सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
  • १०।२ § ९२३ ] दशमोऽध्यायः ३५७
    भागो विवर्धितशुभकर्मानुभवोऽनिवृत्तिकरणप्राप्त्याऽनिवृत्तिबादरसांपरायक्षपकगुणस्थानमधिरुह्य
    तत्र कषायाष्टकं नष्टं कृत्वा नपुंसकवेदनाशं समापाद्य स्त्रीवेदमुन्मूल्य नोकषायषट्कं पुंवेदे प्रक्षिप्य
    क्षपयित्वा पुंवेदं क्रोधसंज्वलने, क्रोधसंज्वलनं मानसंज्वलने, मानसंज्वलनं मायासंज्वलने, माया-
    संज्वलनं$^१$ च लोभसंज्वलने क्रमेण बादरकृष्टिविभागेन विलयमुपनीय लोभसंज्वलनं तनूकृत्य सूक्ष्म-
    सांपरायक्षपकत्वमनुभूय निरवशेषं मोहनीयं निर्मूलकषायं कषित्वा क्षीणकषायतामधिरुह्यावतारित- ५
    मोहनीयभार उपान्त्यप्रथमे समये निद्राप्रचले प्रलयमुपनीय पञ्चानां ज्ञानावरणानां चतुर्णां दर्शना-
    वरणानां पञ्चानामन्तरायाणां$^२$ चान्तमन्ते समुपनीय$^३$ तदनन्तरं ज्ञानदर्शनस्वभावं केवलपर्यायम-
    प्रतर्क्यविभूतिविशेषमवाप्नोति ।
    § ९२२. आह कस्माद्धेतोर्मोक्षः किंलक्षणश्चेत्यत्रोच्यते—
    बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः ॥ २ ॥ १०
    § ९२३. मिथ्यादर्शनादिहेत्वभावादभिनवकर्मभावः पूर्वोदितनिर्जराहेतुसंनिधाने चार्जित-
    कर्मनिरासः । ताभ्यां बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यामिति हेतुलक्षणविभक्तिनिर्देशः । ततो भवस्थिति-
    हेतुसमीकृतशेषकर्मविस्थस्य$^४$ युगपदात्यन्तिकः$^५$ कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः प्रत्येत्यव्यः । कर्माभावो
    द्विविधः—यत्नसाध्योऽयत्नसाध्यश्चेति । तत्र चरमदेहस्य नारकतिर्यग्देवायुषामभावो न यत्नसाध्यः
    असत्त्वात् । यत्नसाध्य इत ऊर्ध्वमुच्यते—असंयतसम्यग्दृष्ट्यादिषु चतुर्षु गुणस्थानेषु कस्मिंश्चि- १५
    पापप्रकृतियोंकी स्थिति और अनुभागको कृश करके तथा शुभकर्मोंके अनुभागकी वृद्धि करके अनिवृत्ति-
    करणकी प्राप्ति द्वारा अनिवृत्तिबादरसाम्पराय क्षपकगुणस्थानपर आरोहण करके तथा वहाँ आठ
    कषायोंका नाश करके तथा नपुंसकवेद और स्त्रीवेदका क्रमसे नाश करके, छह नोकषायका पुरुषवेद
    में संक्रमण द्वारा नाश करके तथा पुरुषवेदका क्रोधसंज्वलनमें, क्रोधसंज्वलनका मानसंज्वलनमें,
    मानसंज्वलनका मायासंज्वलनमें और मायासंज्वलनका लोभसंज्वलनमें क्रमसे बादरकृष्टिविभागके २०
    द्वारा संक्रमण करके तथा लोभसंज्वलनको कृश करके, सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकत्वका अनुभव करके,
    समस्त मोहनीयका निर्मूल नाश करके, क्षीणकषाय गुणस्थानपर आरोहण करके, मोहनीयके
    भारको उतारकर क्षीणकषाय गुणस्थानके उपान्त्य समयमें निद्रा और प्रचलाका नाश करके तथा
    अन्तिम समयमें पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय कर्मोंका अन्त करके
    तदनन्तर ज्ञानदर्शनस्वभावरूप केवल पर्यायको प्राप्त होता है । २५
    § ९२२. कहते हैं कि किस कारणसे मोक्ष प्राप्त होता है और उसका लक्षण क्या है यह
    बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    बन्ध-हेतुओंके अभाव और निर्जरासे सब कर्मोंका आत्यन्तिक क्षय होना ही मोक्ष है ॥२॥
    § ९२३. मिथ्यादर्शनादिक हेतुओंका अभाव होनेसे नूतन कर्मोंका अभाव होता है और पहले
    कही गयी निर्जरारूप हेतुके मिलनेपर अर्जित कर्मोंका नाश होता है। इन दोनोंसे 'बन्धहेत्वभाव- ३०
    निर्जराभ्याम्' यह हेतुपरक विभक्तिका निर्देश है। जिसने भवस्थितिके हेतुभूत आयुकर्मके बराबर
    शेष कर्मोंकी स्थितिको कर लिया है उसके उक्त कारणोंसे एक साथ समस्त कर्मोंका आत्यन्तिक
    वियोग होना मोक्ष है ऐसा जानना चाहिए। कर्मका अभाव दो प्रकारका है—यत्नसाध्य और अय-
    त्नसाध्य । इनमें से चरम देहवालेके नरकायु, तिर्यंचायु और देवायुका अभाव यत्नसाध्य नहीं होता,
    क्योंकि उसके उनका सत्त्व नहीं उपलब्ध होता । यत्नसाध्य अभाव इससे आगे कहते हैं—असंयत- ३५
    १. –लनं लोभ–मु० । २. –याणामन्त–मु० । ३. समुपगमय्य तद–मु०, ता० । ४. –वस्थितस्य मु०, ता० ।
    ५. –दात्यतीकृतकृ–मु० ।

३५८ सर्वार्थसिद्धौ [ १०।२ § ९२३ -
तत्सप्रकृतिकक्षयः क्रियते । निद्रानिद्राप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्धिनरकगतितिर्यग्गत्येकद्वित्रिचतुरिन्द्रिय-
जातिनरकगतितिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्व्यातोपोद्योतस्थावरसूक्ष्मसाधारणसंज्ञिकानां षोडशानां कर्म-
प्रकृतीनामनिवृत्तिबादरसांपरायस्थाने युगपत्क्षयः क्रियते । ततः परं तत्रैव कषायाष्टकं नष्टं
क्रियते । नपुंसकवेदः स्त्रीवेदश्च¹ क्रमेण तत्रैव क्षयमुपयाति । नोकषायषट्कं च सहैकेनैव प्रहारेण
५ विनिपातयति । ततः पुंवेदसंज्वलनक्रोधमानमायाः क्रमेण तत्रैवात्यन्तिकं ध्वंसमास्कन्दन्ति । लोभ-
संज्वलनः सूक्ष्मसांपरायान्ते यात्यन्तम् । निद्राप्रचले क्षीणकषायवीतरागच्छद्मस्थस्योपान्त्यसमये
प्रलयमुपव्रजतः । पञ्चानां ज्ञानावरणानां चतुर्णां दर्शनावरणानां पञ्चानामन्तरायाणां च तस्यैवान्त्य-
समये प्रक्षयो भवति । अन्यतरवेदनीयदेवगत्यौदारिकवैक्रियिकाहारकतेजसकार्मणशरीरपञ्चबन्धन-
पञ्चसंघातसंस्थानषट्कौदारिकवैक्रियिकाहारकशरीराङ्गोपाङ्गषट्संहननपञ्चप्रशस्त वर्णपञ्चाप्रशस्त-
१० वर्णगन्धद्वयपञ्चप्रशस्तरसपञ्चाप्रशस्तरसस्पर्शाष्टकदेवगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यागुरुलघूपघातपरघातोच्छ्वा-
सप्रशस्ताप्रशस्तविहायोगत्यपर्याप्तप्रत्येकशरीरस्थिरास्थिरशुभाशुभदुर्भगसुस्वरदुःस्वरानादेयायशः-
कीर्तिनिर्माणनामनीचैर्गोत्राख्या द्वासप्ततिप्रकृतयोऽयोगकेवलिन उपान्त्यसमये विनाशमुपयान्ति ।
अन्यतरवेदनीयमनुष्यायुर्मनुष्यगतिपञ्चेन्द्रियजातिमनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यत्रसबादरपर्याप्तकसुभगा-
देययशःकीर्तितीर्थंकरनामोच्चैर्गोत्रसंज्ञिकानां त्रयोदशानां प्रकृतीनामयोगकेवलिनश्चरमसमये व्यु-
१५ च्छेदो भवति ।
सम्यग्दृष्टि आदि चार गुणस्थानोंमेंसे किसी एक गुणस्थानमें सात प्रकृतियोंका क्षय करता है ।
पुनः निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, नरकगति, तिर्यंचगति, एकेन्द्रियजाति, द्वीन्द्रियजाति,
त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यंचगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आतप,
उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण नामवाली सोलह कर्मप्रकृतियोंका अनिवृत्तिबादरसाम्पराय
२० गुणस्थानमें एक साथ क्षय करता है। इसके बाद उसी गुणस्थानमें आठ कषायोंका नाश करता
है । पुनः वहींपर नपुंसकवेद और स्त्रीवेदका क्रमसे क्षय करता है । तथा छह नोकषायोंको एक
ही प्रहारके द्वारा गिरा देता है। तदनन्तर पुरुषवेद संज्वलनक्रोध, संज्वलनमान और संज्वलनमाया
वहाँपर क्रमसे अत्यन्त क्षयको प्राप्त होते हैं। तथा लोभसंज्वलन सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानके
अन्तमें विनाशको प्राप्त होता है। निद्रा और प्रचला क्षीणकषाय वीतरागछद्मस्थगुणस्थानके
२५ उपान्त्य समयमें प्रलयको प्राप्त होते हैं। पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय
कर्मोंका उसी गुणस्थानके अन्तिम समयमें क्षय होता है। कोई एक वेदनीय, देवगति, औदारिक
शरीर, वैक्रियिक शरीर, आहारक शरीर, तैजसशरीर, कार्मण शरीर, पाँच बन्धन, पाँच संघात,
छह संस्थान, औदारिक शरीर अंगोपांग, वैक्रियिकशरीर अंगोपांग, आहारक शरीर अंगोपांग,
छह संहनन, पाँच प्रशस्तवर्ण, पाँच अप्रशस्तवर्ण, दो गन्ध, पाँच प्रशस्तरस, पाँच अप्रशस्तरस, आठ
३० स्पर्श, देवगति, प्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, अप्र-
शस्तविहायोगति, अपर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, सुस्वर, दुःस्वर,
अनादेय, अयशःकीर्ति, निर्माण और नीचगोत्र नामवाली बहत्तर प्रकृतियोंको अयोगकेवली गुण-
स्थानके उपान्त्य समयमें विनष्ट करता है तथा कोई एक वेदनीय मनुष्य आयु, मनुष्यगति, पंचे-
न्द्रियजाति, मनुष्यगति-प्रायोग्यानुपूर्वी, त्रस, बादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, यशःकीर्ति, तीर्थंकर
३५ और उच्चगोत्र नामवाली तेरह प्रकृतियोंका अयोगकेवली गुणस्थानके

