सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ व भूमिका
प्रकाशक—
लक्ष्मण "पथिक"
पथिक ऐण्ड कम्पनी
नई सड़क, देहली.
विक्रेता—
लक्ष्मण "पथिक"
वजीरगंज (बदायूँ)
राजनीतिक, धार्मिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक
पुस्तकें मिलने का पता
मिलने का पता—
सरस्वती पुस्तक भण्डार
आर्यनगर, लखनऊ
मुद्रक—
पं० मन्नालाल तिवारी
शुक्ला प्रिंटिंग प्रेस,
लाटूश रोड, लखनऊ.
प्रथमोऽध्यायः
ॐ ओ३म् ॐ
सांख्य दर्शन
भाषाटीका
प्रथमोऽध्यायः
प्र०—मनुष्य-जीवन का मुख्य उद्देश्य क्या है ?
उ०—अथ त्रिविधदुःखात्यन्त निवृत्तिरत्यन्त
पुरुषार्थः ॥ १ ॥
अर्थ—तीन प्रकार के दुःखों का अत्यन्ताभाव हो जाना
प्राणीमात्र का मुख्य उद्देश्य है ।
प्र०—तीन प्रकार के कौनसे दुःख हैं ?
उ०—अध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक ।
प्र०—अध्यात्मिक दुःख किसको कहते हैं ?
उ०—जो दुःख शरीरान्तर में उत्पन्न हो, जैसे—ईर्ष्या, द्वेष,
लोभ, मोह, क्लेश रोगादि ।
( २ )
प्र०—आधिभौतिक दुःख किस को कहते हैं ?
उ०—जो अन्य प्राणियों के संसर्ग से उत्पन्न हो, जैसे—सर्प
के काटने या सिंह से मारे जाने या मनुष्यों के परस्पर युद्ध से
जो दुःख उपस्थित हो, उसे आधिभौतिक कहते हैं ।
प्र०—आधिदैविक दुःख किसको कहते हैं ?
उ०—जो दुःख दैवी शक्तियों अर्थात् अग्नि, वायु या जल के
न्यूनाधिक्य से उपस्थित हों, उनको आधिदैविक कहते हैं ।
प्र०—समय के विचार से दुःख कितने प्रकार के होते हैं ?
उ०—तीन प्रकार के अर्थात् भूत, बर्त्तमान, अनागत ।
प्र०—क्या इन तीनों के लिये पुरुषार्थ करना चाहिये ?
उ०—केवल अनागत के लिये पुरुषार्थ करना योग्य है, क्योंकि
भूत तो व्यतीत हो जाने के कारण नाश हो ही गया, और वर्त्तमान
दूसरे क्षण में भूत हो जाता है, अतएव यह दोनों स्वयं नाश हो
जाते हैं, केवल अनागत का नाश करना आवश्यकीय है ।
प्र०—जो दुःख अभी उत्पन्न नहीं हुआ या जो क्षुधा अभी
नहीं लगी उसका नाश किस प्रकार हो सकता है ?
उ०—“कारणाभावात् कार्य्याभावः” । ( वैशेषिक )—
अर्थ—कारण के नाश होने से कार्य का नाश हो जाता है,
अतएव दुःख के कारण का नाश करना चाहिये; क्योंकि कारण
के नाश से अनागत दुःख का नाश हो जाता है । जैसाकि महर्षि
पतञ्जलि ने लिखा है “हेयं दुःखमनागतम्” ।
अर्थ—आगामी दुःख 'हेयं' अर्थात् त्यागने योग्य है, उसी
के दूर करने का प्रयत्न करो ।
प्र०—इस सांख्य शास्त्र में किस वस्तु का वर्णन किया गया है ?
उ०—'हेयं' अर्थात् दुःख 'हीन' अर्थात् दुःख निवृत्ति । 'हेयं
( ३ )
हेतु' अर्थात् दुःख के उत्पन्न होने का कारण 'हानोपाय' अर्थात्
दुःख के नाश करने का उपाय ।
प्र०—क्या दुःख अन्न और औषध इत्यादि से दूर नहीं होता ?
उ०—दुःख की अत्यन्त निवृत्ति किसी प्राकृतिक वस्तु से नहीं
हो सकती, जैसाकि लिखा है—
न दृष्टात् दृष्टात्तत्सिद्धिर्निवृत्तेऽप्यनुवृत्ति
दर्शनात् ॥ २ ॥
अर्थ—दृश्य पदार्थों अर्थात् औषध्यादि द्वारा दुःख का
अत्यन्ताभाव हो जाना सम्भव नहीं, क्योंकि जिस पदार्थ के
संयोग से दुःख दूर होता है, उसके वियोग से वही दुःख फिर
उपस्थित हो जाता है, जैसे—अग्नि के निकट बैठने या कपड़े
के संसर्ग से शीत दूर होता है और अग्नि या कपड़े के अलग
होने से फिर वही शीत उपस्थित हो जाता है, अतएव दृश्य
पदार्थ अनागत् दुःख की औषध नहीं ।
प्र०—क्या दृश्य पदार्थ दुःख की अत्यन्त निवृत्ति का
कारण नहीं ?
