विद्या का जप करे तो यह योग विष-
रोग के विनाश करने वाला होता है ।१०२। वली और पलित के रोग
का नाशक तथा क्षुधा और पिपासा के विनाश करने वाला है। यह
पुष्टि का दाता—सब प्रकार के सौभाग्य का प्रदाता और लक्ष्मी एव शुभ
का देने वाला है ।१०३।
सोमसूर्याग्निरूपाः स्युर्वर्णाः लोहत्रयं तथा ।
रौप्यमिन्दुः स्मृतो हेम सूर्य्यताम्रं हुताशनः ।१०४

षष्ठ पटल ] १४१
लोहभागाः समुद्दिष्टाः स्वरात्तक्षरसंख्यया ।
तैर्लोहैः कारयेन्मुद्रामसङ्कलितसङ्गताम् ॥१०५
साग्रं सहस्रं सञ्जप्य स्पृष्ट्वा यां जुहुयात्ततः ।
तस्यां सम्पातयेन्मन्त्री सर्पिषा पूर्वसंख्यया ।१०६
निःक्षिप्य कुम्भे तां मुद्रामभिषेकोक्तवर्त्मना ।
आवाह्य पूजयेद्देवीमुपचारैः समाहितः ।१०७
अभिषिच्य विनीताय दद्यात्तां मुद्रिकां गुरुः ।
इयं रक्षः क्षुद्ररोगविषज्वरविनाशिनी ।१०८
व्यालचौरमृगादिभ्यो रक्षां कुर्याद्विशेषतः ।
युद्धे विजयमाप्नोति धारयन्मनुजेश्वरः ।१०६
विभजेन्मातृकां मन्त्री नव वर्गान्यथाक्रमात् ।
अष्टावष्टौ स्वराः स्पर्शाः पंचशो व्यापका अपि ।११०
तीन प्रकार के लोह सोम-सूर्य और अग्नि के स्वरूप वाले हैं।
इनके वर्ण इसी प्रकार के होते हैं। रौप्य (चाँदी) चन्द्रमा है, हेम सूर्य
कहा गया है और ताम्र अग्नि है ।१०४। लोह भाग स्वर आदि अक्षरों
की संख्या से समुद्दिष्ट किये गये हैं। उन लोहों के द्वारा असंकलित
अर्थात् अमिलित से सङ्गत मुद्रा करनी चाहिए ।१०५। साग्र अर्थात्
अष्टाधिक एक सहस्र भली भांति जप करके उमका स्पर्श करके फिर
होम करना चाहिए । मन्त्रधारी उसमें पूर्व संख्या से घृत से सम्पातन
करे ।१०६! उस मुद्रा को अभिषेक में कहे हुए मार्ग से कुम्भ में निक्षिप्त
करके देवी का आवाहन करके पूजनोपचारों के द्वारा सावधान होकर
पूजा करे ।१०७। गुरु अभिषेक करके उन मुद्राओं को विनीत साधक
को दे देवे । यह मुद्रा राक्षस, क्षुद्र रोग, विष और ज्वर का विनाश
करने वाली होती है ।१०८। विशेष रूप से व्याल, चोर और पशु आदि
से रक्षा किया करती है । राजा इसको धारण करता हुआ युद्ध में
विजय को प्राप्त किया करता है ।१०६। मन्त्रधारी मातृका को यथा
क्रम नौ वर्गों में विभाजित करे । आठ-आठ स्वर हैं और स्पर्श पाँच
व्यापक भी हैं ।११०

१४२ ] [ श्री शारदा तिलक
नव वर्गाः समुत्पन्ना नवरत्नेश्वरा ग्रहाः ।
अर्केन्दुरक्तज्ञगुरुभृगुमन्दाहिकेतवः ।१११
माणिक्यं मौक्तिकं चारु विद्रुमं गारुडं पुनः ।
पुष्परागं लसद्वज्रं नीलं गोमेदिकं शुभम् ।११२
वैदूर्यं नव रत्नानि मुद्रान्तैः कल्पयेच्छुभाम् ।
जपहोमादिकं सर्वं कुर्यात्पूर्वोक्तवर्त्मना ।११३
योमुद्रां धारयेदेनां तस्य स्युर्वंशगा ग्रहाः ।
वर्द्धते तस्य सौभाग्यं लक्ष्मीरव्याहता भवेत् ।११४
कृत्याद्रोहा विनश्यन्ति नश्यन्ति सकलापदः ।
रक्षोभूतपिशाचाद्या नेक्षन्ते तं भयाकुलः ।११५
उपर्युपरि वर्द्धन्ते धनरत्नादिसम्पदः ।११६
तार्तीयोज्ज्वलकाणकं स्वरयुगैराविर्भवत्केसरम्
वर्गोद्भासिवसुच्छेद वसुमतीगेहेन सम्वेष्टितम् ।
ताराधीश्वरवारिवर्णविलसद्धिक्कोणसंशोभितम्
यन्त्रं वर्णतनोः पदं निगदित सर्वामयघ्नं परम् ।११७
नौ वर्ग उत्पन्न हुए। नौ रत्न हैं और नौ ग्रह होते हैं। उन ग्रहों
के नाम—सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, भृगु, शनि, राहु और केतु ये
होते हैं ।१११। माणिक्य, मौक्तिक, विद्रुम, गारुड, पुष्पराग, वज्र,
नीलम, गोमेद, चारु ये रत्नों के नाम होते हैं ।११२। उनमें वैदूर्य—
नवरत्न से शुभमुद्रा की कल्पना करनी चाहिए । जप और होम आदि
सब पूर्व में बताये हुए मार्ग से करे ।११३। जो पुरुष इस मुद्रा को
धारण किया करता है उसके वश में गमन करने वाले सभी ग्रह हुआ
करते हैं । उस पुरुष का सौभाग्य बढ़ा करता है और उसकी अव्याहत
गति होती है ।११४। कृत्या कृत द्रोह विनिष्ट हो जाया करते हैं और
सभी आपदाएं विनाश को प्राप्त हो जाया करती हैं । राक्षस, भूत
और पिशाच आदि तो भय से बेचैन होकर उसकी ओर अपनी दृष्टि
भी नहीं डाला करते हैं ।११५। धन और रत्नों आदि की सम्पदायें

