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सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

स्वीकार करते हैं. उन हवियों को व्याप्त करते हैं यानी देवताओं तक पहुंचाते हैं. आप
दानशील लोगों को धनधान्य प्रदान करते हैं. (१०)
उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्यम्.. (११)
सारे भुवनों को देखने के लिए सूर्य की किरणें जिस से उत्पन्न हुई हैं, ऐसे सूर्य के रूप में
वे अग्नि को भलीभांति धारण किए रहती हैं. (११)
कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे. देवममीवचातनम्.. (१२)
हे ऋत्विजो (यज्ञ करने वालो)! इस यज्ञ में आप सब ज्ञान वाले अग्नि की स्तुति
कीजिए. वे सत्य धर्म से युक्त हैं. वे शत्रुओं का (रोगों का) नाश करने वाले हैं. (१२)
शं नो देवीरभिष्टये शं नो भवन्तु पीतये. शं योरभि स्रवन्तु नः.. (१३)
हमारा कल्याण हो. दिव्य जल हमारे पीने के लिए कल्याणकारी हो. जल रोग शांत
करने वाला हो. जल सुखशांति देते हुए अमृत रूप में प्रवाहित हो. (१३)
कस्य नूनं परीणसि धियो जिन्वसि सत्पते. गोषाता यस्य ते गिरः.. (१४)
हे अग्नि! आप सत्य (सज्जन) के पालनहार हैं. आप इस समय किस तरह के मानव के
कर्मों को सत्य मार्ग (ब्रज) तक पहुंचा रहे हैं. किस कर्म से आप की कृपा गौओं को प्राप्त
कराने वाली होगी. (१४)
चौथा खंड
यज्ञायज्ञा वो अग्नये गिरागिरा व दक्षसे.
प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न श ॐ सिषम्.. (१)
हे अग्नि! आप सब कुछ जानने वाले व अमर हैं. आप मित्र की तरह सहयोग करने
वाले हैं. हम आप की स्तुति करते हैं. हे श्रोताओ! आप भी ऐसे अग्नि की स्तुति कीजिए. (१)
पाहि नो अग्न एकया पाह्यू ३ त द्वतीयया.
पाहि गीर्भिस्तिसृभिरूर्जा पते पाहि चतसृभिर्वसो.. (२)
हे अग्नि! आप पहली स्तुति से हमारी रक्षा कीजिए. दूसरी स्तुति से हमें संरक्षण प्रदान
कीजिए. तीसरी स्तुति से हमारी रक्षा (पालनपोषण रूप) कीजिए. चौथी स्तुति से आप
हमारी सब प्रकार से रक्षा कीजिए. हे अग्नि! आप सब को संरक्षण देने वाले हैं. (२)
बृहद्भिरग्ने अर्चिभिः शुक्रेण देव शोचिषा.
भरद्वाजे समिधानो यविष्ठ्य रेवत्पावक दीदिहि.. (३)
हे अग्नि! आप बड़ी ज्वालाओं वाले व युवा हैं. आप संपन्नता व पवित्रता देने वाले हैं.
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आप अपने प्रखर तेज से भरद्वाज (ऋषि) के लिए अत्यंत तेजस्वी रूप में प्रज्वलित होइए.
(३)
त्वे अग्ने स्वाहुत प्रियासः सन्तु सूरयः.
यन्तारो ये मघवानो जनानामूर्वं दयन्त गोनाम्.. (४)
हे अग्नि! यजमान भलीभांति हवन करते हैं. वे आप को प्रिय हों. जो धन देने वाले और
प्रजा की देखभाल करने वाले हैं, वे भी आप को प्रिय हों. गौओं का पालन करने वाले आप
को प्रिय हों. (४)
अग्ने जरितर्विशपतिस्तपानो देव रक्षसः.
अप्रोषिवान् गृहपते महाँ असि दिवस्पायुर्दुरोणयुः.. (५)
हे अग्नि! आप ज्ञानी, प्रजा का पालनपोषण करने वाले, राक्षसों (कष्ट देने वालों) का
नाश करने वाले, घर के स्वामी, उपासकों के घर को नहीं छोड़ने वाले व स्वर्गलोक के रक्षक
हैं. आप हमारे घर में सदा निवास करिए. (५)
अग्ने विवस्वदुषसश्चित्र १७ राधो अमर्त्य.
आ दाशुषे जातवेदो वहा त्वमद्या देवाँ उषर्बुधः.. (६)
हे अग्नि! आप अमर, प्राणिमात्र को जानने वाले और उषा (उषाकाल) से प्राप्त होने
वाला विशेष धन दानदाता यजमान को दीजिए. आप सब कुछ जानने वाले हैं. आप
उषाकाल में जागे हुए देवताओं को भी यहां आमंत्रित कीजिए. (६)
त्वं नश्चित्र ऊत्या वसो राधा १७ सि चोदय.
अस्य रायस्त्वमग्ने रथीरसि विदा गाधं तुचे तु नः.. (७)
हे अग्नि! आप सर्वव्यापक, अद्भुत शक्ति वाले, दर्शनीय, अपार व बहुत क्षमतावान हैं.
आप समृद्धि (वैभव) लाने में समर्थ हैं. आप हमें समृद्धि दीजिए. आप हमारी संतानों को भी
समृद्धि एवं प्रतिष्ठा दीजिए. (७)
त्वमित्सप्रथा अस्यग्ने त्रातर्ऋतः कविः.
त्वां विप्रासः समिधान दीदिव आ विवासन्ति वेधसः.. (८)
हे अग्नि! आप रक्षक हैं. आप (अपने गुण तथा धर्म के लिए) बहुत प्रसिद्ध हैं. आप
सत्यवान और ज्ञानी हैं. हे तेजस्वी अग्नि! प्रज्वलित (प्रकाशित) हो जाने पर ज्ञानी जन आप
की उपासना व सेवा करते हैं. (८)
आ नो अग्ने वयोवृध १७ रयिं पावक श १७ स्यम्.
रास्वा च न उपमाते पुरुस्पृह १७ सुनीती सुयशस्तरम्.. (९)
हे अग्नि! आप पवित्र करने वाले व धनधान्य की समृद्धि करने वाले हैं. आप हमें यश
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बढ़ाने वाला धन दीजिए. आप हमें सही रास्ते से आने वाला धन प्रदान करें. आप हमें ऐसा
धन प्रदान करें जिसे अनेक लोग चाहते हों. (९)
यो विश्वा दयते वसु होता मन्द्रो जनानाम्.
मधोर्न पात्रा प्रथमान्यस्मै प्र स्तोमा यन्त्वग्नये.. (१०)
यजमानों को सब प्रकार की समृद्धि दे कर आनंदित करने वाले अग्नि की हम पहले
स्तुति करते हैं, जैसे उन्हें सब से पहले सोमरस का पात्र समर्पित किया जाता है. (१०)
पांचवां खंड
एना वो अग्निं नमसोजो नपातमा हुवे.
प्रियं चेतिष्ठमरति ॐ स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम्.. (१)
हे उपासको! अन्न से शक्ति देने वाले (बल के पुत्र), पूर्णज्ञानी, स्नेह देने वाले, सुंदर यज्ञ
वाले देवताओं के दूत अग्नि को मैं नमस्कारपूर्वक प्रार्थना से आमंत्रित करता हूं. (१)
शेषे वनेषु मातृषु सं त्वा मर्तास इन्धते.