उ०—नहीं ।
प्र०—प्रात्यहिकक्षुत्प्रतीकारवत् तत्प्रतीकारचे-
ष्टनात् पुरुषार्थत्वम् ॥ ३ ॥
अर्थ—नित्यप्रति क्षुधा लगती है उसकी निवृत्ति भोजन से हो
जाती है । इसी प्रकार और दुःख भी प्राकृतिक वस्तुओं से दूर हो
सकते हैं अर्थात् जैसे औषध से रोग की निवृत्ति हो जाती है,
अतएव वर्त्तमान काल के दुःख दृष्ट पदार्थों से दूर हो जाते हैं,
इसीको पुरुषार्थ मानना चाहिये ।
( ४ )
उ०—सर्वासम्भवात् सम्भवेऽपि सत्वारसम्भ-
वाद्धेयः प्रमाण कुशलैः ॥ ४ ॥
अर्थ—प्रथम तो प्रत्येक दुःख दृष्ट पदार्थों से दूर ही नहीं
होता, क्योंकि सर्व वस्तु प्रत्येक देश और काल में प्राप्त नहीं
हो सकती। यदि मान भी लें कि प्रत्येक आवश्यकीय वस्तुएँ
सुलभ भी हों तथापि उन पदार्थों से दुःख का अभाव नहीं हो
सकता, केवल दुःख का तिरोभाव कुछ काल के लिये हो जायगा ;
अतएव बुद्धिमान को चाहिये कि दृष्ट पदार्थों से दुःख दूर
करने का प्रयत्न न करे, दुःख के मूलोच्छेद करने का प्रयत्न करें,
जैसाकि लिखा है—
उत्कर्षादपिमोक्षस्य सर्वोत्कर्षश्रुतेः ॥ ५ ॥
अर्थ—मोक्ष सब सुखों से परे है और प्रत्येक बुद्धिमान्
सबसे परे पदार्थ की ही इच्छा करता है। इस हेतु से दृष्ट पदार्थों
को छोड़कर मोक्ष के लिये प्रयत्न करें, यही प्राणियों का मुख्य
उद्देश्य है।
अविशेषश्चोभयोः ॥ ६ ॥
अर्थ—यदि मोक्ष को अन्य सुखों के समान माना जावे तो
दोनों बातें समान हो जावेंगी, परन्तु क्षणिक सुख को महाकल्प
-पर्य्यन्त सुख के समान समझना बड़ी मूर्खता है।
प्र०—तुम जो मोक्ष को सबसे उत्तम जानते हो और मोक्ष
छूटने को कहते हैं, छूटता वही है, जो बन्धन में हो। क्या यह
जीव बन्धन में है ? यदि कहो कि बन्धन में है तो वह बन्धन
उसका स्वाभाविक गुण है या नैमित्तिक ?
उ०—न स्वभावतोबद्धस्य मोक्ष साधनोपदेश
विधिः ॥ ७ ॥
( ५ )
अर्थ—दुःख जीव का स्वाभाविक गुण नहीं, क्योंकि जो गुण
स्वभाव से होता है, वह गुणी से अलग नहीं होता, अतएव
दुःख के नाश के कथन से ही प्रतीत होता है, कि दुःख जीव का
स्वाभाविक गुण नहीं, क्योंकि वह गुणी से हो ही नहीं सकता।
स्वभावस्यानपायित्वादननुष्ठानलक्षणम प्रामा-
ण्यम् ॥ ८ ॥
अर्थ—स्वाभाविक गुण के अविनाशी होने से जिन मन्त्रों में
दुःख दूर करने का उपदेश किया गया है, वह सब प्रमाण नहीं
रहेंगे, अतएव दुःख जीव का स्वाभाविक गुण नहीं है।
नाशक्योपदेशविधिरुपदिष्टेऽप्यनुपदेशः ॥ ६ ॥
अर्थ—निष्फल कर्म्म के निमित्त वेद में कभी उपदेश नहीं
होसकता, क्योंकि असम्भव के लिये उपदेश करना भी न करने
के समान है, अतएव दुःख जीव का स्वाभाविक गुण नहीं, किन्तु
नैमित्तिक है।
प्र०—शुक्लपटवद्बीजवच्चेत् ॥ १० ॥
अर्थ—स्वाभाविक गुण का भी नाश होजाता है, जैसे—श्वेत
वस्त्र का श्वेत रंग स्वाभाविक गुण है, परन्तु वह मैला सुर्ख हो जाने
से नष्ट होजाता है। इसी प्रकार बीज में अंकुर लाने का स्वाभाविक
गुण है, परन्तु वह बीज के जला देने से नष्ट हो जाता है, अतएव
यह विचार करना ठीक नहीं।
उ०—शक्त्युद्भवानुद्भवाभ्यां नाशक्योपदेशः॥११॥
अर्थ—उपर्यु क्त उदाहरण स्वाभाविक गुण के अत्यन्ताभाव
का सर्वथा अयुक्त व अप्रामाणिक है; क्योंकि यह तो शक्ति के
गुप्त व प्रकट होने का उदाहरण है; क्योंकि यदि रजक के धोने से
( ६ )
पुनः यह वस्त्र श्वेत न होजाता तब यह ठीक होता । इसी प्रकार
जला हुआ बीज अनेक ओषधियों के मेल से ठीक होजाता है,
अतएव यह कथन ठीक नहीं कि स्वाभाविक गुण का भी नाश
हो सकता है ।
प्र०—यदि मान लिया जाय कि दुःख जीव का स्वाभाविक
गुण नहीं तो किन कारणों से दुःख उत्पन्न होता है ? मेरी सम्मति
में तो सृष्टिकाल में दुःख उत्पन्न होता है और सृष्ट के नाश से
दुःख नष्ट हो जाता है । इस हेतु से दुःख का कारण काल है ?
