सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
१६० सौन्दर्य लहरी
के निकट अपने मुकुटों की शोभा बढाने के लिये हाथ जोडे
खडे रहते हैं ।
सं० टि० भगवती के पूजन से सब देवों का पूजन हो जाता है ।
[ २६ ]
विरिञ्चिः पञ्चत्वं व्रजति हरिराप्नोति विरतिं
विनाशं कीनाशो भजति धनदोयाति निधनम् ।
वितन्द्री माहेन्द्री विततिरपि संमीलति दृशा
महासंहारेऽस्मिन्विहरति सतिस्त्वत्पतिरसौ ॥
कठिन शब्दः-- कीनाश=यमराज, दृशां=दृष्टि, पंचत्व=मरण
( जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरिया से ५ वीं अवस्था ।
अर्थः-- हे सति ! इस महा प्रलय के समय ब्रह्मा
पांचवी अवस्था को प्राप्त हो जाता है, अर्थात् मर जाता है ।
हरि विरति को प्राप्त होते हैं । कीनाश ( यमराज ) का नाश
हो जाता है । धनद ( कुवेर ) का निधन ( मरण ) हो जाता
है, जिसको कभी तन्द्रा नहीं आती वह हजार नेत्र वाला महेन्द्र
भी अपनी फैली हुई दृष्टि वाला नेत्र बन्द कर लेता है । परन्तु
सदाशिव तेरा पति तो तब भी विहार ही करता रहता है ।
सं० टि० महा प्रलय में सब देवों का लय हो जाता है, केवल
परंब्रह्म रहता हैं, और शक्ति भी उसमें अव्यक्त दशा में बनी रहती है ।
सौंदर्य लहरी १६१
सतियों के सतीत्व की इतनी महानता है कि उनका सौभाग्य
सदा अखंड रहता है । इसलिये हे सति ! तेरा पति महा प्रलय में
भी रहता है, जब कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, महेश, इन्द्र, कुबेर और
मृत्यु की भी मृत्यु हो जाती है । यह भगवति के सतीत्व का ही प्रभाव
है कि सदाशिव तब भी बने रहते हैं । क्योंकि सदाख्य तत्व में विश्व
का बीज रहता है और बीज कभी नष्ट नहीं होता । यदि विश्व का
बीज नष्ट हो जाय तो प्रलय के पश्चात् फिर सृष्टि कैसे हो सकती
है ? वेद कहते हैं ।
यथा धाता पूर्वमकल्पयत् ।
प्रकृति सब को गर्भ में लेकर, महासूति का रूप धारण कर के
ब्रह्म में लीन हो जाती है । प्रत्येक बीज में दो दल होते हैं, उनको
भी यदि घुन खा जाय, परन्तु दोनों के संयोग का अंकुर स्थान
नष्ट न हो तो देखा जाता है कि वह बीज अंकुरित हो उठता है ।
भूत ग्रामः स एवायं भूत्वा २ प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ ( गीता ८, १९ )
अधिकारी भेद से पूजन भी तीन प्रकार का होता है । अधम
तीन प्रकार का अधिकारी के लिये मूर्ति, यंत्र इत्यादि द्वारा बाह्य
पूजन भावना युक्त पूजन किया जाता है, मध्यम
अधिकारी के लिये अन्तर्भावना युक्त ध्यानादि
अन्तर्यागों का साधन है और उत्तम अधिकार का पूजन उसकी
अद्वैत ब्रह्म भावना ही है । इनको क्रमशः अपरा पूजा, 'पराऽपरा
१६२ सौन्दर्य लहरी
पूजा और परा पूजा कहते हैं। द्वैत भाव का सर्वथा अभाव हो
जाने पर ही परा पूजा संभव है द्वैतभाव बना रहते परा पूजा नहीं
बन सकती, वह साधक अपरा अर्थात् बाह्य पूजा का ही अधिकारी
है परन्तु अद्वैत भाव के उदय होने के पूर्व और द्वैत भाव के लय
होने को अभ्यास दशा में परा और अपरा दोनों का अभ्यास युग
पद् रहता है। योगी ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होने के पश्चात् परा
पूजा का अधिकारी बनता है, क्योंकि ऋतंभरा प्रज्ञा से अविद्या
जनित नाम रूपों के भेदोत्पादक संस्कार ऋत् के संस्कारों से इस
प्रकार नष्ट होने लगते हैं, जैसे सूर्य के उदय से पूर्व उषः कालीन
प्रकाश से धीरे २ अन्धकार में उत्पन्न होने वाली भ्रांति में दिखने
वाले रूपों और नामों के संस्कार मिटने लगते हैं और सूर्य उदय