अतन्द्रो हव्यं वहसि हविष्कृत आदिद्देवेषु राजसि.. (२)
हे अग्नि! आप वनों में व्याप्त हैं. आप माताओं में गर्भ के रूप में व्याप्त हैं. आप शेष
पदार्थों में भी फैले हैं. हम मनुष्य समिधाओं द्वारा आप को प्रज्वलित करते हैं. आप आलस्य
रहित हैं. आप यजमान की हवि देवताओं तक पहुंचाते हैं. आप देवताओं के मध्य (बीच में)
सुशोभित होते हैं. (२)
अदर्शि गातुवित्तमो यस्मिन्व्रतान्यादधुः.
उपो षु जातमार्यस्य वर्धनमग्निं नक्षन्तु नो गिरः.. (३)
धर्म के मार्ग को पूरी तरह जानने वाले अग्नि प्रकट हो रहे हैं. इन के माध्यम से यज्ञ के
नियम पूरे किए जाते हैं. अग्नि आर्यों को प्रगति देने वाले हैं. वे वाणी रूप में की जा रही
हमारी प्रार्थनाओं को स्वीकार करने की कृपा करें. (३)
अग्निरुक्थे पुरोहितो ग्रावाणो बर्हिरध्वरे.
ऋचा यामि मरुतो ब्रह्मणस्पते देवा अवो वरेण्यम्.. (४)
स्तोत्र वाले हिंसा रहित यज्ञ में सब से पहले अग्नि देवता की स्थापना की जाती है.
सोमलता से रस निकालने वाले पत्थर एवं आसन भी स्थापित किए जाते हैं. हे मरुतो! हे
ब्रह्मणस्पति! हे देव! हम वेदमंत्रों द्वारा अपनी रक्षा का अनुरोध करते हैं. (४)
अग्निमीडिष्वावसे गाथाभिः शीरशोचिषम्.
अग्नि ॐ राये पुरुमीढ श्रुतं नरो ऽ ग्निः सुदीतये छर्दिः.. (५)
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हे उपासको! अपनी रक्षा के लिए विस्तृत तथा विकराल स्वरूप वाले अग्नि की स्तुति
करो. धन प्राप्ति के लिए अग्नि की स्तुति करो. (५)
श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः.
आ सीदतु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावभिरध्वरे.. (६)
हे अग्नि! आप समर्थ कानों वाले हैं. आप हमारी प्रार्थना स्वीकार कीजिए. अग्नि के
साथ मित्र और अर्यमा आदि देवता भी यज्ञ के कुशासन पर विराजमान हों. (६)
प्र दैवोदासो अग्निर्देव इन्द्रो न मन्मना.
अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य शर्मणि.. (७)
अग्नि इंद्र के समान शक्तिशाली हैं. अग्नि दिव्य (अच्छे) कार्य करने वालों के लिए पृथ्वी
पर प्रकट हुए. हवि पहुंचाने के अपने श्रेष्ठ कामों से वे स्वर्ग में रहने लगे. (७)
अध ज्मो अध वा दिवो बृहतो रोचनादधि.
अया वर्धस्व तन्वा गिरा ममा जाता सुक्रतो पृण.. (८)
हे अग्नि! आप उत्तम यज्ञ के आधार हैं. आप स्वर्गलोक एवं पृथ्वीलोक में अपनी आभा
फैलाएं. आप हमारी तथा हमारे संबंधियों की मनोकामनाएं पूरी कीजिए. (८)
कायमानो वना त्वं यन्मातृरजगन्नपः.
न तत्ते अग्ने प्रमृषे निवर्तनं यद् दूरे सन्निहाभुवः.. (९)
हे अग्नि! आप वन की इच्छा करने वाले हो कर भी माता के समान जल के पास गए.
आप का जाना हम से नहीं सहा गया. आप अदृश्य हो कर भी हमारे आसपास प्रकट हो जाते
हैं. (९)
नि त्वामग्ने मनुर्दधे ज्योतिर्जनाय शश्वते.
दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टयः.. (१०)
हे अग्नि! मननशील मनुष्य आप को धारण करते हैं. अनंत काल से मानव जाति के
लिए आप का प्रकाश प्रकाशित है. आप ज्ञानी ऋषियों के आश्रम में प्रकाशित होते हैं.
प्रजापति ने यजमान के लिए आप को देव यज्ञ स्थान में स्थापित किया. हम सब आप को
नमस्कार करते हैं. (१०)
छठा खंड
देवो वो द्रविणोदाः पूर्णां विवष्ट्वासिचम्.
उद्वा सिञ्चध्वमुप वा पृणध्वमादिद्धो देव ओहते.. (१)
अग्नि धन देने वाले हैं. इसलिए हे होताओ! यज्ञ में अच्छी तरह भरे हुए स्रुक (एक

पात्र) से बारबार आहुति दो. सोमरस से पात्र को सींचो. इस तरह अग्नि आहुति पहुंचा कर
यजमान की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. (१)
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता.
अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः.. (२)
हमें ब्रह्मणस्पति देवता प्राप्त हों (यानी हमारे पास पहुंचें). सत्य और प्रिय देवी एवं वाग्
देवता (वाणी के देवता) हमें प्राप्त हों. सभी देवगण हमारे शत्रुओं का नाश करें. कल्याणकारी
यश देने वाले वीर को सब देवता श्रेष्ठ मार्ग से ले जाएं. (२)
ऊर्ध्व ऊ षु ण ऊतये तिष्ठा देवो न सविता.
ऊर्ध्वो वाजस्य सनिता यदञ्जिभिर्वाघद्भिर्विह्वयामहे.. (३)
हे अग्नि! हमारे संरक्षण के लिए आप ऊंचे आसन पर विराजिए. सूर्य के समान उन्नत
हो कर हमें अन्न आदि प्रदान कीजिए. हम इसीलिए अच्छे स्तोत्रों से स्तुति करते हुए आप को
आमंत्रित करते हैं. (३)
प्र यो राये निनीषति मर्तो यस्ते वसो दाशत्.
स वीरं धत्ते अग्न उक्थश ꣳ सिनं त्मना सहस्रपोषिणम्.. (४)
हे अग्नि! आप व्यापक हैं. हम आप के भक्त धन के लिए आप को प्रसन्न करना चाहते
हैं. जो मनुष्य आप को हवि प्रदान करता है, वह स्तुति करने वाले हजारों मनुष्यों का
पालनपोषण करने वाले वीर पुत्र को प्राप्त करता है. (४)
प्र वो यह्वं पुरूणां विशां देवयतीनाम्.
अग्नि ꣳ सूक्तेभिर्वचोभिर्वृणीमहे य ꣳ समिदन्य इन्धते.. (५)
हे अग्नि! आप मनुष्य में देवत्व का विकास करने वाले हैं. हम अपनी स्तुतियों से आप
की महानता का वर्णन करते हैं. हे अग्नि! आप को अन्य ऋषियों ने भी अच्छी तरह दीप्त
(प्रसन्न) किया है. (५)
अयमग्निः सुवीर्यस्येशे हि सौभाग्यस्य.
राय ईशे स्वपत्यस्य गोमत ईशे वृत्रहथानाम्.. (६)
अग्नि संपत्ति और सौभाग्य के ईश हैं. वे गौ आदि पशुओं के स्वामी हैं. संतान और धन
के स्वामी हैं. शत्रुओं का नाश करने वालों के भी स्वामी हैं. (६)
त्वमग्ने गृहपतिस्त्व ꣳ होता नो अध्वरे.