उ०—न कालयोगतो व्यापिनो नित्यस्य
सर्वसम्बन्धात् ॥ १२ ॥
अर्थ—दुःख काल के कारण से नहीं होसकता; क्योंकि काल
सर्वव्यापक और नित्य है और उसका सब से सम्बन्ध है, अत-
एव काल के हेतु से तो बन्धन और मुक्त हो नहीं सकता ; क्योंकि
यदि काल ही दुःख का हेतु माना जावे तो सबही दुःखी होने
चाहिये ।
प्र०—तो क्या देश-योग से दुःख उत्पन्न होता है ? क्योंकि
बहुतसे लोग यह कहते हैं कि अटक पार जाने से पाप होता है
और उससे दुःख उत्पन्न होता है ?
उ०—न देशयोगतोऽप्यस्मात् ॥ १३ ॥
अर्थ—चूंकि काल के अनुसार देश भी सर्वव्यापक और
सबसे सम्बन्ध रखने वाला तथा नित्य है, इसलिये देशयोग
से बन्धन नहीं होसकता ।
प्र०—तो फिर क्या अवस्था अर्थात् दशाओं के हेतु से
दुःख उत्पन्न होता है ? क्योंकि तीन अवस्था अर्थात् जाग्रत, स्वप्न
( ७ )
और सुषुप्ति या बाल्यावस्था या युवावस्था या वृद्धावस्था इन
छः दशाओं में किसके हेतु से दुःख और बन्धन होता है ?
उ०—नावस्थातो देहधर्म्मत्वात् तस्याः ॥ १४ ॥
अर्थ—इन दशाओं से भी दुःख उत्पन्न नहीं हो सकता,
क्योंकि बाल, युवा और वृद्धावस्था शरीर के धर्म हैं। यदि अन्य
के धर्म से अन्य का बन्धन माना जाय तो सर्वथा अन्याय है;
क्योंकि किसी दूसरे बन्धनयुक्त मनुष्य के धर्म से कोई मुक्त बन्धन
में पड़ जायगा और मुक्त के धर्म से कोई बद्ध मुक्त होजायगा ।
प्र०—क्या इन अवस्थाओं से जीव का कोई सम्बन्ध नहीं,
ये केवल शरीर की हैं ?
उ०—असङ्गोऽयं पुरुष इति ॥ १५ ॥
अर्थ—यह जीव सर्वथा असङ्ग है, इसका बाल्य, वृद्ध और
युवावस्था से किञ्चित् सम्बन्ध नहीं ।
प्र०—तो क्या दुःख अर्थात् बन्धन के उत्पन्न होने का हेतु
कर्म है ?
उ०—न कर्म्माण्यधर्म्मत्वादतिप्रसक्तेश्च ॥ १६ ॥
अर्थ—वेदविहित या निषिद्ध कर्मों से जीव का बन्धन-रूपी
दुःख उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि कर्म करना भी शरीर वा चित्त
का धर्म है। द्वितीय कर्म शरीर से होगा और शरीर कर्म के फल
से होता है, तो अनवस्था दोष उपस्थित हो जायगा । तीसरे यदि
शरीर का कर्म आत्मा के बन्धन का हेतु माना जावे तो बन्धन में
हुये जीव के कर्म से मुक्त-जीव का बन्धन होना सम्भव हो सकता
है, अतएव कर्म द्वारा बन्धन उत्पन्न नहीं होता।
प्र०—तो हम दुःखरूप बन्धन भी चित्त को ही मान लेंगे,
उस दशा में चित्त के कर्म द्वारा चित्त को बन्धन होने से कोई
दोष नहीं रहेगा ?
( ८ )
उ०—विचित्र भोगानुपपत्तिरन्यधर्म्मत्वे ॥ १७
अर्थ—यदि दुःख योग-रूप बन्धन केवल चित्त का धर्म
माना जाय तो नाना प्रकार के भोग में संसार प्रवृत्त है, नहीं
रहना चाहिये, क्योंकि जीव को दुःख होने के बिना हो यदि दुःख
का अनुभवकर्त्ता माना जाय तो सारे मनुष्य दुःखी हो जायेंगे;
क्योंकि जिस प्रकार दुःख का सम्बन्ध न होने से जैसे दुःखी
प्रतीत होता है ऐसे ही दुःख के न होने पर सब दुःखी लोग
हो सकते हैं, अतएव कोई दुःखी या कोई सुखी इस प्रकार अन्य
प्रकार का भोग नहीं हो सकेगा।
प्र०—क्या प्रकृति के संयोग से दुःख होता है ?
