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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

वर्ण के तुल्य हो गया ( जल गया ) । कुंज को कूल = कुंज का तट, छोर ।
हार = माला ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति नायक प्रति ) हे घनश्याम, मैंने आज भली
भाँति कपूर को घोलकर और उसमें चंदन मिलाकर आपके शरीर पर लगाया ।
पर शरीर छूते ही वह ( जलकर ) आपके शरीर के वर्ण के तुल्य हों गया ।
(अर्थात् जल गया) । शुभ फूलों से फूले हुए उस कुंज की ओर देखने पर भी
प्रतिकूल ही बात हुई ( विषाद हुआ, हर्ष नहीं ) । आप भूले से फिर रहे हैं।
बुलाने पर भी उधर कहाँ जाते हैं, आपका मन किस भ्रम के चक्कर में पड़ा
है ? मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि आपका मन आज किसी के मनोहर हार
रूपी झूले में भूलता रहा है। इसी से उसे चक्कर आ रहे हैं (आप किसी की
स्मृति कर रहे हैं) ।
अलंकार--हेतूत्प्रेक्षा ।
श्रीकृष्णजू की प्रकाश स्मृति, यथा-( सवैया )
(३१०) बासन बास भए बिष केसव डासन डासन की गति लीने ।
चंदन चाँदनी त्यों चित चाहै न चंद्रक चंद चितारस-भीने ।
पान न खात न पान करै कछु हास-बिलास बिदा करि दीने ।
ऐसी हैं गोकुल के कुल की जिहिं गोकुलनाथ के ये ढँग कीने ।२६।
शब्दार्थ-बासन = वस्त्र । बास = सुगंध । डासन = बिछौना । डास =
मच्छड़ ( काटनेवाला ) । त्यों = उसी प्रकार अथवा ओर । चाहै न = चाहता
नहीं अथवा देखता नही । चंद्रक = कपूर । चंद = चंद्रमा । चितारस-भीने =
बीभत्स, बुरे ( लगते हैं ) । पान करै न = पीती नहीं । बिदा० = छोड़ दिए ।
अथ उद्वेग-लक्षण- (दोहा)
(३१०) दुखदायक ह्वै जात जहँ सुखदायक अनयास ।
सो उद्वेग दसा दुसह, जानहु केसवदास ।३०।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न उद्वेग, यथा-(सवैया)
(३१२) चंद नहीं बिषकंद है केसव राहुँ इहीं गुन लीलि न लीनो ।
कुंभज पावन जानि अपावन धोखें पियो पचि जानि न दीनो ।
यासों सुधाधर सेष बिषाधर नाउँ घरयो बिधि है बुधिहीनो ।
सूर सों माई कहा कहियै, जिन पापी लै आप-बराबर कीनो ।३१।
शब्दार्थ-कंद=जड़, मूल । चंद० = यह चंद्रमा नहीं है विष की जड़
है । इहीं गुन = इस ( अवगुण ) के कारण । लीलि न लीनो=एकदम निगल
२६-भए- भयो । त्यों-ज्यों । चंद-बंद । जिहिं-जिनि । ये-जे । ३०-
जानहु-बरनहु । ३१-इहीं-यही, यहै । बुधि-बिधि । जिन-जेहि, यह ।
पापी-पापु जु ।

सप्तम एवं अष्टम प्रभाव: अष्टविध नायिका (स्वाधीनपतिका, खण्डिता, वासकसज्जा आदि)

१७४ रसिकप्रिया
नहीं गया (मुँह में लेकर भी उगल देता है)। कुंभज = अगस्त। पावन =
पवित्र (कुंभज का विशेषण)। अपावन = इसे अपवित्र जानकर। पचि जानि
न दीनो = पचने नहीं दिया (समुद्र पीते समय चंद्रमा को पी तो गए पर पचा
नहीं सके)। यासों = इसको। सुधाधर = अमृत धारण करनेवाला। सेष
बिषाधर = शेषनाग की तरह बिषैला। बिधि = ब्रह्मा। बुधिहीनो = बुद्धिहीन।
यासों० = ब्रह्मा सचमुच ही बुद्धिहीन है जिसने इसे तो 'सुधाधर' नाम दिया
और शेष को 'बिषाधर' ('विषाधर' तो इसे कहना चाहिए था)। सूर =
सूर्य। सूर = सूर्य को क्या कहा जाय जिसने इस पापी को अपने बराबर
कर रखा है।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश उद्वेग, यथा-(सवैया)
(३१३) केसव काल्हि बिलोकि भजी वह, आजु बिलोकें बिना सु मरै जू।
बासर बीस बिसे बिष मीडियै, राति जुन्हाई की ज्योति जरै जू।
पालिक तें भुवि भूमि तें पालिक आलि करोरि कलालि करै जू।
भूषन देहु कछू ब्रजभूषन दूषन देह को हेरि हरै जू।३२।
शब्दार्थ-भजी = भाग गई। काल्हि० = आपको देखकर वह भाग गई
(पर इतने में ही आपकी छटा उसके मन में ऐसी बस गई कि यदि वह अब
आपको न देखे तो मर जाएगी)। बासर = दिन। बीस बिसे = पूर्ण प्रकार
से। बिष मीडियै = विष में मसलती है। बासर = दिन में तो वह सब प्रकार
से विष में डूबी रहती है। जुन्हाई - चाँदनी। ज्योति = प्रकाश। राति० =
रात में चाँदनी के प्रकाश से जलती रहती है। पालिक = पल्यंक, पलंग,
शय्या। भुवि = पृथ्वी पर। आलि = मेरी सखी, नायिका। कलालि = कलाछ,
बेचैनी से इधर उधर होना। पालिक० = वह पलंग से पृथ्वी पर और फिर
पृथ्वी से पलंग पर हो जाती है, इस प्रकार पलंग से पृथ्वी, पृथ्वी से पलंग पर
आने जाने में मेरी सखी अनेक कलाछें करती रहती है। भूषन देहु = (अथवा
कोई) आभूषण दीजिए। ब्रजभूषन = श्रीकृष्ण। दूषन = दोषों, दुःखों, कष्टों। देह
को = अपने शरीर का। हेरि = (जिसे) देखकर। हरै = दूर करे। भूषन० =
आप कोई अपना गहना ही दे दीजिए जिसे देखकर वह अपनी तपन कुछ
शांत कर सके।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न उद्वेग, यथा- (सवैया)
(३१४) मेघनि ज्यों हँसि हंस न हेरत हंसनि ज्यों घनरूप न पीवैं।
कंजनि ज्यों चित चंद न चाहत चंदु ज्यों कंजनि क्योंहूँ न छीवैं।
३२-भजी-भगी। सु-सो। मीडियै-जोरियै। पालिक-पालकी। कलालि-
कलाप। देहु-देहि।