होने पर रात्रि के अन्धकार से उत्पन्न भ्रांति का सर्वथा नाश हो
जाता है। पूर्वगत श्लोकों में भगवती की अपरा और परापरा पूजा
का वर्णन था, अगले श्लोक में परा पूजा का रूप दिखाया जाता
है। ऋतंभरा प्रज्ञा का अर्थ है ऋत् अर्थात् निरपेक्ष सत्य से
भरी हुई बुद्धि।
(२७)
जपो जल्पः शिल्पं सकलमपि मुद्राविरचनं
गतिः प्रादक्षिण्यक्रमणमशनाद्याहुतिविधिः ।
प्रणामः संवेशः सुखमखिलमात्मार्पणदशा
सपर्यापर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥
सौंदर्य लहरी १६३
कठिन शब्द:—सपर्या=पूजा, जल्प=बकवास ।
अर्थ:—बोलना मंत्रों के जप सदृश, कर्म काण्ड सब
मुद्राओं की विरचना के सदृश, चलना फिरना प्रदक्षिणा के सदृश,
खाना पीना आहुति के समान, सोना प्रणाम सदृश, सब सुखों
के उपभोग में आत्मसमर्पण की दृष्टि, अर्थात जो भी मेरा
विलास है सब तेरी पूजा पद्धति का क्रम हो ।
सं० टि०:—यहां ज्ञान योग का लक्षण दिखाया गया है ।
स्फोटात्मक शब्दों के सार्थक एवं निरर्थक क्रम को जल्प कहते
हैं, यहां तक कि वर्णमाला के अक्षरों के उच्चारण को एकाक्षरी मंत्र
कहा जाता है, इसी प्रकार उनके योग से जो पद बनते हैं सब मंत्रों के
तुल्य हैं, और इस न्याय से सब जल्प जप के समान है। पूजन में हाथों
के अभिनयों से अनेक प्रकार की मुद्राएं दिखाई जाती हैं अर्थात्
मुद्राएं एक प्रकार से हाथों की क्रियाएं मात्र हैं इसलिये विविध
कर्मों के करने के लिये जो भी क्रियायें हाथ करते हैं, वे सब मुद्राओं
के समान हैं। भगवती की व्यापकता सर्वत्र है, इसलिये चलते
फिरते समय सर्वत्र उस विभु की प्रदक्षिणा होती रहती है। जठराग्नि
भी शक्ति का ही रूप है, वह अन्तराग्नि अन्न पचा कर आत्मा
को बलि पहुंचाती है। हवन की अग्नि का कार्य भी हव्य
को देवता तक पहुंचाना है, इसी अभिप्राय से उसकी एक कला का
नाम हव्यवाहिनी है। खाना पीना इस दृष्टि से सब आहुति
देना है।
१६४ सौन्दर्य लहरी
कहा है:—
या देवी सर्व भूतेषु क्षुधा रुपण संस्थिता,
नमस्तस्यै ३ नमोनमः
अहंवैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नंचतुर्विधम् ॥
(गीता० १५,-१४)
साष्टांग प्रणाम में दोनों हाथ, दोनों पैर, छाती, ग्रीवा और
मस्तक आठों अंगों से भूमि को स्पर्श करके पडा जाता है, भगवती
सर्वत्र भीतर बाहर सब जगह है, इसलिये सोते लेटते शरीर का
भूशायी होना साष्टांग प्रणाम के समान है । जितने सुख हैं वे सब
आत्मा-नंद की लहरें हैं, उनमें चित्त लगाना उसे आनंद ब्रह्म को
ही समर्पण करना मात्र है । श्रीचक्र पर पूजन करना तो एकदेशीय
पूजन है, हमारी अनेक प्रकार की विविध चेष्टायें और कृत्य निरंतर
विश्वतोमुखी भगवती का ही तो पूजन किया करती हैं, क्योंकि
वास्तविक पूजन तो भाव से संबंध रखता है और ब्राह्मी स्थिति में
रहने वाले का लक्ष्य सर्वदा ईश्वर पद में लगा ही रहता है और
उसके शरीर की क्रियायें भी तद्रूप पूजनवत् ही होती रहती हैं ।
( २८ )
सुधामप्यास्वाद्य प्रतिभयजरामृत्युहरणा
विपद्यन्ते विश्वे विधिशतमखाद्या दिविषदः ।
करालं यत्क्ष्वेलं (डं) कवलितवतः कालकलना
न शम्भोस्तन्मूलं जननि तव ताटङ्कमहिमा ॥
सौंदर्य लहरी १६५
कठिन शब्द:—दिविषद=देवता; क्ष्वेल, क्ष्वेड=विष;
कवल=ग्रास, ताटंक=कर्ण फूल ।
अर्थ:—ब्रह्मा और शतमख अर्थात् इन्द्रादि देवगण जरामृत्यु
का हरण करने वाली सुधा को भी पीकर, इस विश्व में काल के
शिकार होते हैं और कराल हलाहल विष का ग्रास करने वाले
शंभु पर काल की कलना नहीं चलती, इसका कारण हे जननि !