सप्तम पटल ] [ १४३
ऊपर-ऊपर हो जाने की उस मनुष्य के गृह में स्पर्धा किया करती हैं
अर्थात् एक दूसरों से अत्यधिक बढ़ जाने की होड़ किया करती हैं
।११६। अब एक मन्त्र बतलाया जाता है—तार्त्तीय—कर्णिका बीज—
ताराधीश्वर, वारिवर्ण—वकार इनसे शोभित कोण ओर दिशा से
भूषित, तार्ती से उज्ज्वल कोण युक्त दो स्वरों से आविर्भूत केसर वाला-
वर्गोद्भासी आठ मन्त्रों वाला भूपुर से संवेष्ठित यह वर्णतनु का मन्त्र
कहा गया है, जो सब भयों का नाशक होता है ।११७।
———

सप्तम पटल

अथ भूतलिपिं वक्ष्ये सुगोप्यमतिदुर्लभम् ।
यां प्राप्य शम्भोर्मु नयः सर्वान्कामान्प्रपेदिरे ।१
पञ्च ह्रस्वाः सन्धिवर्णा व्यामेराग्निर्जलन्धरा ।
अन्त्यमाद्यं द्वितीयं च चतुर्थं मध्यमं क्रमात् ।२
पञ्च वर्गाक्षराणि स्युर्वान्तश्वतेन्दुभिः सह ।
एषा भूतलिपिः प्रोक्ता द्विचत्वारिंशदक्षरैः ।३
आयम्बराणं वर्गाणां पञ्चमाः शार्णसंयुताः ।
वर्गाद्या इति विज्ञेया नव वर्गाः स्मृता अमी ।४
व्योमेराग्निजलक्षोणी वर्गवर्णान्पृथक् विदुः ।
द्वितीयवर्गे भूर्न स्यान्नवमे जल धरा ।५
इसके अनन्तर भूत लिपि के विषय में बतलायेंगे जो बहुत ही
सुगोपनीय हैं और अत्यन्त दुर्लभ है । जिसको शम्भु से प्राप्त करके
मुनिगण ने अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लिया था ।१। पाँच
ह्रस्व हैं—यथा—अ इ उ ऋ लृ, सन्धि वर्ण—ए-ऐ-ओ-औ है क्योंकि
अकार और इकार की सन्धि होने पर ही 'ए' बनता है । व्योम—

१४४ [ श्री शारदा तिलक
हकार, ई, ऐ—यकार, अग्नि—रकार, जल—वकार धरा—लकार—
यह तीसरा वर्ग होता है। अन्त्य अर्थात् अन्त में होने वाला ङकार
और आद्य अर्थात् आदि में रहने वाला—ककार । द्वितीय—खकार,
चतुर्थ घकार मध्यम—गकार, यही क्रम चारों में होता है। इस प्रकार
के वर्गों का अष्टक होता है। पांच वर्ग के अक्षर होते हैं दान्त—शकार,
चेतः—षकार, इन्दु—सकार । यह भूतलिपि ब्यालीस अक्षरों की कही
गयी हैं। २।३। अम्बराणं का अर्थ हकार होता है। अ-ए और अम्बराणं
इनमें द्वन्द्व समास होता है। वर्गाणं का अर्थ अ-क-च-र-त-प-य और श
अर्थ है। ये वर्गों के आद्य अक्षर होते हैं। ये नौ वर्ग कहे गये हैं ।४।
अब वर्णों के अक्षरों की भूत स्वरूपता बतलायी जाती है—अर्थात् नौ
वर्गों के प्रथम आदि वर्ण व्योम आदि नामों वाले होते हैं । आकाश,
वायु, अग्नि, जल और भूमि इन वर्गों के वर्णों को पृथक्-पृथक् जानना
चाहिये । द्वितीय वर्ग में भू नहीं है और नवम में जल और धरा नहीं
है ।५।
विरिञ्चिविष्णुरुद्राश्विप्रजापतिदिगीश्वराः ।
क्रियादिशक्तिसहिताः क्रमात्स्युर्वर्गदेवताः ।६
ऋषिः स्याद्दक्षिणामूर्तिगायत्रं छन्द ईरितम् ।
देवता कथिता सद्भिः साक्षद्वर्णेश्वरी परा ।७
हादिषड्वर्गकैः कुर्यात्षडङ्गानि सजातिभिः ।
ध्यायेल्लिपतरोर्मूले देवीं तन्मयपङ्कजे ।८
वदन्ति सुधियोवृक्षं नित्यं वर्णमयं शुभम् ।
परसञ्चिन्महाबीजं विन्दुनादमहाशिखम् ।६
पृथिव्यक्षरशाखाभिः सर्वाशासु विजृम्भितम् ।
सलिलाक्षरपत्रैःस्वैस्संछादितजगत्त्रयम् ।१०
अब नौ वर्गों के देवता बतलाये जाते हैं—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, अश्वि
प्रजापति और दिगीश्वर अर्थात् यम, वरुण और सोम ये क्रिया आदि
शक्ति के सहित क्रम से वर्गों के देवता होते हैं ।६। इसका ऋषि दक्षिणा-