त्वं पोता विश्ववार प्रचेता यक्षि यासि च वार्यम्.. (७)
हे अग्नि! आप घर के स्वामी हैं. हमारे हिंसा रहित यज्ञ के होता (पुरोहित) हैं. आप की
आराधना सभी कर सकते हैं. आप पवित्र करने वाले हैं. आप श्रेष्ठ हवि का यज्ञ कीजिए. हमें
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धनादि (सुख) प्रदान कीजिए. (७)
सखायस्त्वा ववृमहे देवं मर्तास ऊतये.
अपां नपात ॐ सुभग ॐ सुद सम ॐ सुप्रतूर्तिमनेहसम्.. (८)
हे अग्नि! आप हमारे सखा हैं. आप श्रेष्ठ कर्म करने वाले हैं. मनुष्य की शीघ्र इच्छा पूर्ति
करते हैं. आप धन के स्वामी व जल को धारण करने वाले हैं. हम समान बुद्धि वाले सभी
साधक आप से अपने संरक्षण की प्रार्थना करते हैं. (८)
सातवां खंड
आ जुहोता हविषा मर्चयध्वं नि होतारं गृहपतिं दधिध्वम्.
इडस्पदे नमसा रातहव्य ॐ सपर्यता यजतं पस्त्यानाम्.. (१)
हे ऋत्विजो (यजमानो)! आप अग्नि देव को आमंत्रित कीजिए. आप सब ओर शुद्धता
फैलाने वाली हवि अग्नि देव को प्रदान कीजिए. गृहपति गृह की रक्षा करने वाली अग्नि की
स्थापना करें. हवन की चीजों के साथसाथ आप स्तुति कर के उन का स्वागतसत्कार करें.
(१)
चित्र इच्छिशोस्तरुणस्य वक्षथो न यो मातरावन्वेति धातवे.
अनूधा यदजीजनदधा चिदा ववक्षत्सद्यो महि दूत्यां ३ चरन्.. (२)
हे अग्नि! बाल एवं तरुण (युवा) रूप आप का हवि पहुंचाना बहुत आश्चर्य वाला है.
आप पैदा होने के बाद दूध पीने के लिए अपनी दोनों ही माताओं (पृथ्वी और अरणियों) के
पास नहीं जाते, बल्कि अच्छे दूत की भूमिका निभाते हुए देवताओं के पास हवि पहुंचाने
जाते हैं. (२)
इदं त एकं पर ऊ त एकं तृतीयेन ज्योतिषा सं विशस्व.
संवेशनस्तन्वे ३ चारुरेधि प्रियो देवानां परमे जनित्रे.. (३)
हे मृत्यु धर्म वाले मनुष्य! अग्नि तुम्हारा एक भाग है. वायु तुम्हारा दूसरा भाग (शरीर)
है. सूर्य रूप तीसरे भाग (तेज) से तुम मिलते हो. उन से मुक्त हो कर मुनष्य तेजस्वी रूप
प्राप्त करता है. अर्थात् मनुष्य को पावन स्थान में जन्म ले कर देव शक्तियों के लिए प्रिय तथा
श्रेष्ठ बनना चाहिए. (पिछले मंत्र में मृत्यु के बाद पुनः प्रकृति में मिलने की क्रिया बताई है).
(३)
इम ॐ स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषा.
भद्रा हि नः प्रमतिरस्य स ॐ सद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (४)
हे अग्नि! आप सब कुछ जानने वाले हैं. हम स्तोत्र रूप को रथ के समान उत्तम बुद्धि से
तैयार करते हैं. हे अग्नि! हम आप के मित्र हैं. हमें किसी प्रकार का कोई कष्ट न हो. (४)
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वि त्वदापो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेभिरग्ने जनयन्त देवाः.

मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम्.
कवि ॐ सम्राजमतिथिं जनानामासन्नः पात्रं जनयन्त देवाः.. (५)
हे अग्नि! आप सब से ऊपर (सर्वोपरि) हैं. आप स्वर्गलोक के वासी हैं. आप भूलोक के
स्वामी हैं. आप यज्ञ में उत्पन्न हैं. आप ज्ञानी मनुष्यों में मेहमान की तरह पूजनीय हैं. मुख की
तरह मुख्य हैं. आप को देवताओं ने उत्पन्न किया है. (५)
वि त्वदापो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेभिरग्ने जनयन्त देवाः.
तं त्वा गिरः सुष्टुतयो वाजयन्त्याजिं न गिर्वाहणो जिग्युरश्वाः.. (६)
हे अग्नि! जैसे पर्वत के ऊपरी भाग से जल उत्पन्न होता है, वैसे ही विद्वान् यजमान
आप को अपनी स्तुतियों से प्रकट करते हैं. जैसे घोड़े युद्ध में विजय पाते हैं, वैसे ही आप
हमारी स्तुतियों से संचालित होते हैं. इस से हमें विजय (कामना सिद्धि) मिलती है. (६)
आ वो राजानमध्वरस्य रुद्रं ॐ होतारं ॐ सत्ययजं ॐ रोदस्योः.
अग्निं पुरा तनयित्नोरचित्ताद्धिरण्यरूपमवसे कृणुध्वम्.. (७)
हे अग्नि! आप यज्ञ के स्वामी हैं. आप देवताओं को बुलाने वाले हैं. आप शत्रुओं को
रुलाने वाले हैं. आप स्वर्गलोक तथा पृथ्वीलोक के अन्नदाता हैं. आप आनंद एवं सत्य रूप
को प्राप्त कराने वाले हैं. आप स्वर्ण के समान चमक वाले हैं. ऐसे स्वरूप वाले अग्नि को
स्वाभाविक रूप से विद्युत् से पहले संरक्षण के लिए उत्पन्न किया है. (७)
इन्धे राजा समर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन.
नरो हव्येभिरीडते सबाध आग्निरग्रमुषसामशोचि.. (८)
हे अग्नि! आप श्रेष्ठ हैं. आप राजा हैं. आप को अन्नों से प्रज्वलित किया जाता है. आप
को घी से बढ़ाया जाता है. सभी मिल कर हवन से आप की पूजा करते हैं. इस प्रकार अग्नि
उषा काल के पूर्व (यानी माता के गर्भ से ही) उत्पन्न हुए हैं. (८)
प्र केतुना बृहता यात्यग्निरा रोदसी वृषभो रोरवीति.
दिवश्चिदन्तादुपमामुदानडपामुपस्थे महिषो ववर्ध.. (९)
हे अग्नि! आप महान प्रकाश के साथ प्रकट होते हैं. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक में
बलवान हो कर गर्जना करते हैं. बिजली के गर्जन और जल मेघों के बीच बढ़ते हैं. (९)
अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युतं जनयत प्रशस्तम्.
दूरेदृशं गृहपतिमथव्युम्.. (१०)
हे अग्नि! आप प्रशंसा के योग्य हैं. आप दूर से दिखाई देते हैं. आप घर के रक्षक हैं.
यजमान ने अग्नि को अरणि मथ कर प्रकट किया. (यानी अंगुलियों में अरणियों को पकड़
कर, घिस कर प्रकट किया है). (१०)
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आठवां खंड
अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्.
यह्वा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सस्रते नाकमच्छ.. (१)
हे अग्नि! आप यजमानों की श्रद्धा से प्रज्वलित हैं. जैसे अग्निहोत्र (सुबह यज्ञ करने
वाले) के लिए पाली हुई गाय प्रातःकाल उठ जाती है, वैसे ही प्रातःकाल आप प्रज्वलित होते
हैं (किए जाते हैं). पेड़ की फैली हुई शाखाओं के समान आप की किरणें भी दूरदूर तक
फैलती हैं. (१)
प्र भूर्जयन्तं महां विपोधां मूरैरमूरं पुरां दर्माणम्.
