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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

सौंदर्य लहरी १६५
कठिन शब्द:—दिविषद=देवता; क्ष्वेल, क्ष्वेड=विष;
कवल=ग्रास, ताटंक=कर्ण फूल ।
अर्थ:—ब्रह्मा और शतमख अर्थात् इन्द्रादि देवगण जरामृत्यु
का हरण करने वाली सुधा को भी पीकर, इस विश्व में काल के
शिकार होते हैं और कराल हलाहल विष का ग्रास करने वाले
शंभु पर काल की कलना नहीं चलती, इसका कारण हे जननि !
तेरे कर्णफूलों की महिमा है ।
सं० टि०—ताटंकों के कहने से भगवती के कानों में पहिने
जाने वाले आभूषणों से इंगित भगवती के अखण्ड सौभाग्य का
अभिप्राय है । विधवा स्त्रियां उनको उतार देती हैं । शंकर पर हला-
हल विष का असर नहीं हुआ, इसका कारण भगवती का अनादि
अनन्त अखंड सुहाग है । यह है भगवती के सतीत्व का महात्म्य। वह
नित्य है, उसका सुहाग भी नित्य है, इसलिये शंकर हलाहल को
पीकर भी अमर हैं । देवता अमृत पीकर भी मर जाते हैं । ताटंक
अर्थात् कर्णफूल सुहाग के चिन्ह माने जाते हैं ।
[ २९ ]
किरीटं वैरिञ्च्यं परिहर पुरः कैटभभिदः
कठोरे कोटीरे स्खलसि जहि जम्भारिमुकुटम् ।
प्रणम्रेष्वेतेषु प्रसभमुपयातस्य भवनं
भवस्याभ्युत्थाने तव परिजनोक्तिर्विजयते ॥