अष्टम प्रभाव १७५
ताल तें बागिन बाग तें तालनि ताल तमाल की जात न सीवैं ।
कैसी हैं केसव वे जुवतीं सुनि ऐसी दसा पिय की पल जीवैं ।३३।
शब्दार्थ—मेघनि ज्यों० = जैसे बादल हंसों को नहीं देखता ( वर्षा आने
पर हंस मानसरोवर चले जाते हैं ) वैसे ही वे हँसकर ( प्रसन्नतापूर्वक ) हंसों
को नहीं देखते । हंसनि ज्यों० = जैसे हंस बादल का रूप (रस) पान नहीं करते
वैसे ही वे भी बादलों को नहीं देखते । कंजनि ज्यों० = जैसे कमल मन से
चंद्रमा को नहीं चाहते वैसे ही वे भी चंद्रमा को नहीं देखते । चंद ज्यों० =
जैसे चंद्रमा किसी प्रकार'कमलों की नहीं छूता (कमल चंद्रोदय होने पर बंद हो
जाते हैं) वैसे ही वे भी कमलों को नहीं छूते । न छीवैं = नहीं छूते । ताल
तें० = न ताल से बाग में आते हैं और न बाग से ताल की ओर ( जैसे पहले
जाया आया करते थे, वे अब सुखद नहीं लगते ) । ताल तमाल की० = जहाँ
ताल और तमाल के वृक्ष हैं वहाँ ( संकेतस्थल समझकर मारे क्लेश के )
जाते ही नहीं । सीवैं = सीमा में, निकट । पल = क्षण भर भी ! जीवैं =
जीती हैं ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश उद्वेग, यथा—( सवैया )
(३१५) सोचि सखी भरि लेत बिलोचन, काँपत देखत फूले तमालहि ।
भूले से डोलत बोलत नाहिंन बाग गए किधौं तेरे ही तालहि ।
देख्यो जौ चाहति देखि न आवति ऐसे में हौं न दिखैहौं री लालहि ।
आजु कहा दिखसाध लगी जब देख्यो सुहाइ कछू न गुपालहि ।३४।
शब्दार्थ—सोचि = स्मरण करके । बिलोचन = दोनो नेत्र । काँपत०=फूले
तमालों को देखकर वे काँपने लगते हैं । भूले० = भूले से फिरते रहते हैं, चुप-
चाप । बाग गए० = ( कभी ) तेरे बाग या (कभी) ताल पर जाया करते हैं ।
देख्यो जु० = यदि उन्हें देखना ही चाहती है तो देख क्यों नहीं आती ? मैं तो
ऐसी दशा में लाल को दिखलाने स्वयम् न जाऊँगी । दिखसाध = देखने की
उत्कंठा । जब देख्यो = जब गोपाल को कोई वस्तु देखने पर अच्छी नहीं लग
रही है तब तुझे देखने की लालसा जगी है ।
अथ प्रलाप-लक्षण—( दोहा )
(३१६) भँवंत रहै मन भौर ज्यों, है तन-मन-परिताप ।
बचन कहै प्रिय पक्ष सों, तासों कहत प्रलाप ।३५।
शब्दार्थ—परिताप = ( परि + ताप ) अत्यंत ताप । वचन कहै=प्रिय
पक्ष की ही बातें कहे, प्रियतम की ही बातें करे ।
३४—दो लोचन-दो लोचन । तेरे हों-तेरई । जौ-जु । दिखैहौं-दिखाऊँ ।
३५—भँवत-भ्रमत । परिताप-परिताप ।

१७६ रसिकप्रिया
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न प्रलाप, यथा—( सवैया )
(३१७) खेल न हाँसी न खोरि अठाउ न हेत न बैर हियो कंपै रोसों ।
लेनो न देनो हलाव भलाव न नातो न गोतो कहाँ कहौं तोसों ।
आनि दियो दुख में दुख केसव कैसे हँसौ री कहा कहि कोसों ।
नैन भरिभरि ग्वालि कहै अरी देख्यो तैं कान्ह कहा कह्यो मोसों ।३६।
शब्दार्थ—खोरि = दोष, दुष्टपना । अठाउ = शरारत । हेत = प्रेम ।
लेनो० = लेना देना कुछ नहीं । हलाव० = हला भला भी नहीं है, दुआ सलाम
या भेंट असीस वाली बात भी नहीं । नातो० = नाता गोता भी नहीं, नाता
रिश्ता भी नहीं है । कोसों = बुरा भला कहूँ कोसूं । खेलन० = न तो उनसे
खेल खेलने का ही वास्ता है, न उनसे हँसी-मजाक ही है, न कोई दुष्टपना या
शरारत ही जान पड़ती है न उनसे कोई मेल-मुहब्बत है और न शत्रुता ही है ।
पर उन्होंने जो कुछ कहा है उससे मेरा अंतःकरण रोष से कांप रहा है ।
भरिभरि = आँसू से भली भाँति भरकर । देख्यो तैं० = देखा तूने मुझसे कृष्ण
ने क्या कहा ? लेनो० = न उनसे अपना कुछ लेना देना, न दुआ सलामत, न
नाता-गोता फिर भी उन्होंने मुझसे ऐसी बात कही, तुझसे क्या कहूँ ।
आनि० = मैं अपने ही दुख में दुखी थी, उन्होंने मुझे इस दुख में दुख दिया ।
न हँसते ही बनता है न कोसते ही ( हँसूँ तो किस बात पर और कोसूँ तो
किस बात पर और कोसूँ तो क्या दोष लगाकर कोसूँ ) ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश प्रलाप, यथा— ( सवैया )
(३१८) आलिनि माँझ मिली हुती खेलति जानै को कान्ह धौं आए कहाँ तैं ।
डीठिहि डीठि पर्यो न कछू सठ ढीठ गही हठि पीठि की घातैं ।
गई गड़ि लाजनहीं हिय हौं तौ उठी जरि केसव काँपति यातैं ।
इती रिस मैं कबहुँ न बची पै रही पचि हौं अँखियान के नातैं ।३७।
शब्दार्थ—जानै को = न जानै । डीठिहि० = आँखों से तो कुछ दिखलाई नहीं
पड़ा ( सामने से तो वे आए नहीं ) । सठ = दुष्ट ने । ढीठ = धृष्ट, नायक ।
हठि = बरबस । पीठ की घातैं = पीठ की घात से, पीछे की ओर से । हौं
गड़ि० = मैं लाज के मारे गड़ गई । उठी जरि० = मैं उस ढिठाई के कारण
जल उठीं, इसी से काँप रही हूँ । इती रिस० = इतना रोष तो मैंने कभीं
सहन नहीं किया । केवल आँखों के नाते इतनी परेशानी सह रही हूँ ।
३६—हियो-हिये । कंपै-करि । रोसों-हाँसों । लेनो०-लेन न देन ।
हलाव०-हलाउ भला नहिं, हलाउ भलाउत । दुख में-सुख भी । हँसों-सहौं ।
नैन०-नैननि नीर भरे कहै ग्वालिन । अरी-अलि । ३७—आलिनि-आलि के ।
डीठिहि-डीठहि, सु डीठहि । सठ-सुठि । गई-हौं । हिय हौं तो-जु गई पै ।
केसव-को सब । काँपति-कांपनी । यातैं-वातैं । बची-सही । पचिहौं-बचिहौं ।

१२ अष्टम प्रभाव १७७
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न प्रलाप, यथा ( सवैया )
(३१६) नील निचोल दुराइ कपोल बिलोकति ही करि ओलिक तोही ।
जानि परी हँसि बोलति भीतर भाजि गई अवलोकत मोही ।
बूझिबे की जक लागी है कान्हहि केसव कै रुचि रूप-लिलोही ।
गोरस की सौं बबाकी सौं तोहि कि बार लगी कहि मेरी सौं को ही ३८
शब्दार्थ-नील = नीला । निचोल = वस्त्र में । दुराइ = छिपाकर । ही =
थी । ओलिक = ओट, परदा । जानि परी = मुझे देखकर भाग गई पर ऐसा
जान पड़ा कि भीतर हँसकर कुछ बोल रही थी । बूझिबे की = उसके बारे में
जानने की । जक = धुन । रुचि = इच्छा । रूप-लिलोही = सौंदर्य को लीलने-
वाली, रूपलोभी । कै रुचि० = सौंदर्यदर्शी इच्छा के कारण । गोरस = दूध ।
सौं = शपथ । बार = द्वार । बार० = बतला दे, तुझे मेरी शपथ द्वार से लगी
वह कौन खड़ी थी ? अथवा किवार = किवाड़ ।
वचन- सखी की उक्ति नायिका या सखी से (कृष्ण की बातों को
दोहरा रही है) ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश प्रलाप, यथा-(कबित्त )
(३२०) मोहन मरीचिका सो हास, घनसार को सो
बास, मुख रूप की सी रेखा अवदात हैं।
केसोदास बेनी तौ त्रिबेनी सी बनाई गुही,
जामें मेरे मनोरथ मुनि से अन्हात हैं।
नेह उरझे से नैन देखिबे कौं बिरुझे से,
बिझुकी सी भौंहैं उझके से उरजात हैं।
लोचन कमल चारु तिन पर पाइ देति,
तेरे घर आई आजु कहि कैसी बात हैं। ३६।
शब्दार्थ - मोहन = मोहनेवाली । मरीचिका = किरण । घनसार =
कपूर । बास = सुगंध । रूप = सौन्दर्य । अवदात = उज्ज्वल, निर्मल, स्वच्छ ।
बेनी = (सं० वेणी ) चोटी । नेह उरझे = प्रेम में उलझे हुए । बिरुझे = हठ
करते हुए । विभुकी = किंचित् तनी हुई । उझके० = झाँकते हुए से । उर-
जात = कुच, स्तन ।
भावार्थ - (नायक की उक्ति सखी से) जिस (नायिका) की हँसी
मोहिनी किरण सी (श्वेत) है, सुगंध कपूर सी है और मुख सौन्दर्य की
निर्मल रेखा की भाँति हैं, जिसने अपनी वेणी उज्ज्वल मोती और लाल तागे
३८-करि-किये, करे । ओलिक-पोलिक । कान्हहि-लालहि । लिलोही-
मिलोहीं । ३६-कोसो-केसो । बात-बात की सो-कंसी । लोचन ०-देखी सी
बनाई बिधि कौन की है जाई यह तेरे घर जाई आजु कहि कैसी बात है ।