तेरे कर्णफूलों की महिमा है ।
सं० टि०—ताटंकों के कहने से भगवती के कानों में पहिने
जाने वाले आभूषणों से इंगित भगवती के अखण्ड सौभाग्य का
अभिप्राय है । विधवा स्त्रियां उनको उतार देती हैं । शंकर पर हला-
हल विष का असर नहीं हुआ, इसका कारण भगवती का अनादि
अनन्त अखंड सुहाग है । यह है भगवती के सतीत्व का महात्म्य। वह
नित्य है, उसका सुहाग भी नित्य है, इसलिये शंकर हलाहल को
पीकर भी अमर हैं । देवता अमृत पीकर भी मर जाते हैं । ताटंक
अर्थात् कर्णफूल सुहाग के चिन्ह माने जाते हैं ।
[ २९ ]
किरीटं वैरिञ्च्यं परिहर पुरः कैटभभिदः
कठोरे कोटीरे स्खलसि जहि जम्भारिमुकुटम् ।
प्रणम्रेष्वेतेषु प्रसभमुपयातस्य भवनं
भवस्याभ्युत्थाने तव परिजनोक्तिर्विजयते ॥
१६६ सौन्दर्य लहरी
कठिन शब्दः— जहि= (ओहाक् त्यागे) त्यागें, बचें।
अर्थः— शंकर को अकस्मात् अपने भवन में आते देख
खडी होकर स्वागतार्थ आगे बढने पर तेरी परिचारिकाओं की
इन उक्तियों की जय है कि 'सामने ब्रह्मा के मुकुट से बचें,'
'कैटभ के मारने वाले विष्णु के कठोर मुकुट से ठोकर लगेगी,'
'जम्भारि इन्द्र के मुकुट से बचकर चलें।'
सं०टि० भाव यह है कि सब देव भगवती को सदा साष्टांग प्रणाम
किया करते हैं।
व्याख्या—अभिप्राय यह है कि एक दिन जब भगवती को
इन्द्र ब्रह्मा और विष्णु प्रणाम कर रहे थे, तब अकस्मात् शंकर
आगये, पति का स्वागत करने जब भगवती उठीं, तो उनकी
परिचारकायें कहने लगीं कि ब्रह्मा इन्द्र और विष्णु के मुकुटों से
ठोकर न लगे, इसलिये उन से बचकर चलिये ।
विष्णु भगवान को मधुसूदन और कैटभारि भी कहते हैं क्योंकि
कैटभ भिद् मधु और कैटभ दो राक्षस उनके कान के मैल से
उत्पन्न हो गये थे। वे जब ब्रह्माजी को खाने लपके
ब्रह्माजी ने भगवान को शेष शय्या पर सोते देखकर भगवती की प्रार्थना
की। प्रार्थना से प्रसन्न होकर नारायण के नेत्रों में निवास करने वाली
महामाया ने भगवान्को जगा दिया, तब भगवान ने दोनों राक्षसों का
वध किया, और नाभि से उत्पन्न हुए कमल पर बैठे ब्रह्माजी को भय
से मुक्त किया। उपरोक्त आख्यायिका में नारायण आध्यात्म भाव है
सौंदर्य लहरी १६७
और शेष भगवान विराट की कुण्डलिनी वत् आधार शक्ति । नारायण
को सुलाने वाली निद्रा देवी महासुप्ति स्वरूपा बीजशक्ति है ।
पद्म जो नाभि से निकलता है वह स्पन्दस्वरूपा रजोगुण की विमर्ष
शक्ति है, और ब्रह्मदेव स्वयं शब्दब्रह्म स्वरूप प्रणव है। ब्रह्मदेव को
विराट के प्राण और बुद्धि समझना चाहिये । प्रणव का प्रथम
स्वरूप ध्वन्यात्मक होता है फिर शब्दों का रूप धारण कर के वेदों के
रूप में व्यक्त होने लगता है । वेदों के शब्दों से फिर उनके वाच्य
अर्थ स्वरूप रूपात्मिका सृष्टि का प्रसार होने लगता है । शब्द से
विराट ब्रह्माण्ड का श्रोत्र, श्रोत्र से आकाश, और आकाश से स्थूल
शब्दों का संबंध है । विराट् भगवान के कानों से आकाश की
उत्पत्ति कही गई है, कानों का मैल शब्दब्रह्म रूपी ब्रह्मदेव को
खाने के लिये उद्यत नाद का आवरण है, जो निद्रा के कारण जम
गया है, और जिससे मधु और कैटभ दो राक्षसों की उत्पत्ति बताई
जाती है । आलस्य प्रमादादि की मादकता को मधु कह सकते हैं, और
ज्ञान के ऊपर आवरण डालने वाले भ्रांति विक्षेपादि को कैटभ कह
सकते हैं । कैटभ का अर्थ कीटवत् आभा वाला किया जा सकता
है । कान के मैल को भी कीट कह सकते हैं, कीट का अर्थ कीडा
भी होता है । अर्थात् कैटभ वह प्रकाश है जो मलावृत्त होने के
कारण भ्रांति उत्पन्न करता है, अथवा उसका प्रकाश कीटाणु सदृश