पञ्चम पटल } [ १४५
मूर्त्ति है और छन्द गायत्र कहा गया है। इसका देवता सत्पुरुषों के द्वारा
साक्षात् परा वर्णेश्वरी कही गयी है ।७। हकार से आदि सजाति षड्
वर्गों के द्वारा षड अङ्गों को करना चाहिए। लिपि वृक्ष के मूल में
तत्स्वरूप पंकज में देवी का ध्यान करना चाहिए ।८। सुधीगण इसको
वर्णमय परम शुभ और नित्य वृक्ष कहते हैं। इसका परसम्वित् महा-
बीज है और विन्दुनाद महाशिफा है ।६। पृथिवी के अक्षरों की शाखाओ
से सभी दिशाओं में विजृम्भित है । अपने सलिलाक्षर सत्रों से तीनों
जगतों को आच्छादित करने वाला है ।१०।
वह्निवर्णांऽकुरैर्दीप्तं रत्नैग्वि सुरद्रुमम् ।
मरुद्वर्ण लसत्पुष्पैर्द्योतन्तं वपुः श्रियम् ।११
आकाशार्णफलैर्नम्यं सर्वभूताश्रयं परम् ।
पर मृताख्यमधुभिस्सिञ्चन्त परमेश्वरीम् ।१२
वेदागमादिभिः कॢप्तं समुन्नतिमनोहरम् ।
शिवशक्तिमयं साक्षात् छाया श्रितगतत्रयम् ।१३
एनमाश्रित्य मुनयः सर्वान्कामानवाप्नुयुः ।१४
अङ्कोन्मत्तशशाङ्ककोटिसदृशीमापीनतुङ्गस्तनीम्
चन्द्राङ्काङ्कितमस्तकां मधुमदादालोलनेत्रयाम् ।
विभ्राणामनिशं वरं जपवटीं विद्यां कपालं करै
सन्दृप्त्यां यौवनगर्वितां लिपितनुं वागीश्वरीमाश्रये ।१५
रत्नों से सुरद्रुम की ही भाँति यह वहिन वर्णों के अंकुरों से दीप्त
है। मरुद् वर्णों से शोभित पुष्पों के द्वारा वपु की श्री को द्योतित
करने वाला है ।११। आकाश वर्णों के स्वरूप वाले फलों से नम्र और
सर्वभूतों का आश्रय स्थल है । परामृत नामक मधुओं से परमेश्वरी का
सिञ्चन करता हुआ है ।१२। यह वेदों आगमों आदि से कॢप्त है तथा
भली भाँति उन्नति ऊँचाई से मनोह है। यह साक्षात् शिव शक्ति से
परिपूर्ण साक्षात् भ्रू छाया से तीनों जगतों का आश्रय दिए हुए हैं ।१३।
मुनिगण इस प्रकार से इस का समाश्रय ग्रहण करके सभी कामनाओं

१४६ ] [ श्री शारदा तिलक
कामनाओं को प्राप्त करते थे ।१४। अब ध्यान बतलाते हैं—अंक में
करोड़ों उन्मत्त चन्द्रों के सदृश है, थोड़े पीन (स्थूल) और ऊँचे कुच-
युगों वाली, अर्ध चन्द्र से अंकित मस्तक से युत, मधु के मद से ईषत्
चञ्चल तीन नेत्रों से अन्वित, करकमलों में निरन्तर वरदान—जपवटी,
विद्या, कपाल को धारण करने वाली, यौवन के गर्व से संदृप्त, लिपि
के तनुवाली भगवती वागीश्वरी का मैं समाश्रय ग्रहण करता हूँ ।१५।
आधारदेशेऽधिष्ठाने नाभौ हृदि गले पुनः ।
विन्दौ नादे ततः शक्त्यां शिवे देशिकसत्तमः ।१६
नवाधारेषु विन्यस्य स्वरान्नव यथाविधि ।
हादिवर्णांस्तनौ न्यस्येन्मुखे ऊर्ध्वादितः सुधीः ।१७
ऊर्ध्वमाहेन्द्रयाम्योदक्पश्चिमेषु समाहितः ।
दोः पत्सु पञ्चवर्गाणां वर्णान्देशिकसत्तमः ।१८
अग्रमूलोपमूलाग्रमध्यदेशक्रमेण तु ।
जठरे पार्श्वयुगले नाभौ पृष्ठे समाहितः ।१९
गुह्यहृद्भ्रूविले न्यस्येत शादिवर्णत्रयं क्रमात् ।
सृष्टौ सर्गाविसना स्यात्स्थितौ वह्निमरुत्पयः ।२०
वियद्भूमिक्रमान्न्यस्येद्बिन्दुसर्गाविसानिकाम् ।
संहृतौ प्रतिलोमेन विन्यसेद्बिन्दुभूषिताम् ।२१
श्रेष्ठ आचार्य आधार देश में, अधिष्ठान में, नाभि में, कण्ठ में,
विन्दु में, नाद में, शिव में, शक्ति में नवाधारों में विन्यास करके फिर
नौ स्वरों को विधि पूर्वक सुधी हकार से आदि वर्णों को स्तनों में न्यास
करे और मुख में ऊर्ध्वादि से करे ।१६।१७। ऊर्ध्व में समाहित होकर
माहेन्द्री, याम्य, उत्तर और पश्चिम में न्यास करे । श्रेष्ठ आचार्य
पाँचों वर्गों के वर्णों का बाहुओं और पादों में न्यास करे ।
अग्रमूल, उपमूलाग्र और मध्य देश के क्रम से समाहित होकर जठर
में, पार्श्वों के युगल में अर्थात् दोनों पार्श्वों में, नाभि में, पृष्ठ में

सप्तम पटल ] [ १४७
न्यास करे । १८-१९। क्रम से शादि तीन वर्णों का गुह्य-हृदय और
भ्रूविल में न्यास करना चाहिए । सृष्टि में सर्ग के अवमान वाली होवे
और स्थिति में यहित, जल, आकाश और भूमि के क्रम से विन्दु
और विसर्ग के अवसान वाली का न्यास करे । और संहार में प्रतिलोम
से विन्दुभूषिता का न्यास करना चाहिए । २०-२१।
आगमोक्तेन मार्गेण दीक्षितः साधकोत्तमः ।
लक्षं न्यसेजपेत्तावदयुतं जुहुयात्तिलैः ।२२
पूजयेदन्वहं देवीं पीठे प्रागीरिते सुधीः ।
वर्णाब्जेनासनन्दद्यान्मूर्त्तिं मूलेन कल्पयेत् ।२३
देवीं सम्पूजयेत्तस्यामङ्गाद्यावरणान्यजेत् ।
आदावङ्गावृत्तिः पश्चादम्बिकाद्याभिरीरिता ।२४
द्वितीया मातृभिः प्रोक्ता तृतीया द्वष्टशक्तिभिः ।
चतुर्थी पञ्चमी प्रोक्ता द्वात्रिंशच्छाक्तिभिः पुनः ।२५
चतुः षष्ठ्या स्मृता षष्ठो शक्तिःभिर्लोकनायकैः ।
सप्तमी पुनरेतेषामस्त्रैः स्यादष्टमावृत्तिः ।२६
एवं पूज्या जगद्धात्री श्रीभूतलिपिदेवता ।
स्थानेषु तेषु विधिवदभ्यर्च्य्याङ्गानि पूर्ववत् ।२७
आगमों में वर्णित मार्ग से साधकों में उत्तम दीक्षित होकर एक
लाख जप करे और दश सहस्र तिलों के द्वारा होम करना चाहिए ।२२
सुधी को चाहिए कि वह पूर्व में वर्णित पीठ पर देवी का प्रतिदिन
पूजन करे । वर्णाब्ज से आसन अर्पित करे । और मूल मन्त्र के द्वारा
मूर्त्ति की कल्पना करे ।२२! उसमें देवी का भली-भाँति पूजन करे और
अंग आदि आवरणों का यजन करना चाहिए । आदि में अंगों की
आवृत्ति और पीछे अम्बिकाद्याओं से कही गयी है । २४। दूसरी
मातृकाओं से बतायी गयी है । तीसरी सोलह शक्तियों के द्वारा होती
है । फिर चौथी और पाँचवी बत्तीस शक्तियों से कही गयी हैं ।२५।
शक्तियों से और लोक नायकों के द्वारा चौंसठ से छठवीं बतायी गयी