नयन्तं गीर्भिर्वना धियं धा हरिश्मश्रुं न वर्मणा धनर्चिम्.. (२)
हे अग्नि! आप राक्षसों को जीतने वाले हैं. आप विद्वानों को धारण करने वाले हैं. मूर्खों
के आश्रय (स्थान) का नाश करने वाले हैं. आप स्तुति करने वाले को ऐश्वर्य देने वाले हैं. आप
कवच के समान रक्षा करने वाले हैं. आप सुनहरी ज्वालाओं वाले हैं. हे मनुष्य! तुम ऐसे अग्नि
की आराधना करो. (२)
शुक्रं ते अन्यद्यजतं ते अन्यद्विषुरूपे अहनी द्यौरिवासि.
विश्वा हि माया अवसि स्वधावन्भद्रा ते पूषन्निह रातिरस्तु.. (३)
हे पूषा! आप का तेजस्वी रंग वाला दिन अलग है. उसी तरह काले रंग वाली रात्रि
अलग है. आप की महिमा से ये अलगअलग रंग वाले भाग एक ही दिनरात के हैं. आप
पोषण करने वाले हैं. आप सारे जग की रक्षा करने वाले हैं. आप कल्याण करने वाले हैं. आप
हमारा कल्याण करें. (३)
इडामग्ने पुरुद ꣳ स ꣳ सनिं गोः शश्वत्तम ꣳ हवमानाय साध.
स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे.. (४)
हे अग्नि! आप अनेक कामों में उपयोगी सुमति हमें दीजिए. आप गायों को देने वाली
स्तुति हमें दीजिए. आप हमें पुत्रपौत्र प्रदान कीजिए. आप उत्तम बुद्धि वाले हैं. कृपया भली
प्रकार आराधना करने वाले यजमान को ये सब प्रदान कीजिए. (४)
प्र होता जातो महान्नभोविन्नृषद्मा सीददपां विवर्ते.
दधद्यो धायी सुते वया ꣳ सि यन्ता वसूनि विधते तनूपाः.. (५)
हे अग्नि! आप सभी घरों में मौजूद रहते हैं. आप बादलों के बीच बिजली के रूप में
रहते हैं. इस समय आप यज्ञ में मौजूद हैं. आप महान हैं. आप अंतरिक्ष को जानने वाले हैं.
हवि को धारण करने वाले हैं. आप हमें अन्न, धन व संरक्षण प्रदान कीजिए. (५)
प्र सम्राजममुरस्य प्रशस्तं पु ꣳ सः कृष्टीनामनुमाद्यस्य.
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इन्द्रस्येव प्र तवसस्कृतानि वन्दद्वारा वन्दमाना विवष्टु.. (६)
हे अग्नि! आप बलवान और वीर मनुष्य के स्तुति योग्य हैं. आप बल में इंद्र के समान
हैं. आप के इस प्रशंसनीय स्वरूप की स्तुति करते हैं. हे यजमान! स्तुति और आराधना से
अग्नि की उपासना करो. (६)
अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इवेत्सुभृतो गर्भिणीभि:.
दिवेदिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्नि:.. (७)
हे अग्नि! आप सब प्रकार के ज्ञान वाले हैं. आप अच्छी तरह गर्भ धारण करने वाली
स्त्री के समान अरणियों द्वारा धारण किए जाते हैं. यज्ञ के लिए जागरूक रहने वाले यजमानों
द्वारा प्रतिदिन आप वंदनीय हैं. (७)
सनादग्ने मृणसि यातुधानान्न त्वा रक्षा ᳪ सि पृतनासु जिग्यु:.
अनु दह सहमूरान्क्रव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्याया:.. (८)
हे अग्नि! आप हमेशा शत्रुओं को बाधा देने वाले हैं. आप को युद्ध में राक्षस नहीं जीत
सकते. आप मांस खाने वाले राक्षसों को अपने तेज से भस्म कर दीजिए. आप के इस
हथियार से कोई शत्रु न बचे. (८)
नौवां खंड
अग्न ओजिष्ठमा भर द्युम्नमस्मभ्यमध्रिगो.
प्र नो राये पनीयसे रत्सि वाजाय पन्थाम्.. (१)
हे अग्नि! आप हमें खूब बल तथा धन दीजिए. आप बेरोकटोक गति वाले हैं. धन का
मार्ग हमें दिखाइए. आप अन्न और बल वाला मार्ग हमें दिखाइए. (१)
यदि वीरो अनु ष्यादग्निमिन्धीत मर्त्य:.
आजुह्वद्धव्यमानुषक् शर्म भक्षीत दैव्यम्.. (२)
हे अग्नि! मनुष्य वीर पुत्र को पाने के लिए आप को प्रज्वलित करे. हवन के पदार्थों से
सदा हवन करे. आप की कृपा से सदा परम सुख प्राप्त करे. (२)
त्वेषस्ते धूम ऋण्वति दिवि सञ्छुक्र आतत:.
सूरो न हि द्युता त्वं कृपा पावक रोचसे.. (३)
हे अग्नि! प्रज्वलित होने के बाद आप का धुआं आकाश में फैलता है. बादल रूप में
बदल जाता है. आप पवित्र करने वाले हैं. स्तुति के प्रभाव से आप सूर्य के समान प्रकाशित
होते हैं. (३)
त्व ᳪ हि क्षैतवद्यशो ऽ ग्ने मित्रो न पत्यसे.
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त्वं विचर्षणे श्रवो वसो पुष्टिं न पुष्यसि.. (४)
हे अग्नि! निश्चय ही आप सूखी समिधा रूप में अन्न को ग्रहण करते हैं. आप उसे (अन्न
को) बहुत ज्यादा मात्रा में बढ़ाते हैं (पुष्ट करते हैं). आप सूर्य के समान तेजस्वी हैं. आप सभी
को शरण (आश्रय) देने वाले व सब कुछ देखने वाले हैं. (४)
प्रातरग्निः पुरुप्रियो विश स्तवेतातिथिः.
विश्वे यस्मिन्नमर्त्ये हव्यं मर्तास इन्धते.. (५)
हे अग्नि! आप अनेक लोगों को प्रिय लगने वाले हैं. आप यजमानों के घर धन स्थापित
करने वाले हैं. आप यजमानों के घर मेहमान के समान आने वाले हैं. आप प्रातःकाल स्तुति
किए जाने वाले हैं. आप अमर हैं. सभी मनुष्य आप को पवित्र हवन सामग्री प्रदान करें. (५)
यद्वाहिष्ठं तदग्नये बृहदर्च विभावसो.
महिषीव त्वद्रयिस्त्वद्वाजा उदीरते.. (६)
हे अग्नि! शीघ्र पहुंचने वाले स्तोत्र से हम आप की आराधना करते हैं. आप तेजस्वी हैं.
हमें बहुत सा अन्न और धन प्रदान कीजिए क्योंकि आप ही से बहुत सा धन और अन्न प्राप्त
होता है. (६)
विशोविशो वो अतिथिं वाजयन्तः पुरुप्रियम्.
अग्निं वो दुर्यं वचः स्तुषे शूषस्य मन्मभिः.. (७)
हे यजमानो! आप अन्न और बल की इच्छा करते हुए अग्नि की स्तुति करो. वे सब के
प्रिय व पूजनीय हैं. हे अग्नि! हम गृहपति आप की सुखदायी स्तोत्रों से आराधना करते हैं.
(७)
बृहद्वयो हि भानवे ऽ र्चा देवायाग्नये.