१६८ रसिकप्रिया
से गूंथकर त्रिवेणी (केश = यमुना, मोती = गंगा तथा लाल तागा = सरस्वती)
सी बनाई है जिसमें मेरे मनोरथ मुनियों की भाँति स्नान करते हैं, जिसके
नेत्र प्रेम में उलझे हुए और ( किसी प्रिय को ) देखने के लिए हठ करते
हुए जान पड़ते हैं, जिसकी भौहें किंचित् तनी हुई हैं और कुछ झाँकते हुए से
( उठे हुए ) हैं, नेत्र-कमलों पर पैर रखती हुई ( लक्ष्मी सी ) यह तेरे यहाँ
जो आई है कौन है और उसके आने का क्या कारण है।
अथ उन्माद-लक्षण—( दोहा )
(३२१) तरकि उठै पुनि उठि चलै, चितै रहै मुख देखि।
सो उन्माद जनावहीं, रोवै हँसै बिसेषि ॥४०॥
शब्दार्थ—तरकि = सोच-विचार करके। चितै० = मुख देखकर देखता
ही रह जाए। जनावहीं — बताते हैं, कहते हैं। बिसेषि = विशेष रूप से।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न उन्माद, यथा—( सवैया )
(३२२) केसव सुधि बुधि हरित सु तुम बिन बिथा अगाध राधिकहि बाढ़ी ।
छूटी लट लटकति कटितट लौं चितवति नीठि नीठि करि ठाढ़ी ।
तरकति तकि तोरति तन तलफति अति अपार उपचारनि डाढ़ी ।
सकसकाति लै साँस अचेत सुचेतहु प्रेम-प्रेत गति गाढ़ी ॥४१॥
शब्दार्थ—सुधि बुधि = होश हवास। हरित = हर ली गई। बिथा =
( सं० व्यथा ) कष्ट, पीड़ा । अगाध = गहरी अत्यधिक । सुधि बुधि० =
आपके वियोग में राधिका की ऐसी गहरी व्यथा बढ़ी कि ( कुछ कहा नहीं जा
सकता ) उसकी सारी सुधबुध खो गई है। नीठि = कठिनता से। ठाढ़ी =
खड़ी। छूटी० = उसकी छूटी हुई केशों की लट कमर तक लटक रही है।
बड़ी कठिनाई से तो वह खड़ी रह पाती है और कठिनाई से ही वह देखती
भी रह सकती है। तरकति = सोच-विचार करती है। तोरति तन = शरीर
तोड़ रही है, शरीर ऐंठ रही है। उपचार = औषध का प्रयोग। डाढ़ी =
जली हुई। तरकति० = किसी की ओर देखकर न जाने वह किस सोच-
विचार में पड़ जाती है। वह अपना शरीर तोड़ने लगती है। वह विरहताप
के लिए किए गए औषधोपचार से बहुत अधिक जली हुई सी प्रतीत होती
है। सकसकाति = (कभी) साँस लेकर वह कुछ कुछ होश में आने का आभास
देती है। अचेत० = ( कभी ) भली भाँति चेत ( होश ) में रहते हुए भी वह
अचेत सी रहती है। प्रेत० = मानो प्रेम रूपी प्रेत ने उसे भली भाँति पकड़
लिया है।
४०—मुख-मुँह । जनावहीं—जु गावहीं, गनावहीं, मनावहीं । ४१—
सुधि०—सुबुद्धि सिद्ध हरि तुम । हरित०—रहे तुम्हें बिन । व्यथा-वृथा ।
राधिकहि—राधिहि । लौं-लहूँ । चितवनि—बिनवति । नीठि करि-दीठि करि ।
ठाढ़ी-गाढ़ी । तरकति०—तरकि तरकि । अचेत०—अचेतह मानह ।

अष्टम प्रभाव १७६
सूचना-यह छंद मात्रावृत्त है। मात्राएँ ३२ हैं। ऐसे मात्रावृत्त का
नाम भी 'सवैया ही होता है। १६, १६ के विश्राम से अर्थात् दो चौपाई के
चरणों के योग से यह छंद बनता है। इसे सवाई या समान सवैया कहते हैं।
यह एक प्रकार का ताटंक है।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश उन्माद, यथा- (सवैया )
(३२३) केसव चौंकति सी चितवै छतिया धरकै तरकै तकि छाँहीं ।
बूझियै और कहै मुख और सु और की और भई पल माँहीं ।
डीठि लगी किधौं बाय लगी मन भूलि पर्यो कै कर्यो कछु काँहीं।
घूँघट की घट की पट की हरि आजु कछू सुधि राधिकै नाँहीं ।४२।
शब्दार्थ-तरकै = सोच-विचार करती है, चकपकाती है। ताकि=देख-
कर। छाँहीं = छाया । चौंकति० = चौंकती हुई तो वह देखती है। उसकी
छाती धड़कती है और अपनी छाया तक को देखकर सोच-विचार में पड़
जाती है। बूझिये और = पूछा जाता है और कुछ । बूझियै० = उससे पूछा
कुछ जाता है और उत्तर में उसके मुख से कुछ और ही निकल पड़ता है।
वियोग के कारण पल भर में वह दूसरी की दूसरी ही हो गई। डीठि =
नजर। बाय = वायु, बात । मन० = मन में ही कोई गड़बड़ी हो गई है ।
काँहीं = किसी ने । डीठि० = उसे किसी की नजर लग गई अथवा उसे बाई ने
घर दबाया अथवा उसके अंतःकरण में ही विभ्रम हो गया है अथवा किसी ने
उस पर जादू-टोना कर दिया है, कुछ समझ में ही नहीं आता कि बात क्या
है । घट = घड़ा । पट = वस्त्र ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न उन्माद, यथा- (सवैया)
(३२४) गूढ़ अगूढ़ प्रकासत बातनि लोक अलोक की बात सरी सी ।
रोवत हैं कबहूँ हँसि गावत नाचत लाज की छाँडि छरी सी ।
काहू को सोच सँकोच न केसव देखत आवति देह मरी सी ।
बाम की बाय किं काम की बाय कि है हरि की मति काहू हरी सी ४३
शब्दार्थ-गूढ़ = अस्पष्ट । अगूढ = स्पष्ट । प्रकासत = कहते हैं । लोक
की बात=इस लोक में जैसी बातें होती हैं, साधारण बातें । अलोक की बातें
= जो बातें सामान्यतया लोक में नहीं होतीं । गूढ़० = कभी तो उनके मुख
से गूढ़ बातें निकलती हैं और कभी अगूढ़ । कभी वे संसार की सर्वसाधारण
बातें करते हैं कभी उनके मुख से अलौकिक बातें निकल पड़ती हैं । सरी सी=
४२-छतिया-छिति पैं । ताकि-छिति । मुख-कछु । और सु-औरई ।
और की-औरई । भई-कहै । पल-छन । हरि०-कछु माजु सबो सुधि ।
४३-अलोक की-अलौकिक । छांडि-छांह ।

