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सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

बारहवां अध्याय

बारहवां अध्याय
पहला खंड
उपप्रयन्तो अध्वरं मन्त्रं वोचेमाग्नये. आरे अस्मे च शृण्वते.. (१)
अग्नि उत्तम यज्ञ करने वाले यजमान की प्रार्थना सुनने के लिए तैयार हैं. हम उन की
उपासना करते हैं. (१)
यः स्नीहितीषु पूर्व्यः संजग्मानासु कृष्टिषु. अरक्षद्दाशुषे गयम्.. (२)
अग्नि हमेशा प्रकाशित रहते हैं. यजमान जब प्रेम भाव से मिल कर रहते हैं तो वे उन के
वैभव की रक्षा करते हैं. (२)
स नो वेदो अमात्यमग्नी रक्षतु शन्तमः. उतास्मान्पात्व ॐ हसः.. (३)
अग्नि बहुत कल्याणकारी हैं. वे हमें पापों (बुरी प्रवृत्तियों) से दूर करने व हमारे वैभव
की रक्षा करने में हमारी सहायता करने की कृपा करें. (३)
उत ब्रुवन्तु जन्तव उदग्निर्वृत्रहाजनि. धनञ्जयो रणेरणे.. (४)
अग्नि युद्धों में दुश्मनों को हराते हैं व उन का धन जीतते हैं. वे प्रकट हो गए हैं. मंत्र
गायक पुरोहित को उन की स्तुति करनी चाहिए. (४)
अग्ने युंक्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः. अरं वहन्त्याशवः.. (५)
हे अग्नि! आप के घोड़े शीघ्र जाने वाले हैं. आप के घोड़े भी सामर्थ्यवान हैं. आप उन
को रथ में जोतिए. (५)
अच्छा नो याह्या वहाभि प्रया ॐ सि वीतये. आ देवान्त्सोमपीतये.. (६)
हे अग्नि! आप सोमपान व देवताओं को हमारी ओर उन्मुख करने की कृपा कीजिए.
(६)
उदग्ने भारत द्युमदजस्रेण दविद्युतत्. शोचा वि भाह्यजर.. (७)
हे अग्नि! आप जग के पालक व अक्षुण्ण (कभी क्षीण न हो सकने वाले) हैं. आप भी
प्रकाशित होइए और जग को भी प्रकाशित कीजिए. आप प्रज्वलित हो कर उत्तरोत्तर
बढ़ोतरी प्राप्त कीजिए. (७)
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प्र सुन्वानायान्धसो मर्तो न वष्ट तद्वचः.
अप श्वानमराधसं १४ हता मखं न भृगवः.. (८)
सोमरस रसीला व सेवन के योग्य है. सोम के लिए की गई प्रार्थनाओं को लालची कुत्ते
न सुन सकें. भृगु ऋषि ने जैसे मख नामक राक्षस को मारा था, वैसे ही आप उन कुत्तों को
अपराधी की तरह ही दंडित कीजिए. (८)
आ जामिरत्के अव्यत भुजे न पुत्र ओण्योः.
सरज्जारो न योषणां वरो न योनिमासदम्.. (९)
सोम भाई जैसे प्रिय हैं, मातापिता की भुजाओं में संरक्षित बेटे जैसे हैं व कामी आदमी
जैसे स्त्री की ओर और वर कन्या की ओर आकर्षित होता है, वैसे ही सोम द्रोणकलश की
ओर जा रहे हैं. (९)
स वीरो दक्षसाधनो वि यस्तस्तम्भ रोदसी.
हरिः पवित्रे अव्यत वेधा न योनिमासदम्.. (१०)
सोम पवित्र, हरे, पोषक, वीर व उत्तम रसायनों से भरे हैं. वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक
को अपने प्रकाश से भर देते हैं. द्रोणकलश में यजमान के घर जाने की तरह प्रवेश करते हैं.
(१०)
दूसरा खंड
अभ्रातृव्यो अना त्वमनापिरिन्द्र जनुषा सनादसि. युधेदापित्वमिच्छसे.. (१)
हे इंद्र! आप का कोई शत्रु नहीं जन्मा और समस्त उपासकों को ही अपना बंधु
स्वीकारते हैं. आप दुश्मनों के प्रति बंधु भाव से रहित और शत्रुओं के नाश की इच्छा रखते हैं.