  • १०१४ § ९२७ ] दशमोऽध्यायः ३५९
    § ९२४. आह, किमासां पौद्गलिकीनामेव द्रव्यकर्मप्रकृतीनां निरासान्मोक्षोऽवसीयते उत
    भावकर्मणोऽपीत्यत्रोच्यते—
    औपशमिकादिभव्यत्वानां च ॥ ३ ॥
    § ९२५. किम् । 'मोक्षः' इत्यनुवर्तते । भव्यत्वग्रहणमन्यपारिणामिकनिवृत्त्यर्थम् । तेन पारि-
    णामिकेषु भव्यत्वस्यौपशमिकादीनां च भावानाम्भावान्मोक्षो भवतीत्यभ्युपगम्यते । ५
    § ९२६. आह, यद्यपवर्गो भावोपरतेः प्रतिज्ञायते नैनु औपशमिकादिभावनिवृत्तितत्सर्व-
    क्षायिकभावनिवृत्तिर्व्यपदेशो मुक्तस्य प्राप्नोतीति । स्यादेतदेवं यदि विशेषो नोच्येत । अस्त्यत्र
    विशेष इत्यपवादविधानार्थमिदमुच्यते—
    अन्यत्र केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्यः ॥ ४ ॥
    § ९२७. अन्यत्रशब्दापेक्षया 'का'निर्देशः । केवलसम्यक्त्वज्ञानदर्शनसिद्धत्वेभ्योऽन्यत्रान्य- १०
    स्मिन्नयं विधिरिति । यदि चत्वार एवावशिष्यन्ते, अनन्तवीर्यादीनां निवृत्तिः प्राप्नोति । नैष दोषः,
    और किसीके नहीं होता । इनके सिवा शेष प्रकृतियोंका सत्त्व नियमसे होता है । यह जीव गुण-
    स्थान क्रमसे बन्धहेतुओंका अभाव करता है इसलिए क्रमसे नूतन बन्धका अभाव होता जाता है
    और सत्तामें स्थित प्राचीन प्रकृतियोंका परिणाम-विशेषसे क्षय करता जाता है इसलिए सत्तामें
    स्थित कर्मोंका भी अभाव होता जाता है और इस प्रकार अन्तमें सब कर्मोंका वियोग हो जानेसे १५
    यह जीव मुक्त होता है। यहाँ मोक्ष शब्दका प्रयोग कर्म, नोकर्म और भावकर्मके वियोग अर्थमें
    किया गया है । संसारी जीव बद्ध है अतएव वह परतन्त्र है। उसके बन्धनके टूट जाने पर
    वह मुक्त होता है अर्थात् अपनी स्वतन्त्रताको प्राप्त करता है। इस प्रकार मोक्ष क्या है इसका
    निर्देश किया ।
    § ९२४. कहते हैं कि क्या इन पौद्गलिक द्रव्यकर्म प्रकृतियोंके वियोगसे ही मोक्ष मिलता २०
    है या भावकर्मोंके भी अभावसे मोक्ष मिलता है इस बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
    तथा औपशमिक आदि भावों और भव्यत्व भावके अभाव होनेसे मोक्ष होता है ॥३॥
    § ९२५. क्या होता है ? मोक्ष होता है। यहाँ पर 'मोक्ष' इस पदकी अनुवृत्ति होती है।
    अन्य पारिणामिक भावोंकी निवृत्ति करनेके लिए सूत्रमें भव्यत्व पदका ग्रहण किया है। इससे
    पारिणामिक भावोंमें भव्यत्वका और औपशमिक आदि भावोंका अभाव होनेसे मोक्ष होता है यह २५
    ज्ञात होता है।
    § ९२६. कहते हैं, यदि भावोंके अभाव होनेसे मोक्षकी प्रतिज्ञा करते हो तो औपशमिक
    आदि भावोंकी निवृत्तिके समान समस्त क्षायिक भावोंकी निवृत्ति मुक्त जीवके प्राप्त होती है ?
    यह ऐसा होवे यदि इसके सम्बन्धमें कोई विशेष बात न कही जावे तो । किन्तु इस सम्बन्धमें
    विशेषता है इसलिए अपवादका विधान करनेके लिए यह आगेका सूत्र कहते हैं— ३०
    पर केवल सम्यक्त्व, केवलज्ञान, केवलदर्शन और सिद्धत्व भावका अभाव नहीं होता ॥४॥
    § ९२७. यहाँ पर अन्यत्र शब्दकी अपेक्षा पंचमी विभक्तिका निर्देश किया है। केवल-
    सम्यक्त्व, केवलज्ञान, केवलदर्शन और सिद्धत्व इनके सिवा अन्य भावोंमें यह विधि होती है।
    शंका—सिद्धोंके यदि चार ही भाव शेष रहते हैं तो अनन्तवीर्य आदिकी निवृत्ति प्राप्त होती है।
    १. –यते नत्वौप-मु० । –यतेतदौप– ता० । २. 'कापदाने' –जैनेन्द्र० १, ४, ४१ । 'अपादाने कारके का ३५
    विभक्तिर्भवति ।' – वृत्तिः । प्रतिषु 'को निर्देशः' इति पाठः ।
३६०सर्वार्थसिद्धौ[ १०।५ § ९२८-