१८० रसिकप्रिया
निकली जान पड़ी । छर = लांछन, चिह्न । 'छर' का स्त्रीलिंग छुरी। लाज० =
लज्जा का चिह्न भी उनमें नहीं रह गया है । देखत० = मैं देखे चली आ रही
हूँ । देह० = शरीर चेतनाशून्य सा हो गया है । बाम = स्त्री । बाय = वायु,
बात । बाम की बाय = श्रीकृष्ण को किसी स्त्री की हवा लग गई है अथवा
काम की बातव्याधि हो गई है अथवा किसी ने,उनकी बुद्धि ही हरण कर ली है।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश उन्माद, यथा--(कवित्त)
(३२५) सजल चकित चित चितवत चहूँ दिसि,
चाहि चाहि रहैं मुख चपल चलत धाइ ।
सोचत से मन मन कंपत तपत तन,
केसौदास रोवत हँसत उठै गाइ गाइ ।
चलहि दिखाऊँ तोहि देखत हीं भयो मोहिं,
भयो सो कहन आई तोसों अलि अकुलाइ ।
जैसें कछु आकबाक बकत हैं आजु हरि,
तैसैं जिन नाउँ मुख काहू को निकसि जाइ ।४४।
शब्दार्थ-( सखी की उक्ति राधिका या सखी से ) । सजल = अश्रुपूर्ण
नेत्रों से । चकित० = चकपकाए हुए चित्त से । चितवत० = चारो दिशाओं को
देखते हैं, चारो ओर (चकित हो) देखते हैं। चाहि चाहि रहैं = मुख को देख
देखकर रह जाते हैं, जो उनके पास जाता है उसका मुख ध्यान देकर देखने
लगते हैं तो देखते ही रह जाते हैं। चपल चलत० = फिर दौड़कर बड़ी तेजी
से चलने लगते हैं। सोचन० = मन में कुछ सोचते रहते हैं। मन कंपत = मन
ही मन, भीतर ही भीतर कांपते से रहते हैं। तपत तन = शरीर तपता रहता
है। चलहि = (हे सखी) चलो । दिखाऊँ० = उन्हें देखकर मेरी जो दशा हुई
तुझे दिखला दूँ (समझा दूँ, तेरी भी वही स्थिति हो जाएगी)। उनकी जैसी
कुछ दशा है उससे ही मैं व्याकुल होकर तुझसे कहने आई हूँ। आकवाक =
अंडबंड, बेसिर पैर की बातें। जैसें कछु० = आज श्रीकृष्ण जैसी बेठिकाने की
बातें कर रहे हैं वैसे में ( तो मुझे भय हो रहा है कि ) कहीं किसी का
( तेरा ) नाम न निकल जाए (प्रेम की बातें खुल न जायं ) ।
अथ व्याधि-लक्षण-( दोहा )
(३२६) अंग-बरन बिबरन जहाँ, अति ऊँचे उस्वास ।
नैननीर परिताप बहु, व्याधि सु केसवदास ।४५।
शब्दार्थ-अंग-बरन = शरीर का रंग । बिबरन = अपने सहज रंग से
भिन्न, कष्टसूचक पीला आदि रंग । उस्वास = उच्छ्वास । नैननीर = आँसू ।
४४-तन-गात । केसौदास-केसौराय । तैसे०-ऐसे माँझ नाउँ जनि ।
४५-ऊँचे-ऊँची ।

अष्टम प्रभाव १८१
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न व्याधि, यथा-( सवैया )
(३२७) बेनु तन्यो उनि, बैन तें बोलौ न बोल, बिलोकत बुद्धि भगी है।
वे न सुनैं समुझैँ तूँ न बातहि प्रेत लग्यो किधौं प्रीति जगी है।
केसव वे तुहि तोहि रटैं रट तोहि इतै उन्हीं की लगी है।
वे भखैं पान न, पान्यौ न तूँ सु तै कान्ह ठगे कि तूँ कान्ह ठगी है।४६।
शब्दार्थ- बेनु = बाँसुरी । बैन = ( वदन, बयण, बैन ) मुख । बोल =
बात । पान्यौ = पानी भी ।
भावार्थ- ( सखी की उक्ति नायिका से ) उधर उन्होंने (श्रीकृष्ण ने)
तो बंशी बजाना छोड़ दिया है, इधर तेरे मुख से बोल नहीं निकलते । ऐसी
स्थिति को देखने ( और उस पर विचार करने से ) तो बुद्धि भाग खड़ी होती
है । कुछ समझ में ही नहीं आता कि आखिर हो क्या गया है, न जाने ये
कैसी चेष्टाएँ करते हैं ( यह तो स्वयम् बोलने की, मुख का व्यापार स्वयम्
करने की बात हुई ) । उधर वे सुनने पर भी किसी की बातें नहीं समझते
और तू भी उसी प्रकार किसी की बातें सुनती समझती नहीं । यह ( तुम
दोनो को ) प्रेत लगा है या प्रीति जगी है ? ( ऐसी चेष्टाएँ तो प्रेत लगने
पर ही हुआ करती हैं) । उधर वे तुझे केवल तुझे ही रट रहे हैं इधर तू
उन्हें ही रट रही है, उन्होंने पान खाना छोड़ दिया तूने पानी पीना छोड़
दिया, पता नहीं केवल उन्हें श्रीकृष्ण को तूने ठगा है या उन्होंने तुझे ठगा है।
श्रीकृष्णजू की प्रकाश व्याधि, यथा-( सवैया )
(३२८) ह्वाँ उनके तनताप तें तापियै, ह्याँ इनके उपचार जड़ैयै ।
ह्वाँ उनके उड़ि जैयै उसासनि, ह्याँ इनके अँसुवानि अन्हैयै ।
केसव वै नँदलाल न ये बृषभान-लली पै निदान न पैयै ।
एकहिं बेर दुहूँनि कहा भयो भाई री तूँ चलि देखन जैयै ।४७।
शब्दार्थ--ताप = जलन । तापिये = तपिए, जलिए। ह्वाँ = वहाँ। ह्याँ =
यहाँ । उपचार जड़ैयै = ठंडे ठंडे उपचारों से जाड़ा खाना पड़ता है । निदान =
भेद, कारण ।
भावार्थ - ( सखी का वचन सखी से ) वहाँ तो उन (नायक) के शरीर
की जलन से जलना पड़ता है और यहाँ आने पर इनके ताप को दूर करनेवाले
शीतल उपचारों की शीतलता से जाड़ा खाना पड़ता है। वहाँ उनकी ( बड़ी
बड़ी और तीव्र ) उसासों से उड़ जाना पड़ता है और यहाँ इनके आँसुओं
( की धारा में ) स्नान करना पड़ता है ( बह जाना पड़ता है) । वे तो नंद
४६-बेनु-बैन । बैन-बीन । बोलो बोलै, बोल्यो । बोल-बैन । वे न-
बैन । तुहि०-तोहि तोही । तैं-तौ । ४७-ह्वाँ- x । ताप तें-तापनि । इनके ०
-इनके तन तो । माई-आलि । री तूं-यहै । देखन ०-देखि डरैयै ।