आप सब के नियंत्रक हैं. (१)
न की रेवन्त १४ सख्याय विन्दसे पीयन्ति ते सुराश्वः.
यदा कृणोषि नदनु १४ समूहस्यादित्पितेव हूयसे.. (२)
हे इंद्र! आप शक्तिशाली हैं. धन का गर्व करने वाले के आप सखा नहीं होते. जो सुरा पी
कर आप को पीड़ित करते हैं, उन के भी आप सखा नहीं होते. जो ज्ञान, गुण संपन्नों के साथ
मिल कर चलते हैं, उन को आप पिता के समान प्रेम करते हैं. (२)
आ त्वा सहस्रमा शतं युक्ता रथे हिरण्यये.
ब्रह्मयुजो हरय इन्द्र केशिनो वहन्तु सोमपीतये.. (३)
हे इंद्र! आप का रथ सुनहरा है. आप के घोड़े संकेत मात्र से रथ में जुत जाते हैं. आप
के वे घोड़े आप को सोमरस पिलाने के लिए रथ में बैठा कर यज्ञ स्थान में लाने की कृपा करें.
(३)

आ त्वा रथे हिरण्यये हरी मयूरशेप्या.
शितिपृष्ठा वहतां मध्वो अन्धसो विवक्षणस्य पीतये.. (४)
हे इंद्र! आप के घोड़े मोर जैसे रंग और सफेद पीठ वाले हैं. वे आप को यज्ञ स्थान पर
लाने की कृपा करें, ताकि आप मीठा अमृत जैसा सोमरस पी सकें. (४)
पिबा त्व ३ स्य गिर्वणः सुतस्य पूर्वपा इव.
परिष्कृतस्य रसिन इयमासुतिश्चारुर्मदाय पत्यते.. (५)
हे इंद्र! आप पूजनीय हैं. सोमरस मददायी, आनंदवर्द्धक व गुणमय है. आप सब से
पहले इस साफ छने हुए सोमरस को पीने की कृपा करें. (५)
आ सोता परि षिञ्चताश्वं न स्तोममप्तुरं रजस्तुरम्. वनप्रक्षमृदप्रुतम्.. (६)
हे यजमानो! सोमरस घोड़े की तरह वेगवान, जलमय व प्रकाश का विस्तारक है. आप
सोमरस छान कर, जल में मिला कर तैयार कीजिए. (६)
सहस्रधारं वृषभं पयोदुहं प्रियं देवाय जन्मने.
ऋतेन य ऋतजातो विवावृधे राजा देव ऋतं बृहत्.. (७)
सोमरस दिव्य गुण वाला, सुख बढ़ाने वाला, प्रिय और जल में मिल कर बढ़ोत्तरी पाता
है. हे यजमानो! आप दूध मिला हुआ सोमरस देवताओं के लिए तैयार कीजिए. आप
परिष्कृत सोमरस देवताओं के लिए तैयार कीजिए. (७)
तीसरा खंड
अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्दद्रविणस्युर्विपन्यया. समिद्धः शुक्र आहुतः.. (१)
हे अग्नि! आप भलीभांति प्रदीप्त, आप प्रकाशमान, धनदाता हैं. आप हवि से पोषण
पाते हैं. आप शत्रुओं का नाश करने की कृपा कीजिए. (१)
गर्भे मातुः पितुः पिता विविद्युतानो अक्षरे. सीदन्नृतस्य योनिमा.. (२)
हे अग्नि! आप पृथ्वी माता के गर्भ में विशेष रूप से प्रकाशित हैं व अंतरिक्ष में पिता की
भूमिका में विराजमान हैं. अग्नि यज्ञ में वेदी पर प्रतिष्ठित हैं. (२)
ब्रह्म प्रजावदा भर जातवेदो विचर्षणे. अग्ने यद्द्यौद्यदिवि.. (३)
हे अग्नि! जोजो सुख स्वर्गलोक में उपलब्ध हैं, आप उन सुखों को हमें प्राप्त कराने की
कृपा कीजिए. आप सर्वद्रष्टा व विलक्षण हैं. आप हमें ब्रह्मज्ञान व संतान प्रदान कीजिए. (३)
अस्य प्रेषा हेमना पूयमानो देवो देवेभिः समपृक्त रसम्.