उ०—प्रकृतिनिबन्धनाच्चेन्नत्तस्या अपि पार-
तन्त्र्यम् ॥ १८ ॥
अर्थ—यदि बन्धन का कारण प्रकृति मानो तो प्रकृति स्वयं
ही स्वतन्त्र नहीं, तो परतन्त्र प्रकृति किसी को किस प्रकार बाँध
सकती है; क्योंकि जबतक प्रकृति का संयोग न हो तबतक वह
किसी को बाँध ही नहीं सकती और संयोग दूसरे के अधि-
कार में है।
प्र०—क्या ब्रह्म ही उपाधि से जीव-रूप होकर अपने आप
बँध गया है ?
उ०—न नित्यशुद्ध मुक्तस्वभावस्य तद्योगस्तद्यो-
गाहते ॥ १९ ॥
अर्थ—जो ईश्वर नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव है, उसका तो
प्रकृति के साथ सदैव सम्बन्ध है, इसलिये वह जीव-रूप होकर
दुःख नहीं पा सकता, क्योंकि उसके गुण एक रस हैं, इस कारण
ब्रह्म को उपाधिकृत बन्धन नहीं, वरन् जीव अल्पज्ञ, नित्य पदार्थ
( ६ )
है उसी का प्रकृति के साथ योग होता है और वह मिथ्याज्ञान के
कारण बद्ध हो जाता है, जैसाकि आगे कथन होगा ।
प्र०—तो क्या अविद्या से ब्रह्म ही जीव हो गया है और
इस दुःख की उत्पत्ति केवल अविद्या से है ?
उ०—नाविद्यातोऽप्य वस्तुनोवन्धायोगात् ॥२०॥
अर्थ—अविद्या से जो कोई पदार्थ ही नहीं, बन्धन का होना
सम्भव नहीं, क्योंकि आकाश के फूल की सुगन्धि किसी को भी
नहीं आती। यदि मायावादी जो अविद्या, उपाधि से जीव को
वन्धत मानते हैं अविद्या को वस्तु अर्थात् द्रव्य मानते हैं तो
उनका सिद्धान्त उड़ जायगा जैसाकि लिखा है—
उ०—वस्तुत्वे सिद्धान्तहानिः ॥ २१ ॥
अर्थ—यदि अविद्या को वस्तु मान लिया जावे तो उनको एक
अद्वैत ब्रह्म के सिद्धान्त का खण्डन हो जायगा, क्योंकि एक वस्तु
जो ब्रह्म है दूसरी अविद्या हो गई, इसलिये अद्वैत न रहा।
प्र०—इसमें क्या दोष है ?
उ०—विजातीयाद्वैतापत्तिश्च ॥ २२ ॥
अर्थ—अद्वैतवादी ब्रह्म को सजातीय अर्थात् बराबर जाति
वाले, विजातीय विरुद्ध जातिवाले, स्वगत अपने भाग इत्यादि के
भेद से रहित मानते हैं और यहाँ अविद्या के वस्तु मानने से
विजाति अर्थात् दूसरी जाति का पदार्थ उपस्थित होने से अद्वैत
सिद्धान्त का खण्डन हो गया ।
प्र०—हम अविद्या को वस्तु और अवस्तु दोनों से पृथक्
अनिर्वचनीय पदार्थ मानते हैं, जैसे—
विरुद्धोभय रूपा चेत् ॥ २३ ॥
( १० )
अर्थ—यदि दोनों से पृथक् मानो तो यह दोष आजायगा ।
उ०—न तादृक्पदार्थप्रतीतेः ॥ २४ ॥
अर्थ—इस प्रकार अविद्या वस्तु अवस्तु से पृथक् नहीं हो
सकती ; क्योंकि ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो सत् असत् से पृथक्
हो और यहाँ यह भी प्रश्न उत्पन्न होता है कि तुम्हारी अविद्या
के अनिर्वचनीय होने में कोई प्रमाण है या नहीं। यदि कहो
प्रमाण है तो वह प्रमेय हो गई, फिर अनिर्वचनीय किस प्रकार
हो सकती है। यदि कहो प्रमाण नहीं, तो उसके होने का क्या
प्रमाण है ?
प्र०—न वयं षट्पदार्थवादिनोवैशेषिकादिवत्॥ २५
अर्थ—हम षट् पदार्थों को वैशेषिक के सदृश नहीं मानते
और न्याय के समान सोलह भी नहीं मानते हैं। इस कारण हमारे
मत में सत् असत् से अविद्या विलक्षण होना ठीक है और वही
बन्ध का हेतु है।
उ०—अनियतत्वेऽपि नायौक्तिकस्य संग्रहोऽ
न्यथाबालोन्मत्तादिसमत्वम् ॥ २६ ॥
अर्थ—आप पदार्थों की संख्या का नियम मानें चाहे न मानें,
परन्तु सत् असत् से पृथक् कोई पदार्थ बिना युक्ति के माननीय नहीं
हो सकते। नहीं तो इस प्रकार बालक और उन्मत्त का कहना
भी ठीक हो सकता है। जिस प्रकार बालक और उन्मत्त का
कहना युक्तिशून्य होने से प्रामाणिक नहीं, इसी प्रकार तुम्हारा
कहना भी असंगत है।
प्र०—तो क्या जीव अनादि वासना से बन्धन में पड़ा है ?