१८४ रसिकप्रिया
जी के पुत्र हैं और ये वृषभानुजी की पुत्री हैं। इन (बड़े बाप के लाडिली-
लाड़िलों) का भेद कुछ खुलता नहीं कि आखिर बात क्या है। एक ही साथ
दोनो को क्या हो गया, जरा आकर तू भी देख क्यों नहीं जाती।
सूचना-व्याधि के इन दो उदाहरणों में नायक और नायिका दोनो की
दशा का साथ ही वर्णन कर दिया गया है, इसी से प्रकाश और प्रच्छन्न के
पृथक् पृथक् दो दो उदाहरण केशव ने नहीं रखे।
अथ जड़ता-लक्षण- (दोहा)
(३२६) भूलि जाइ सुधि बुधि जहाँ, सुख दुख होइ समान।
तासों जड़ता कहत हैं, केसवदास सुजान। ४८।
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न जड़ता, यथा- (सवैया)
(३३०) खरे उपचार खरी सियरी सियरे तें खरोई खरो तन छीजै।
ऐसे में और करें तें कछू उपजै तौ सकेलि कहा हम लीजै।
देखत हौ यह कामकली कुँभिलानियै जाति कहा अब कीजै।
कौन पै जाऊँ, कहा करौ केसव कैसें जियै बह क्यों हम जीजै। ४६।
शब्दार्थ-खरे = अच्छे, अत्यंत लाभदायक। खरी = अत्यंत। सियरी =
शीतलता। सियरे तें = शीतल से। खरोई खरी = अत्यधिक, और अधिक।
छीजै = क्षीण होता है। खरे उपचार० = अच्छे उपचारों से शरीर में अत्यंत
शीतलता होती है, पर यहाँ तो शीतोपचार से और भी शरीर क्षीण होता चला
जा रहा है। सकेलि कहा हम लीजै० = हम क्या भँजा लेंगी, क्या पाएँगी,
हमें क्या मिलेगा ? सकेलना = एकत्र करना, पाना। ऐसे में = ऐसी दशा में
कोई और उपचार करने से कहीं कुछ का कुछ न हो जाय तो हम लोग कौन
सा भाँड़ा भर लेंगी ? कामकली = नायिका। जीजै = जीवित रहें, जियें।
(३३१) श्रीराधिकाजू की प्रकाश जड़ता, यथा- (सवैया)
आँखियानि मिली सखियानि मिली पतियाँ बतियानि मिली तजि मौनै।
ध्यान-बिधान मिली मनहीं मन ज्यों मिलै राँक मनौ मन सौनै।
केसव कैसहूँ बेगि चलौ नतु हैहै वहै हरि जो कछु हौनै।
पूरन प्रेम-समाधि लगे मिलि जैहै तुम्हें मिलिहौ तब कौनै। ५०।
शब्दार्थ-पतियाँ = पत्रिका। पतियां बतियानि = पत्रिका की बातों के
द्वारा। ध्यान-विधान = ध्यान करने के ढंग से।
भावार्थ-(सखी-वचन नायक से) वह स्वयम् अपनी आँखों से तुमसे मिली
(आँखों से देखना जब संभव नहीं रहा तो) सखियों द्वारा मिली (अर्थात् सखियों
४८-केसवदास-केसवराय। ४६-करें-किये। हौ-ही। कामकली-
कामलता। ५०-पतियां०-पतियानि मिली बतियाँ। रांक-एक। मन-मिलि,
मय। चलो-मिलो। नतु-तन। लगे-मिलें।

अष्टम प्रभाव १८३
के माध्यम से बात करती रही, स्वयम् मौन हो रही), फिर उसने सखियों के
माध्यम से मिलने की अपेक्षा पत्रिका की बातों के द्वारा प्रत्यक्ष तुमसे बात करना
ठीक समझकर उस माध्यम से भी वह मिली । पत्रिका का माध्यम संतोषप्रद
न होने से वह ध्यान-विधान से मन ही मन तुमसे मिली, जैसे दरिद्र मन ही
मन सोने की कल्पना करके उससे मिलता है । इसलिए अब आप उससे शीघ्र
ही मिलिए । नहीं तो जो कुछ होना होगा वही होकर रहेगा । यदि कहीं
उसकी पूर्ण प्रेमसमाधि लग गई और ( उसने योगियों की भाँति ) तुममें
अपने को मिला दिया, तब तुम जाकर मिलोगे भी तो किससे मिलोगे ?
उसमें तुममें अभेद हो जायगा, भेद रहेगा ही नहीं ।
श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न जड़ता, यथा—( सवैया )
(३३२) पल ही पल सीतल होत सरोर .बिचारे सबै उपचार निदानैं ।
जौ करियै तन मंडन खंडन चित्त कछू सुख दुख न आनैं ।
केसव कान्ह सुने समुझें नहिं, बूझिय कौनहिं को पहिचानैं ।
जोग लियो कै बियोग है काहू को लोग कहा इन रोगनि जानैं ।५१।
शब्दार्थ—पल ही पल = प्रतिक्षण । बिचारे = सोचे । उपचार = रोगशमन
के उपाय, औषध । निदानैं = रोग का आदिकारण । मंडन = अलंकृत, सज्जित ।
खंडन = काट डालना, कष्ट देना । न आनैं = नहीं लाते । चित्त कछू० = उनके
चित्त में शरीर को आराम देने या कष्ट पहुँचाने से सुख या दुख नहीं होता ।
बूझियै० = (श्रीकृष्ण की तो यह दशा है कि वे कुछ सुनते समझते नहीं) अब
किससे पूछूं, कौन रोग की ठीक ठीक पहचान कर सकता है ? जोग लियो० =
यह योग किया है या किसी का वियोग है, आखिर लोग इन रोगों को समझते
ही क्या हैं ? ( यह योगजन्य है या प्रेमजन्य अथवा अन्य किसी हेतु से है ) ।
श्रीकृष्णजू की प्रकाश जड़ता, यथा—( सवैया )
(३३३) कान्ह के आसन बासनहीन हुतासन-मीत को प्रासन कीजै ।
केसव इंद्रिय सोधि सबै मन साधि समाधिनि के रस भीजै ।
जौ लौं भए हरि सिद्ध प्रसिद्ध न तौ लौं बिलोकि अलोक न कीजै ।
देवी करैं तप तो लगि वै वरदान न जौ जिय-दान तौ दीजै ।५२।
शब्दार्थ—बासन = वस्त्रों से । हुतासन-मीत = हुताशन का मित्र, वायु ।
प्रासन = भोजन, भक्षण, पान । साधि = स्थिर करके । रस भीजै = आनंद
प्राप्त कर रहे हैं । अलोक = बदनामी, अपयश ।
भावार्थ—( सखी-वचन नायिका प्रति ) श्रीकृष्ण की अवस्था यह है कि
वे आसन मारे हुए हैं, वस्त्र उन्होंने उतार फेंके हैं, हवा पीकर रहते हैं, सभी
५१—बिचारे-बिचारि । कान्ह-स्यामु । पहिचानैं यह मानैं । ५२—
सोधि०-निग्रह जानिकं सोधि ।

१८४ रसिकप्रिया
इंद्रियों को सोष लिया है (तत्तत् विषयों से उन्हें हटा लिया है—आँखों को
देखने से, कानों को सुनने से आदि) । मन को भी साध लिया है और समाधि
का आनंद ले रहे हैं। जब तक वे प्रख्यात सिद्ध न हो जायँ तब तक देखो,
उनका अपयश मत करो । हे देवी, वे तपस्या तुम्हारे ही लिए कर रहे हैं ।
यदि वरदान नहीं देती हो तो कम से कम जीवन-दान तो दो (उनकी दशा
तो यह है कि प्राण निकलने निकलने हो रहे हैं ) ।
अथ मरण-लक्षण—( दोहा )
(३३४) बनै न क्योंहूँ मिलन जहँ, छलबल केसवदास ।
पूरन-प्रेम-प्रताप तें, मरन होत अनयास ।५३।
शब्दार्थ—प्रताप तें = प्रभाव से ।
भावार्थ—वियोग से जब किसी प्रकार छल बल से भी संयोग नहीं हो
पाता तो पूर्ण प्रेम होने के कारण अनायास मरण हो जाता है ।
(३३५) मरन सु केसवदास पै, बरन्यो जाइ न मित्र ।
अजर अमर जस कहि कहौं, कैसे प्रेत-चरित्र ।५४।
शब्दार्थ—पै = से । अजर अमर० = अजर अमर यश का वर्णन करके
अब प्रेतचरित्र ( मरण का ) वर्णन क्या करूँ ?
(३३६) रति उपजै रमनीन के, पहिलें केसवदास ।
तिनकी इंगित देखि सखि, करत·सुप्रेम-प्रकास ।५५।
शब्दार्थ—रति = प्रेम । रमनी = रमणी, नायिका । तिनकी = उनकी ।
इंगित = चेष्टा ।
(३३७) अति आदर अति लोभ तें, अति संगति तें मित्त ।
साधुनिहूँ के होत हैं, केसव चंचल चित्त ।५६।
सूचना—'रसग्राहकचंद्रिका' टीका में इसके अनंतर यह दोहा है—
आदरादि तें साधुहू क्यों चंचल चित होत ।
त्यों परि सखिसँग दंपतिहिं चंचलता उद्दोत ।
(३३८) सुभग दसा दस मैं कही, उपजै पूरन राग ।
जिहि बिधि उपजै मान मन, बरनौँ सुनहु सभाग ।५७।
शब्दार्थ—उपजै०—जिनसे पूर्ण प्रेम प्रकट होता है ।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां विप्रलंभशृंगार-
पूर्वानुरागवर्णनं नामाष्टमः प्रभावः ।८।
५३—होत-होहि । ५४- जस०-तासों कहौं। कैं से०-केसव प्रेम चरित्र ।
५५—की-पै । देखि-जान । सखि-पिय । ५७-मन अब । सभाग-समाय ।