१४८ ] [ श्री शारदा तिलक
हैं। फिर इनके अस्त्रों से सातवीं करे। इस प्रकार से अष्टम आवृत्ति
होती है। २६। इस रीति से जगतों की धात्री श्रीभूत लिपि देवता का
पूजन करना चाहिए। पूर्व की भाँति उन स्थानों में विधि के साथ
अङ्गों का अभ्यर्चन करे। २७।
अम्बिका वाग्भवी दुर्गा श्रीशक्तिश्चोक्तलक्षणाः ।
ब्राह्मयाद्याः पूर्ववत् प्रोक्ताः कराली विकराल्युमा ।२८
सरस्वती श्रीदुर्गाषा लक्ष्मीश्रुतयौ स्मृतिधृतिः ।
श्रद्धा मेधा मतिः कान्तिराया षोडशक्तयः । २६
खड् खेटकधारिण्यः श्यामाः पूज्याः स्वलङ्कृताः ।
विद्या ह्री पुष्टयः प्रज्ञा सिनावाली कुहूः पुनः । ३०
रुद्रा वीर्या प्रभानन्दा स्याद्योषा ऋद्धिदा शुभा ।
कालरात्रिर्महारात्रिर्भद्रकाली कपर्दिनी । ३१
विकृतिर्दण्डिमुण्डिन्यौ सेन्दुरुखण्डा शिखण्डिनी ।
निशुम्भशुम्भमथिनी महिषासुरमर्दिनी । ३२
इन्द्राणी चैव रुद्राणी शङ्करार्र्द्धशरीरिणी ।
नारी नारायणी चैव त्रिशूलिन्यपि पालिनी ।३३
अम्बिका ह्लादिनी चैव द्वात्रिंशच्छक्तयःस्मृतः ।
चक्रहस्ताः पिशाचास्याः सम्पूज्याश्चोरुभूषणाः । ३४
अम्बिका, वाग्भवी, दुर्गा, और श्री शक्ति ये सब उक्त लक्षणों वाली
है। ब्राह्मी आदि पूर्व में की ही तरह कही गयी है। कराली, त्रिकराली,
उमा, सरस्वती, श्री, दुर्गा, ऊषा, लक्ष्मी, श्रुति, स्मृति, धृति, श्रद्धा,
मेधा, मति, क्रान्ति और आर्या ये सोलह शक्तियां हैं ।२८।२६। ये सब
खड्ग और खेटक के धारण करने वाली हैं—श्यामा और स्वलंकृता हैं,
इनका पूजन करना चाहिए। विद्या, ह्री, पुष्टि, प्रज्ञा, सिनीवाली,
कुहू, रुद्रा, वीर्या, प्रभा, मन्दा, योषा, ऋद्धिहा, शुभा, कालरात्रि,
महारात्रि, भद्रकाली, कपर्दिनी, विकृति दण्डी, मुण्डिनी, इन्दु खण्डा,
शिखण्डिनी, निशुम्भ, शुम्भमथिनी महिषासुर मर्दिनी, इन्द्राणी, रुद्राणी

  • सप्तम पटल ] [ १४६
    शंकरा र्धश रीरिणी, नारी, नारायणी, त्रिशूलिनी, पालिनी, अम्बिका,
    ह्लादिनी ये बत्तीस शक्तियाँ कहीं हैं । चक्र, हस्ता, पिशाचा, और उरु-
    भूषणा पूजने योग्य हैं । २६।३४।
    पिङ्गलाक्षी विशालाक्षी समृद्धिर्वृद्धिरेव च ।
    श्रद्धा स्वाहा स्वधाऽभिख्या माया संज्ञा वसुन्धरा ।३५
    त्रिलोकधात्री सावित्री गायत्री त्रिदशेश्वरी ।
    सुरूपा बहुरूपा च स्कन्दमाताऽच्युतप्रिया ।३६
    विमला चामला पश्चादरुणी पुनरारुणी ।
    प्रकृतिर्विकृतिः सृष्टिः स्थितिः संहृतिरेव च । ३७
    सन्ध्या माता सती हंसी मद्दिका कुब्जिकाऽपरा (१) ।
    वेदमाता भगवती देवकी कमलासना । ३८
    त्रिमुखी सप्तमुख्यान्या सुरासुरविमर्दिनी ।
    लम्बोष्ठी चोर्ध्वकेशी च बहुशीर्षा वृकोदरी । ३६
    रथरेखाह्वया पश्चाच्छशिरेखा तथाऽपरा ।
    गगनवेगा पवनवेगा च तदनन्तरम् ।४०
    ततोभुवनमालाख्या ततः स्यान्मदनातुरा ।
    अनङ्गाऽनङ्गमदना तथैवानङ्गमेखला ।४१
    अनङ्गकुसुमा विश्वरूपाऽसुरभयङ्करी ।
    अक्षोभ्यासत्यवादिन्यौ वज्ररूपा शुचिव्रता ।४२
    पिङ्गलाक्षी, विशालाक्षी, समृद्धि, वृद्धि, श्रद्धा, स्वाहा, स्वधा,
    माया, वसुन्धरा, संज्ञा, त्रिलोक धात्री, सावित्री, गायत्री, त्रिदशेश्वरी,
    सुरूपा, बहुरूपा, स्कन्दमाता, अनुच्युत प्रिया, विमला, अमला, अरुणी,
    आरुणी, प्रकृति, सृष्टि, स्थिति, संहृति, सन्ध्या, माता, सती, हंसी,
    मद्दिका, कुब्जिका, अपरा, देवमाता, भगवती, देवकी, कमलासना,
    त्रिमुखी, सप्तमुखी, अन्या, सुरासुर विमर्दिनी, लम्बोष्ठा, ऊर्ध्व केशी,
    बहुशीर्षा, वृकोदरी, रथरेखा, शशिरेखा, अपरा, गगन, वेगा, पवन,