उ०—नानादिविषयोपरागनिमित्तकोऽप्यस्य॥२७
( ११ )
अर्थ—इस आत्मा को अनादि-प्रवाह-रूप-वासना से बन्धन
होना भी असम्भव मालूम होता है, क्योंकि निम्नलिखित प्रमाण
से अशुद्ध प्रतीत होता है ।
न बाह्याभ्यन्तरयोरुपरज्योपरंजक भावोऽपि
देशव्यवधानात् स्रुघ्नस्थापाटलिपुत्रस्थयोरिव ॥२८॥
अर्थ—जो मनुष्य जीव-आत्मा को शरीर में एक देशी
मानते हैं, इस कारण जीव-आत्मा का कुछ भी सम्बन्ध बाह्य
विषयों से नहीं रहेगा, क्योंकि आत्मा और जड़ के बीच अति
देश का अन्तर है, जैसे—पटने का रहनेवाला बिना आगरे पहुँचे
वहाँ के रहनेवाले को नहीं बाँध सकता, इसी प्रकार बाह्य इंद्रियों
से उत्पन्न हुई वासना आभ्यन्तरस्थ आत्मा के बन्धन का हेतु
किस प्रकार हो सकती है ? और लोक में भी ऐसा ही देखा
जाता है कि जब रङ्ग और वस्त्र का सम्बन्ध बिना अन्तर के
होता है तब तो वस्त्र पर रङ्ग चढ़ जाता है । यदि उनके बीच कुछ
अन्तर हो तो रङ्ग कदापि नहीं चढ़ सकता, अतएव वासना से
बन्धन नहीं हो सकता, परन्तु जब लोग आत्मा और बाह्य
इन्द्रियों में अन्तर मानते हैं तो इन्द्रियकृत वासना से आत्मा
किसी प्रकार बन्धन में नहीं आ सकता । यदि यह कहा जाय
कि बाह्य इन्द्रियों का आभ्यन्तर इन्द्रिय मन आदि से सम्बन्ध
है और आभ्यन्तर इन्द्रियों का आत्मा से । इस परम्परा सम्बन्ध
से आत्मा भी विषय वासना से बद्ध हो सकता है, यह कहना
अयुक्त है; क्योंकि—
द्वयोरेकदेशलब्धोपरागान्नव्यवस्था ॥ २६ ॥
जब आत्मा और इन्द्रिय दोनों को विषय-वासना में बंधा
हुआ मानोगे तो मुक्त और बन्धन में रहनेवाले का पता भी
( १२ )
नहीं लगेगा। इसका आशय यह है कि जब आत्मा और इन्द्रिय
दोनों ही विषय-वासना से समान सम्बन्ध रखते हैं तो इन्द्रियों
का बन्धन न कहकर केवल आत्मा ही का बन्धन बतलाना
अयुक्त होगा। इस कारण वासना से भी बन्धन नहीं होता।
अदृष्टवशाच्चेत् ॥ ३० ॥
प्र०—तो क्या फिर अदृष्ट अर्थात् पूर्व किये धर्म अधर्म से
जो एक भोग-शक्ति पैदा होती है उससे बन्धन होता है ?
उ०—न द्वयोरेककालायोगादुप कार्य्योपका-
रक भावः ॥ ३१ ॥
अर्थ—जब तुम्हारा बन्धन और अदृष्ट एक काल में उत्पन्न
होते हैं तो उनमें कर्त्ता और कर्म नहीं हो सकता। जबकि
तुम्हारी दृष्टि में संसार प्रत्येक क्षण में बदलता है तो एक स्थिर
आत्मा के न होने से दूसरे आत्मा के अदृष्ट से दूसरे आत्मा
का बन्धन रूप दोष होगा।
प्र०—पुत्रकर्म्मवदिति चेत् ॥ ३२ ॥
अर्थ—जिस प्रकार उसी काल में तो गर्भाधान किया जाता
है और उसी समय उसका संस्कार किया जाता है, अतएव
एक काल में उत्पन्न होनेवाले पदार्थों में पूर्व कथित सम्बन्ध
हो सकता है ?
उ०—नास्ति हि तत्र स्थिर एकात्मा यो गर्भा-
धानादिना संस्क्रियते ॥ ३३ ॥
अर्थ—तुम्हारे मत में तो एक स्थिर जीवात्मा हा नहीं जिस
का गर्भाधानादि से संस्कार किया जावे, अतएव तुम्हारा पुत्र-
( १३ )
कर्म वाला दृष्टांत ठीक नहीं । यह दृष्टांत एक स्थिर आत्मा
मानने वालों के मत में तो कुछ घट भी सकता है ।
प्र०—बन्धन भी ( क्षणिक ) एक क्षण भर रहनेवाला है,
इसलिये उसका कारण अर्थात् नियम नहीं, या अभाव ही उसका
कारण है, अथवा वह बिना कारण ही है ?