ज्ञानदर्शनाविनाभावित्वादनन्तवीर्यादीनामविशेषः, अनन्तसामर्थ्यहीनस्यानन्तावबोधवृत्त्यभावाज्ज्ञान-
¹मयत्वाच्च सुखस्येति। अनाकारत्वान्मुक्तानामभाव इति चेन्न; अतीतानन्तरशरीराकारत्वात्।
§ ९२८. स्यान्मतं, यदि शरीरानुविधायी जीवः, तदभावात्स्वाभाविकलोकाकाशप्रदेशपरि-
माणत्वात्तावद्विसर्पणं प्राप्नोतीति। नैष दोषः। कुतः। कारणाभावात्। नामकर्मसंबन्धो हि
संहरणविसर्पणकारणम्। तदभावात्पुनः संहरणविसर्पणाभावः।
§ ९२९. यदि कारणाभावान्न संहरणं न विसर्पणं तर्हि गमनकारणाभावादूर्ध्वगमनमपि न
प्राप्नोति अधस्तिर्यग्गमनाभाववत्, ततो यत्र मुक्तस्तत्रैवावस्थानं प्राप्नोतीति। अत्रोच्यते—
तदनन्तरमूर्ध्वं गच्छत्या लोकान्तात् ॥ ५ ॥
§ ९३०. तस्यानन्तरम्। कस्य। सर्वकर्मविप्रमोक्षस्य। आङ्भिविध्यर्थः। ऊर्ध्वं गच्छत्या
लोकान्तात्।
§ ९३१. अनुपदिष्टहेतुकमिदमूर्ध्वगमनं कथमध्यवसातुं शक्यमित्यत्रोच्यते—
पूर्वप्रयोगादसङ्गत्वाद् बन्धच्छेदात्तथागतिपरिणामाच्च ॥ ६ ॥
§ ९३२. आह, हेत्वर्थः पुष्कलोऽपि दृष्टान्तसमर्थनमन्तरेणाभिप्रेतार्थसाधनाय नालमित्य-
त्रोच्यते—
समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि ज्ञानदर्शनके अविनाभावी अनन्तवीर्य आदिक भी सिद्धोंमें
अवशिष्ट रहते हैं। क्योंकि अनन्त सामर्थ्यसे हीन व्यक्तिके अनन्तज्ञानकी वृत्ति नहीं हो सकती और
सुख ज्ञानमय होता है। शंका—अनाकार होनेसे मुक्त जीवोंका अभाव प्राप्त होता है। समाधान—
नहीं। क्योंकि उनके अतीत अनन्तर शरीरका आकार उपलब्ध होता है।
§ ९२८. शंका—यदि जीव शरीरके आकारका अनुकरण करता है तो शरीरका अभाव
होनेसे उसके स्वाभाविक लोकाकाशके प्रदेशोंके बराबर होनेके कारण जीव तत्प्रमाण प्राप्त होता
है। समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जीवके तत्प्रमाण होनेका कोई प्रमाण नहीं उपलब्ध
होता। नामकर्मका सम्बन्ध जीवके संकोच और विस्तारका कारण है किन्तु उसका अभाव हो जाने
से जीवके प्रदेशोंका संकोच और विस्तार नहीं होता।
§ ९२९. यदि कारणका अभाव हो जानेसे जीवके प्रदेशोंका संकोच और विस्तार नहीं
होता तो गमनके कारणका अभाव हो जानेसे जिस प्रकार यह जीव तिरछा और नीचेकी ओर
गमन नहीं करता है उसी प्रकार उसका ऊर्ध्वगमन भी नहीं प्राप्त होता है। इसलिए जिस
स्थानपर मुक्त होता है उसी स्थानपर उसका अवस्थान प्राप्त होता है, ऐसी शंकाके होनेपर
आगेके सूत्र द्वारा उसका समाधान करते हैं।
तदनन्तर मुक्त जीव लोकके अन्त तक ऊपर जाता है ॥५॥
§ ९३०. उसके अनन्तर। शंका—किसके? समाधान—सब कर्मोंके वियोग होनेके। सूत्रमें
'आङ्' पद अभिविधि अर्थमें आया है। लोकके अन्त तक ऊपर जाता है।
§ ९३१. जीव ऊर्ध्वगमन क्यों करता है इसका कोई हेतु नहीं बतलाया, इसलिए इसका
निश्चय कैसे होता है अतः इसी बातका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पूर्वप्रयोगसे, संगका अभाव होनेसे, बन्धनके टूटनेसे और वैसा गमन करना स्वभाव होनेसे
मुक्त जीव ऊर्ध्वगमन करता है ॥६॥
§ ९३२. कहते हैं, पुष्कल भी हेतु दृष्टान्त द्वारा समर्थनके बिना अभिप्रेत अर्थकी सिद्धि
करनेमें समर्थ नहीं होते इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
१. -मयपर्यायत्वाच्च मु०, ता० । २. अतीतानन्तशरी-मु० । ३. -कर्मसंसर्गो हि ता० ।

आविद्धकुलालचक्रवद्व्यपगतलेपालाबुवदेरण्डबीजवदग्निशिखावच्च ॥ ७ ॥
§ ९३२. पूर्वसूत्रे^१ विहितानां हेतूनामत्रोक्तानां दृष्टान्तानां च यथासंख्यमभिसंबन्धो भवति ।
तद्यथा—कुलालप्रयोगापादितहस्तदण्डचक्रसंयोगपूर्वकं भ्रमणम् । उपरतेऽपि तस्मिन्पूर्वप्रयोगादा-
संस्कारक्षयाद् भ्रमति । एवं भवस्थेनात्मनापवर्गप्राप्तये बहुशो यत्प्रणिधानं तदभावेऽपि तदावेश-
पूर्वकं मुक्तस्य गमनमवसीयते । किं च, असङ्गत्वात् । यथा मृत्तिकालेपजनितगौरवमलाबुद्रव्यं ५
जलेऽधःपतितं जलक्लेदविशिष्टमृत्तिकाबन्धनं लघु सत्तूर्ध्वमेव गच्छति तथा कर्मभाराक्रान्तिवशी-
कृत आत्मा तदावेशवशात्संसारे अनियमेन गच्छति । तत्सङ्गविमुक्त^२स्तूर्ध्वमेवोपयाति । किं च,
बन्धच्छेदात् । यथा बीजकोशबन्धच्छेदादेरण्डबीजस्य गतिर्दृष्टा तथा मनुष्यादिभवप्रापकगतिजाति-
नामादिसकलकर्मबन्धच्छेदान्मुक्तस्य ऊर्ध्वगतिरवसीयते । किं च, तथागतिपरिणामात् । यथा
तिर्यक्प्लवनस्वभावसमीरणसंबन्धनिरुत्सुका प्रदीपशिखा स्वभावादुत्पतति तथा मुक्तात्मापि १०
नानागतिविकारकारणकर्मनिर्वारणे सत्यूर्ध्वगतिस्वभावोऽ^३दूर्ध्वमेवारोहति ।
§ ९३४. आह, यदि मुक्त ऊर्ध्वगतिस्वभावो लोकान्तादूर्ध्वमपि कस्मान्नोत्पततीत्यत्रोच्यते—
धर्मास्तिकायाभावात् ॥ ८ ॥
घुमाये गये कुम्हारके चक्रके समान, लेपसे मुक्त हुई तूमड़ीके समान, एरण्डके बीजके
समान और अग्निकी शिखाके समान ॥७॥ १५
§ ९३३. पिछले सूत्रमें कहे गये सूत्रोंका और इस सूत्रमें कहे गये दृष्टान्तोंका क्रमसे सम्बन्ध
होता है । यथा—कुम्हारके प्रयोगसे किया गया हाथ, दण्ड और चक्रके संयोगपूर्वक जो भ्रमण
होता है उसके उपरत हो जानेपर भी पूर्व प्रयोगवश संस्कारका क्षय होने तक चक्र घूमता रहता
है । इसी प्रकार संसारमें स्थित आत्माने मोक्षकी प्राप्तिके लिए जो अनेक बार प्रणिधान किया है
उसका अभाव होनेपर भी उसके आवेश पूर्वक मुक्त जीवका गमन निश्चित होता है। असंगतवात्— २०
जिस प्रकार मृत्तिकाके लेपसे तूमड़ीमें जो भारीपन आ जाता है उससे जलके नीचे पड़ी हुई तूमड़ी
जलसे मिट्टीके गीले हो जानेके कारण बन्धनके शिथिल होनेसे शीघ्र ही ऊपर ही जाती है उसी
प्रकार कर्मभारके आक्रमणसे आधीन हुआ आत्मा उसके आवेशवश संसारमें अनियमसे गमन करता
है किन्तु उसके संगसे मुक्त होनेपर ऊपर ही जाता है। बन्धच्छेदात्—जिस प्रकार बीजकोषके
बन्धनके टूटनेसे एरण्ड बीजकी ऊर्ध्व गति देखी जाती है उसी प्रकार मनुष्यादि भवको प्राप्त २५
करानेवाले गतिनाम और जातिनाम आदि समस्त कर्मोंके बन्धका छेद होनेसे मुक्त जीवकी ऊर्ध्व-
गति जानी जाती है। तथागतिपरिणामात्—जिस प्रकार तिर्यग्वहन स्वभाववाले वायुके सम्बन्धसे
रहित प्रदीपशिखा स्वभावसे ऊपरकी ओर गमन करती है उसी प्रकार मुक्त आत्मा भी नानागति
रूप विकारके कारणभूत कर्मका अभाव होनेपर ऊर्ध्वगति स्वभाव होनेसे ऊपरकी ओर ही आरोहण
करता है। ३०
§ ९३४. कहते हैं कि यदि मुक्तजीव ऊर्ध्व गति स्वभाववाला है तो लोकान्तसे ऊपर भी
किस कारणसे नहीं गमन करता है, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
धर्मास्तिकायका अभाव होनेसे मुक्त जीव लोकान्तसे और ऊपर नहीं जाता ॥८॥
१. पूर्वसूत्रोदितानां-मु० । २. -विप्रमुक्तौ तूपर्येवोप-मु० । -विमुक्ते तूपर्येवोप-ता० । -विमुक्तोऽत्र-दि० १,
दि० २ । ३. -भावत्वादू-मु० । ३५
४६
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

! Wait, why does it look like दुःषमा? In Digambara Hindi texts, they often write दुःषमा(matching Sanskrit दुःषमा). Wait, let's look at L31: भागमें और दुःषमा-सुषमामें उत्पन्न हुआ सिद्ध होता है। दुःषमामें उत्पन्न हुआ दुःषमामें सिद्ध Wait, look atदुःषमामें: is there a visarga ः? Yes, two dots are clearly visible! दुःषमामें. Wait, let's look at the character: is it ष? Yes, it is ष! Notice the horizontal line on top and the प-like shape with a crossbar: ष. Wait, why did I think खearlier? The crossbar is faint in some places, but it'sषmatching Sanskritदुःषमायाम्. Let's re-read line 30: सुषमा-दुःषमाके अन्त Line 31:भागमें और दुःषमा-सुषमामें उत्पन्न हुआ सिद्ध होता है। दुःषमामें उत्पन्न हुआ दुःषमामें सिद्ध Yes, it's definitelyदुःषमा`!