१५० ] [ श्री शारदा तिलक
वेगा, भुवनमाला, मदनातुरा, अनङ्गा मदना, अनङ्गमेखला, अनङ्ग-
कुसुमा, विश्व रूपा, असुर भयङ्करी, अक्षोभ्या, सत्यवादिनी, वज्ररूपा,
शुचिव्रत । ३५।४२।
वरदाख्या च वागीशा चतुःषष्टिः समीरिताः ।
चापबाणधरा सर्वा ज्वालाजिह्वाः समीरिताः ।४३
दंष्ट्रिण्यश्चोर्ध्वकेश्यास्ता युद्धोपक्रान्तमनसाः ।
सर्वाभरणसद्दीप्ताः पूजनीयाः प्रयत्नतः ।४४
लोकेशाः पूर्ववत्पूज्या स्तद्वद्वज्रादिकान्यपि ।
इत्थं यः पूजयेन्मन्त्री श्रीभूतलिपिदेवताम् ।४५
श्रीवाण्योः स भवेद्भूमिदेवैरप्यभिवन्द्यते ।
कमलैरयुतं हुत्वा राजानं वशमानयेत् ।४६
उत्पलैर्जुहुयात्तद्वन्महालक्ष्मीः प्रजायते ।
पलाशकुसुमैर्हुत्वा वत्सरेण कविर्भवेत् ।४७
राजी-लवणहोमेन वनितां वशमानयेत् ।
मातृकोक्तानि कर्माणि कुर्यादत्रापि साधकः ।४८
भूतलिप्या पुटीकृत्यं योमन्त्रं भजते नरः ।
क्रमोत्क्रमाच्छतावृत्त्या यस्य सिद्धो भवेन्मनुः ४६
वरदा, वागीशा, ये चौंसठ कही गई हैं। ये सब चाप और बाणों
के धारण करने वाली हैं और इनकी जिह्वा ज्वाला बताई गई है।
।४३। ये दाढ़ों वाली है और ऊपर की ओर केशों वाली हैं। और ये
युद्ध करने के लिए उपक्रान्त मन वाली हैं। ये समस्त आभरणों से
दैदीप्यमान है। इनका प्रयत्न पूर्वक पूजन करना चाहिए ।४३।४४।
लोकेशों का पूजन पूर्व की ही तरह करे तथा उनके आयुध वज्र आदि
का भी अर्चन करना चाहिए। इस तरह से मन्त्रधारी जो श्रीभूत लिपि
देवता का पूजन करता है वह श्री और वाणी का स्थान हो जाता है
और देवगणों के द्वारा भी वन्दना किया जाया करता है। दश हजार
आहुतियां कमलों के द्वारा देकर राजा को भी अपने वश में ले आया

सप्तम पटल ] [ १५१
करता है ।४५।४६। उसी भाँति उपलों के हवन करे तो महालक्ष्मी प्रसन्न
हो जाती है। ढाक के पुष्पों से होम करके एक ही वर्ष में कवि हो जाया
करता है ।४७। राजी (राई) और नमक के होम से वनिता को वश
में कर लेता है। मातृका में कहे हुए कर्म यहाँ पर भी साधक को करने
चाहिए ।४८। भूतलिपि में सम्पुट देकर जो मनुष्य मन्त्र का सेवन करता
है और क्रमोत्क्रम से सौ आवृत्ति करे तो उसका मन्त्र सिद्ध हो जाता
है ।४६।
सुषुप्तभुजगाकाराँ कुण्डलीमध्यवर्त्मना ।
संगमय्य परं स्थानं प्राणवित्तां परामृतैः ।५०
प्लावयेन्मूर्द्धिन मूलान्तं योगोऽयं सर्वसिद्धिदः ।
अनया न्यस्तदेहस्तु तेजसा भास्करोभवेत् ।५१
यन्त्रक्रियाविशेषांस्तु ज्ञात्वा कर्माणि साधयेत् ।५२
विन्द्राढ्यं गगनं तदेव शिवयुक् ज्ञानी चतुर्थ्यायुतो
नत्यन्तो मनुरेष मध्यविहितः साध्यस्य बन्ध्वक्षरैः ।
पत्रेष्वक्षरशो हकारपुटितांस्तद्भूतवर्णान्लिखे-
दन्त्यं चान्त्यदले विलिख्य मतिमान् वृत्तेन संवेष्टयेत् ।५३
विषद्यन्त्रमिदं प्रोक्तं लाक्षाचन्दननिर्मितम् ।
रोहिण्यामुदये राह्नोर्विषघ्नं सर्वशान्तिदम् ।५४
सुषुप्त अर्थात् सोये हुए भुजङ्ग के आकार वाली कुण्डली के मध्य
मार्ग के द्वारा परस्थान में सङ्क्रमित करके प्राणवित्ता को परामृत से
मूर्धा में मूल के अन्त पर्यन्त प्लावित करना चाहिए । यह सिद्ध योग
सब सिद्धियों के प्रदान करने वाला है। इसके द्वारा देह में जो न्यास
करता है वह तेज से भास्कर ही हो जाता है ।५०।५१। यन्त्र की क्रिया
के विषयों का ज्ञान प्राप्त करके कर्मों का साधन करना चाहिए ।५२।
अब विषद् यन्त्र बतलाया जाता है—गगन—हकार जो विन्दु से आढ्य
होवे, वह शिव अर्थात् एकादश एकार से युक्त होवे और ज्ञानी
शब्द चतुर्थी विभक्ति से युक्त होना चाहिए। अन्त में नमः—यह पद