उ०—स्थिरकार्य्यासिद्धेः क्षणिकत्वम् ॥ ३४ ॥
अर्थ—यदि तुम बन्धन को ( क्षणिक ) एक क्षण रहनेवाला
मानो तो उसमें दीपशिखा अर्थात् दीपज्योति के समान दोनों
का कोई स्थिर कार्य उत्पन्न नहीं होगा। इस अगले सूत्र से
स्पष्ट करते हैं कि कार्य को क्षणिक मानने में क्या दोष होगा ।
न प्रत्यभिज्ञावाघात् ॥ ३५ ॥
अर्थ—लोक में कोई भी पदार्थ ( क्षणिक ) अर्थात् एकक्षण
रहनेवाला नहीं, क्योंकि यह ज्ञान के सर्वथा विरुद्ध है, क्योंकि
प्रत्येक मनुष्य यह कहता हुआ सुनाई देता है कि जिसको मैंने
देखा उसको स्पर्श किया। दृष्टांत यह है कि जैसे कि यदि एक
घोड़ा मोल लिया जावे तो क्षणिकवादी के मत में परीक्षा करके
मोल लेना असम्भव है ; क्योंकि जिस क्षण में घोड़े को देखा था
तब और घोड़ा था, जिस क्षण में हाथ लगाया तब और था,
दुबारा देखा तब और हुआ, इस कारण कोई कार्य हो ही नहीं
सकता। अतएव जिसके लिये दृष्टांत न हो वह ठीक नहीं ;
इसलिये बन्धनादि क्षणिक नहीं वरन् स्थिर हैं और प्रमाण
देते हैं—
श्रुतिन्यायविरोधाच्च ॥ ३६ ॥
अर्थ—यह कहना कि जगत् एकक्षण रहता है श्रुति अर्थात् वेद
और न्याय अर्थात् तर्क से सर्वथा विरुद्ध है, जैसा कि लिखा है—
( १४ )
‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’
अर्थ—हे सौम्य ! इस जगत् से पहिले भी सत् था अर्थात्
जगत् का कारण था ।
‘तम एवेदमग्र आसीत्’
अर्थ—इस सृष्टि से पहिले यह जगत् तमोरूप अर्थात् नाम-
रूपज्ञान जो कार्य में है इनसे पृथक् सत्रूप था और न्याय से
इसलिये विरुद्ध है कि असत् से सत् किसी प्रकार हो नहीं सकता,
इस कारण यह बन्धनरूप दुःख न तो क्षणिक है, बिना कारण
ही है । और प्रमाण लीजिये—
दृष्टान्तासिद्धेश्च ॥ ३७ ॥
अर्थ—क्षणिक में जो दीपशिखा का दृष्टांत दिया वह अयुक्त
है, क्योंकि क्षण ऐसा सूक्ष्म काल है कि जिसकी इयत्ता
( अन्दाज़ा ) नहीं हो सकती और न उसकी कुछ इयत्ता ( तादाद् )
है और प्रत्यक्ष में दीपशिखा कई क्षण तक एक-सी बराबर
रहती है, यह कथन भी सर्वथा अयुक्त है और क्षणिकवादियों
के मत में एक दोष यह भी होगा कि कारण और कार्यभाव
नहीं हो सकेगा और जब कार्य्य कारण का नियम न रहा तो
किसी रोग की औषध जो निदान अर्थात् कारण के ज्ञान
को जानकर उसके विरुद्ध शक्ति से की जाती है नहीं हो सकेगी
और संसार में जो घट कारण मृत्तिका को माना जाता है
सर्वथा न कह सकेंगे ; क्योंकि जिस क्षण में मृत्तिका घट का
कारण है वह क्षण अब नष्ट हो गया और यह कहना सर्वथा
अयुक्त है कि मृत्तिका घट का कारण नहीं ; क्योंकि बिना कारण
जाने घट बनाने में कुलाल की प्रवृत्ति नहीं होती और यदि दोनों
की अर्थात् मृत्तिका और घट की उत्पत्ति एक ही क्षण में मानें
तो दोष होगा—
( १५ )
युगपज्जायमानयोर्न कार्य्यकारणभावः ॥ ३८ ॥
अर्थ—जो पदार्थ एक साथ उत्पन्न होते हैं उनमें कार्य्य-कारण
भाव नहीं हो सकता ; क्योंकि ऐसा कोई दृष्टांत लोक में नहीं है,
जिसमें कार्य्य-कारण की उत्पत्ति एक साथ ही हो। यदि क्षणिक-
वादी यह कहें कि मृत्तिका और घटक्रम से हैं, पहिले मृत्तिका
कारण फिर घट कार्य्य उत्पन्न हो गया तो इसमें भी दोष है।
पूर्वापाये उत्तरायोगात् ॥ ३६ ॥
अर्थ—इस पक्ष में यह दोष होगा कि पूर्व क्षण में मृत्तिका
उत्पन्न हुई, दूसरे क्षण में नष्ट हुई, तब पीछे उससे कार्य्यरूप घट
क्योंकर उत्पन्न होसकता है ? इसलिये जबतक उपादान कारण न
माना जाय तबतक कार्य्य की उत्पत्ति नहीं होसकती। अतएव
कार्य्य-कारण भाव क्षणिकवादियों के मत से सिद्ध नहीं हो सकता।
उ०—तद्भावे तद्योगादुभयव्यभिचारादपि
न ॥ ४० ॥
अर्थ—कारण की विद्यमानता से और कार्य्य के साथ उसका
सम्बन्ध न मानने से दोनों दशाओं में व्यभिचार दोष होने
से कारण-कार्य्य का सम्बन्ध नहीं रहता। जब कार्य्य बनता था
तब तो कारण नहीं था और कारण हुआ तब कार्य्य बनाने का
विचार नहीं, अतएव क्षणिकवादियों के मत में कार्य्य-कारण का
सम्बन्ध किसी प्रकार हो नहीं सकता।
प्र०—जिस प्रकार घट का निमित्त कारण कुलाल पहिले से
ही माना जाता है, यदि इसी भाँति उपादान कारण भी माना जावे
तो क्या शङ्का है ?