नवम प्रभाव
अथ मान-लक्षण—( दोहा )
(३३६) पूरन-प्रेम-प्रताप तें, उपजि परत अभिमान ।
ताकी छबि के छोभ तें, केसव कहियत मान । १।
शब्दार्थ—प्रताप तें = प्रभाव से, कारण। छवि के छोभ तें = उसकी
छटा के उद्रेक से ।
(३४०) प्रकटहि पिय प्रति मानिनी, गुरु लघु मध्यम मान ।
प्रकटहिं पीय प्रियानि प्रति, केसवदास सुजान ।२।
शब्दार्थ—पिय, पीय = प्रिय, नायक । प्रियानि प्रति = प्रियाओं के प्रति,
नायिकाओं के प्रति ।
अथ गुरुमान लक्षण—( दोहा )
(३४१) आन नारि के चिह्न लखि, अरु सुनि स्रवननि नाउँ ।
उपजत है गुरुमान तहँ, केसवदास सुभाउँ ।३।
शब्दार्थ—आन = (अन्य ) दूसरी । स्रवननि = अपने कानों से किसी
दूसरी नायिका का नाम सुनकर । नाउँ = नाम ( गोत्रस्खलन ) । सुभाउँ =
स्वभाव से ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न गुरुमान चिह्न-दर्शन तें यथा—( सवैया )
(३४२) आजु मिले बृषभानुकुमारिहि नंदकुमार बियोग बितैकै ।
रूप की रासि रस्यो रस केसव हास-विलासनि रोस रितैकै ।
बागे के भीतर देखि हियें नख नैन नबाइ रही सु इतै कै ।
फूलिहि में भ्रमि भूलि मनो सकुचे सरसीरुह चंद चितैकै ,४।
शब्दार्थ—बियोग = वियोगजन्य दुःख, विरह । बितैकै = व्यतीत करके,
दूर करके । रस रस्यो = आनंद प्राप्त किया । रोस रितैकै = रोषशून्य करके,
दूर करके । बागा = पोशाक, वस्त्र । इतै कै = इधर की ओर करके, अपनी
ओर करके । फूलिहि में = फूलते ही समय । भ्रमि = धोखे में पड़कर ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) आज श्रीकृष्ण राधिका से वियोग-
जन्य दुःख दूर करते हुए ( परम प्रेम से ) मिले और हास-विलास में रोष को
दूर करते हुए उन्होंने रूपवती ( राधा ) के प्रेम का आनंद प्राप्त किया । किंतु
संयोग से वस्त्रों के भीतर श्रीकृष्ण के हृदय पर नखक्षत देखकर उन्होंने इस
प्रकार उधर से अपने नेत्र हटाकर नीचे कर लिए मानो कमल के दो फूल जिस
१-छोम तें-छोभ सों । २-प्रकटहि ०-मानभेद प्रकटहि प्रिया । ३-के
-को । अरु-कँ । ४-हियें०-नखच्छत । नैन ०-रेख बनाइ । सकुचे-सकुच्यो ।

१८६ रसिकप्रिया
समय खिल रहे हों उ सी समय किसी (प्रकाशपिंड में) चंद्रमा का भ्रम हो जाने
से भूलकर (नखक्षत = द्वितीया का चंद्र) उसे देखते ही संकुचित हो गए हों।
अलंकार—उत्प्रेक्षा।
श्रीराधाकाजू को प्रकाश गुरुमान श्रवण तें, यथा—( सवैया )
(३४३) बूझति ही वह गोपी गुपालहि आजु कछू हँसिकै गुनगाथहिं।
ऐसे में काहू को नाम सखी कहि कैसे धौं आइ गयो ब्रजनाथहि।
खात खवावति ही जु बिरी सु रही मुख की मुख हाथ की हाथहिं।
आतुर ह्वै उनि आँखिन तें अँसुवा निकसे अखरान के साथहि। ५।
शब्दार्थ—बूझति ही = ( श्रीकृष्ण से ) पूछ रही थी। गुनगाथहिं =
उनकी गुणगाथा, उनकी बातें। कहि आइ गयो = मुख से निकल पड़ा। धौं
कैसे० = न जाने कैसे श्रीकृष्ण के मुख से निकल पड़ा, गोत्रस्खलन हो गया।
खाति खवावति ही = खा-खिला रही थी। ही = थी। बिरी = पान के बीड़े।
सु रही० = जो पान वह खा रही थी वह तो मुँह का मुँह में ही रह गया,
दाँतों से या होठों से जहाँ का तहाँ दबाए रह गई और जो हाथ में लेकर
उन्हें खिलाने जा रही थी वह हाथ में ही ज्यों का त्यों रह गया, उन्हें खिला
न सकी। आतुर ह्वै = व्यग्र होकर। उनि० = उनकी आँखों से। अखरान =
नाम के अक्षरों के साथ।
अलंकार—चपलातिशयोक्ति।
अथ नायक को गुरुमान-लक्षण—( दोहा )
(३४४) लोकलीक उल्लंघि कछु, प्रिया कहै जब बैन।
उपजि परत गुरुमान तहँ, प्रीतम के उर-ऐन। ६।
शब्दार्थ—लोकलीक = लोकमर्यादा। उल्लंघि = उल्लंघन करके ( लोक-
सीमा को पार करके )। ऐन = ( अयन ) घर। उर-ऐन = हृदय रूपी घर में,
हृदय में।
श्रीकृष्ण को प्रच्छन्न गुरुमान, यथा—( कबित्त )
(३४५) ऐसी ऐसी रति राचे सौंहनि के साँचे स्याम,
देखौ आनि बाँचि किधौं कौन की ये चीठी है।
सुनहु सभागै पाई रावरीयै पाग माँहँ,
कागर के रूप काहू आगि की अँगीठी है।
जानति हौं याही मग पायो है जनम जग,
औरहूँ अलोकन की बीथी तुम दीठी है।
५—नाम-नाउ। कहि कैसे-सुनि आयो। आइ०-कैसे कह्यो। ६—
उपजि०-उपजत है।