यं मित्रं न प्रशस्तये मर्तासो दधिरे पुरः.. (८)
हे अग्नि! आप तेजस्वी हैं. आप के लिए बहुत सा हवि का अन्न दिया जाता है. हम
प्रकाश वाले आप की पूजा करते हैं. हम आप को मित्र के समान मानते हैं. हम उत्तम स्तुति
करने के लिए आप को आगे कर के स्थापित करते हैं. (८)
अगन्म वृत्रहन्तमं ज्येष्ठमग्निमानवम्.
यः स्म श्रुतर्वन्नार्क्षे बृहदनीक इध्यते.. (९)
हे अग्नि! आप पापों का नाश करने वाले व प्रशंसनीय मनुष्यों के हितकारी हैं. ऋक्ष पुत्र
श्रुतर्वा के लिए हम बड़ीबड़ी ज्वालाओं के साथ आप को प्रकट करते हैं. (९)
जातः परेण धर्मणा यत्सवृद्धिः सहाभुवः.
पिता यत्कश्यपस्याग्निः श्रद्धा माता मनुः कविः.. (१०)
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हे अग्नि! कश्यप आप के पिता और श्रद्धा माता हैं. मनु कवि हैं. आप श्रेष्ठ कर्मों द्वारा
शुरू किए गए यज्ञ में प्रकट होते हैं. (१०)
दसवां खंड
सोम २४ राजानं वरुणमग्निमन्वारभामहे.
आदित्यं विष्णु २४ सूर्य ब्रह्माणं च बृहस्पतिम्.. (१)
हम सोम, राजा, वरुण, अग्नि, अदिति के पुत्र, विष्णु, सूर्य एवं ब्रह्मा को बारबार याद
करते हुए आमंत्रित करते हैं. अर्थात् इन सभी देवताओं को स्तुतियों से आमंत्रित करते हैं. (१)
इत एत उदारुहन्दिवः पृष्यान्त्या रुहन्.
प्र भूर्जयो यथा पथोद्द्यामङ्गिरसो ययुः.. (२)
यज्ञ करने वाले आंगिरस ऋषि स्वर्गलोक को पहुंचे. उसी के प्रभाव से और भी ऊपर
गए. (२)
राये अग्ने महे त्वा दानाय समिधीमहि.
ईडिष्वा हि महे वृषं द्यावा होत्राय पृथिवी.. (३)
हे अग्नि! हम बहुत धन दान के लिए आप को प्रदीप्त करते हैं. आप वरदान की वर्षा
करने वाले हैं. महान यज्ञ के लिए स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक की स्तुति करते हैं. (३)
दधन्वे वा यदीमनु वोचद्ब्रह्मेति वेरु तत्.
परि विश्वानि काव्या नेमिश्चक्रमिवाभुवत्.. (४)
हे अग्नि! आप को संबोधित कर के अध्वर्यु आदि पुरोहित स्तोत्र उचारते हैं. आप सब
कुछ जानते हैं. आप सब कर्मों को वैसे ही वश में रखते हैं, जैसे पहिए गाड़ी को. (४)
प्रत्यग्ने हरसा हरः शृणाहि विश्वतस्परि.
यातुधानस्य रक्षसो बलं न्युब्जवीर्यम्.. (५)
हे अग्नि! आप अपने तेज से यातना देने वाले राक्षसों को सब ओर (प्रकार) से नष्ट कर
दीजिए. (५)
त्वमग्ने वसू २४ रिह रुद्राँ आदित्याँ उत.
यजा स्वध्वरं जनं मनुजातं घृतप्रुषम्.. (६)
हे अग्नि! आप यहां वसु, रुद्र एवं आदित्य देवता के लिए यज्ञ कीजिए. आप उत्तम यज्ञ
करने वाले, घी से सींचने वाले, मनु से उत्पन्न हुए मनुष्य का सत्कार (मनोकामना सिद्धि
द्वारा) कीजिए. (६)

ग्यारहवां खंड
पुरु त्वा दाशिवाँ वोचे ऽ रिरग्ने तव स्विदा.
तोदस्येव शरण आ महस्य.. (१)
हे अग्नि! आप को बहुत सी हवि प्रदान करते हुए मैं उसी तरह आप की शरण में आया
हूं, जैसे बहुत धनवान की शरण में सेवक आते हैं. (१)
प्र होत्रे पूर्व्यं वचो ऽ ग्नये भरता बृहत्.
विपां ज्योती २४ षि बिभ्रते न वेधसे.. (२)
हे स्तुति करने वालो! अग्नि ज्ञानियों के तेज को धारण करने वाले हैं. विधाता आदि देवों
को बुलाने वाले हैं. आप इन के लिए महान और प्राचीन स्तोत्र का पाठ कीजिए. (२)
अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो.
अस्मे देहि जातवेदो महि श्रवः.. (३)
हे अग्नि! आप बल से उत्पन्न हुए हैं. आप अन्न के स्वामी व अंतर्यामी हैं. आप हमें बहुत
सा अन्नधन दीजिए. (३)
अग्ने यजिष्ठो अध्वरे देवां देवयते यज.
होता मन्द्रो वि राजस्यति स्रिधः.. (४)
हे अग्नि! आप यज्ञ में पूजनीय हैं. यजमान के लिए देवताओं का यजन कीजिए. देवों
को बुलाने वाले आप शत्रुओं को हरा कर शोभायमान होते हैं. (४)
जज्ञानः सप्त मातृभिर्मेधामाशासत श्रिये.
अयं ध्रुवो रयीणां चिकेतदा.. (५)
हे अग्नि! आप सात माताओं की सहायता से उत्पन्न होने वाले हैं. आप सोम को सेवा
कार्य में शोभित करते हैं (प्रेरित करते हैं). सोम कर्म का विधान करने वाले हैं. आप धनसंपदा
को अच्छी तरह जानने वाले हैं. (५)
उत स्या नो दिवा मतिरदितिरूत्यागमत्. सा शन्ताता मयस्करदप स्रिधः.. (६)
हे अदिति! आप स्तुति के योग्य हैं. आप अपने पूरे रक्षा साधनों के साथ हमारे पास
पधारें. हमें सुखशांति प्रदान करें. हमारे शत्रुओं को दूर करें. (६)
ईडिष्वा हि प्रतीव्यां ३ यजस्व जातवेदसम्. चरिष्णुधूममगृभीतशोचिषम्.. (७)
हे स्तुति करने वालो! शत्रुओं को भस्म करने (हराने) वाले अग्नि की स्तुति करो. इन का
धुआं सब ओर घूम सकता है. इन के प्रकाश को कोई नहीं रोक सकता. ये सब कुछ जानने
वाले हैं. आप हवि से इन की आराधना कीजिए. (७)
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न तस्य मायया च न रिपुरीशीत मर्त्यः. यो अग्नये ददाश हव्यदातये.. (८)
हे अग्नि! जो आप के लिए हवि पदार्थ देता है, उस पर कभी भी किसी दुष्ट (शत्रु) के
छलकपट का असर नहीं होता है. (८)
अप त्यं वृजिन २४ रिपु २४ स्तेनमग्ने दुराध्यम्. दविष्ठमस्य सत्पते कृधी सुगम्.. (९)
हे अग्नि! आप छलीकपटी शत्रु को बहुत दूर फेंक दीजिए. आप सत्य के पालनहार हैं.
