सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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इससे भी सिद्ध होती है कि वे लोग जो दूसरे श्लोकोक्त मंत्र की
उपासना करते हैं, जप के पश्चात् दशांश आहुति भी देते हैं, और
वे कभी समाप्त न होने वाली भोगों की इच्छा से सकाम अनुष्ठान
किया करते हैं, जैसा कि ‘निरवधि महाभोग रसिकाः’ पद से स्पष्ट
है। शंकर भगवत्पाद एक सन्यासी थे, उनने दारेषणा, वित्तेषणा
और लोकेषणा तीनों का त्याग किया हुआ था, अग्नि का स्पर्श भी
नहीं करते थे, और कर्म काण्ड का सर्वथा त्याग किया हुआ था; इस
लिये वे प्रथम श्लोकोक्त भावना प्रधान विद्या के ही उपासक थे। अर्थात्
प्रथम श्लोक में सन्यासियों के लिये लोपा मुद्रा हादि विद्या का मंत्र
बताया गया है। और दूसरे में सब प्रयोगों की सिद्धि देने वाले
कादि विद्या के मंत्र का वर्णन है। यह ही बात त्रिपुरोपनिषद् से
भी स्पष्ट है। देखें परिशिष्ट (२) श्रुतियां ८, ९, १०, ११,
और १२। श्लोक ८ की व्याख्या में हम यह भी दिखा चुके हैं कि
आनन्द लहरी पद का भी संकेत हादि विद्या की ही ओर है।
भगवती की उपासना भोग और मोक्ष दोनों देती है। भोगों
में आसक्त गृहस्थियों के लिये कादि विद्या की सपर्या पद्धति, जो
श्री चक्र के पूजन न्यास और बहिरनुष्ठानों से संयुक्त है, आणवी
दीक्षा द्वारा दी जाती है। कर्म काण्ड का उपयोग कामनाओं की
तृप्ति मात्र नहीं है, वरन सब भोगों को भगवती के चरणों में समर्पण
कर के अन्तःकरण की शुद्धि के लिये है। सकाम अनुष्ठानों से
कामनाओं की पूर्ति अवश्य होती है, परन्तु यह मंत्रशास्त्र का गौण
फल है। कहा है—‘मननात् त्रायते इति मंत्रम्....’