है । ये दोनों ज्ञान के महानशत्रु हैं । भगवान जागकर अर्थात्
अध्यात्म जागृति होने पर दोनों का नाश होता है । दुर्गा सप्तशति
में इस समय ब्रह्मदेव से की गई भगवती की प्रार्थना पढने योग्य
है, जो विषयान्तर भय से यहां नहीं दी जाती ।
१६८ सौंदर्य लहरी
शक्ति के जागते ही शंकर से मिलने की आतुरता में सहस्रार
पर चढ़ते समय नीचे के चक्रों पर प्रणाम करते हुए ब्रह्मा विष्णु
और इन्द्र के मुकुटों से उसको ठोकर लगने की आशंका सूचक
परिचारिकाओं की उपरोक्त उक्तियां स्वाभाविक ही हैं। मूलाधार में
ब्रह्मा का स्थान है और तत् सम्बन्धी पृथ्वी तत्व का स्वामी इन्द्र
है, स्वाधिष्ठान में विष्णु का स्थान है। ये दोनों चक्र अन्धकारमय
माने जाते हैं देखें श्लोक ३२, ३३ की व्याख्या में 'षोडशी विज्ञान'
का विषय पृष्ठ १८३। अन्धेरे में ठोकर लगने की सम्भावना रहती
है। अर्थात् साधक की शक्ति उन्नेय पथ पर इस मण्डल में रुक कर
ठिठकनी नहीं चाहिये। श्लोक ९ में बताये गये चक्रों के बेधक्रम
और ४१ वें श्लोकोक्त समयाचार की व्याख्या भी इस सम्बन्ध में
ध्यान में रखने योग्य है। कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने पर
शिवभाव का प्रादुर्भाव होना साधकों के अनुभव की बात है।
परिचारिकाओं का विभिन्न चक्रों की योगिनीओं से अभिप्राय
हो सकता है।
ब्रह्म भाव
( ३० )
स्वदेहोद्भूताभिर्घृणिभिरणिमाऽऽद्याभिरभितो
निषेव्ये नित्ये त्वामहमिति सदा भावयति यः ।
किमाश्चर्यं तस्य त्रिनयनसमृद्धिं तृणयतो
महासंवर्ताग्निर्विरचयति नीराजनविधिम् ॥
कठिन शब्दः-घृणि=किरण, संवर्ताग्नि=प्रलयाग्नि, नीराजन=आरती
सौंदर्य लहरी १६९
अर्थः— हे सेवा करने के योग्य वरेण्ये, नित्ये ! अपने
देह से निकलने वाली अणिमादि सिद्धियों रूपी किरणों से
घिरा हुआ तेरा भक्त जो 'त्वां अहम्' अर्थात् तुझको अपना
ही रूप मानकर सदा भावना करता है, त्रिनयन की समृद्धि
को भी तृणवत् तुच्छ समझने वाले उस साधक की संवर्ताग्नि
आरती उतारता है, इसमें क्या आश्चर्य है ?
सं० टि० ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति । ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म ही
हो जाता है, वह प्रलय में भी क्षोभ नहीं पाता, मानो संवर्ताग्नि का
जलना उसकी आरती उतारने के सदृश हैं ।
जिस योगी ने सारूप्य मुक्ति प्राप्त करली है, और भगवती में
स्वभाव से रहने वाली अणिमादि सिद्धियों युक्त ब्रह्म तेज की
किरणें जिसके शरीरसे फूट २ कर निकलने लगी हैं, उस योगी को
अहम् ब्रह्मास्मि भाव के उदय होने की चरम दशा में तीसरा दिव्य
ज्ञाननेत्र खुल जाने से जो समृद्धि प्राप्त होती है, उसको भी वह
सायुज्य मुक्ति के सामने तुच्छ समझने लगता है । देखें योग दर्शन
सूत्र (३,५०) 'तद्वैराग्यादपि दोष बीज क्षये कैवल्यम्' । अर्थात्
सर्वज्ञता और सर्व शक्तिमत्ता से भी वैराग्य होने से सब दोषों के
बीज रूपी वासना के क्षय होने पर कैवल्य पद की प्राप्ति होती है ।
'नित्ये' पद से संबोधन करने का अभिप्राय यह है कि योगी
सर्वाशा परिपूरक षोडशार चक्रस्थ कामाकर्षिणी आदि १६ नित्या
कलाओं को जीत कर नित्य मोक्ष पद की प्राप्ति की इच्छा रखता
१७० सौन्दर्य लहरी
है क्यों कि भगवती की आराधना का फल महावाक्यात्मक ब्रह्मात्मैक्य
अपरोक्षानुभूति का उदय होनाही है।
सर्वकर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परि समाप्यते । (गीता)
६४ तंत्रों से भगवती का तंत्र स्वतंत्र है
[ ३१ ]