१८८ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—खोरि = दोष । खोरि = गली । घनी = अनेक । घरनीनि =
स्त्रियाँ ।
भावार्थ—( नायक के गुरुमान करने पर बहिरंग सखी की उक्ति नायिका
से ) अगर कोई शिकायत करनी ही हो तो अपने लोगों से अपने ही सामने
( एकांत में ) उसे कहते हैं । यह नहीं कि उसके दोषों का खजाना गलियों में
खोलने लगें ( गली गली सबसे दोष कहते फिरना अनुचित है ) । यदि किसी
की दृष्टि किसी की ओर जाती है तो इतना ही किया जा सकता है कि वह
उधर जाने से रोक ली जाय, यह तो हो नहीं सकता कि चाकू लेकर नेत्र ही
तराश दिए जायें । ( आज तो तू ऐसी बातें करके उन्हें क्रुद्ध कर रही है और
वियोग सहा रही है ) पर क्या जानती नहीं कि ये वे ही घनश्याम हैं जिनके
घड़ी भर के वियोग के कारण अनेक स्त्रियों की ऐसी दशा हो जाया करती
थी कि उनकी विरहाग्नि शांत करने के लिए कपूर घोलने की आवश्यकता
पड़ जाती थी । तू कैसी बातें करने लगी है, तुझे इस प्रकार बोलना चाहिए
जिस प्रकार साधारणतया बोलते हैं । मोल लिए हुए के प्रति भी क्या ऐसी
बातें कही जाती हैं, जैसी बातें तूने अपने प्रिय श्रीकृष्ण के प्रति कही हैं ?
( जो तेरे प्रेम में बिक चुका उसे ऐसी कड़ी बातें ! ) ।
सूचना—सखी की उक्ति से स्पष्ट है कि नायिका ने ऐसी बातें कही हैं
जैसी साधारणतः लोकमर्यादा के विरुद्ध हैं । श्रीकृष्ण की ओर से सखी
उलाहना दे रही है । वह बहिरंग है अतः प्रकाश गुरुमान है ।
अथ लघुमान-लक्षण—( दोहा )
(३४७) देखत काहू नारि-त्यों, देखै अपने नैन ।
तहँ उपजत लघुमान कै, सुनै सखी के बैन ।६।
शब्दार्थ—त्यों = ओर ।
भावार्थ—स्वयम् अपनी आँखों से किसी दूसरी स्त्री की ओर देखते हुए
नायक को देख लेने पर या ऐसी बात सखी से सुनने पर लघुमान उत्पन्न
होता है ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न लघुमान, यथा—( सवैया )
(३४८) कान्ह तिहारी वा प्रानप्रिया कें अयान सयान सबै मन माहीं ।
मान किधौँ अपमान अबै यह मानस पै अनुमाने न जाहीं ।
सुख दुख्ख न केसव जानि परै समुझ रिस हास न हाँ अरु नाहीं ।
यों खिन ही सियरी खिन ताती है ज्यौं बदलै बदरानि की छाहीं ।१०।
६—उपजत—उपजै । सखी के—सखीये । १० — मानस पै—मान लखौ ।
अनुमाने—पहिचाने । न हां—नहीं अरु माहीं । यों—जो । ही—में । है—सो, सु ।
बदरानि—बदरान ।

नवम प्रभाव १८६
शब्दार्थ - सयान = सयानापन, चतुराई । अयान = मूढ़ता, अज्ञान,
भोलापन । मानस = मनुष्य । पै = से । सियरी = ठंढी ।
भावार्थ-( सखी की उक्ति नायक से ) हे कन्हैया, तुम्हारी उस प्राण-
प्यारी की बातें कुछ खुलती नहीं-उसका सयानापन या भोलापन सब उसके
मन में ही रहता है। यह मान है या अपमान, अभी तो मनुष्य इसका अनुमान
लगा ही नहीं सकता ( पता नहीं चलता कि बात क्या है ? ) । न तो सुख
का पता चलता है न दुख का, न रोष अर्थात् उदासी का ही पता चलता है
न हँसी या प्रसन्नता का । ( पूछने पर ऐसे ढंग से बोलती है कि ) न 'हाँ'
का पता चलता है न 'नहीं' का । क्षण भर में तो वह ठंढी ( शांत ) पड़
जाती है और क्षण भर में गरम ( उग्र ) हो उठती है । वह तो अपना रंग
ढंग उसी प्रकार बदल रही है जैसे बादलों की छाया ( थोड़ी देर तक छाया
रहती है फिर हट जाती है, फिर आती है फिर हटती है ) ।
सूचना-जिस अवस्था का वर्णन किया गया है उससे मान व्यंजित
होता है । शब्दों द्वारा साफ साफ नहीं कहा गया है इसलिए प्रच्छन्न है ।
सखी कृष्ण को किसी बात का उलाहना नहीं दे रही है, इससे जान पड़ता
है कि नायिका ने श्रीकृष्ण का अन्य स्त्री से प्रेम किसी से सुना है, अतः
लघुमान है ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश लघुमान, यथा-( कवित्त )
(३४१) मूठहूँ न रूठिये री ईठ सों इतै कहा ब,
नेक पीठ देत ईठ कौन के भए अली ।
कालि केतौ नंदलाल मोसों घालि लालि करें,
कालि ही न आई ग्वारि जो पै तूँ हुती भली ।
आजुहीं जु बीच परी बीच पारिबे कौं माई,
आन रंग आन भाँति ज्यों कनेर की कली ।
तेरे ही कहे की कोऊ साखि है जु बूझिये री,
देखिये जु आँखि ताकी साखि की कहा चली ।११।
शब्दार्थ - ईठ = प्रिय, स्वामी, पति । पीठ देत = विमुख होने पर । मो-
सों घालि = मुझे बीच में डालकर, मेरे माध्यम से । लालि = मिन्नत,लालसा ।
बीच पारिबे कौं = भेद डालने को । कनेर = कनै ल का फूल । साखि =
साक्षी, गवाह ।
११-इतै०रती कहा बनै कुडाँठि पीठि देत ईठ कौन के अली । देत-
देइ । नन्दलाल०-केसौराइ नन्दलाल लालि करे । जो पै-पे तो । आन भाँति-
आनमति , आन रंग । ताकी०-ताकी०-ताहि०, साखि बूझिबे की ।

१५० रसिकप्रिया
भावार्थ—( सखी और नायिका के उत्तर प्रत्युत्तर ) (सखी-) प्रिय से
झूठमूठ भी रूठना नहीं चाहिए और इतना अधिक रूठने की तो कल्पना ही नहीं
करनी चाहिए। (नायिका ने) विमुख होने पर भला कौन प्रिय होता है? (सखी)
कल नंदलाल ने मुझसे तेरे लिए कितनी ही लालसाएँ कीं । (नायिका- )
यदि तू बड़ी भोली थी तो कल ही क्यों नहीं झगड़ा निपटाने आई ? सखी-)
अच्छा तो मैं आज ही बीच में पड़ती हूँ । (नायिका-) तब तो तू भेद ही
डालने के लिए बीच में पड़ेगी । श्रीकृष्ण तो कनेर की तरह बाहर और भीतर
से भिन्न स्वरूप वाले हैं ( कनेर की कली ऊपर लाल और भीतर सफेद होती
है, श्रीकृष्ण भी दिखाऊ प्रेम करते हैं भीतर से सौतों को चाहते हैं )।
( सखी-) तू जो बात कहती है, क्या उसका कोई साक्षी है जिससे पूछा जा
सके ? ( नायिका-) जो बात मैंने अपनी आँखों देखी उसके लिए साक्षी
की आवश्यकता ही क्या ?
सूचना—नायिका ने स्वयम् अपनी आँखों से श्रीकृष्ण को अन्य स्त्री की
ओर निहारते देखा है उसी पर लघुमान किया है। सखी (बहिरंग ) तक बात
पहुँच चुकी है इसलिए प्रकाश है ।
अथ प्रिय को लघुमान-लक्षण—(दोहा)
(३५०) प्रिय को कह्यो करै नहीं, प्रिया कौनहूँ काज ।
उपजत है लघुमान तहँ, बरनि कहत कबिराज ।१२।
शब्दार्थ—कौनहूँ काज = किसी कारण से ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न लघुमान, यथा-(सवैया)
(१५१) आगें कहा करिहौ अबहीं तें इतौ दुख दीनो कह्यो बिनु कीनें ।
केसव कौनहु लाज कि लाड़ तें भूलि गई तौ भए हित हीनें ।
भेंटे नहीं भरि अंक लला भरि जीभ न बोली जु बोल नवीनें ।
देखे नहीं कबहूँ भरि आँखिनि आजुहिं कैसें चलै चित लीनें ।१।
शब्दार्थ—कह्यो बिनु कीनें = कहा न करके । कि = अथवा । लाड़ तें =
प्यार से । हीने = अभाव, कमी । चलै चित लीनें = ( चित चलै लीनें ) चित्त
चंचल कर लिया, चित्त हटा लिया ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से ) आगे क्या करोगी, कहा हुआ
१२—प्रिय-तिय । नहीं-न जहँ । प्रिया-पिया । प्रिया०-प्रिय को
नाहीं लाज । बरनि०-बरनत हैं । १३—करिहो-हरिहो । तें-तौ । कि-के,
की । भए-भई । भेंटे-भेंटत हो । भरि०-भरि जीव, हँसि जोय । आँखिनि-
नैननि । चलै-चलो ।