सुतः पवित्रं पर्येति रैभन्मितेव सद्म पशुमन्ति होता.. (४)
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यजमान के पशु आदि वाले घर में प्रवेश करने के समान कूट व छान कर तैयार किया
हुआ सोमरस द्रोणकलश में प्रवेश करता है. प्रकाशमान सोमरस स्वर्ण के समान कांतिमान है
और प्रकाशमान वह देवताओं से मिलता है. (४)
भद्रा वसा समन्या ३ वसानो महान्कविर्निर्वचनानि श २४ सन्.
आ वच्यस्व चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागृविर्देववीतौ.. (५)
हे सोम! आप जाग्रत, विलक्षण, महान, कवि, अनिर्वचनीय, प्रशंसित एवं कल्याणकारी
हैं. आप वीरता से समन्वित (युक्त) हैं. आप पवित्र बरतनों में प्रवेश कीजिए. (५)
समु प्रियो मृज्यते सानो अव्ये यशस्तरो यशमां क्षैतो अस्मे.
अभि स्वर धन्वा पूयमानो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६)
हे सोम! क्षिति (पृथ्वी) पर प्रकट हों आप यशस्वियों में यशवान, छका देने वाले और
पवित्र हैं. हे यजमानो! आप सब स्वस्ति वचनों से सदैव उच्च स्वर से प्रार्थनाएं करते हुए सोम
की स्तुति कीजिए. (६)
एतो न्विन्द्र २४ स्तवाम शुद्ध २४ शुद्धेन साम्ना.
शुद्धैरुक्यैर्वावृध्वा २४ स २४ शुद्धैराशीर्वान्ममत्तु.. (७)
हे इंद्र! हम शुद्ध सामगायन से आप की स्तुति व शुद्ध मदमस्त बनाने वाला सोमरस
आप को भेंट करते हैं. हम शुद्ध वचनों वाली स्तुतियों से आप की बढ़ोतरी की कामना करते
हैं. (७)
इन्द्र शुद्धो न आ गहि शुद्धः शुद्धाभिरूतिभिः.
शुद्धो रयिं नि धारय शुद्धो ममद्धि सोम्य.. (८)
हे इंद्र! आप शुद्ध हैं. हम शुद्ध वाणी से आप की स्तुति करते हैं. आप हमें भी शुद्ध
बनाइए. आप मेरे द्वारा भेंट किए गए इस शुद्ध सोमरस को स्वीकारिए. आप हमारे लिए शुद्ध
धन धारण करिए. (८)
इन्द्र शुद्धो हि नो रयि २४ शुद्धो रत्नानि दाशुषे.
शुद्धो वृत्राणि जिघ्नसे शुद्धो वाज २४ सिषाससि.. (९)
हे इंद्र! आप शुद्ध हैं. आप हमें शुद्ध बल दीजिए. आप शुद्ध होइए और विघ्न बाधाओं
को दूर कीजिए. हमारे दुश्मनों को मारिए. आप हमें शुद्ध धन और रत्न व ऐश्वर्य आदि
दीजिए. (९)
चौथा खंड
अग्ने स्तोमं मनामहे सिद्धमद्य दिविस्पृशः. देवस्य द्रविणस्यवः.. (१)
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हे अग्नि! आप स्वर्गलोक का स्पर्श करते हैं. हम आप से वैभव चाहते हैं. हम
कल्याणदायी स्तोत्रों से आप की स्तुति करते हैं, आप को मनाते हैं. (१)
अग्निर्जुषत नो गिरो होता यो मानुषेष्वा. स यक्षद्दैव्यं जनम्.. (२)
हे अग्नि! आप मनुष्य को दिव्यता प्रदान कीजिए. आप यज्ञ के प्रमुख और मनुष्यों के
लिए होता (पुरोहित की तरह) हैं. आप हमारी वाणी सुनने की कृपा कीजिए. (२)
त्वमग्ने सप्रथा असि जुष्टो होता वरेण्यः. त्वया यज्ञं वि तन्वते.. (३)
हे अग्नि! आप वरेण्य (सर्वश्रेष्ठ वरण करने योग्य), होता व यज्ञ में प्रमुख हैं. हम आप
के द्वारा यज्ञ का विस्तार करते हैं. (३)
अभि त्रिपृष्ठं वृषणं वयोधामङ्गोषणमवावशंत वाणी:.