  • Line 32: नहीं होता। इस कालको छोड़कर अन्यकाल में सिद्ध नहीं होता है। संहरणकी अपेक्षा उत्सर्पिणी
  • १०।९ § ९३७ ] दशमोऽध्यायः ३६३
    पुल्लिङ्गेनैव । अथवा निर्ग्रन्थलिङ्गेन । सग्रन्थलिङ्गेन वा सिद्धिर्भूतपूर्वनयापेक्षया । तीर्थेन,१ तीर्थ-
    सिद्धिः द्वेधा, तीर्थंकरेतरविकल्पात् । इतरे द्विविधाः सति तीर्थंकरे सिद्धा असति चेति । चारित्रेण
    केन सिध्यति । अव्यपदेशेनैकचतुःपञ्चविकल्पचारित्रेण वा सिद्धिः । स्वशक्तिपरोपदेशनिमित्त-
    ज्ञानभेदात् प्रत्येकबुद्धबोधितविकल्पः । ज्ञानेन केन । एकेन द्वित्रिचतुर्भिश्च ज्ञानविशेषैः सिद्धिः ।
    आत्मप्रदेशव्यापित्वमवगाहनम् । तद् द्विविधम्, उत्कृष्टजघन्यभेदात् । तत्रोत्कृष्टं पञ्चधनुःशतानि
    पञ्चविंशत्युत्तराणि । जघन्यमर्धचतुर्थारत्नयो देशोनाः । मध्ये विकल्पाः । एकस्मिन्नवगाहे
    सिध्यति । किमन्तरम् । सिध्यतां सिद्धानामनन्तरं२ जघन्येन द्वौ समयौ उत्कृष्टेनाष्टौ । अन्तरं
    जघन्येनैकः समयः उत्कर्षेण षण्मासाः । संख्या, जघन्येन एकसमये एकः सिध्यति । उत्कर्षेणा-
    ष्टोत्तरशतसंख्याः । क्षेत्रादिभेदभिन्नानां परस्परतः संख्याविशेषोऽल्पबहुत्वम् । तद्यथा-प्रत्युत्पन्न-
    नयापेक्षया सिद्धिक्षेत्रे सिध्यन्तीति नास्त्यल्पबहुत्वम् । भूतपूर्वनयापेक्षया तु चिन्त्यते, क्षेत्रसिद्धा
    द्विविधा-जन्मतः संहरणतश्च । तत्राल्पे संहरणसिद्धाः । जन्मसिद्धाः संख्येयगुणाः । क्षेत्राणां
    विभागः कर्मभूमिरकर्मभूमिः समुद्रो द्वीप ऊर्ध्वमधस्तिर्यगिति । तत्र स्तोका ऊर्ध्वलोकसिद्धाः ।
    अधोलोकसिद्धाः संख्येयगुणाः । तिर्यग्लोकसिद्धाः संख्येयगुणाः । सर्वतः स्तोकाः समुद्रसिद्धाः ।
    द्वीपसिद्धाः संख्येयगुणाः । एवं तावदविशेषेण । सर्वतः स्तोका लवणोदसिद्धाः । कालोदसिद्धाः
    अपेक्षा पुलिंगसे ही सिद्धि होती है अथवा निर्ग्रन्थलिंगसे सिद्धि होती है । भूतपूर्वनयकी अपेक्षा सग्रन्थ
    लिंगसे सिद्धि होती है । तीर्थ-तीर्थसिद्धि दो प्रकारकी है-तीर्थंकरसिद्ध और इतरसिद्ध । इतर
    दो प्रकारके हैं, कितने ही जीव तीर्थंकरके रहते हुए सिद्ध होते हैं और कितने ही जीव तीर्थंकरके
    अभावमें सिद्ध होते हैं । चारित्र-किस चारित्रसे सिद्धि होती है ? नामरहित चारित्रसे सिद्धि होती
    है या एक, चार और पाँच प्रकारके चारित्रसे सिद्धि होती है ! प्रत्येकबुद्ध-बोधितबुद्ध-अपनी
    शक्ति रूप निमित्तसे होनेवाले ज्ञानके भेदसे प्रत्येकबुद्ध होते हैं और परोपदेश रूप निमित्तसे होने-
    वाले ज्ञानके भेदसे बोधितबुद्ध होते हैं, इस प्रकार ये दो प्रकारके हैं । ज्ञान-किस ज्ञानसे सिद्धि
    होती है । एक, दो, तीन और चार प्रकारके ज्ञानविशेषोंसे सिद्धि होती है । अवगाहना-आत्म-
    प्रदेशमें व्याप्त करके रहना इसका नाम अवगाहना है । वह दो प्रकारकी है-जघन्य और उत्कृष्ट ।
    उत्कृष्ट अवगाहना पाँच सौ पचीस धनुष है और जघन्य अवगाहना कुछ कम साढ़े तीन अरत्नि
    है । बीचके भेद अनेक हैं । किसी एक अवगाहनामें सिद्धि होती है । अन्तर-क्या अन्तर है ?
    सिद्धिको प्राप्त होनेवाले सिद्धोंका जघन्य अनन्तर दो समय है और उत्कृष्ट अनन्तर आठ समय है ।
    जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है । संख्या-जघन्य रूपसे एक
    समयमें एक जीव सिद्ध होता है और उत्कृष्ट रूपसे एक समयमें एक सौ आठ जीव सिद्ध होते हैं ।
    अल्पबहुत्व-क्षेत्रादि भेदोंकी अपेक्षा भेदको प्राप्त हुए जीवोंकी परस्पर संख्याका विशेष प्राप्त
    करना अल्पबहुत्व है । यथा-वर्तमान नयकी अपेक्षा सिद्धिक्षेत्रमें सिद्ध होनेवाले जीवोंका अल्प-
    बहुत्व नहीं है । भूतपूर्व नयकी अपेक्षा विचार करते हैं-क्षेत्रसिद्ध जीव दो प्रकारके हैं-जन्मसिद्ध
    और संहरणसिद्ध । इनमेंसे संहरणसिद्ध जीव सबसे अल्प हैं। इनसे जन्मसिद्ध जीव संख्यातगुणे
    हैं । क्षेत्रोंका विभाग इस प्रकार है-कर्मभूमि, अकर्मभूमि, समुद्र, द्वीप, ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और
    तिर्यग्लोक । इनमें से ऊर्ध्वलोकसिद्ध सबसे स्तोक हैं। इनसे अधोलोक सिद्ध संख्यातगुणे हैं, इनसे
    तिर्यग्लोकसिद्ध संख्यातगुणे हैं। समुद्रसिद्ध सबसे स्तोक हैं। इनसे द्वीपसिद्ध संख्यातगुणे हैं। यह
    सामान्य रूपसे कहा है । विशेष रूपसे विचार करनेपर लवण समुद्रसिद्ध सबसे स्तोक हैं। इनसे
    १. तीर्थेन केन तीर्थेन सिद्धिः मु० । २. सिद्धानामन्तरं मु० ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

