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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 214

१६४ सौन्दर्य लहरी
कहा है:—
या देवी सर्व भूतेषु क्षुधा रुपण संस्थिता,
नमस्तस्यै ३ नमोनमः
अहंवैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नंचतुर्विधम् ॥
(गीता० १५,-१४)
साष्टांग प्रणाम में दोनों हाथ, दोनों पैर, छाती, ग्रीवा और
मस्तक आठों अंगों से भूमि को स्पर्श करके पडा जाता है, भगवती
सर्वत्र भीतर बाहर सब जगह है, इसलिये सोते लेटते शरीर का
भूशायी होना साष्टांग प्रणाम के समान है । जितने सुख हैं वे सब
आत्मा-नंद की लहरें हैं, उनमें चित्त लगाना उसे आनंद ब्रह्म को
ही समर्पण करना मात्र है । श्रीचक्र पर पूजन करना तो एकदेशीय
पूजन है, हमारी अनेक प्रकार की विविध चेष्टायें और कृत्य निरंतर
विश्वतोमुखी भगवती का ही तो पूजन किया करती हैं, क्योंकि
वास्तविक पूजन तो भाव से संबंध रखता है और ब्राह्मी स्थिति में
रहने वाले का लक्ष्य सर्वदा ईश्वर पद में लगा ही रहता है और
उसके शरीर की क्रियायें भी तद्रूप पूजनवत् ही होती रहती हैं ।
( २८ )
सुधामप्यास्वाद्य प्रतिभयजरामृत्युहरणा
विपद्यन्ते विश्वे विधिशतमखाद्या दिविषदः ।
करालं यत्क्ष्वेलं (डं) कवलितवतः कालकलना
न शम्भोस्तन्मूलं जननि तव ताटङ्कमहिमा ॥