वना वसानो वरुणो न सिन्धुर्वि रत्नधा दयते वार्याणि.. (४)
हे सोम! आप अन्नदाता, धनदाता और रत्नदाता हैं. आप की ओर हमारी वाणियां
दौड़ती हैं. आप स्वयं भी वाणीमय (आवाज करने वाले), वनवासी, जलमय एवं तीनों कालों
में बरसने वाले हैं. (४)
शूरग्रामः सर्ववीरः सहावान् जेता पवस्व सनिता धनानि.
तिग्मायुधः क्षिप्रधन्वा समत्स्वषाढः साह्वान्पृतनासु शत्रून्.. (५)
हे सोम! आप सब से शूरवीर, सहनशील, विजेता, धनदाता, पवित्र, शीघ्र गति वाले,
तीक्ष्ण अस्त्रशस्त्र वाले व शत्रुओं को हराने वाले हैं. आप द्रोणकलश में बरसिए. (५)
उरुगव्यूतिरभयानि कृण्वन्त्समीचीने आ पवस्वा पुरन्धी.
अपः सिषासन्नुषसः स्व ऽ ३ र्गाः सं चक्रदो महो अस्मभ्यं वाजान्.. (६)
हे सोम! आप विस्तृत पथवान, निर्भय, स्वर्ग और पृथ्वी के योजक (जोड़ने वाले,
मिलाने वाले) हैं. आप उषा और सूर्य की किरणों से पोषण पाते हैं. आप आवाज करते हुए
छन कर पवित्र होइए. आप हमारे लिए धन दीजिए. (६)
त्वमिन्द्र यशा अस्यृजीषी शवसस्पतिः.
त्वं वृत्राणि ह २४ स्यप्रतीन्येक इत्पुर्व्वनुत्तश्चर्षणीधृतिः.. (७)
हे इंद्र! आप यशस्वी, धैर्यवान, दुश्मनों को मारने वाले व शक्ति के स्वामी हैं. आप जैसे
देवता के बारे में हम ने पहले नहीं सुना. (७)
तमुत्वा नूनमसुर प्रचेतस २४ राधो भागमिवेमहे.
महीव कृत्तिः शरणा त इन्द्र प्र ते सुम्ना नो अश्नवन्.. (८)
हे इंद्र! बेटा जैसे पिता से धनभाग चाहता है, वैसे ही हम पिता तुल्य आप से धन चाहते
हैं. आप धनवान, ज्ञानवान व शरणदाता हैं. हमें श्रेष्ठ सुख प्रदान करने की कृपा कीजिए. (८)
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यजिष्ठं त्वा ववृमहे देवं देवत्रा होतारममर्त्यम्. अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्.. (९)
हे अग्नि! आप इस यज्ञ में श्रेष्ठ कार्य करने वाले हैं. आप भजनीय (भजन करने योग्य)
हैं. देवताओं में हम आप का वरण करते हैं. आप अमर व देवताओं में सर्वाधिक दिव्य देव हैं.
(९)
अपां नपात ꣫ सुभग ꣫ सुदीदितिमग्निमु श्रेष्ठशोचिषम्.
स नो मित्रस्य वरुणस्य सो अपामा सुम्नं यक्षते दिवि.. (१०)
हे अग्नि! आप सुभग (श्रेष्ठ धन वाले), सुदीप्त (अच्छी तरह प्रकाशित), श्रेष्ठ ज्वालाओं
वाले व आकाश के जल को धारते हैं. आप हमें मित्र और वरुण देवता से प्राप्त होने वाला
सुख तथा दिव्यलोक का जल प्राप्त कराइए. (१०)
पांचवां खंड
यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः. स यन्ता शश्वतीरिषः.. (१)
हे अग्नि! आप युद्ध में जिन लोगों को लगाते हैं, उन्हें अन्न व बल प्रदान करते हैं और
मृत्यु से उन की रक्षा करते हैं. (१)
न किरस्य सहन्त्य पर्येता कयस्य चित्. वाजो अस्ति श्रवाय्यः.. (२)
हे अग्नि! आप ने जिस को बल दिया है, उस बलवान वीर को कोई भी नहीं हरा सकता
है. (२)
स वाजं विश्वचर्षणिर्वद्भिर्भरस्तु तस्ता. विप्रेभिरस्तु सनिता.. (३)
हे अग्नि! ब्राह्मणों द्वारा आप की प्रशंसा की जाती है. आप संसार के द्रष्टा हैं. आप
घोड़ों के द्वारा हमें युद्ध जिताएं. आप कल्याणकारी हैं. (३)
साकमुक्षो मर्जयन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः.
हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी.. (४)
सोमरस दिव्य, पवित्र और हरित आभा वाला है. सूर्य की किरणों से शुद्ध हो कर वह
द्रोणकलश में जाता है. वह घोड़े की तरह वेगवान हो कर कलश में जाता है. दस अंगुलियां
उस को मसलमसल कर शुद्ध बनाती हैं. (४)
सं मातृभिर्न शिशुर्वावशानो वृषा दधन्वे पुरुवारो अद्भिः.
मर्यो न योषामभि निष्कृतं यन्त्सं गच्छते कलश उस्रियाभिः.. (५)
सोमरस सर्वश्रेष्ठ, देवताओं को प्रिय व बलवान है. वह दूध व जल में ऐसे एकमेक हो
जाता है, जैसे पुरुष और स्त्री तथा मां और बच्चा एकदूसरे में एकमेक हो जाते हैं. (५)
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उत प्र पिप्य ऊधर्ध्न्याया इन्दुर्थाराभिः सचते सुमेधाः.
मूर्धानं गावः पयसा चमूष्वभि श्रीणन्ति वसुभिर्न निक्तैः.. (६)
सोम बुद्धिशाली हैं. वे गायों को दूध से भरपूर करते हैं. गायों के दूध को सोमरस में
मिलाया जाता है. लोग जैसे वस्त्रों से अपने को ढकते हैं, वैसे ही गाएं सोमपात्र को (दूध देने
के लिए) ढक लेती हैं. (६)
पिबा सुतस्य रसिनो मत्स्वा न इन्द्र गोमतः.
आपिनो बोधि सधमाद्ये वृधे ३ ऽ स्मां अवन्तु ते धियः.. (७)
हे इंद्र! आप के पुत्रों ने रसीला सोमरस तैयार किया है. आप उस को पी कर मस्त
होइए. आप उस से अपनी और हमारी बढ़ोतरी कीजिए. आप हमें गोमति (सुबुद्धिवान)
बनाइए. आप अपनी बुद्धियों से हमारी बुद्धि की रक्षा कीजिए. (७)
भूयाम ते सुमतौ वाजिनो वयं मा न स्तरभिमातये.
अस्माञ्चित्राभिरवतादभीष्टिभिा नः सुम्नेषु यामय.. (८)
हे इंद्र! हम आप की सुमति से मतिवान व आप के बल से बलवान हों. आप अपने
अभीष्ट साधनों से हमारी रक्षा करें. आप हमें सुखी व समृद्ध बनाएं. हमें आप की कृपा प्राप्त
हो. (८)
त्रिरस्मै सप्त धेनवो दुदुहिरे सत्यामाशिरं परमे व्योमनि.
चत्वार्यन्या भुवनानि निर्णिजे चारुणि चक्रे यदृतैरवर्धत.. (९)
हे सोम! परम व्योम में सात से तीन गुनी अर्थात् इक्कीस गाएं श्रेष्ठ दूध देती हैं. चार
अन्य लोकों के सुंदर जल से सोम की बढ़ोतरी होती है. सोमरस कल्याणकारी चक्र से (क्रम
से) प्रवाहित होता है. (९)
स भक्षमाणो अमृतस्य चारुण उभे द्यावा काव्येना वि शश्रथे.
तेजिष्ठा अपो म २४ हना परि व्यत यदी देवस्य श्रवसा सदो विदुः.. (१०)
सोमरस अमृत भक्षण करता है. वह स्वर्ग और पृथ्वी दोनों लोकों को अमृत जैसे जल से
भर देता है. जब यजमान देवस्थान को हविमय बनाते हैं तो सोम जल को अपने महत्त्व से
तेजोमय बना देते हैं. (१०)
ते अस्य सन्तु केतवो ऽ मृत्यवो ऽ दाभ्यासो जनुषी उभे अनु.
येभिर्नृम्णा च देव्या च पुनत आदिद्राजानं मनना अगृभ्णत.. (११)
सोम मनुष्यों में अमर, अदम्य व दोपायों और चौपायों के संरक्षक हैं. वे मनुष्यों और
देवों में राजा हैं. हम उन सोम की उपासना करते हैं. (११)
छठा खंड
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अभि वायुं वीत्यर्षा गृणानो ३ ऽ भि मित्रावरुणां पूयमानः.