३६४ सर्वार्थसिद्धौ [ १०।९ ६९३८-
संख्येयगुणाः । जम्बूद्वीपसिद्धाः संख्येयगुणाः । धातकीखण्डसिद्धाः संख्येयगुणाः । पुष्करद्वोपार्ध-
सिद्धाः संख्येयगुणा इति । एवं कालादिविभागेऽपि यथागममल्पबहुत्वं वेदितव्यम् ॥१०॥
§ ९३८. स्वर्गापवर्गसुखमाप्तुमनोभिरार्यै-
र्जैनेन्द्रशासनवरामृतसार ता ।
५ सर्वार्थसिद्धिरिति सद्द्भिरुपात्तनामा
तत्त्वार्थवृत्तिरनिशं मनसा प्रधार्या ॥१॥
तत्त्वार्थवृत्तिममुदितां विदितार्थतत्त्वाः
शृण्वन्ति ये परिपठन्ति च धर्मभक्त्या ।
हस्ते कृतं परमसिद्धिसुखामृतं तै-
१० र्मर्त्यामरेश्वरसुखेषु किमस्ति वाच्यम् ॥२॥
येनेदमप्रतिहतं सकलार्थतत्त्व-
मुद्द्योतितं विमलकेवललोचनेन ।
भक्त्या तमद्भुतगुणं प्रणमामि वीर-
माराद्धरामरगणार्चितपादपीठम् ॥३॥
१५ इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां दशमोऽध्यायः समाप्तः ।
शुभं भवतु सर्वेषाम् ।
कालोदसिद्ध संख्यातगुणे हैं। इनसे जम्बूद्वीपसिद्ध संख्यातगुणे हैं। इनसे धातकी खंड सिद्ध संख्यात-
गुणे हैं। इनसे पुष्करार्द्धद्वीपसिद्ध संख्यातगुणे हैं। इसी प्रकार कालादिका विभाग करनेपर भी
आगमके अनुसार अल्पबहुत्व जान लेना चाहिए ।
२० § ९३८. स्वर्ग और अपवर्गके सुखको चाहनेवाले आर्य पुरुषोंने इस तत्त्वार्थवृत्तिका सर्वार्थ-
सिद्धि यह नाम रखा है। यह जिनेन्द्रदेवके शासनरूपी अमृतका सार है, अतः मनःपूर्वक इसे
निरन्तर धारण करना चाहिए ॥१॥ सब तत्त्वोंके जानकार जो इस तत्त्वार्थवृत्तिको धर्मभक्तिसे
सुनते हैं और पढ़ते हैं मानो उन्होंने परम सिद्धिसुखामृतको अपने हाथमें ही कर लिया है, फिर,
चक्रवर्ती और देवेन्द्रके सुखके विषयमें तो कहना ही क्या है ॥२॥ जिन्होंने अपने विमल केवल-
२५ ज्ञानरूपी नेत्रके द्वारा इस निर्विवाद सकल तत्त्वार्थका प्रकाश किया है, मनुष्यों और देवोंके द्वारा
पूजित अद्भुतगुणवाले उन वीर भगवान् को भक्तिपूर्वक मैं प्रणाम करता हूँ ॥३॥
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामक तत्त्वार्थवृत्तिमें दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ।
१. - द्वीपसिद्धाः मु० Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

परिशिष्ट १
सूत्रपाठ
प्रथम अध्याय
पैराग्राफ संख्या
१. सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः । ४
२. तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम् । ९
३. तन्निसर्गादधिगमाद्वा । १३
४. जीवाजीवास्त्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम् । १७
५. नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्न्यासः । २१
६. प्रमाणनयैरधिगमः । २३
७. निर्देशस्वामित्वसाधनाधिकरणस्थितिविधानतः । २५
८. सत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालान्तरभावाल्पबहुत्वैश्च । ३२
९. मतिश्रुतावधिमनःपर्ययै²केवलानि ज्ञानम् १६३
१०. तत्प्रमाणे । १६५
११. आद्ये परोक्षम् ।³ १७३
१२. प्रत्यक्षमन्यत् । १७५
१३. मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ताभिनिबोध इत्यनर्थान्तरम् । १८१
१४. तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् । १८४
१५. अवग्रहेहावाय⁴धारणाः । १८९
१६. बहुबहुविधक्षिप्रानिः⁵सृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् । १९१
१७. अर्थस्य । १९७
१८. व्यञ्जनस्यावग्रहः । १९९
१९. न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् । २०१
२०. श्रुतं मतिपूर्वं द्वयनेकदशद्वादशभेदम् । २०५
२१. भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम् ।⁶ २१२
२२. क्षयोपशमनिमित्तः⁷ षड्विकल्पः शेषाणाम् । २१४
२३. ऋजुविपुलमतीमनःपर्ययः ।⁸ २१६
२४. विशुद्धयप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः २१९
२५. विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययोः ।⁹ २२१
२६. मतिश्रुतयोर्निबन्धो¹⁰ द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु । २२३
१. आश्रव-हारिभ० । २. मनःपर्य्याय-त० भा० । ३. तत्र आद्ये-हारिभ० । ४.-हेहापाय-त०, मा०,
हारिभ० सि० । तत्त्वार्थवार्तिकमें 'अवाय और अपाय' दोनों पाठ हैं । ५.-निश्चिता-त० मा०, क्षिप्र-
निःसृतानु- स०, श्रितनिश्चितध्रु- सि० वृ० पा० । ६. त० मा० में भवप्रत्ययो इत्यादि सूत्रके स्थान पर
द्विविधोऽवधिः ॥२१॥ भवप्रत्ययो नारकदेवानाम् ॥२२॥ ऐसे दो सूत्र हैं । ७. यथोक्तनिमित्तः । त० भा० ।
८. -मनःपर्य्यायः । त० भा० । ९.-मनःपर्य्याययोः । त० भा० । १०. सर्वद्रव्ये-त० मा० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

३६६ सर्वार्थसिद्धि
२७. रूपिष्ववधेः । २२५
२८. तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य ।१ २२७
२९. सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य । २२९
३०. एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्भ्यः । २३१
३१. मतिश्रुतावधयो२ विपर्ययश्च । २३३
३२. सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् । २३५
३३. नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दा३समभिरूढैवंभूता नयाः । २४०
इति प्रथमोऽध्यायः ।
दूसरा अध्याय
१. औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य स्वतत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ च । २५१
२. द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदा यथाक्रमम् । २५४
३. सम्यक्त्वचारित्रे । २५६
४. ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च । २६०
५. ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्त्रिपञ्चभेदाः४,५सम्यक्त्वचारित्रसंयमासंयमाश्च । २६२
६. गतिकषायलिङ्गमिथ्यादर्शनाज्ञानासंयतासिद्ध७लेश्याश्चतुश्चतुस्त्र्येकैकैकषड्भेदाः । २६४
७. जीवभव्याभव्यत्वानि च । २६७
८. उपयोगो लक्षणम् । २७०
९. स९ द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः । २७२
१०. संसारिणो मुक्ताश्च । २७४
११. समनस्कामनस्काः । २८१
१२. संसारिणस्त्रसस्थावराः । २८३
१३. पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः ।१० २८५
१४. द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः ।११ २८७
१५. पञ्चेन्द्रियाणि । २८९
१६. द्विविधानि । २९१
१७. निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् । २९३
१८. लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् । २९५
१९. स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्राणि ।१२ २९७
२०. स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः ।१३ २९९
२१. श्रुतमानिन्द्रियस्य । ३०१
१. मनःपर्ययस्य त० भा० । २.-श्रुतिविभंगा विप- हारिभ० । ३.-सूत्रशब्दा नयाः त० भा० । ४.-त०
म० में आद्यशब्दौ द्वित्रिभेदौ ॥३५॥ यह सूत्र अधिक है । ५.-दानादिलब्धय-त० भा० । ६-त० सा० में
'यथाक्रमम्' इतना पाठ अधिक है । ७. सिद्धत्व-त० भा० । ८. भव्यत्वादीनि-त० भा० । ९. 'स' पाठ
नहीं है सि० वृ० पा० । १०. 'पृथिव्यम्बुवनस्पतयः स्थावराः' त० भा० । ११. तेजोवायू द्वीन्द्रियादयश्च
त्रसाः त० भा० । १२. 'स्पर्शनरसन'-इत्यादि सूत्रके पूर्व 'उपयोगः स्पर्शादिषु' ।।१९।। यह सूत्र त० भा० में
अधिक है । १३. शब्दास्तेषामर्थाः । त० भा० ।

परिशिष्ट १ ३६७
२२. वनस्पत्यन्तानामेकम् ।¹ ३०३
२३. कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि । ३०५
२४. संज्ञिनः समनस्काः । ३०७
२५. विग्रहगतौ कर्मयोगः । ३०९
२६. अनुश्रेणि गतिः । ३११
२७. अविग्रहा जीवस्य । ३१३
२८. विग्रहवती च संसारिणः प्राक् चतुर्थ्यः । ३१५
२९. एकसमयाविग्रहा ।२ ३१७
३०. एकं द्वौ ३ त्रीन्वानाहारकः । ३१९
३१. संमूर्च्छनगर्भोपपादा४ जन्म । ३२१
३२. सचित्तशीतसंवृताः सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः । ३२३
३३. जरायुजाण्डैजपोतानां गर्भः । ३२५
३४. देवनारकाणामुपपादः६ । ३२७
३५. शेषाणां संमूर्च्छनम् । ३२८
३६. औदारिकवैक्रियिकाहारक⁷तैजसकार्मणानि शरीराणि । ३३०
३७. परं परं सूक्ष्मम् । ३३२
३८. प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक् तैजसात् ३३४
३९. अनन्तगुणे परे । ३३६
४०. अप्रतीघाते८ । ३३८
४१. अनादिसंबन्धे च । ३४०
४२. सर्वस्य । ३४२
४३. तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्भ्यः । ३४४
४४. निरुपभोगमन्त्यम् । ३४६
४५. गर्भसंमूर्च्छनजमाद्यम् । ३४८
४६. औपपादिकं वैक्रियिकम् ।१० ३५०
४७. लब्धिप्रत्ययं च । ३५२
४८. तैजसमपि ।११ ३५४
४९. शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं १२ प्रमत्तसंयतस्यैव । ३५६
५०. नारकसंमूर्च्छिनो नपुंसकानि । ३५८
५१. न देवाः । ३६०
५२. शेषास्त्रिवेदाः ।१३ ३६२
५३. औपपादिकचरमोत्तमदेहा १४ऽसंख्येय १५वर्षायुषोनपवर्त्यायुषः । ३६४
इति द्वितीयोऽध्यायः ।
१. वाय्वन्तानामेकम् त० भा० । २. एकसमयोऽविग्रहः त० भा० । ३. द्वौ वानाहरकः त० भा० ।
४. —गर्भोपपाता त० भा० । ५. जरायुवण्डपोतजानां त० भा० । ६. नारकदेवानामुपपातः त० भा० ।
७. —वैक्रियाहारक- । त० भा० । ८. अप्रतिघाते । त० भा० । ९. युगपदेकस्या । १०. वैक्रियमौप-
पातिकम् । त० भा० । ११. त० भा० में यह सूत्र नहीं है । १२. चतुर्दशपूर्वधरस्यैव । त० भा० में इतना
पाठ अधिक है । १३. त० भा० में यह सूत्र नहीं है । १४. ‘चरमदेहा’ यह भी पाठान्तर है । स०, त०
वा० । १५. औपपातिकचरमदेहोत्तमपुरुषासंख्येय- । त० भा० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