चतुः षष्ट्यातन्त्रैः सकलमति(भि)संधाय भुवनं
स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः ।
पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना—
स्वतन्त्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम् ॥
अर्थः— पशुपति शंकर ने ६४ तंत्रों से सारे भुवन
को भरकर, जो अपनी २ उन सिद्धियों के देने वाले हैं जो
प्रत्येक का अपना विषय हैं, फिर तत्पश्चात् तेरे आग्रह से सब
पुरुषार्थों की सिद्धि देने वाले स्वतंत्र तेरे तंत्र को भूतल
पर उतारा ।
सं० टि० भगवती का तंत्र अर्थात् श्री विद्या का तंत्र स्वतंत्र
है और सब तंत्र गौण हैं । भगवती के तंत्र से कुण्डलिनी शक्ति को
जगाकर सहस्रार में ले जाया जाता है, परन्तु अन्य सब तंत्र धर्म,
अर्थ, और काम की ही सिद्धि दे सकते हैं । भगवती का तंत्र चारों
पदार्थ देता है ।
सौंदर्य लहरी १७१
सनातन धर्म में उपासना की पद्धति वैदिक, तांत्रिक और
तंत्र पौराणिक तीन प्रकार की है। तथापि द्विजों के
लिये मिश्रित पद्धति काम में लाई जाती है,
जो द्विज नहीं हैं उनको वेदों का अधिकार नहीं दिया गया है,
वे तांत्रिक और पौराणिक उपासनाओं में ही दीक्षित किये जाते हैं।
तांत्रिक उपासना के दो भेद हो गए हैं-- समयाचार और कौला-
चार, जिनको दक्षिण और वाम मार्ग भी कहते हैं। ब्राह्मणों के
लिये कौलाचार निषिद्ध है, क्योंकि उसमें पंचमकार अर्थात् मांस,
मदिरा, मत्स्य, मैथुन और मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। वामा-
चार के कारण ही साधारण जनता की दृष्टि में सारी तांत्रिक
उपासना बदनाम हो रही है। यद्यपि पंचमकारों का आध्यात्मिक अर्थ
भी किया जाता है, जैसे मदिरा से सोमपान, मैथुन से शिवशक्ति
का सहस्रार में योग, इत्यादि; और कुलार्णव तंत्र में स्पष्टतया उनका
निषेध कराने के लिये साधकों को चेतावनी दी गयी है कि इनका
प्रयोग करने वाला मनुष्य नर्कगामी होता है। परन्तु तो भी
यह निर्विवाद मानना पडता है कि सब साधक आध्यात्मिक दृष्टि
वाले नहीं होते। प्रायः अधिक मनुष्यों का लक्ष्य सांसारिक भोगों
की उपलब्धि तक ही सीमित रहता है। उक्त ६४ तंत्रों में ऐसी
ही सिद्धियां प्राप्त करने के साधन हैं, जो सच्चे जिज्ञासु को पथभ्रष्ट
कर सकते हैं। श्री अरविन्दुजी इस विषय पर कल्याण के 'शक्ति
अंक' में पृष्ठ ३२ पर प्रकाशित एक लेख में लिखते हैं कि “विशेष-
कर तंत्र के वाम मार्ग में ऐसी २ बातें आ गई हैं, जिनसे न केवल
अच्छे बुरे का, पापपुण्य का कोई विचार न रहा प्रत्युत पाप पुण्यादि
द्वंद्वों के स्थान में स्वभाव नियत सद्धर्म की स्थापना होने के बजाय
१७२ सौंदर्य लहरी
अनियंत्रित कामाचार, असंयत सामाजिक व्यभिचार दुराचार का
मानो एक पंथ ही बन गया--तथापि मूलतः तंत्र एक बडी चीज थी,
बडी बलवती योग पद्धति थी ।........इसके दक्षिण और वाम
दोनों ही मार्ग एक बडी गंभीर अनुभूति के फल थे......एक है
ज्ञान का मार्ग और दूसरा आनन्द का मार्ग ।"
एक मत यह भी है कि कौलाचार अथवा वाम मार्ग बहिर्पूजा
का साधन है और समयाचार अथवा दक्षिण मार्ग भावना प्रधान
धारणा ध्यान समाधि युक्त अन्तर्याग रूपी योग साधन और मनन
निदिध्यासन पूर्वक ब्रह्म भावना का साधन है । बहिर्पूजा कर्म प्रधान
होती है, और अन्तर्पूजा भावना प्रधान । इसलिये निकृष्ट श्रेणि के
अधिकारियों को बहिर्पूजा में दीक्षित किया जाता है और उत्तम
अधिकारियों को अन्तर्पूजा में । परन्तु मध्यम श्रेणि के साधकों को
दोनों का आश्रय लेना पडता है, वे क्रमशः जैसे २ उनकी अन्तर्गति
