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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 286 में से

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पृष्ठ 182

नवम प्रभाव
अथ मान-लक्षण—( दोहा )
(३३६) पूरन-प्रेम-प्रताप तें, उपजि परत अभिमान ।
ताकी छबि के छोभ तें, केसव कहियत मान । १।
शब्दार्थ—प्रताप तें = प्रभाव से, कारण। छवि के छोभ तें = उसकी
छटा के उद्रेक से ।
(३४०) प्रकटहि पिय प्रति मानिनी, गुरु लघु मध्यम मान ।
प्रकटहिं पीय प्रियानि प्रति, केसवदास सुजान ।२।
शब्दार्थ—पिय, पीय = प्रिय, नायक । प्रियानि प्रति = प्रियाओं के प्रति,
नायिकाओं के प्रति ।
अथ गुरुमान लक्षण—( दोहा )
(३४१) आन नारि के चिह्न लखि, अरु सुनि स्रवननि नाउँ ।
उपजत है गुरुमान तहँ, केसवदास सुभाउँ ।३।
शब्दार्थ—आन = (अन्य ) दूसरी । स्रवननि = अपने कानों से किसी
दूसरी नायिका का नाम सुनकर । नाउँ = नाम ( गोत्रस्खलन ) । सुभाउँ =
स्वभाव से ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न गुरुमान चिह्न-दर्शन तें यथा—( सवैया )
(३४२) आजु मिले बृषभानुकुमारिहि नंदकुमार बियोग बितैकै ।
रूप की रासि रस्यो रस केसव हास-विलासनि रोस रितैकै ।
बागे के भीतर देखि हियें नख नैन नबाइ रही सु इतै कै ।
फूलिहि में भ्रमि भूलि मनो सकुचे सरसीरुह चंद चितैकै ,४।
शब्दार्थ—बियोग = वियोगजन्य दुःख, विरह । बितैकै = व्यतीत करके,
दूर करके । रस रस्यो = आनंद प्राप्त किया । रोस रितैकै = रोषशून्य करके,
दूर करके । बागा = पोशाक, वस्त्र । इतै कै = इधर की ओर करके, अपनी
ओर करके । फूलिहि में = फूलते ही समय । भ्रमि = धोखे में पड़कर ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) आज श्रीकृष्ण राधिका से वियोग-
जन्य दुःख दूर करते हुए ( परम प्रेम से ) मिले और हास-विलास में रोष को
दूर करते हुए उन्होंने रूपवती ( राधा ) के प्रेम का आनंद प्राप्त किया । किंतु
संयोग से वस्त्रों के भीतर श्रीकृष्ण के हृदय पर नखक्षत देखकर उन्होंने इस
प्रकार उधर से अपने नेत्र हटाकर नीचे कर लिए मानो कमल के दो फूल जिस
१-छोम तें-छोभ सों । २-प्रकटहि ०-मानभेद प्रकटहि प्रिया । ३-के
-को । अरु-कँ । ४-हियें०-नखच्छत । नैन ०-रेख बनाइ । सकुचे-सकुच्यो ।