हमारे लिए सुखशांति का मार्ग सुगम बनाइए. (९)
श्रुष्ट्यग्ने नवस्य मे स्तोमस्य वीर विष्पते. नि मायिनस्तपसा रक्षसो दह.. (१०)
हे अग्नि! आप वीर हैं. हमारी इन नई प्रार्थनाओं को सुन कर छली, दुष्ट राक्षसों को
अपने ताप से भस्म कीजिए. राक्षस हमारे कर्मों में विघ्न डालते हैं. (१०)
बारहवां खंड
प्र म २४ हिष्ठाय गायत ऋताव्ने बृहते शुक्रशोचिषे. उपस्तुतासो अग्नये.. (१)
हे स्तुति करने वालो! अग्नि यज्ञ व सत्य के पालनहार हैं. वे महान तेज वाले हैं. आप
ऐसे महान रक्षक अग्नि की स्तुति कीजिए. (१)
प्र सो अग्ने तवोतिभिः सुवीराभिस्तरति वाजकर्मभिः.
यस्य त्व २४ सख्यमाविथ.. (२)
हे अग्नि! आप जिन यजमानों के मित्र हो जाते हैं, वे अन्नबल की रक्षा करने वाली श्रेष्ठ
संतान प्राप्त करते हैं. (२)
तं गूर्धया स्वर्णरं देवासो देवमरतिं दधन्विरे. देवत्रा हव्यमूहिषे.. (३)
हे स्तुति करने वालो! स्वर्ग में देवताओं तक हवि पहुंचाने वाले अग्नि की स्तुति करो.
आप जिस देवता को इष्ट मान कर पूजते हैं, आप की हवि अग्नि उस देवता तक पहुंचा देते
हैं. (३)
मा नो हृणीथा अतिथिं वसुरग्निः पुरुप्रशस्त एषः. यः सुहोता स्वध्वरः.. (४)
अग्नि यज्ञ में मेहमान की तरह हैं. उन्हें यज्ञ से दूर मत ले जाओ. वे देवताओं को बुलाने
वाले हैं. वे सुखशांति देने वाले हैं. वे अनेक लोगों द्वारा पूजित व सब को बसाने वाले हैं. (४)
भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः. भद्रा उत प्रशस्तयः.. (५)
हे अग्नि! आप को हवियों से तृप्त किया है. आप हमारा कल्याण कीजिए. आप
ऐश्वर्यशाली हैं. हमें शुभ धन प्रदान कीजिए. हमें कल्याणकारी यज्ञ प्राप्त कराइए. हमारी
प्रार्थनाएं हमारे लिए मंगलमयी हों. (५)
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यजिष्ठं त्वा ववृमहे देवं देवत्रा होतारममर्त्यम्. अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्.. (६)
हे अग्नि! आप देवों में श्रेष्ठ हैं. आप श्रेष्ठ यज्ञ कराने वाले हैं. आप अमर हैं. इस यज्ञ को
अच्छी तरह पूरा करने वाले हैं. हम आप की स्तुति करते हैं. (६)
तदग्ने द्युम्नमा भर यत्सासाह सदने कं चिदत्रिणम्. मन्युं जनस्य दूढ्यम्.. (७)
हे अग्नि! आप हमें तेजस्वी बनाइए. आप हमें यश प्रदान कीजिए. यज्ञ में विघ्न पहुंचाने
वाले दुष्टों को हम वश में कर सकें. उन का तिरस्कार कर सकें. आप दुर्बुद्धि वाले लोगों की
बुद्धि ठीक कीजिए. आप उन के क्रोध को दूर कीजिए. (७)
यद्वा उ विशपतिः शितः सुप्रीतो मनुषो विशे.
विश्वेदग्निः प्रति रक्षा ꣲ सि सेधति.. (८)
हे अग्नि! आप यजमानों के पालनहार हैं. हवियों से तृप्त और प्रसन्न होने पर आप जब
तक मनुष्यों के घर रहते हैं तब तक उन के सभी कष्ट दूर करते हैं. यह बात जग प्रसिद्ध है.
(८)

ऐंद्र पर्व

ऐंद्र पर्व
दूसरा अध्याय
पहला खंड
तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने. शं यद्गवे न शाकिने.. (१)
हे स्तुति करने वालो! सोम तैयार करने के बाद बहुत से यजमान जिन की स्तुति करते हैं
जो धन दाता हैं, तुम उन इंद्र के लिए प्रार्थना करो. वे प्रार्थनाएं उन्हें उसी प्रकार सुख देती हैं,
जिस प्रकार गायों को घास. (१)
यस्ते नून ॐ शतक्रतविन्द्र द्युम्नितमो मद:. तेन नूनं मदे मदे:.. (२)
हे इंद्र! आप सैकड़ों कर्म करने वाले हैं अथवा आप सैकड़ों प्रकार का ज्ञान रखने वाले
हैं. वह सोमरस हम ने आप ही के लिए निकाला था. आप उस रस को पी कर आनंदित होइए
और हमें भी आनंद प्रदान कीजिए. (२)
गाव उप वदावटे मही यज्ञस्य रप्सुदा. उभा कर्णा हिरण्यया.. (३)
हे गौओ! आप यज्ञ स्थान की ओर जाइए. आप धार्मिक यज्ञ विधाओं के लिए दूध आदि
प्रदान कीजिए. आप के दोनों कान स्वर्ण से सुशोभित हैं. (३)
अरमश्वाय गायत श्रुतकक्षारं गवे. अरमिन्द्रस्य धाम्ने.. (४)
हे स्तुति करने वालो! इंद्र के घोड़े, गायों व इंद्र धाम के लिए पूरी तरह वैदिक स्तुतियां
गाइए. (४)
तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे. स वृषा वृषभो भुवत्.. (५)
हे इंद्र! आप उस बड़े राक्षस (वृत्रासुर) को मारने वाले हैं. आप वज्र के समान बलवान
हैं. हम अपनी सहायता के लिए आप को आमंत्रित करते हैं. आप धन दाता हैं. हमें धन प्रदान
कीजिए. (५)
त्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजस:. त्व ॐ सन्वृषन्वृषदसि.. (६)
हे इंद्र! आप शत्रुओं को हराने वाले हैं. आप बल और हृदय के धैर्य के कारण प्रसिद्ध हैं.
आप वरदानों तथा मनोवांछित फलों को देने वाले हैं. (६)
यज्ञ इन्द्रमवर्धयद्द्याद्भूमिं व्यवर्तयत्. चक्राण ओपशं दिवि.. (७)
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हे इंद्र! अंतरिक्ष में मेघों को फैला कर आप ने बरसात आदि से पृथ्वी को बढ़ाया (समृद्ध
किया)। हम यजमानों के यज्ञों ने आप का यश बढ़ाया है. (७)
यदिन्द्रा॒हं यथा॒ त्वमी॑शीय॒ वस्व॒ एक॒ इत्. स्तो॒ता मे॑ गो॒सखा॑ स्यात्.. (८)
हे इंद्र! जैसे आप अकेले समस्त वैभव के स्वामी हैं, यदि वैसे ही मैं भी सारे वैभव का
स्वामी हो जाऊं तो मेरी स्तुति करने वाले गौ आदि धनधान्य वाले हो जाएं. (८)
पन्यंपन्यमित्सोतार आ धावत मद्याय. सोमं वीराय शूराय.. (९)
सोमरस निकालने वाले पुरोहितो! आप शूरवीर इंद्र के लिए सोमरस अर्पित कीजिए.