दृढ होती जाती है शनैः २ कर्म काण्ड से हटते जाते हैं ।
इस श्लोक में ६४ तंत्रों का उल्लेख है, परन्तु भगवती ने देखा
कि उनसे श्रेय की प्राप्ति नहीं हो सकती, इसलिये उन्होंने शंकर से
श्रेय की प्राप्ति का साधन बताने का अनुरोध किया, तब शंकर ने
समयाचार का साधन कहा, जो पूर्वोक्त ६४ तंत्रों से पृथक है ।
वह भगवती के आग्रह पर श्रेय की जिज्ञासा रखने वालों के
कल्याणार्थ कहे जाने के कारण, शंकराचार्य भगवत्पाद ने उसको
भगवती का अपना स्वतंत्र तंत्र कहकर संकेत किया है, अर्थात्
'तेरा तंत्र' कहा है । शंकर भगवत्पाद उसे लोक हितार्थ सौन्दर्य
लहरी में प्रकाशित करते हैं । यह तंत्र सब तंत्रों से स्वतंत्र है ।
सौंदर्य लहरी १७३
अन्य ६४ तंत्र अनेक सिद्धियों के विषय हैं, परन्तु यह तंत्र श्रेयस् का
देने वाला है, और मोक्ष के साथ धर्म अर्थ काम की भी सिद्धि
देने के कारण अन्य सब तंत्रों की अपेक्षा नहीं रखता । इस तंत्र
में श्री विद्या का रहस्य बताया गया है, जो स्वयं महा त्रिपुर सुन्दरी
का स्वरूप है । यह बात अगले दो श्लोकों से स्पष्ट हो जाती है ।
श्री विद्या को चन्द्रकला विद्या भी कहते हैं, क्योंकि चन्द्रमा
की १६ कलाओं के अनुरूप षोडशी में भी १६ अक्षर हैं, और
१६ नित्या कला हैं । इसको, ब्रह्म विद्या ही जानना चाहिये ।
इस विषय पर चन्द्रकला, ज्योतिष्मती, कला निधि, कुलार्णव, कुलेश्वरी,
भुवनेश्वरी, वार्हस्पत्य, और दुर्वासा मत मुख्य ग्रंथ हैं । इसी प्रकार
समयाचार पर वशिष्ठ, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और शुकदेवजी
विरचित् शुभागम पंचक भी हैं ।
६४ तंत्रों के नाम
६४ तंत्रों के नाम ये हैं—(१) महामाया शंबर नाम का
मोहन तंत्र, (२) योगिनीजाल शंबर, (३) तत्व शंबर, तत्वों में संकरण
करने की विद्या, (४) सिद्ध भैरव, (५) वटुक भैरव, (६) कंकाल-
भैरव, (७) काल भैरव, (८) कालाग्नि भैरव, (९) योगिनी भैरव,
(१०) महा भैरव, (११) शक्ति भैरव, उक्त ८ भैरव तंत्र कापालिकों
के तंत्र हैं । इनमें अनेक सिद्धियों का वर्णन है जैसा भूतल के नीचे
धन देखना इत्यादि । (१२) ब्राह्मी, (१३) माहेश्वरी, (१४) कौ-
मारी, (१५) वैष्णवी, (१६) वाराही, (१७) माहेन्द्री, (१८)
चामुण्डा, (१९) शिवदूती, इन ८ तंत्रों को बहुरूपाष्टक कहते हैं;
१७४ सौन्दर्य लहरी
इनमें उक्त शक्तियों की उपासना है। (२०) ब्रह्म यामल, (२१)
विष्णु यामल, (२२) रुद्र यामल, (२३) लक्ष्मी यामल, (२४)
उमा यामल, (२५) स्कन्द यामल, (२६) गणेश यामल. (२७)
जयद्रथ यामल, ये आठ काम सिद्ध यामल तंत्र हैं। (२८) चंद्र-
ज्ञान (२९) मालिनी विद्या-समुद्रों को पार करने की विद्या, (३०)
महासंमोहन, (३१) वामजुष्ठ, (३२) महादेव, (३३) वातुल,
(३४) वातुलोत्तर, (३५) कामिक, (३६) हृद्भेद तंत्र, वामाचार
द्वारा षड्चक्रवेध, (३७) तन्त भेद, (३८) गुह्य तंत्र, (३९) कला-
वाद, (४०) कलासार, (४१) कुंडिका मंत, (४२) मतोत्तर, पारद
विज्ञान का तंत्र, (४३) वीणाख्य-यक्षिणी का तंत्र, (४४) त्रोतल,
जादू तावीज इत्यादिका तंत्र, (४५) त्रोतलोत्तर-६४ हजार यक्षिणियों
को आवाहन करने की विद्या । (४६) पंचामृत-आयुदीर्घ करने का
विज्ञान, (४७) रूपभेद, (४८) भूतोड्डामर (४९) कुलसार, (५०)
कुलोड्डीश, (५१) कुलचूडामणि, इन सब में मारण उच्चाटन प्रयोग
हैं। (५२) सर्वज्ञानोत्तर, (५३) महा कालीमत, (५४) अरूणेश,
(५५) मोदिनी ईशा, (५६) विकुण्ठेश्वर-ये ५ तंत्र दिगंवरों के
हैं। (५७) पूर्व आम्नाय, (५८) पश्चिम आम्नाय, (५९) दक्षिण
