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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

१७० सौन्दर्य लहरी
है क्यों कि भगवती की आराधना का फल महावाक्यात्मक ब्रह्मात्मैक्य
अपरोक्षानुभूति का उदय होनाही है।
सर्वकर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परि समाप्यते । (गीता)
६४ तंत्रों से भगवती का तंत्र स्वतंत्र है
[ ३१ ]
चतुः षष्ट्यातन्त्रैः सकलमति(भि)संधाय भुवनं
स्थितस्तत्तत्सिद्धिप्रसवपरतन्त्रैः पशुपतिः ।
पुनस्त्वन्निर्बन्धादखिलपुरुषार्थैकघटना—
स्वतन्त्रं ते तन्त्रं क्षितितलमवातीतरदिदम् ॥
अर्थः— पशुपति शंकर ने ६४ तंत्रों से सारे भुवन
को भरकर, जो अपनी २ उन सिद्धियों के देने वाले हैं जो
प्रत्येक का अपना विषय हैं, फिर तत्पश्चात् तेरे आग्रह से सब
पुरुषार्थों की सिद्धि देने वाले स्वतंत्र तेरे तंत्र को भूतल
पर उतारा ।
सं० टि० भगवती का तंत्र अर्थात् श्री विद्या का तंत्र स्वतंत्र
है और सब तंत्र गौण हैं । भगवती के तंत्र से कुण्डलिनी शक्ति को
जगाकर सहस्रार में ले जाया जाता है, परन्तु अन्य सब तंत्र धर्म,
अर्थ, और काम की ही सिद्धि दे सकते हैं । भगवती का तंत्र चारों
पदार्थ देता है ।