यह सोमरस सर्वत्र प्रशंसा के योग्य है. (९)
इदं वसो सुतमन्धः पिबा सुपूूर्णमुदरम्. अनाभयिन्नरिमा ते.. (१०)
हे इंद्र! आप अंतर्यामी हैं. यह सोमरस लीजिए. अपनी प्रसन्नता के लिए इसे पीजिए,
जिस से आप का पेट पूरी तरह भर जाए. आप सब ओर से निर्भय हैं. (१०)
दूसरा खंड
उद्घेदिभि श्रुतामघं वृषभं नर्यापसम्. अस्तारमेषि सूर्य.. (१)
उदीयमान इंद्र (सूर्य रूप में) श्रेष्ठ वीर, धन देने वाले व मनुष्यों के हितकारी हैं. वे उदार
स्वभाव के हैं और (शत्रुओं पर) शस्त्र प्रहार करने वाले हैं. (१)
यदद्य कच्च वृत्रहन्नुदगा अभि सूर्य. सर्वं तदिन्द्र ते वशे.. (२)
हे इंद्र! आप जल रोकने वाले मेघ को नष्ट करते हैं. अभी उदित हुए आप से सब कुछ
प्रकाशित हो रहा है. सब कुछ आप के अधीन है. (२)
य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम्. इन्द्रः स नो युवा सखा.. (३)
हे इंद्र! तुर्वश और यदु को शत्रुओं ने दूर फेंक दिया था, आप अपनी श्रेष्ठ नीति से उन्हें
फिर पास लौटा लाए. आप युवा हैं. आप हमारे मित्र हो जाइए. (३)
मा न इन्द्राभ्या ३ दिशः सूरो अत्कुष्वा यमत्. त्वा युजा वनेम तत्.. (४)
हे इंद्र! राक्षस चारों ओर से शस्त्र बरसाने वाले व सब ओर विचरण करने वाले हैं. आप
कृपा कीजिए जिस से ऐसे राक्षस हमारी ओर न आ सकें. आप की सहायता से हम ऐसे
राक्षसों को नष्ट कर सकें. (४)
एन्द्र सानसि 𑓐 रयि 𑓐 सजित्वान 𑓐 सदासहम्. वर्षिष्ठमूतये भर.. (५)
हे इंद्र! आप हमारे संरक्षण के लिए, भोग के लिए तथा शत्रुओं पर विजय पाने के लिए
हमें बहुत सा धन दीजिए. (५)
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इन्द्रं वयं महाधन इन्द्रमर्भे हवामहे. युजं वृत्रेषु वज्रिणम्.. (६)
हे इंद्र! हम थोड़ा धन होने पर भी बहुत धन वाले आप को बुलाते हैं. हम छोटीबड़ी
सभी विपत्तियों से रक्षा करने वाले तथा शत्रुओं का नाश करने में सहायक आप को आमंत्रित
करते हैं. (६)
अपिबत्कद्रुवः सुतमिन्द्रः सहस्रबाह्वे. तत्राददिष्ट पौंस्यम्.. (७)
हे इंद्र! आप ने कद्रू से निकाले हुए सोमरस को पीया. आप ने हजारों भुजाओं वाले शत्रु
को मारा. आप की वीरता उसी समय प्रकाशित हुई. (७)
वयमिन्द्र त्वायवो ऽ भि प्र नोनुमो वृषन्. विद्धी त्वा ३ स्य नो वसो.. (८)
हे इंद्र! आप कामनाओं की वर्षा करने वाले हैं. हम आप की कामना करते हैं. आप की
ओर मुंह कर के बारबार प्रणाम करते हैं. आप सर्वव्यापक हैं. आप हमारे स्तोत्र (की भावना)
को समझ लीजिए. (८)
आ घा ये अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (९)
चिर युवा इंद्र श्रेष्ठ अग्नि को प्रज्वलित करने वाले यजमानों के मित्र हैं. यज्ञ करने वाले
उन के लिए कुश का आसन बिछाते हैं. (९)
भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः. वसु स्पार्हं तदा भर.. (१०)
हे इंद्र! आप द्वेष करने वाले सारे शत्रुओं का नाश कीजिए. विघ्न डालने वाले शत्रुओं
को हराइए. हमें यश देने वाला भरपूर धन प्रदान कीजिए. (१०)
तीसरा खंड
इहेव शृण्व एषां कशा हस्तेषु यद्वदान्. नि यामं चित्रमृञ्जते.. (१)
मरुद्गणों के हाथों में चाबुक है. उन चाबुकों से जो आवाज होती है, वह हमें सुनाई देती
है. ये आवाजें (ध्वनियां) युद्ध में अनेक प्रकार की वीरता प्रदर्शित करती हैं. (१)
इम उ त्वा वि चक्षते सखाय इन्द्र सोमिनः. पुष्टावन्तो यथा पशुम्.. (२)
हे इंद्र! यजमान हाथों में सोमरस ले कर आप की ओर उसी तरह एकाग्रचित्त हो कर
देख रहे हैं, जैसे पशु पालक घास हाथ में ले कर प्रेम भाव से पशु की ओर देखता है. (२)
समस्य मन्यवे विशो विश्वा नमन्त कृष्टयः. समुद्रायेव सिन्धवः.. (३)
हे इंद्र! सारी प्रजा (जनता) नम्रतापूर्वक वैसे ही आकर्षित हो रही है, जैसे समुद्र की
ओर जाने वाली नदियां. (३)
देवानामिदवो महत्तदा वृणीमहे वयम्. वृष्णामस्मभ्यमूतये.. (४)
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हे देवताओ! आप का संरक्षण पूजनीय व महान है. आप सारी इच्छाओं को पूरा करते
हैं. यह संरक्षण हमारे लिए धन रूप है. हम अपने संरक्षण के लिए आप से चारों ओर से (सब
ओर से) प्रार्थना करते हैं. (४)
सोमाना ꣲ स्वरं कृणुहि ब्रह्मणस्पते. कक्षीवन्तं य औशिजः.. (५)
हे ब्रह्मणस्पति! आप सोम यज्ञ करने वाले उशिज के पुत्र कक्षीवान को प्रकाशित करने
की कृपा कीजिए. (५)
बोधन्मना इदस्तु नो वृत्रहा भूर्यासुतिः. शृणोतु शक्र आशिषम्.. (६)
हे इंद्र! आप वृत्र नामक राक्षस को मारने वाले हैं. आप के लिए बहुत से लोग सोमरस
तैयार करते हैं. आप हमेशा हमारे मनोरथों को जानने वाले हैं. आप युद्ध में शत्रुओं का नाश
करने वाले हैं. आप सामर्थ्यवान हैं. कृपया आप हमारी स्तुति सुनिए. (६)
अद्या नो देव सवितः प्रजावत्सावीः सौभाग्यम्. परा दुःष्वप्न्यं ꣲ सुव.. (७)
हे सूर्य! आप हमें पुत्रपौत्रों सहित धन प्रदान कीजिए. गरीबी बुरे सपने की तरह
दुःखदायी है. आप उसे दूर कीजिए. (७)
क्व ३ स्य वृषभो युवा तुविग्रीवो अनानतः. ब्रह्मा कस्त ꣲ सपर्यति.. (८)
हे इंद्र! आप समर्थ व युवा हैं. आप इच्छाएं पूरी करने वाले हैं. आप बलवान हैं. आप
किसी के सामने झुकने वाले नहीं हैं. आप कहां हैं? इस समय कौन ज्ञानी आप की पूजा कर
रहा है? (८)
उपह्वरे गिरीणा ꣲ सङ्गमे च नदीनाम्. धिया विप्रो अजायत.. (९)
पर्वतों पर और नदियों के संगम पर बुद्धि से की हुई प्रार्थना को सुनने के लिए बुद्धिमान
इंद्र प्रकट होते हैं. (९)