आम्नाय, (६०) उत्तर आम्नाय, (६१) निरुत्तर आम्नाय, (६२)
विमल, (६३) विमलोत्तर, और (६४) देवीमत, ये क्षपणकों के तंत्र
हैं। यह नामावली वामकेश्वर तंत्र में है। भास्करराय के मतानुसार
४ से ११ तक भैरवाष्टक को एक ही तंत्र माना गया है, और
(३१, ३२) वामजुष्ठ और महादेव दोनों को एक तंत्र माना गया
है इसलिये नीचे दिये हुए आठ और तंत्रों सहित ६४ की संख्या
पूरी की जाती है। उनके नाम ये हैं (१) महालक्ष्मी मत, (२)
सौंदर्य लहरी १७५
सिद्ध योगेश्वरी मत (३) कुरुपिका मत, (४) देवरूपिका मत,
(५) सर्ववीर मत, (६) विमला मत, (७) ज्ञानार्णव और (८)
वीरावलि ।
हादि और कादि विद्याओं के रूप
[ ३२ ]
शिवः शक्तिः कामः क्षितिरथ रविः शीतकिरणः
स्मरो हंसः शक्रस्तदनु च परामारहरयः ।
अमी हृल्लेखाभिस्तिसृभिरवसानेषु घटिता
भजन्ते वर्णास्ते तव जननि नामावयवताम् ॥
[ ३३ ]
स्मरं योनिं लक्ष्मीं त्रितयमिदमादौ तव मनो-
र्निधायैके नित्ये निरवधिमहाभोगरसिकाः ।
(जपंति) भजंति त्वां चिन्तामणिगुणनिबद्धाक्षव (र) लयाः
शिवाऽग्नौ जुह्वन्तः सुरभिघृतधाराऽऽहुतिशतैः ॥
अर्थ—हे जननि ! शिव, शक्ति, काम, क्षिति और फिर
रवि, शीतकिरण (चन्द्र), स्मर (काम), हंस, शक्र, इसके पीछे परा
(शक्ति), मार (काम), हरि, इन तीनों के अन्त में ३ हृल्लेखा
जोडकर तेरे नाम के अवयव स्वरुप अक्षरों का साधक जन
भजन करते हैं । (३२)
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यह हादि लोपा मुद्रा का मंत्र बताया गया है । इसके
१५ अक्षर हैं ।
अर्थः— हे नित्ये ! स्मर, (काम), योनि (त्रिकोण), लक्ष्मी
इन तीनों को तेरे मंत्र के आदि (अक्षरों के स्थान) पर रखकर
निरवधि महा भोग के रसिक तेरे कुछ भक्त, चिन्तामणियों की
गुंथी हुई अक्ष माला पर तेरा भजन करते हैं, और शिवा
(त्रिकोण) अग्नि हवन कुण्ड में सुरभि (गाय) के घी की सैकड़ों
धाराओं की आहुतियां देते हैं । (३३)
यह कादि मूल विद्या का मंत्र है ।
स०टि० दोनों श्लोकों में हादि कादि विद्याओं के मंत्र बताये गये
हैं। देखे त्रिपुरोपनिषद् (परिशिष्ट) ऋचा ८ । शिवाग्नि=कुण्डलिनी का
मुख, घी=अमृत, चिन्तामणि=चित्कला, गुण=सत्व, रज, तम,
निरवधि- महाभोगरसिकाः=भोग और मोक्ष दोनो की इच्छा रखने वाले ।
व्याख्याः— षोडशी का १६ वां अक्षर गुरु मुख से जानना
चाहिये । मंत्र के चार पाद होते हैं, प्रथम तीन पाद तीन कूट
वाग्भवव, कामकला, और शक्ति कूट के नामों से प्रसिद्ध हैं, चौथा
पाद् श्रीकूट है । प्रथम तीन पादों को अग्नि, सूर्य और चन्द्र;
विष्णु ब्रह्मा और रुद्र की क्रमशः क्रिया, इच्छा और ज्ञान शक्तियां;
जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के अनुरुप विश्व, तैजस् और प्राज्ञ; सत्व, रजस्
और तमस् समझना चाहिये । चौथा पाद् तुरीय पद है । वाह्य
सौंदर्य लहरी १७७
उपासना में ऋषि, छंद, देवता विनियोग इत्यादि की आवश्यकता
रहती है, परन्तु अन्तर्याग में केवल आत्म तत्व पर ही लक्ष्य रहता है ।
देखें भास्कर राय का वरिवस्यारहस्य ।
त्रिपुरोपनिषद् में दोनों विद्याओं का संकेत निम्न श्रुतियों
द्वारा किया गया है। वहां दोनों का क्रम सौन्दर्य लहरी के क्रम से
विपरीत है, वहां पहिले कादि मूल विद्या बताकर उससे लोपा मुद्रा का
निर्माण किया गया है, यहां लोपा मुद्रा पहिले कहकर उससे मूल
विद्या का निर्माण किया गया है।
कादि मूल विद्या को बताने वाली श्रुति यह है: —
कामोयोनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहाहसा मातरिश्वाअमिन्द्रः ।