३६८ सर्वार्थसिद्धि
तीसरा अध्याय
१. रत्नशर्कराबालुकापङ्कधूमतमोमहातमःप्रभा भूमयो घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोधः।१ ३६६
२. २तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरकशतसहस्राणि पञ्च चैव यथाक्रमम् । ३६८
३. ३नारका नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः । ३७०
४. परस्परोदीरितदुःखाः । ३७२
५. संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः । ३७४
६. तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशाष्टाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्त्वानां परा स्थितिः । ३७६
७. जम्बूद्वीपलवणादयः४ शुभनामानो द्वीपसमुद्राः । ३७८
८. द्विर्द्विर्विष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः । ३८०
९. तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः । ३८२
१०. भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि ।५ ३८४
११. तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनीलरुक्मिशिखरिणो ६वर्षधरपर्वताः । ३८६
१२. हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः । ३८८
१३. मणिविचित्रपार्श्वा उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः । ३९०
१४. पद्ममहापद्मतिगिञ्छकेसरिमहापुण्डरीकपुण्डरोका ह्रदास्तेषामुपरि । ३९२
१५. प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदर्धविष्कम्भो ह्रदः । ३९४
१६. दशयोजनावगाहः । ३९६
१७. तन्मध्ये योजनं पुष्करम् । ३९८
१८. तद्द्विगुणद्विगुणा ह्रदाः पुष्कराणि च । ४००
१९. तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीह्रीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः पल्योपमस्थितयः ससामानिकपरिषदत्काः । ४०२
२०. गङ्गासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तासीतासीतोदानारीनरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारक्ता-
रक्तोदाः

परिशिष्ट १ ३६९
३४. पुष्करार्धे च । ४३१
३५. प्राङ् मानुषोत्तरान्मनुष्याः । ४३३
३६. आर्या म्लेच्छाश्च¹ । ४३४
३७. भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरूत्तरकुरुभ्यः । ४३६
३८. नृस्थिती परावरे² त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते । ४३८
३९. तिर्यग्योनिजानां³ च । ४४०
इति तृतीयोऽध्यायः ।
चौथा अध्याय
१. देवाश्चतुर्णिकायाः ।⁴ ४४२
२. आदितस्त्रिषु पीतान्तलेश्याः ।⁵ ४४४
३. दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः । ४४६
४. इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदामरक्ष⁶लोकपालानीकप्रकीर्णकाभियोग्यकिल्विषिकाश्चै-
कशः । ४४८
५. त्रायस्त्रिंशलोकपालवर्ज्या व्यन्तरज्योतिष्काः । ४५०
६. पूर्वयोर्द्वीन्द्राः⁷ । ४५२
७. कायप्रवीचारा आ ऐशानात् । ४५४
८. शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः⁸ । ४५६
९. परेऽप्रवीचाराः । ४५८
१०. भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निवातस्तनितोदधिद्वीपदिकुमाराः । ४६०
११. व्यन्तराः किंनरकिंपुरुषमहोरगगन्धर्वयक्षराक्षसभूतपिशाचाः । ४६२
१२. ज्योतिष्काः सूर्य्याचन्द्रमसौ¹⁰ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च¹¹ । ४६४
१३. मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके । ४६६
१४. तत्कृतः कालविभागः । ४६८
१५. बहिरवस्थिताः । ४७०
१६. वैमानिकाः । ४७२
१७. कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च । ४७४
१८. उपर्युपरि । ४७६
१९. सौधर्मेशानसानत्कुमारमाहेन्द्रे¹²ब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठशुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेष्वानत-
प्राणतयोरारणाच्युतयोर्नवसु ग्रैवेयकेषु विजयवैजयन्तजयन्तापराजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च¹³। ४७८
२०. स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्याविशुद्धीन्द्रियावधिविषयतोऽधिकाः । ४८०
२१. गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो हीनाः । ४८२
१. म्लिशश्च । त० भा०, हारिभ० । २. परापरे । त० भा० । ३. तिर्यग्योनीनां च त० भा० । ४. -श्चतु-
र्निकायाः त० भा० । ५. त० भा० में तृतीयः पीतलेश्यः ऐसा सूत्र है। ६. -पारिषद्यात्म०-त० भा० ।
७. त० भा० में इस सूत्र के आगे 'पीतान्तलेश्याः' सूत्र अधिक है। ८. त० भा० में द्वयोर्द्वयोः इतना पाठ
अधिक है। ९. गान्धर्व०-त० भा० । १०. सूर्य्यश्चन्द्रमसो । त० भा० । ११. प्रकीर्णतारकाश्च । त० भा० ।
१२. -ब्रह्मलोकलान्तकमहाशुक्रसहस्रारेष्वानत-त० भा० । १३. सर्वार्थसिद्धे च त० भा० ।
४७ CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

३७० सर्वार्थसिद्धि
२२. पीतपद्मशुक्ललेश्या द्वित्रिशेषेषु¹। ४८४
२३. प्राग्ग्रैवेयकेभ्यः कल्पाः। ४८६
२४. ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः²। ४८८
२५. सारस्वतादित्यवह्नयरुणगर्दतोयतुषिताव्याबाधारिष्टाश्च³। ४९०
२६. विजयादिषु द्विचरमाः। ४९२
२७. औपपादिकमनुष्येभ्यः⁴ शेषास्तिर्यग्योनयः। ४९४
२८. स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमार्द्धहीनमिताः।⁵ ४९६
२९. सौधर्मेशानयोः सागरोपमेऽधिके।⁶ ४९८
३०. सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सप्त।⁷ ५००
३१. त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानि तु॑। ५०२
३२. आरणाच्युतादूर्ध्वमेकैकेन नवसु ग्रैवेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ⁹ च। ५०४
३३. अपरा पल्योपममधिकम्¹⁰। ५०६
३४. परतः परतः पूर्वा पूर्वानन्तरा।¹¹ ५०८
३५. नारकाणां च द्वितीयादिषु। ५१०
३६. दशवर्षसहस्राणि प्रथमायाम्। ५१२
३७. भवनेषु च। ५१४
३८. व्यन्तराणां च। ५१६
३९. परा पल्योपममधिकम्। ५१८
४०. ज्योतिष्काणां च।¹² ५२०
४१. तदष्टभागोऽपरा।¹³ ५२२
४२. लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम्।¹⁴ ५२४
इति चतुर्थोऽध्यायः।
पाँचवां अध्याय
१. अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः। ५२६
२. द्रव्याणि।¹⁵ ५२८
३. जीवाश्च। ५३०
१. पीतमिश्र-पद्ममिश्रशुक्ललेश्या द्विद्विचतुश्चतुःशेषेषु इति त० भा० । २. लोकान्तिकाः त० भा० । ३.
व्याबाधमरुतोऽरिष्टाश्च । त० भा० । ४. औपपातिक-त० भा० । ५. इस एक सूत्र के स्थान पर त० भा० में
चार सूत्र हैं। वे इस प्रकार हैं:—स्थितिः॥२९॥ भवनेषु दक्षिणार्धाधिपतीनां पल्योपममध्यर्धम्॥३०॥ शेषाणां
पादोने॥३१॥ असुरेन्द्रयोः सागरोपममधिकं च ॥३२॥ ६. त० भा० में इस एक सूत्र के स्थान पर 'सौध-
र्मादिषु यथाक्रमम् ॥३३॥ सागरोपमे ॥३४॥ अधिके ॥३५॥ ऐसे तीन सूत्र हैं। ७. त० भा० में 'सप्त
सानत्कुमारे' ऐसा सूत्र है। ८. त० भा० में 'विशेषत्रिसप्तदशैकादशपञ्चदशभिरधिकानि च' ऐसा सूत्र है।
९. सर्वार्थसिद्धे च त० भा० । १०. -मधिकं च त० भा० । ११. त० भा० में इस सूत्र के पूर्व दो सूत्र और
पाये जाते हैं। वे इस प्रकार हैं—सागरोपमे ॥४०॥ अधिके च॥४१॥ १२. ज्योतिष्काणामधिकम् त० भा०।
१३. इस सूत्रके स्थान पर त० भा० में निम्नलिखित सूत्र हैं:—ग्रहाणामेकम् ॥४९॥ नक्षत्राणामर्धम् ॥५०॥
तारकाणां चतुर्भागः ॥५१॥ जघन्या त्वष्टभागः ॥५२॥ चतुर्थभागः शेषाणाम् ॥५४॥ १४. त० भा० में यह
सूत्र नहीं है। १५. त० भा० में 'द्रव्याणि जीवाश्च' ऐसा दो सूत्रोंके स्थान पर एक सूत्र है।