प्र सम्राजं चर्षणीनामिन्द्र ꣲ स्तोता नव्यं गीर्भिः. नरं नृषाहं म ꣲ हिष्ठम्.. (१०)
मनुष्यों में इंद्र भली प्रकार प्रकाशित हैं. वे स्तुति करने योग्य हैं. शत्रुओं को जीतने वाले
हैं. हम उन महान इंद्र की स्तुति करते हैं. (१०)
चौथा खंड
अपादु शिप्रयन्धसः सुदक्षस्य प्रहोषिणः. इन्दोरिन्द्रो यवाशिरः.. (१)
हे इंद्र! आप सुंदर ठोड़ी वाले और सुंदर मुकुट धारण करने वाले हैं. यजमान हवि देने में
विशेष कुशल हैं. आप ने दूध और जौ से बनाए हुए सोमरस को ग्रहण किया. (१)
इमा उ त्वा पुरूवसो ऽ भि प्र नोनुवुर्गिरः. गावो वत्सं न धेनवः.. (२)
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हे इंद्र! आप अनेक प्रकार के वैभव वाले हैं. हमारी स्तुतियां बारबार आप के पास उसी
तरह आना चाहती हैं, जैसे दूध वाली गाएं बारबार बछड़ों की ओर आती हैं. (२)
अत्राह गोरमन्वत नाम त्वष्टुरपीच्यम्. इत्था चन्द्रमसो गृहे.. (३)
गतिमान चंद्र मंडल में सूर्य का दिव्य तेज है, ऐसा विद्वान् मानते हैं अर्थात् सूर्य के छिप
जाने पर उन्हीं के प्रकाश से चंद्रमा प्रकाशित होता है. (३)
यदिन्द्रो अनयद्रितो महीरपो वृषन्तमः. तत्र पूषाभुवत्सचा.. (४)
हे इंद्र! आप बहुत बरसात के रूप में जल प्रवाहित करते हैं, इस लोक तक पहुंचाते हैं
तब पूषा देवता आप के सहायक होते हैं. वे पोषण करने में समर्थ देवता हैं. (४)
गौर्धयति मरुता ᳵ श्रवस्युर्माता मघोनाम्. युक्ता वह्नी रथानाम्.. (५)
पृथ्वी माता धनसंपन्न हैं. वे मरुतों के रथ में जुड़ी हुई हैं. वे सब ओर पूजित हैं. वे अन्न
आदि उत्पन्न कर के अपने पुत्रों का पालनपोषण करती हैं. (५)
उप नो हरिभिः सुतं याहि मदानां पते. उप नो हरिभिः सुतम्.. (६)
हे इंद्र! आप सोम के स्वामी हैं. हम ने आप के लिए सोमरस निचोड़ कर रखा है. आप
अपने हजारों घोड़ों से (सहित या माध्यम से) हमारे इस यज्ञ में पधारिए. आप जल्दी और
बारबार पधारिए. (६)
इष्टा होत्रा असृक्षतेन्द्रं वृधन्तो अध्वरे. अच्छावभृथमोजसा.. (७)
हे इंद्र! हम यजमान बारबार आप की स्तुति करते हैं. हम अपने तेज से यज्ञ खत्म होने
पर होने वाले स्नान तक बारबार आप के लिए आहुति प्रदान करते हैं. (७)
अहमिद्धि पितुषपरि मेधामृतस्य जग्रह. अह ᳵ सूर्य इवाजनि.. (८)
हे इंद्र! आप पालनकर्ता हैं. हम ने आप की बुद्धि को अपनी ओर आकर्षित कर लिया
है. यानी हम ने आप की कृपा प्राप्त कर ली है. अब हम सूर्य देव के समान प्रकाशित हो गए
हैं. (८)
रेवतीर्नः सधमाद इन्द्रे सन्तु तुविवाजाः. क्षुमन्तो याभिर्मदेम.. (९)
हे इंद्र! आप की कृपा से हम धनधान्य संपन्न हो कर प्रसन्न हो जाते हैं. हमारी गायों पर
भी आप की कृपा हो. वे भी अधिक अन्न और दूध देने वाली हो जाएं. (९)
सोमः पूषा च चेततुर्विश्वासा ᳵ सुक्षितीनाम्. देवत्रा रथ्योर्हिता.. (१०)
सोम और पूषा देवताओं के रथ में विराजमान हैं. वे इसी रथ में बैठने योग्य हैं. वे सभी
मनुष्यों का उत्साह बढ़ाने वाले हैं. (१०)
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पांचवां खंड
पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायत.
विश्वासाह २३ शतक्रतुं म २३ हिष्ठं चर्षणीनाम्.. (१)
हे याजको (यज्ञ करने वालो)! आप इंद्र की विशेष स्तुति करें. वे शत्रुओं का नाश करने
वाले हैं. सैकड़ों कर्म करने वाले हैं. वे धन दाता हैं. वे सोमरस का पान करने वाले हैं. (१)
प्र व इन्द्राय मादन २३ हर्यश्वाय गायत. सखायः सोमपाव्ने.. (२)
हे साधको! इंद्र हरि नामक घोड़े वाले हैं. वे सोमरस पीने वाले हैं. आप इन इंद्र को
प्रसन्न करने वाली प्रार्थनाएं गाइए. (२)
वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः. कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते.. (३)
हे इंद्र! हम आप को अपना मित्र बनाना चाहते हैं. हम आप के मित्र होना चाहते हैं. हम
कण्ववंशी हैं. हम आप की स्तुति करना अपना कर्तव्य मानते हैं. हम आप की स्तुति कर रहे
हैं. (३)
इन्द्राय मद्धने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः. अर्कमर्चन्तु कारवः.. (४)
हे इंद्र! आप प्रसन्न स्वभाव वाले हैं. हम आप के लिए निचोड़े गए सोमरस की स्तुति
करते हैं. यज्ञ करने वालों से निवेदन है कि सोमरस की स्तुति करें. सोमरस पूजा योग्य है. (४)
अयं त इन्द्र सोमो निपूतो अधि बर्हिषि. एहीमस्य द्रवा पिब.. (५)
हे इंद्र! वेदी के आसन पर आप के लिए शुद्ध कर के सोमरस रखा हुआ है. आप इस
स्थान पर शीघ्र पधारिए. आप इस सोमरस को ग्रहण कीजिए. (५)
सुरूपकृत्नुमूतये सुदुघामिव गोदुहे. जुहूमसि द्यविद्यवि.. (६)
हे इंद्र! आप सुंदर कार्य करने वाले हैं. हम आप को अपने संरक्षण के लिए उसी प्रकार
बुलाते हैं, जिस प्रकार अच्छा दूध देने वाली गाय को पुकारा जाता है. (६)
अभि त्वा वृषभा सुते सुत २३ सृजामि पीतये. तृम्पा व्यश्नुही मदम्.. (७)
हे इंद्र! आप इच्छा पूरी करने वाले हैं. हम सोम यज्ञ में पीने के लिए आप को सोमरस
अर्पित कर रहे हैं. आप आनंददायी सोमरस ग्रहण कीजिए. (७)
य इन्द्र चमसेष्वा सोमश्चमूषु ते सुतः. पिबेदस्य त्वमीशिषे.. (८)
हे इंद्र! आप के लिए सोमरस 'चमस' और 'ग्रह' नामक बरतनों में रखा हुआ है. आप
इसे अवश्य ग्रहण कीजिए. आप बहुत सामर्थ्य वाले हैं. (८)
योगेयोगे तवस्तरं वाजेवाजे हवामहे. सखाय इन्द्रमूतये.. (९)
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