सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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अन्य ६४ तंत्र अनेक सिद्धियों के विषय हैं, परन्तु यह तंत्र श्रेयस् का
देने वाला है, और मोक्ष के साथ धर्म अर्थ काम की भी सिद्धि
देने के कारण अन्य सब तंत्रों की अपेक्षा नहीं रखता । इस तंत्र
में श्री विद्या का रहस्य बताया गया है, जो स्वयं महा त्रिपुर सुन्दरी
का स्वरूप है । यह बात अगले दो श्लोकों से स्पष्ट हो जाती है ।
श्री विद्या को चन्द्रकला विद्या भी कहते हैं, क्योंकि चन्द्रमा
की १६ कलाओं के अनुरूप षोडशी में भी १६ अक्षर हैं, और
१६ नित्या कला हैं । इसको, ब्रह्म विद्या ही जानना चाहिये ।
इस विषय पर चन्द्रकला, ज्योतिष्मती, कला निधि, कुलार्णव, कुलेश्वरी,
भुवनेश्वरी, वार्हस्पत्य, और दुर्वासा मत मुख्य ग्रंथ हैं । इसी प्रकार
समयाचार पर वशिष्ठ, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और शुकदेवजी
विरचित् शुभागम पंचक भी हैं ।
६४ तंत्रों के नाम
६४ तंत्रों के नाम ये हैं—(१) महामाया शंबर नाम का
मोहन तंत्र, (२) योगिनीजाल शंबर, (३) तत्व शंबर, तत्वों में संकरण
करने की विद्या, (४) सिद्ध भैरव, (५) वटुक भैरव, (६) कंकाल-
भैरव, (७) काल भैरव, (८) कालाग्नि भैरव, (९) योगिनी भैरव,
(१०) महा भैरव, (११) शक्ति भैरव, उक्त ८ भैरव तंत्र कापालिकों
के तंत्र हैं । इनमें अनेक सिद्धियों का वर्णन है जैसा भूतल के नीचे
धन देखना इत्यादि । (१२) ब्राह्मी, (१३) माहेश्वरी, (१४) कौ-
मारी, (१५) वैष्णवी, (१६) वाराही, (१७) माहेन्द्री, (१८)
चामुण्डा, (१९) शिवदूती, इन ८ तंत्रों को बहुरूपाष्टक कहते हैं;