पुनर्गुहा सकला मायया च पुरुच्येषा विश्वमाताऽऽदि विद्या ॥ (८)
और लोपा मुद्रा (हादि विद्या) का इससे निर्माण करने के
लिये नीचे वाली श्रुति है।
षष्ठ सप्तममथ बहिसारथिमस्या मूलत्रिकमादेशयन्तः । (९)
अर्थ देखें परिशिष्ठ (२)
दोनों श्लोकों में पञ्चदशी के दोनों रूप हैं। दूसरे श्लोक में
'एके' पद के प्रयोग से, जिससे अन्य मतावलंबी साधक जन
अभिप्रेत हैं, यह प्रतीत होता है कि श्री शंकर भगवत्पाद स्वयं
प्रथम श्लोक में बताये हुए मंत्र के उपासक थे । और यह ही बात
१७८ सौंदर्य लहरी
इससे भी सिद्ध होती है कि वे लोग जो दूसरे श्लोकोक्त मंत्र की
उपासना करते हैं, जप के पश्चात् दशांश आहुति भी देते हैं, और
वे कभी समाप्त न होने वाली भोगों की इच्छा से सकाम अनुष्ठान
किया करते हैं, जैसा कि ‘निरवधि महाभोग रसिकाः’ पद से स्पष्ट
है। शंकर भगवत्पाद एक सन्यासी थे, उनने दारेषणा, वित्तेषणा
और लोकेषणा तीनों का त्याग किया हुआ था, अग्नि का स्पर्श भी
नहीं करते थे, और कर्म काण्ड का सर्वथा त्याग किया हुआ था; इस
लिये वे प्रथम श्लोकोक्त भावना प्रधान विद्या के ही उपासक थे। अर्थात्
प्रथम श्लोक में सन्यासियों के लिये लोपा मुद्रा हादि विद्या का मंत्र
बताया गया है। और दूसरे में सब प्रयोगों की सिद्धि देने वाले
कादि विद्या के मंत्र का वर्णन है। यह ही बात त्रिपुरोपनिषद् से
भी स्पष्ट है। देखें परिशिष्ट (२) श्रुतियां ८, ९, १०, ११,
और १२। श्लोक ८ की व्याख्या में हम यह भी दिखा चुके हैं कि
आनन्द लहरी पद का भी संकेत हादि विद्या की ही ओर है।
भगवती की उपासना भोग और मोक्ष दोनों देती है। भोगों
में आसक्त गृहस्थियों के लिये कादि विद्या की सपर्या पद्धति, जो
श्री चक्र के पूजन न्यास और बहिरनुष्ठानों से संयुक्त है, आणवी
दीक्षा द्वारा दी जाती है। कर्म काण्ड का उपयोग कामनाओं की
तृप्ति मात्र नहीं है, वरन सब भोगों को भगवती के चरणों में समर्पण
कर के अन्तःकरण की शुद्धि के लिये है। सकाम अनुष्ठानों से
कामनाओं की पूर्ति अवश्य होती है, परन्तु यह मंत्रशास्त्र का गौण
फल है। कहा है—‘मननात् त्रायते इति मंत्रम्....’
सौंदर्य लहरी १७९
मननात् प्राणनाच्चैव मद्रूपस्यावबोधनात् ।
मंत्रमित्युच्यते ब्रह्मन् मदधिष्ठानतोऽपिवा ॥ यो०शि०(२,७)
शिवजी ब्रह्माजी से कहते हैं कि मनन किये जाने के कारण,
प्राणों का उत्थान करने के कारण, मेरे रूप का ज्ञान उत्पन्न करने के
कारण अथवा मेरा अधिष्ठान होने के कारण मंत्र मंत्र कहलाता है ।
मंत्र के जप से कुण्डलिनि शक्ति का जागरण होता है, शक्ति
के जागरण से आत्मज्ञान का उदय होता है, इसलिये मंत्र को
देवता का अधिष्ठान कहा गया है । शक्ति दीक्षा से शक्ति का
जागरण होने पर मंत्रयोग, लययोग, हठयोग और राजयोग चारों का
विकास होता देखा जाता है । इसलिये शक्ति जागरण को ही
महायोग कहते हैं ।
मंत्रो लयोहठो राजयोगोऽन्तर्भूमिकाः क्रमात् ।
एक एव चतुर्धायं महायोगोऽभिधीयते ॥ यो०शि० (१,१२९)
मंत्र के प्राप्त करने पर उक्त चारों भूमिकाएं उदय होती हैं ।
आणवी दीक्षा में मंत्र का उपदेश करके शिष्य को श्रीचक्र पर
भगवती की सपर्यापद्धति के अनुसार पूजन विधि बताई जाती है ।
शक्ति दीक्षा में गुरु शिष्य के सिर पर स्पर्श करके शक्ति जागृत
करता है । तीसरी शांभवी दीक्षा में ब्रह्मात्मैक्य भाव में शिष्य को
ले जाया जाकर उसको महावाक्यों का उपदेश दिया जाता है ।
इस विषय के सम्बन्ध में श्री विद्या पर लिखित नित्योत्सव ग्रंथ में
दीक्षा प्रकरण देखें ।