१५२ ] [ श्री शारदा तिलक
होवे, जो वर्णिका में लिखना चाहिए। साध्य जो भी हो उसके विषाद
से ग्रस्त अमुक व्यक्ति के वस्त्र अक्षरों को अक्षरशः हकार से पुटित पत्रों
में लिखे। मतिमान पुरुष अन्य को अन्तिम दल में लिखे और उसे वृत्त
से संवेष्ठित कर देना चाहिए ।५३। वह विपद् यन्त्र कहा गया है जो
लाख और चन्दन से निर्मित होता है। रोहिणी में राहू के उदय में यह
विष के हनन करने वाला और सब प्रकार की शान्ति का प्रदाता
होता है ।५४।
यौ द्वौ साक्ष्यधरेन्दुखण्डशिरसौ स्यातां क्रमान् ङ्युतं
कोपेशं नमसाऽन्वित विरचयेन्मध्ये दलेष्वष्टसु ।
वायव्यान् यपुटान्विलिख्य विधिना शिष्टार्णमन्त्ये दल ॥
यन्त्रं वायुगृहेण वेष्टितमिदं स्यात्तालपत्रस्थितम् ।५५
स्वात्य मन्दोदये यन्त्रं वायव्ये निखनेद्विपोः ।
द्वयुच्चाटनकृतस्तस्य मृतिर्वा भवति ध्रुवम् ।५६
वह्नेर्त्रीजयुगं क्रमाच्छ्रवणसद्याद्वेन्दुयुक् स्यान्स्वरो
रोः फट्‌हृन्मनुरेष मध्यविहितः पत्रेषु वह्न्युद्भवान् ।
वर्णान्वह्निध्निरोधितान् प्रविलिखेत्साध्याक्षरैःपोषकै-
रन्त्य चान्त्यदले कृशानुपुरगं भूर्जोदरे कल्पितम् ।५७
शुभवारर्क्षसंयोगे लाक्षाकुङ्कुमनिर्मितम् ।
रक्षाकृत्सर्वभूतानां यन्त्रमाग्नेयमीरितम् ।५८
घातजाक्षरमिश्र तत्कृत्तिकायां कुजोदये ।
चिताङ्गारेण नवस्त्रे लिखितं नाशयेद्रिपुम् ।५६
अव वायव्य मन्त्र बतलाया जाता है—दो मकार होवे जो अक्षि-
इकार, शशधर—एकार, इन्दु खण्ड—विन्दु के शिर वाले होवे, चतुर्थी
से युत को पेश पद होवे और अन्त में नमः—यह पद होवे। मध्य में
अष्ट दलों में विरचित करे। य से पुटित वायव्यों लिखकर विधि से
शिष्ट वर्ण को अन्त्य दल में लिखे। इस यन्त्र को वायु गृह से वेष्टित
करके ताल पत्र पर स्थित करे ।५५। स्वाति नक्षत्र में मन्द अर्थात् शनि

सप्तम पटल ] [ १५३
के उदय शत्रु के गृह के द्वार में वायव्य में खोदकर रक्खें तो शत्रु का
उच्चाटन करने वाला होता है अथवा निश्चित रूप से मृत्यु हो जाती
है ।५६। अब आग्नेय को बतलाया जाता है—श्रवण—(उः) सद्य ओ,
अर्धेन्दु—विन्दु इनमें युक्त वह्नि के बीज दो अर्थात् दो रेफ, हृन्नमः७
यह पद और फट् होवे—यह मन्त्र मध्य में विहित होवे । पोषक साध्य
के अक्षरों से युक्त वह्नि निरोधित वर्णों को पत्रों में लिखना चाहिए
अनय को अन्तिम दल लिखे और कृशानुपुर में जर करके भोज पत्र में
कल्पित करे ।५७। शुभ वार नक्षत्र के संयोग में लाक्षा और कुम्कुम से
निर्माण किया हुआ यह समस्त प्राणियों की रक्षा करने वाला आग्नेय
यन्त्र होता है—ऐसा कहा गया है ।५८। वह घातक अक्षरों से मिश्रित
कृत्तिका में मंगल के उदय में चिता के अङ्गार से उसके वस्त्र पर लिखे
तो यह रिपु का नाश कर दिया करता है ।५६।
नासार्द्धेन्दुमदम्बु तन्मनुयुतं सार्द्धेन्दुडेन्तोविधु-
विध्वन्तेतु भुवे नमोविगदितो मध्ये मनुर्वारुणान् ।
वर्णान्पत्रपुटेषु वाक्षरपुटान्साध्यस्य वन्ध्वक्षरै-
रालिख्याप्यपुरेण वेष्टितमिदं यन्त्रं भवेद्वारुणम् ।६०
भूर्जपत्रे लिखेदेतद्रक्तचन्दनवारिणः ।
तरुणत्रोंदये काव्ये यन्त्रं वश्यादिकृद्भवेत् ।६१
गण्डो बिन्दुविभूषितोवसुमती स्यात्तादृशी गण्डयो
मध्यस्थौ तु जगौ लुके नतिरिमि मन्त्रं लिखेन्मध्यतः ।
लान्ताल्लांपुटीकृतान्वसुमतीवर्णान् दलेष्वालिखे-
त्सेवावर्णयुतान्यथाविधि भुवो गेहेन संवेययेत् ।६२
ज्येष्ठायामुदिते सौम्ये मृदि गैरिकनिर्मितम् ।
पार्थिवं यन्त्रमचिरात्सर्वत्र स्तम्भकृद् भवेत् ।६३
अब वारुण यन्त्र बतलाते हैं—नासा-ऋः, अर्द्धेन्दु, विन्दु-अम्बुक।,
मनु शब्द का अर्थ चतुर्दशवां स्वर है अतः मनु से ओंकार कहा जाता
है । इससे युत हो और चतुर्थी के अन्त वाला विधु होवे । फिर भुवे
नमः— यह होना चाहिए । मध्य में मन्त्र होवे । फिर वकाराभूर पुटित