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नवम प्रभाव १६१
न करके तो अभी तुमने इतना दुःख दिया। किसी लज्जा के कारण या प्यार
के कारण भूल कर गईं जिससे हित की हानि हुई। तुमने लाल को अंक
भरकर भेंटा नहीं और भर जीभ नई नई बातें भी नहीं कीं। अभी तो भर
आँख उन्हें देखा भी नहीं फिर अपने चित्त को आज ही उनसे क्यों चलायमान
कर लिया ? (उनकी कही बातें क्यों नहीं करतीं)।
सूचना—सखी नायिका को उलाहना देने आई है इससे नायक का
लघुमान व्यक्त होता है। बहिरंग सखी भी जानती है, इसलिए प्रच्छन्न है।
श्रीकृष्णजू को प्रकाशन लघुमान, यथा— (सवैया)
(३५२) बोलि ज्यौं आए त्यौं बोलत नाहिनै मोसों कहा कछु चूक तिहारी।
केसव कैसहूँ देखे सुने बिन जानै कहा कोऊ जी की पिहाँ री।
खोर सिराइ न जानत खाइ, नई यह भूख की भाँति निहारी।
काँचि ही दाखहि चाहत चाख्यो सु अंत तऊ तुम कुंजबिहारी। १४।
शब्दार्थ—चूक = भूल, अपराध। यहाँ

१६२ रसिकप्रिया
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न मध्यममान, यथा—( सवैया )
(३५४) कहौ कान्ह कहाँ सिगरी निसि नासी सु तौ तुम्हीं कहँ चाहतहीं ।
तनु में तनु रेख लिखी किहि केसव कंटक कानन गाहतहीं ।
कछू राती सी आँखि कहा भई ताती तिहारे बियोग के दाहतहीं ।
हिय-बंचक-रीति रची जब रंचक लाइ लई उर नाह तहीं ।१६।
शब्दार्थ—( नायक और नायिका के प्रश्नोत्तर ) ( नायिका— ) हे
कन्हैया, कहिए सारी रात कहाँ बिताई ? (नायक— ) तुम्हारी प्रतीक्षा करते
हुए तो । ( नायिका— ) कहिए, आपके शरीर में यह पतली ( नख की )
रेखा कैसी है ? ( कृष्ण— ) घूमते-फिरते वन में काँटों की खरोंच लग गई
है ( नायिका— ) अच्छा यह तो बताइए आपकी आँखें कुछ लाल क्यों हैं ?
(नायक— ) तुम्हारी वियोगाग्नि में जलने से गरम होकर ये लाल हो गई हैं।
इस प्रकार कहने पर जब नायिका ने उनकी बातों पर अविश्वास
व्यक्त करते हुए विचित्र मुद्रा से कुछ हृदय लुभाने का सा ढंग दिखाया, तब
नायक ने उसे हृदय से लगा लिया ।
सूचना—अन्य स्त्री से बातें करते देख लेने से नायिका ने मान किया,
इसलिए मध्यममान है । नायक-नायिका तक ही बात है इससे प्रच्छन्न । चौथे
चरण में मानमोचन हो जाने का आभास मिलता है इसलिए सरदार ने उसका
अर्थ इस प्रकार किया है— (नायक) तुमने भी हृदय को धोखा देनेवाली
रीति पकड़ी है । ( नायिका ) आप केवल बात करके क्यों रह गए जरा वहीं
पर उसे गले क्यों नहीं लगा लिया ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश मध्यममान, यथा—( सवैया )
(३५५) सखि ज्यों उनको तू बकावति मोहूँ कों आई बकावन हूँ गरई ।
अब याही तें तोसहूँ बात कछू कहिबे कों हुती न कही परई ।
कहि केसव आपनी जाँघ उघारिकै आपही लाजनि को मरई ।
इक तौ सब तें हरए हरि हैं अब होहुँ कहा हरि तें हरई ।१७।
शब्दार्थ—गरई = हठीली, ढीठ । हरए = हलके, शरारती, नटखट,
निर्लज्ज, दुष्ट । हरई = हलकी, निर्लज्ज ।
भावार्थ—( नायिका ने जिस स्त्री से नायक को बातचीत करते देखा
है, वही मानमोचन के लिए आई है, नायिका उसी से कह रही है ) जिस
१६—नासी-नारी, नाखी । तनु-नल । किहि-कँहि । तिहारे-कि तेरे ।
१७—सखि ज्यों—ज्यों । तू—त्यों । कों-जू, सों । तोसहूँ-तो सों है । परई-
थरई । कै-ब । आपही-आपुन । अब०-अरु होहू ब होऊँ कहा हरई ।

१३ नवम प्रभाव १६३
प्रकार तू उन्हें बकबक करने के लिए प्रेरित करती है क्या ढीठ होकर मुझे
भी बकबक कराने आई है (जैसे उनका सिर खपाती है वैसे मेरा भी खपाने
आई है)। इसी से जो कुछ बात तुझसे कहने को थी वह भी मुझसे कही
नहीं जाती (कौन तुझसे माथा मारे)। कौन अपनी जाँघ उघारकर स्वयम्
ही लज्जा से मरे (तुझसे अपना ही भेद खोलकर मैं क्यों पछताऊँ)। एक तो
श्रीकृष्ण और सब लोगों से बढ़कर निर्लज्ज हैं, क्या मैं अब उनसे भी बढ़कर
निर्लज्ज हो जाऊँ ?
सूचना-नायिका ने बात करते सुना है अतः मध्यममान। जिससे बात
हुई है उसी से बातें हो रही हैं, अतः 'प्रकाश' है।
अलंकार-लोकोक्ति ।
अथ प्रिय को मध्यममान-लक्षण- (दोहा)
(३५६) जहाँ न मानै मानिनी, हारै पिय जु मनाइ ।
उपजत मध्यम मान तहँ, प्रीतम के उर आइ ।१८।
शब्दार्थ-मनाइ हारै = मनाते मनाते थक जाय ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न मध्यममान, यथा- (कवित्त)
(३५७) बार बार बरजी मैं सारस सरस मुखी,
आरसी लै देखि मुख आरस में बोरिहैं ।
सोभा के निहोरे तें निहारति न नेंकहूँ तूँ,
हारी हैं निहोरि सब कहा काहू खोरि हैं ।
सुख को निहोरो जु न मान्यो सो भली करी तैं,
कैसोदास की सौं तोहि जौ तूँ मुँह मोरिहै ।
नाह के निहोरें किन मानहि निहोरति हौं,
नेह के निहोरें फिर मोहीं जु निहोरिहै ।१९।
शब्दार्थ-बरजी = मना किया । सारस = कमल । सरस = रसीला,
रसमय । आरसी = दर्पण । आरस में बोरिहै = आलस्य में डुबो देगी, मलिन
कर देगी । निहोरे = कारण, बहाने । खोरि = दोष, अपराध, त्रुटि । सौं =
सौगंध, शपथ । मुख मोरिहै = विमुख या प्रतिकूल होगी । किन = क्यों नहीं ।
निहोरति हौं = मनाती हूँ । निहोरें = विवश करने पर ।
भावार्थ- (सखी ने मान करते समय नायिका को समझाया था कि
मान मत कर तुझे पीछे पछताना पड़ेगा। पर उसने मान किया, नायक के
१८-पिय जु-पीउ । १९-आरस-या रस । तें-तौ, त्यों । जु-जो ।
तैं-न, ब । कैसोदास-केसोराय । ताहि-अब । मुहँ-मुख, मन । किन-किहि ।
मानहि-मानति । मोही-मोहू । जु-तू ।