सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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पुनः यह वस्त्र श्वेत न होजाता तब यह ठीक होता । इसी प्रकार
जला हुआ बीज अनेक ओषधियों के मेल से ठीक होजाता है,
अतएव यह कथन ठीक नहीं कि स्वाभाविक गुण का भी नाश
हो सकता है ।
प्र०—यदि मान लिया जाय कि दुःख जीव का स्वाभाविक
गुण नहीं तो किन कारणों से दुःख उत्पन्न होता है ? मेरी सम्मति
में तो सृष्टिकाल में दुःख उत्पन्न होता है और सृष्ट के नाश से
दुःख नष्ट हो जाता है । इस हेतु से दुःख का कारण काल है ?
उ०—न कालयोगतो व्यापिनो नित्यस्य
सर्वसम्बन्धात् ॥ १२ ॥
अर्थ—दुःख काल के कारण से नहीं होसकता; क्योंकि काल
सर्वव्यापक और नित्य है और उसका सब से सम्बन्ध है, अत-
एव काल के हेतु से तो बन्धन और मुक्त हो नहीं सकता ; क्योंकि
यदि काल ही दुःख का हेतु माना जावे तो सबही दुःखी होने
चाहिये ।
प्र०—तो क्या देश-योग से दुःख उत्पन्न होता है ? क्योंकि
बहुतसे लोग यह कहते हैं कि अटक पार जाने से पाप होता है
और उससे दुःख उत्पन्न होता है ?
उ०—न देशयोगतोऽप्यस्मात् ॥ १३ ॥
अर्थ—चूंकि काल के अनुसार देश भी सर्वव्यापक और
सबसे सम्बन्ध रखने वाला तथा नित्य है, इसलिये देशयोग
से बन्धन नहीं होसकता ।
प्र०—तो फिर क्या अवस्था अर्थात् दशाओं के हेतु से
दुःख उत्पन्न होता है ? क्योंकि तीन अवस्था अर्थात् जाग्रत, स्वप्न