उ०—पूर्वभावमात्रे न नियमः ॥ ४१ ॥
( १६ )
अर्थ—यदि कारण को नियत न मानकर पूर्वभावमात्र ही माना
जावे तो यह नियम न रहेगा कि मृत्तिका ही से घट बनता है और
वायु से नहीं बनता; क्योंकि क्षणिकवादी किसी विशेष कारण को
भाव से तो मानते नहीं, किन्तु भाव ही मानेंगे। अतएव उपरोक्त
दोष बना रहेगा और निमित्त कारण और उपादान का अन्तर भी
मालूम नहीं होगा और लोक में उपादान कारण और निमित्त
कारण का भेद निश्चित है, इसलिये क्षणिकवाद ठीक नहीं।
प्र०—जो कुछ संसार में है, सब मिथ्या ही है, और संसार
में होने से बन्धन भी मिथ्या है, अतएव उसका कारण खोजने
की कोई आवश्यकता नहीं, वह स्वयम् नाशरूप है ?
उ०—न विज्ञानमात्रं बाह्यप्रतीतेः ॥ ४२ ॥
अर्थ—इस जगत् को केवल मिथ्याज्ञान या विज्ञानमात्र नहीं
कह सकते; क्योंकि ज्ञान आन्तरिक अर्थात् भीतर ही होता है
और जगत् बाहर और भीतर दोनों दशाओं में प्रकट है।
प्र०—जब हम बाहर किसी पदार्थ के भाव को मानते ही
नहीं केवल भीतर के विचार ही मनोराज्य का सृष्टि की भाँति
मालूम होते हैं ?
उ०—तद्भावे तद्भावाच्छून्यं तर्हि ॥ ४३ ॥
अर्थ—यदि तुम जगत् को बाह्य न मानो केवल भीतर ही
मानोगे तो इस दीखते हुए संसार में विज्ञान का भी अभाव
मानना पड़ेगा और जगत् को शून्य कहना पड़ेगा। इसका कारण
यह है कि प्रतीति विषय का साधन करने वाली होती है, इसलिये
यदि बाह्य प्रतीत जगत् का साधन न करे तो विज्ञान प्रतीत भी
विज्ञान को नहीं सिद्ध कर सकती, इस हेतु से विज्ञानवाद में
शून्यबाद होजायगा ।
प्र०—अब शून्यवादी नास्तिक अपनी दलील देता है?
( १७ )
शून्यं तत्वं, भावो विनश्यति वस्तुधर्मत्वाद्वि-
नाशस्य ॥ ४४ ॥
अर्थ—जितने पदार्थ हैं सब शून्य हैं, और जो कुछ भाव
हैं, वह सब नाशवान् हैं, और जो विनाशी है वह स्वप्न की
भांति मिथ्या है। इससे सम्पूर्ण वस्तुओं के आदि और अंत का
तो अभाव सिद्ध ही होगया। अब रहा केवल मध्यभाग सो यथार्थ
नहीं-तब कौन किस को बाँध सकता है ? और कौन छोड़ सकता
है ? इस हेतु से बन्ध मिथ्या ही प्रतीत होता है। विद्यमान
वस्तुओं का नाश इसलिये है कि नाश होना वस्तुमात्र का धर्म है।
इस शून्यवादी के पूर्वपक्ष का खण्डन करते हैं।
उ०—अपवादमात्रम बुद्धानाम् ॥ ४५ ॥
अर्थ—'जो कुछ भाव पदार्थ हैं वह सब नाशवान् हैं', यह
कथन मूर्खों का अपवादमात्र है; क्योंकि नाशमात्र वस्तु का
स्वभाव कहकर, नाश में कुछ कारण न बताने से जिन पदार्थों
का कुछ अवयव नहीं है उनका नहीं कह सकते। इसका हेतु
यह है कि कारण में लय हो जाने को ही नाश कहते हैं, और
जब निरवयव वस्तुओं का कुछ कारण न माना तो उनका लय
किसी में न होने से उनका नाश न हो सकेगा। इसके सिवाय
एक और भी दोष रहेगा कि हर एक कार्य का अभाव लोक में
नहीं कह सकते; जैसे—"घट टूट गया," इस कहने से यह ज्ञात
होगा, कि घट की दूसरी दशा हो गई; परन्तु घटरूपी कार्य तो
बना ही रहा। आकृति को इस हेतु से माना कि वह एक
घट के टूट जाने से दूसरे घटों में तो रहती है।
अब तीनों लक्षणों का खण्डन करते हैं, अर्थात्—विज्ञानवादी
क्षणिकवादी और शून्यवादी ।