अभी नरं धीजवन २४ रथेष्ठामभीन्द्रं वृषणं वज्रबाहुम्.. (१)
हे सोम! आप स्तुति के बाद वायु, मित्र और वरुण को प्राप्त होने की कृपा कीजिए.
आप नेतृत्ववान, बुद्धिदाता और रथ पर सवार अश्विनीकुमारों की ओर पहुंचें. आप वज्रबाहु
इंद्र को प्राप्त होइए. (१)
अभि वस्त्रा सुवसनान्यर्षामि धेनूः सुदुघाः पूयमानः.
अभि चन्द्रा भर्त्तवे नो हिरण्याभ्यश्वान्रथिनो देव सोम.. (२)
हे सोम! आप हमें उत्तम वस्त्र, अच्छे दूध वाली गाएं, सुनहरा सोना व धन दीजिए. आप
हमें रथ के लिए उत्तम घोड़े दीजिए. (२)
अभी नो अर्ष दिव्या वसून्यभिः विश्वा पार्थिवा पूयमानः.
अभि येन द्रविणमश्वावामाभ्यार्षेयं जमदग्निवन्नः.. (३)
हे सोम! आप हमें दिव्य धन पृथ्वीलोक के सारे वैभव दीजिए. हमें श्रेष्ठ धन को श्रेष्ठ
कार्यों में लगाने की क्षमता प्राप्त हो. हमें जमदग्नि आदि ऋषियों जैसी क्षमता प्रदान करने की
कृपा कीजिए. (३)
यज्जायथा अपूर्व्य मघवन्वृत्रहत्याय.
तत्पृथिवीमप्रथयस्तदस्तभ्ना उतो दिवम्.. (४)
हे इंद्र! शत्रु नाश हेतु आप प्रकट हों. आप के कारण स्वर्गलोक को स्थिरता व
पृथ्वीलोक को दृढ़ता मिली. (४)
तत्ते यज्ञो अजायत तदर्क उत हस्कृतिः.
तद्विश्वमभिभूरसि यज्जातं यच्च जन्त्वम्.. (५)
हे इंद्र! आप के प्रकट होने पर सूर्य स्थापित हुए व उत्पन्न हुए. उस के बाद प्राणी उत्पन्न
होने शुरू हुए. आप सभी प्राणियों में व्याप्त हो गए. आप ने श्रेष्ठ यज्ञ कर्मों को उपजाया. (५)
आमासु पक्वमैरय आ सूर्य २४ रोहयो दिवि.
घर्मं न सामन्तपता सुवृक्तिभिर्जुष्टं गिर्वणसे बृहत्.. (६)
हे इंद्र! आप ने स्वर्गलोक में सूर्य को स्थापित किया. यजमान जैसे अग्नि प्रकट करते हैं,
वैसे ही हे यजमानो! आप बृहतसाम गा कर इंद्र में प्रसन्नता प्रकट कराइए. इंद्र ने शिशु की
उत्पत्ति से पहले ही पुष्टिकारी तत्त्व (दूध) उत्पन्न कर दिए. (६)
मत्स्यपायि ते महः पात्रस्येव हरिवो मत्सरो मदः.
वृषा ते वृष्ण इन्दुर्वार्जी सहस्रसातमः.. (७)
हे इंद्र! आप हरे घोड़ों वाले, विशाल पात्र की भांति, शक्तिमान, हर्षदायी व बलदायी हैं.
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सोमरस अनगिनत दानदाता है. आप उसे पीजिए और अपना आनंद बढ़ाइए. (७)
आ नस्ते गन्तु मत्सरो वृषा मदो वरेण्यः
सहावाँ इन्द्र सानसिः पृतनाषाडमर्त्यः.. (८)
हे इंद्र! सोमरस बलदायी, हर्षदायी, उत्तम, अमर, शत्रु विजेता और मददायी हैं. आप
इस सोमरस को पीने की कृपा कीजिए. (८)
त्वं हि शूरः सनिता चोदयो मनुषो रथम्.
सहावान्दस्युमव्रतमोषः पात्रं न शोचिषा.. (९)
हे इंद्र! आप शूरवीर व दानशील हैं और मनुष्यों को सन्मार्ग पर प्रेरित करते हैं. अग्नि
की ज्वाला जैसे तपाती है, वैसे ही आप शत्रुओं को तपाते हैं. (९)
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