परिशिष्ट १ ३७१
४. नित्यावस्थितान्यरूपिणि । ५३२
५. रूपिणः पुद्गलाः । ५३४
६. आ¹ आकाशादेकद्रव्याणि । ५३६
७. निष्क्रियाणि च । ५३८
८. असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मैकजीवानाम्² । ५४०
९. आकाशस्यानन्ताः । ५४२
१०. संख्येयासंख्येयाश्च पुद्गलानाम् । ५४४
११. नाणोः । ५४६
१२. लोकाकाशेऽवगाहः । ५४८
१३. धर्माधर्मयोः कृत्स्ने । ५५०
१४. एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम् । ५५२
१५. असंख्येयभागादिषु जीवानाम् । ५५४
१६. प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां³ प्रदीपवत् । ५५६
१७. गतिस्थित्युपग्रहौ⁴ धर्माधर्मयोरुपकारः । ५५८
१८. आकाशस्यावगाहः । ५६०
[L17

३७२ सर्वार्थसिद्धि
३९. कालश्च ।¹ ६०१
४०. सोऽनन्तसमयः । ६०३
४१. द्रव्याश्रया निर्गुणाः गुणाः । ६०५
४२. तद्भावः परिणामः ।² ६०७
इति पञ्चमोऽध्यायः ।
छठवाँ अध्याय
१. कायवाङ्मनःकर्म योगः । ६०९
२. स आस्रवः । ६११
३. शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य³ । ६१३
४. सकषायाकषाययोः सांपरायिकेर्यापथयोः । ६१५
५. इन्द्रियकषायाव्रतक्रियाः पञ्चचतुःपञ्चपञ्चविंशतिसंख्याः पूर्वस्य भेदाः ।⁴ ६१७
६. तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषेभ्य⁵स्तद्विशेषः । ६१९
७. अधिकरणं जीवाजीवाः । ६२१
८. आद्यं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतकषायविशेषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः । ६२३
९. निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गा द्विचतुर्द्वित्रिभेदाः परम् । ६२५
१०. तत्प्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञानदर्शनावरणयोः । ६२७
११. दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनान्यात्मपरोभयस्थान्यसद्वेद्यस्य । ६२९
१२. भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः⁶ क्षान्तिः शौचमिति सद्धेद्यस्य । ६३१
१३. केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य । ६३३
१४. कषायोदयात्तीव्रपरिणामै⁷श्चारित्रमोहस्य । ६३५
१५. बह्वारम्भपरिग्रहत्वं⁸ नारकस्यायुषः । ६३७
१६. माया तैर्यग्योनस्य । ६३९
१७. अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य । ६४१
१८. स्वभावमार्दवं च ।⁹ ६४३
१९. निःशीलव्रतत्वं च सर्वेषाम् । ६४५
२०. सरागसंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि दैवस्य । ३४७
२१. सम्यक्त्वं च¹⁰ । ६४९
२२. योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः । ६५१
२३. तद्विपरीतं शुभस्य । ६५३
१. कालश्चेत्येके त० भा० । २. इस सूत्र से आगे त० भा० में तीन सूत्र और पाये जाते हैं। वे
इस प्रकार हैं :—अनादिरादिमांश्च ॥४२॥ रूपिष्वादिमान् ॥४३॥ योगोपयोगौ जीवेषु ॥४४॥ ३. इसके
स्थान पर त० भा० में दो सूत्र हैं—शुभः पुण्यस्य ॥३॥ अशुभः पापस्य ॥४॥ ४. अव्रतकषायेन्द्रि-
यक्रिया। त० भा० । ५. ज्ञाताज्ञातभाववीर्याधिकरणविशेषेभ्यस्तद्विशेषः । त० भा० । ६. भूतव्रत्यनुकम्पा-
दानं सरागसंयमादि योगः । त० भा० । ७. कषायोदयात्तीव्रात्मपरिणाम—त० भा० । ८. परिग्रहत्वं च त०
भा० । ९. १७-१८ नं० के सूत्रों के स्थान पर त० भा० में एक सूत्र है:—अल्पारम्भपरिग्रहत्वं स्वभाव-
मार्दवार्जवं च मानुषस्य । १०. त० भा० में यह सूत्र नहीं है।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

परिशिष्ट १ ३७३
२४. दर्शनविशुद्धिर्विनयसम्पन्नता शीलव्रतेष्वनतीचारोऽभीक्ष्णं¹ज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्याग-
तपसी ²साधुसमाधिर्वैयावृत्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्ग-
प्रभावना प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थंकरत्वस्य³ । ६५५
२५. परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने⁴ च नीचैर्गोत्रस्य । ६५७
२६. तद्विपर्ययो⁵ नीचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ चोत्तरस्य । ६५९
२७. विघ्नकरणमन्तरायस्य । ६६१
इति षष्ठोऽध्यायः ।
सातवाँ अध्याय
१. हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम् । ६६३
२. देशसर्वतोऽणुमहती । ६६५
३. तत्स्थैर्यार्थं भावनाः पञ्च पञ्च⁶ । ६६७
४. वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि पञ्च । ६६८
५. क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचिभाषणं च पञ्च । ६७०
६. शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्ष्यशुद्धिसधर्माविसंवादाः । ६७२
७. स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहराङ्गनिरीक्षणपूर्वरतानुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कारत्यागाः
पञ्च । ६७४
८. मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पञ्च । ६७६
९. ⁷हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् । ६७८
१०. दुःखमेव वा । ६८०
११. ⁸मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यानि च⁹ सत्त्वगुणाधिकक्लिश्यमानाविनेयेषु । ६८२
१२. जगत्कायस्वभावौ वा¹⁰ संवेगवैराग्यार्थम् । ६८४
१३. प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा । ६८६
१४. असदभिधानमनृतम् । ६८८
१५. अदत्तादानं स्तेयम् । ६९०
१६. मैथुनमब्रह्म । ६९२
१७. मूर्च्छा परिग्रहः । ६९४
१८. निःशल्यो व्रती । ६९६
१९. अगार्यनगारश्च । ६९८
२०. अणुव्रतोऽगारी । ७००
२१. दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिकप्रोष¹¹धोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणातिथिसंविभागव्रत-
संपन्नश्च । ७०२
२२. मारणान्तिकीं सल्लेखनां¹² जोषिता । ७०४
१. अभीक्ष्णं ज्ञानोपयोग-त०मा० । २. संघसाधुसमाधिवैयावृत्य-त० मा० । ३. तीर्थकृत्त्वस्य । त० भा० ।
४. गुणाच्छाद-त० मा० । ५. तद्विपर्ययो त० भा० । ६. इससे आगेके भावनावाले पाँचों सूत्र त० भा० में
नहीं हैं । ७. -मुत्र चापाया । त० भा० । ८. माध्यस्थ्यानि त० भा० । ९. त० भा० में 'च' पद नहीं है ।
१०. त० भा० में 'वा' के स्थान में 'च' पाठ है । ११. पौषधोप- । त० भा० । १२. संलेखनां त० भा० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