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उभयपक्षसमानक्षेमत्वादयमपि ॥ ४६ ॥
अर्थ—जिस प्रकार क्षणिकवादी और विज्ञानवादी का मत
प्रत्यभिज्ञादि दोष वाह्य प्रतीति से खण्डित हो जाता है, इसी प्रकार
शून्यवादी का मत भी खण्डित हो जाता है; क्योंकि उस दशा में
पुरुषार्थ का बिलकुल अभाव हो जाता है। यदि यह कहो कि
शून्यवाद करने पर भी पुरुषार्थ तो स्वीकार करते हैं, तो वह भी
मानना अयुक्त होगा।
अपुरुषार्थत्वमुभयथा ॥ ४७ ॥
अर्थ—शून्यवादी के मत में पुरुषार्थ अर्थात् मुक्ति नहीं हो
सकती, क्योंकि जब दुःख है ही नहीं केवल शून्य ही है तो
उसकी निवृत्ति का उपाय क्यों किया जावे और मुक्ति भी शून्य
हो होगी उसके लिये साधन भी शून्य ही होंगे, तो ऐसे शून्य
पदार्थ के लिये पुरुषार्थ भी शून्य ही होगा। अतएव शून्यवादी
का मत किसी प्रकार भी शान्तिदायक नहीं और न उससे मुक्ति
हो सकती है।
न गतिविशेषात् ॥ ४८ ॥
अर्थ—गति के ३ अर्थ हैं—ज्ञान, गमन, प्राप्ति। यह तीनों
बन्धन का हेतु नहीं होते। पहिले जब कहा जावे कि ज्ञान विशेष
से बन्धन होता है। ज्ञान तीन प्रकार का है—प्रातिभासिक, व्याव-
हारिक, पारमार्थिक। यदि कहा जावे कि प्रातिभासिक सत्ता के
ज्ञान से बन्धन होता है तो यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि
प्रातिभाविक सत्ता का ज्ञान इन्द्रिय और संस्कार-दोष से उत्पन्न
होता है, परन्तु आत्मा में न इन्द्रिय है न संस्कार है; इसलिये
जिसका कारण है ही नहीं उसका कार्य कैसे हो सकता है। और
रहा व्यावहारिक ज्ञान, सो तो बद्ध अवस्था को छोड़ रहता ही
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नहीं, वह बन्ध का कारण किस प्रकार हो सकता है । और
पारमार्थिक ज्ञान तो मुक्ति का हेतु है, वह बन्ध का कारण क्योंकर
हो सकता है, अतएव ज्ञानविशेष से बन्ध नहीं होता । दूसरा
गमन शरीरादि में होता है, वह जीव का स्वाभाविक धर्म होने से
बन्ध का हेतु नहीं हो सकता ।
तीसरा प्राप्ति, सो प्राप्त होने वाले दो पदार्थ हैं—एक ब्रह्म,
दूसरी प्रकृति, सो यह दोनों व्यापक होने से जीव को सर्वदा
प्राप्त, सदैव रहनेवाली वस्तु से सदैव सम्बन्ध, उससे भी बद्ध
नहीं हो सकता, अतएव गतिविशेष से बन्ध नहीं होता ।
निष्क्रयस्य तदसम्भवात् ॥ ४६ ॥
अर्थ—क्रिया से शून्य जड़ प्रकृति में भी गति असम्भव है
और व्यापक ब्रह्म में भी गति असम्भव है, और यदि जीव की
गति पर विचार किया जावे तो प्रश्न यह उपस्थित होगा, कि
जीव विभु है अथवा मध्यम परिणामवाला है अथवा अणु है ?
यदि विभु मानलें तो गति हो नहीं सकती । यदि मध्यम परिणाम-
वाला मानलें तो यह दोष होगा ।
प्र०—क्या आत्मा अंगुष्ठमात्र नहीं है ? यदि अंगुष्ठमात्र
है तो उसमें गति इत्यादि सम्भव है। यदि विभु है तो जाना हो
ही नहीं सकते ?
उ०—मूर्तत्वाद् घटादिवत् समानधर्मापत्ता-
वपसिद्धान्तः ॥ ५० ॥
अर्थ—आत्मा के मूर्त्तिमान् होने से घटादिकों की भाँति
सावयव इत्यादि दोष आजायेंगे और सावयव होने से संयोग
वियोग अर्थात् उत्पत्ति और नाश भी मानना पड़ेगा । जोकि
आत्मा नित्य है, इसलिये मूर्त्तिवाला नहीं हो सकता और जब