१५४ ] [ श्री शारदा तिलक
साध्य के वन्धु अक्षरों के सहित वारुण वर्णों को पद्मपुटों में लिखकर
आप्यपुर से वेष्टित करे तो यह वारुण यन्त्र हो जाता है। ६०। इस मंत्र
को रक्त चन्दन के जल से भोज्य पत्र पर लिखना चाहिए। तरुण नक्षत्र
के उदय में भृगु वार में बनावे तो यह यन्त्र वश आदि के करने वाला
होता है। ६१। पार्थिव मन्त्र बतलाते हैं—गण्ड—लृं', वसुमती—लकार
गण्ड विन्दु से युक्त होवे। गण्ड वर्णों के मध्य में स्थित ज और ग—ये
वर्ण होवे। लुके स्वरूप है। अन्त में नमः—यह होता है। इस मन्त्र
को मध्य में लिखे। ल वर्ण से पुटीकृत लान्त वसुमती के वर्णों को दलों
में लिखना चाहिए जो सेवा वर्ण युक्त होवे। विधि के साथ भूपुर वेष्टित
करे। ६२। ज्येष्ठा ! नक्षत्र के उयय में सौम्य में मिट्टी में गैरिक से
निर्मित यह पार्थिव यन्त्र शीघ्र ही सर्वत्र स्तम्भन करने वाला होता
है। ६३।
गुह्याद्गुह्यतरां नित्यां श्रीभूतलिपिदेवताम् ।
यः सेवते शुभैः पुत्रैर्धनधान्यैश्च पूर्यते। ६४
अत्रिर्व्वरुणसंरुद्धो द्वाग्वादिनि ठद्वयम् ।
वागीश्वर्या दशार्णोऽयं मन्त्रो वाग्विभवप्रदः। ६५
ऋषिःकण्वोविराट्छन्दो देवता श्राकसमीरिता ।
शिरः श्रवण दृङ् नासावदनान्धुगुदेष्विमान्। ६६
न्यस्यार्णान् प्राग्वदङ्गानि मातृकोक्तानि कल्पयेत्। ६७
तरुणसकलमिन्दोर्विभ्रतीशुभ्रकान्तिः
कुचभरनमिताङ्गी सन्निषण्णा सिताब्दे ।
निजकरकमलद्यल्लेखनीपुस्तकश्रीः
सकलविभवसिद्धयै पातु वाग्देवता नः। ६८
यह गुह्य से भी अधिक गुह्य है। इस नित्या श्री भूत लिपि देवता
को जो सेवन दिया करता है वह शुभ-पुत्र और धन-धान्य से परिपूर्ण
हो जाया करता है। ६४। अत्रि—हकार, वरुण—वकार। इससे सम्पु-
टित होवे। फिर द्वाग्वादिनि और फिर दो ठकार होवें। यह वागी-
श्वरी का दश वर्णों का मन्त्र होता है जो वाग्विभव के देने वाला है। ६५

सप्तम पटल ] [ १५५
इस मन्त्र का ऋषि कण्व है और विराट् छन्द है तथा वाक् इसका
देवता बताया गया है। शिर, श्रवण, नेत्र, नासिका, मुख, अन्धु और
गुदा में इन वर्णों का न्यास करके पूर्व की ही तरह मातृका में कथित
अंगों की कल्पना करनी चाहिए ।६७। अब ध्यान बतलाया जाता है-
चन्द्र के एक खण्ड को धारण करने वाली, शुभ्र क्रान्ति से संयुत, कुच
युग भार से नमित अङ्ग वाली, सितकमल पर विराजमान, अपने करों
में लेखनी, पुस्तक श्री को धारण करती हुई वह वाग्देवता सम्पूर्ण वैभव
की सिद्धि के लिए जापकी रक्षा करे ।६८।
दशलक्षं जपेन्मन्त्रं दशांशं जुहुयात्ततः ।
पुण्डरीकैः पयोभ्यक्तैस्तिलैर्वा मधुराप्लुतैः ।६६
मातृकौदीरिते पीठे वागीशीमर्चयेत्सुधीः ।
वर्णाब्जेनासनं दद्यान्मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ।७०
आदावङ्गानि संपूज्य पश्चाच्छक्तीरिमा यजेत् ।
योगा सत्या च विमला ज्ञाना बुद्धिः स्मृतिः पनः ।७१
मेधा प्रज्ञा च पत्रेषु मुद्रापुस्तकधारिणीः ।
दलाग्रेषु समभ्यर्च्य ब्राह्मयाद्यास्ता यथाविधि ।७२
लोकपाला बहिः पूज्यास्तेषामस्त्राणि तद्बहिः ।
एवं संपूजयेन्मन्त्री जपहोमादितत्परः ।७३
इस मन्त्र का दश लाख जप करे और जप का दशांश होम करना
चाहिए। हवन दूध में अक्त कमलों से अथवा मधुर में आप्लुत तिलों
से करें। सुधी पुरुष मातृका में उदीरि पीठ पर वागीशी का अर्चन
करे, वर्णाब्ज से आसन देवे और मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना करे
।६६।७०। आदि में अंगों का पूजन करके पीछे इन शक्तियों का यजन
करना चाहिए। योग, सत्या, विमला, ज्ञाना, बुद्धि, स्मृति, मेधा और
प्रज्ञा का पत्रों में अर्चन करे। दलों के अग्र भागों में मुद्रा तथा पुस्तक
को धारण करने वाली ब्राह्मणी आदिका विधि के साथ समभ्यर्चन
करना चाहिये ।७१।७२। लोकपालों का यजन बाहिर करे तथा उनके

१५६ ] [ श्री शारदा तिलक
आयुधों का अर्चन उनके बाहिर करना चाहिए। इस प्रकार से जप
और होम आदि में परायण मन्त्रधारी भली-भाँति पूजन करे। ७३।
ब्रह्मचर्यरतः शुद्धःशुद्धदन्तनखादिकः ।
संस्मरन्सर्ववनिताः सततं देवताधिया ।७४
कवित्वं लभते धीमान् मासैर्द्वादशभिर्ध्रुवम् ।
कृत्वा तन्मन्त्रितं तोयं सहस्रं प्रत्यहं पिबेत् ।७५
महाकविर्भवेन्मन्त्री वत्सरेण न संशयः ।
उरोमात्रे जले स्थित्वा ध्यायेन्मार्तण्डमण्डले ।७६
स्थितां देवीं प्रतिदिनं त्रिसहस्रं जपेन्मनुम् ।
लभते मण्डलात्सिद्धि वाचमप्रतिमां भुवि ।७७
पलाशबिल्वकुसुमैर्जुहुयान्धुरोक्षितैः ।
समिद्भिर्वा तदुत्थाभिर्यशः प्राप्नोति वाक्पतेः ।७८
ब्रह्मचर्य व्रत में रत और दाँत तथा नरखों को शुद्ध रखने वाला
पुरुष निरन्तर सब वनिताओं का देवता की बुद्धि से निरन्तर स्मरण
करता हुआ पुरुष बारह मासों में ही धीमान् होकर निश्चय ही कवित्व
का लाभ किया करता है। इस मन्त्र से एक सहस्र बार अभिमन्त्रित
करके जल को प्रतिदिन पान करे तो मन्त्रधारी एक ही वर्ष में महा-
कवि हो जाया करता है—इसमें कुछ भी संशय नहीं है। वक्षःस्थल
पर्यन्त जल में स्थित होकर मार्तण्ड मण्डल में स्थित देवी का ध्यान
करे और नित्य ही तीन सहस्र मन्त्र का जप किया करे तो मण्डल से
सिद्धि का लाभ करता है और भूमण्डल में अप्रतिम वाणी को प्राप्त कर
लेता है ।७४।७५।७६।७७। पलाश-बिल्व के पुष्पों से मधुर में उक्षित
करके अथवा उनसे ग्रहण की हुई समिधाओं से हवन करे तो वाणी के
स्वामी के यश को प्राप्त कर लेता है ।७८।
होमोऽयं सर्वसौभाग्यलक्ष्मीवश्यप्रदोभवेत् ।
राजवृक्षसमुद्भूतैः प्रसूनैर्मधुराप्लुतैः ।७६