३७४ सर्वार्थसिद्धि
२३. शङ्काकाङ्क्षाविचिकित्सान्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतीचाराः । १ ७०६
२४. व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् । ७०८
२५. बन्धवध²च्छेदातिभारारोपणात्नपाननिरोधाः । ७१०
२६. मिथ्योपदेशरहोभ्या³ख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहारसाकारमन्त्रभेदाः । ७११
२७. स्तेनप्रयोगतदाहृतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिकमानोन्मानप्रतिरूपकव्यवहाराः । ७१२
२८. परविवाहकरणेत्वरिका⁴परिगृहीतापरिगृहीतागमनानङ्गक्रीडा⁵कामतीव्राभिनिवेशाः । ७१३
२९. क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणातिक्रमाः । ७१४
३०. ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि ।⁶ ७१६
३१. आनयनप्रेष्यप्रयोगशब्दरूपानुपातपुद्गलक्षेपाः । ७१७
३२. कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोग⁷परिभोगानर्थक्यानि । ७१८
३३. योगदुष्प्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ।⁸ ७१९
३४. अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादान⁹संस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि । ७२०
३५. सचित्तसम्बन्धे¹⁰संमिश्राभिषवदुःपक्वाहाराः । ७२१
३६. सचित्तनिक्षेपा¹¹पिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः । ७२२
३७. जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानानि¹² । ७२३
३८. अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् । ७२५
३९. विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेषः । ७२७
इति सप्तमोऽध्यायः ।
आठवाँ अध्याय
१. मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः । ७२९
२. सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते¹³ स बन्धः । ७३३
३. प्रकृतिस्थित्यनुभव¹⁴प्रदेशास्तद्विधयः । ७३५
४. आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायु¹⁵र्नामगोत्रान्तरायाः । ७३७
५. पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चभेदा यथाक्रमम् । ७३९
६. मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम् ।¹⁶ ७४१
७. चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्धयश्च¹⁷ । ७४३
८. सदसद्वेद्ये । ७४५

परिशिष्ट १ ३७५
९. दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनवषोडशभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्व-
तदुभयान्यकषायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्नपुंसकवेदा अनन्तानुबन्ध्य-
प्रत्याख्यानप्रत्याख्यान संज्वलनविकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमायालोभाः।$^१$ ७४७
१०. नारकतैर्यग्योनमानुषदेवानि । ७५२
११. गतिजातिशरीराङ्गोपाङ्गनिर्माणबन्धनसंघातसंस्थानसंहननस्पर्शरसगन्धवर्णानुपूर्व्या$^२$गुरु-
लघूपघातपरघातातपोद्योतोच्छ्वासविहायोगतयः प्रत्येकशरीरत्रससुभगसुस्वरशुभसूक्ष्म-
पर्याप्तिस्थिरादेयं यशःकीर्त्तिसेतराणि तीर्थंकरत्वं$^४$ च । ७५४
१२. उच्चैर्नीचैश्च । ७५६
१३. दानलाभभोगोपभोगवीर्याणाम्$^५$ । ७५८
१४. आदितस्तिसृणामन्तरायस्य च त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यः परा स्थितिः । ७६०
१५. सप्ततिर्मोहनीयस्य । ७६२
१६. विंशतिर्नामगोत्रयोः$^६$ । ७६४
१७. त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्यायुषः$^७$ । ७६६
१८. अपरा द्वादश मुहूर्त्ता वेदनीयस्य । ७६८
१९. नामगोत्रयोरष्टौ । ७६९
२०. शेषाणामन्तर्मुहूर्त्तः$^८$ । ७७१
२१. विपाकोऽनुभवः$^९$ । ७७३
२२. स यथानाम । ७७५
२३. ततश्च निर्जरा । ७७६
२४. नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाह$^१$$^०$स्थिताः सर्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्त-
प्रदेशाः । ७७९
२५. सद्येशुभायुर्नामगोत्राणि$^१$$^१$पुण्यम् । ७८१
२६. अतोऽन्यत्पापम्$^१$$^२$ । ७८३
इत्यष्टमोऽध्यायः ।
नौवाँ अध्याय
१. आस्रवनिरोधः संवरः । ७८४
२. स गुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः । ७८८
३. तपसा निर्जरा च । ७९०
४. सम्यग्योगनिग्रहो गुप्तिः । ७९२
१. दर्शनचारित्रमोहनीयकषायाकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विषोडशनवभेदाः सम्यक्त्वमिथ्यात्वतदुभयानि कषाया-
नन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानावरणसंज्वलनविकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमायालोभा हास्यरत्यरतिशोकभय-
जुगुप्सास्त्रीपुंनपुंसकवेदाः ॥१०॥ त० भा० । २. पूर्व्वगुरु-त० भा० । ३. यशांसि सेतराणि त० भा० ।
४. तीर्थकृत्त्वं च त० भा० । ५. -दानादीनाम् त० भा० । ६. नामगोत्रयोर्विशतिः । त० भा० । ७. -माण्यायु-
ष्कस्य त० भा० । ८. -मन्तर्मुहूर्त्तम् त० भा० । ९. -नुभावः त० भा० । १०. वगाढस्थिताः त० भा० । ११.
सद्येद्यसम्यक्त्वहास्यरतिपुरुषवेदशुभायुर्नामगोत्राणि त० भा० । १२. त० भा० में यह सूत्र नहीं है ।

३७६ सर्वार्थसिद्धि
५. ईर्याभाषैषणादाननिक्षेपोत्सर्गाः समितयः । ७९४
६. उत्तमक्षमामार्दवार्जवसत्यशौचसंयमतपस्त्यागाकिञ्चन्यब्रह्मचर्याणि धर्मः । १ ७९६
७. अनित्याशरणसंसारैकत्वान्यत्वाशुच्या२स्रवसंवरनिर्जरालोकबोधिदुर्लभधर्मस्वाख्यातत्वानु-
चिन्तनमनुप्रेक्षाः । ७९८
८. मार्गाच्यवननिर्जरार्थं परिषोढव्याः परीषहाः । ८१२
९. क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकनाग्न्यारतिस्त्रीचर्यानिषद्याशय्याक्रोशवधयाचनालाभरोग-
तृणस्पर्शमलसत्कारपुरस्कारप्रज्ञाज्ञानादर्शनानि । ८१४
१०. सूक्ष्मसांपरायच्छद्मस्थवीतरागयोश्चतुर्दश । ८३८
११. एकादश जिने । ८४०
१२. बादरसांपराये सर्वे । ८४२
१३. ज्ञानावरणे प्रज्ञाज्ञाने । ८४४
१४. दर्शनमोहान्तराययोर्दर्शनालाभौ । ८४६
१५. चारित्रमोहे नाग्न्यारतिस्त्रीनिषद्याक्रोशयाचनासत्कारपुरस्काराः । ८४७
१६. वेदनीये शेषाः । ८४९
१७. एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्नेकान्नविंशतेः । ३ ८५१
१८. सामायिकच्छेदोपस्थापना४परिहारविशुद्धिसूक्ष्म५सांपराययथाख्यातमिति६ चारित्रम् । ८५३
१९. अनशनावमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशय्यासनकायक्लेशाः बाह्यं तपः । ८५५
२०. प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम् । ८५७
२१. नवचतुर्दशपञ्चद्विभेदा७ यथाक्रमं प्राग्ध्यानात् । ८५९
२२. आलोचनप्रतिक्रमणतदुभयविवेकव्युत्सर्ग तपश्छेदपरिहारोपस्थापनाः । ८ ८६१
२३. ज्ञानदर्शनचारित्रोपचाराः । ८६३
२४. आचार्योपाध्याय तपस्विशैक्ष९ग्लानगणकुलसंघसाधु१०मनोज्ञानाम् । ८६५
२५. वाचनापृच्छनानुप्रेक्षाऽऽम्नायधर्मोपदेशाः । ८६७
२६. बाह्याभ्यन्तरोपध्योः । ८६९
२७. उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानमान्तर्मुहूर्तात् ११ । ८७१
२८. आर्तंरौद्रधर्म्य१२शुक्लानि । ८७३
२९. परे मोक्षहेतू । ८७५
३०. आर्तममनोज्ञस्य १३ सांप्रयोगे तद्विप्रयोगाय स्मृतिसमन्वाहारः । ८७७
३१. विपरीतं मनोज्ञस्य १४ । ८७९
३२. वेदनायाश्च । ८८१
३३. निदानं च । ८८३
३४. तदविरतदेशविरतप्रमत्तसंयतानाम् । ८८५
३५. हिंसानृतस्तेयविषयसंरक्षणेभ्यो रौद्रमविरतदेशविरतयोः । ८८७
१. उत्तमः क्षमा । त० भा० । २. शुचित्वास्रव० । त० भा० । ३. युगपदैकोनविंशतेः । त० भा० ।
४. ०पस्थाप्यपरिहार । त० भा० । ५. सूक्ष्मसंपराय० । त० भा० । ६. यथाख्यातानि त० भा० । ७.
द्विभेदं त० भा० । ८. स्थापनानि त० भा० । ९. शैक्षक-त० भा० । १०. साधुसमनोज्ञानाम् त० भा० ।
११. इस सूत्र के स्थान में त० भा० में उत्तमसंहननस्यैकाग्रचिन्तानिरोधो ध्यानम् ॥२७॥ आ अन्तर्मुहूर्तात्
॥२८॥ ये दो सूत्र हैं । १२. धर्म । त० भा० । १३. -ममनोज्ञानां त० भा० । १४. त० भा० में 'विपरीतं
मनोज्ञानाम्' ऐसा पाठ है और यह सूत्र 'वेदनायाश्च' इस सूत्र के बादमें है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri