सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी १६१
सतियों के सतीत्व की इतनी महानता है कि उनका सौभाग्य
सदा अखंड रहता है । इसलिये हे सति ! तेरा पति महा प्रलय में
भी रहता है, जब कि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, महेश, इन्द्र, कुबेर और
मृत्यु की भी मृत्यु हो जाती है । यह भगवति के सतीत्व का ही प्रभाव
है कि सदाशिव तब भी बने रहते हैं । क्योंकि सदाख्य तत्व में विश्व
का बीज रहता है और बीज कभी नष्ट नहीं होता । यदि विश्व का
बीज नष्ट हो जाय तो प्रलय के पश्चात् फिर सृष्टि कैसे हो सकती
है ? वेद कहते हैं ।
यथा धाता पूर्वमकल्पयत् ।
प्रकृति सब को गर्भ में लेकर, महासूति का रूप धारण कर के
ब्रह्म में लीन हो जाती है । प्रत्येक बीज में दो दल होते हैं, उनको
भी यदि घुन खा जाय, परन्तु दोनों के संयोग का अंकुर स्थान
नष्ट न हो तो देखा जाता है कि वह बीज अंकुरित हो उठता है ।
भूत ग्रामः स एवायं भूत्वा २ प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ ( गीता ८, १९ )
अधिकारी भेद से पूजन भी तीन प्रकार का होता है । अधम
तीन प्रकार का अधिकारी के लिये मूर्ति, यंत्र इत्यादि द्वारा बाह्य
पूजन भावना युक्त पूजन किया जाता है, मध्यम
अधिकारी के लिये अन्तर्भावना युक्त ध्यानादि
अन्तर्यागों का साधन है और उत्तम अधिकार का पूजन उसकी
अद्वैत ब्रह्म भावना ही है । इनको क्रमशः अपरा पूजा, 'पराऽपरा