सप्तम पटल ] [ १५७
तत्समिद्भिश्च जुहुयात्कवित्वमतुलं लभेत् ।
एवं दशाक्षरी प्रोक्ता सिद्धये वाक्मिच्छताम् ।८०
हृदयान्ते भगवति वद शब्दयुगं पुनः ।
वाग्देवि वह्निजायान्तं वाग्भवाद्यं समुद्धरेत् ।८१
मनुं षोडशवर्णाढ्यं वागैश्वर्यफलप्रदम् ।
मनोः षड्भिः पदैः कुर्यात्षडङ्गानि सजातिभिः ।८२
शुभ्रां स्वच्छविलेपमाल्यवसनां शीतांशुखण्डोज्ज्वलां
व्याख्यामक्षगुणं सुधाढ्यकलशं विद्यां च हस्ताम्बुजैः ।
विभ्राणां कमलासनां कुचनतां वाग्देवतां सुस्मिताम् ।
वन्दे वाग्विभवप्रदां त्रिनयनां सौभाग्यसम्पत्करीम् ।८३
यह होम सब प्रकार के सौभाग्य-लक्ष्मी और वश्य के प्रदान करने
वाला होता है । राज वृक्ष से समुत्पन्न पुष्पों से मधुर में आप्लुत करके
और उसकी समिधाओं से होम करे तो अनुपम कवित्व की प्राप्ति कर
लिया करता है । इस प्रकार से वाक् शक्ति की इच्छा रखने वालों के
लिये यह दशाक्षरी सिद्धि के लिए बतलायी गयी है ।७९।८०।८१। हृदय
के अन्दर ‘भगवती’ वद (यह शब्द दो बार) कहे । वाग्देवि-यह कहकर
‘वाग्भवाद्य’ स्वाहा’ यह कहे—ऐसे मन्त्र का उद्धार करना चाहिए ।
यह मन्त्र सोलह अक्षरों से युक्त है जो वाक् के ऐश्वर्य का फल का
प्रदाता होता है । मन्त्र के छै स्वजाति पदों से षट् अङ्गों को करे ।८२
अब ध्यान बतलाया जाता है—परम स्वच्छ विलेपन और वस्त्र से सम-
न्विता-परम शुभ्र-चन्द्र खण्ड के धारण करने से अतीव समुज्ज्वला कर
कमलों में व्याख्या-अक्षमाला, सुधा से पूर्ण कलश और विद्या को धारण
करन वाली—कमल के आसन पर विराजमान—कुच युगल के भार से
नम्रा-सुन्दर स्मित वाली-वाग्विभव की प्रदात्री—तीन नयनों से युक्त-
सौभाग्य और सम्पदा करने वाली देवी की मैं वन्दना करता हूँ ।८३।

१५८ ] [ श्री शारदा तिलक
हविष्याशी जपेत्सम्यग्वसुलक्षमनत्यधीः ।
दशांशं जुहुतादन्ते तिलैराज्यपरिप्लुतैः ।८४
मातृकोक्ते यजेत्पीठे देवीं प्रागीरिते क्रमात् ।
पिवेत्तन्मन्त्रितं तोयं प्रातःकाले दिनेदिने ।८५
विद्वान्वत्सरतो मन्त्री भवेन्नास्ति विचारणा ।८६
अभिषिञ्चेज्जलैर्जप्तैरात्मानं स्नानकर्मणि ।
तर्पयेत्तां जलैःशुद्धै रतिमेधामवाप्नुयात् ।८७
पुष्पगन्धादिकं सर्वं तज्जप्तं धारयेत्सुधीः ।
सभायां पूज्यते सद्भिर्वादे च विजयी भवेत् ।८८
हविष्य के अशन करने वाला, अनन्य बुद्धि वाला भली-भाँति आठ
लाख मन्त्र का जाप करे तथा जप का दशांश आज्य से परिप्लुत तिलों
से होम अन्त में करना चाहिए । मातृकाओं में कथित पीठ पर जो पूर्व
में कहा गया है। उस पर क्रम से यजन करना चाहिए । उस मन्त्र
में अभिमन्त्रित जल को प्रातःकाल में प्रतिदिन पान करना चाहिए ।
।८४।८५। मन्त्रधारी एक ही वर्ष में विद्वान् हो जाया करता है—इसमें
कुछ भी विचार करने की आवश्यकता नहीं है ।८६। स्नान के कर्म में
जप किए हुए जल से अपने आपका अभिषेक करे और जल से उस देवी
का तर्पण करे तो अत्यधिक मेधा की प्राप्ति किया करता हैं ।८७।
पुष्प और गन्ध आदि सभी को उस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करके
धारण करना चाहिए । वह सुधी पुरुष सभामें सत्पुरुषों के द्वारा पूजित
हुआ करता है और वह वाद में विजयी होता है ।८८।
तारो मायाऽधरो बिन्दुः शक्तिस्तारः सरस्वती ।
ङेन्तोन्त्यन्तिकोमन्त्रः प्रोक्त एकादशाक्षरः ।८६
ब्रह्मारन्ध्रभ्रुवोर्मध्ये नवरन्ध्रेषु च क्रमात् ।
मंत्रवर्णान्न्यसेन्मन्त्री वाग्भवेनाङ्गकल्पना ।६०
वाणीं पूर्णनिशाकरोज्ज्वलमुखीं कर्पूरकुन्दप्रभां
चन्द्रार्धाङ्कितमस्तकां निजकरैः संविभ्रतीमादरात् ।